मुद्दा

स्‍वयंसेवी संगठनों से एनजीओ तक की यात्रा : समाजवाद से पूँजीवाद में राष्‍ट्र का संक्रमण- प्रमोद मीणा

 

  •  प्रमोद मीणा

 

नॉन गवर्नमेंट ऑर्गनाइजेशन का संक्षिप्‍त रूप है एनजीओ। जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि एनजीओ से तात्‍पर्य गैर सरकारी संगठन से है यद्यपि इसकी कोई ऐसी परिभाषा देना संभव नहीं है जो निर्दोष हो और सभी को मान्‍य भी हो किन्तु फिर भी अलग-अलग क्षेत्रों में जो तमाम तरह के एनजीओ अलग-अलग लक्ष्‍यों को लेकर काम कर रहे हैं, उनमें कुछ सामान्‍य विशेषताएँ हम लक्षित करते हैं। एनजीओ कहलाने के लिए सबसे जरूरी तत्‍व है कि एनजीओ नामधारी संगठन किसी भी सरकार के प्रत्‍यक्ष नियंत्रण से मुक्‍त हो। राजनीतिक दल के रूप में कार्यरत किसी गैर सरकारी संगठन को एनजीओ के दायरे में शामिल नहीं किया जा सकता। एनजीओ एक गैर लाभकारी संगठन या संस्‍था के रूप में जन कल्‍याण से जुड़े मुद्दों पर कार्य करता है। सामाजिक-सांस्‍कृतिक और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के सशक्तिकरण से लेकर प्राकृतिक आपदा आदि के समय बचाव और राहत कार्यों तक में परम्परागत रूप से इनकी महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है। आजकल सरकारी विकास योजनाओं को लक्षित तबके तक पहुँचाने में मध्‍यवर्ती कड़ी के रूप में भी ये काम कर रहे हैं। अनैतिक गतिविधियों और हिंसा में इसकी संलग्‍नता नहीं होनी चाहिए।

लेकिन कुछ एनजीओ वाणिज्यिक गतिविधियों में भी लिप्‍त पाये जाते हैं। परामर्श सेवा और प्रकाशन आदि के माध्‍यम से वे आर्थिक लाभ कमा रहे हैं। इसी प्रकार कई बार कुछ कथित एनजीओ किसी राजनीतिक पार्टी विशेष के पक्ष में काम करते देखे जा सकते हैं। उदाहरण हेतु आरएसएस से प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष तौर पर जुड़े एनजीओ भारतीय जनता पार्टी की चुनावी मशीनरी का हिस्‍सा रहते हैं। यहाँ वामपंथी विचारधारा से सहानुभति रखने वाले एनजीओ के अस्तित्‍व से भी इनकार नहीं किया जा सकता किन्तु विचारधारा और चुनावी क्रिया-कलाप दोनों अलग-अलग चीजें हैं। एक तरफ सत्‍ता की दलाली करने वाले कुछ एनजीओ हैं तो दूसरी तरफ वंचितों-पिछड़ों और स्त्रियों के नागरिक अधिकारों के लिए संरचनात्‍मक परिवर्तन की मुहिम चलाने वाले एनजीओ भी हैं।

1990 के बाद से जो नवउदारवादी अर्थव्‍यवस्‍था हमने अपनाई है, उसके चलते हमारे देश में एनजीओ की संख्‍या और उनके कार्य क्षेत्र में इतना ज्‍यादा विस्‍तार हुआ है कि लोक प्रशासन से जुड़े लोग इन्‍हें राज्‍य का पाँचवा स्‍तम्‍भ तक बताने लगे हैं। राज्‍य प्रायोजित नियोजित विकास योजनाओं में व्‍याप्‍त लालफीताशाही और भ्रष्‍टाचार के साथ-साथ बाज़ार केंद्रित अर्थव्‍यवस्‍था के कारण जिस प्रकार मानव विकास सूचकांक पर हम फिसड्डी साबित हुए हैं और विषमता की खाई साल दर साल बढ़ती जा रही है, उसके चलते जहाँ हमारे लोकतंत्र की संस्‍थागत संरचना की कार्यकुशलता संदेह के दायरे में आ गयी है, वहीं दूसरी तरफ इसके लोक कल्‍याणकारी चरित्र पर भी सवाल उठने लगे हैं। ऐसे में राज्‍य के सहयोगी हाथों के रूप में और राज्‍य के जनकल्‍याणकारी चरित्र के विकल्‍प के रूप में भी एनजीओ को देखा जाने लगा है। विश्‍व बैंक और अन्तर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष के साथ-साथ हमारे यहाँ निवेश करने वालें बहुराष्‍ट्रीय निगमों आदि का दबाव भी इस संदर्भ में ध्‍यातव्‍य है। राजकोषीय घाटे को कम करने और जन हित के कार्यक्रमों में प्रत्‍यक्ष सहभागिता से बचने के पूँजीवादी दिशा निर्देशों के साथ कदम ताल मिलाती केंद्र और राज्‍य सरकारों के सामने राज्‍य और नागरिक के बीच की मध्‍यवर्ती कड़ी के रूप में एनजीओ तंत्र को स्‍वीकारने के अलावा आज कोई रास्‍ता भी नहीं बचा है। वास्‍तव में लोक कल्‍याणकारी राज्‍य की जो अवधारणा हमने अपने संविधान में अपनाई है और नागरिकों की बेहतरी के लिए संविधान में जो नीति निर्देशक तत्‍व रखे गये हैं, उन सबके संदर्भ में भी आज एनजीओ की भूमिका को रेखांकित किया जाने लगा है। किन्तु मशरूम की तरह अनियंत्रित ढंग से बढ़ते इन एनजीओ और उनकी गतिविधियों पर निगरानी और नियमन के लिए आयोग तक बनाने की माँग होने लगी है।

एनजीओ संज्ञा के आधिकारिक प्रचलन का श्रेय संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ (यूनाइटेड नेशन्‍स) की आर्थिक और सामाजिक परिषद् को है। पहले विश्‍युद्ध में हुई मानवता की अपार क्षति के उपरांत विश्‍वयुद्ध जनित पारस्‍परिक घृणा और डर के खिलाफ क्षत-विक्षत मानवता की सेवा करने और यूरोप के विभिन्‍न देशों के युवाओं के बीच मैत्री स्‍थापित करने के लिए 1920 में सर्विस सिविल इंटरनेशनल की स्‍थापना की गयी। यह संस्‍था परोपकारिता और सेवा भाव के साथ जमीनी स्‍तर पर कमजोर तबकों के कल्‍याण के साथ-साथ प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के समय राहत और बचाव कार्यों में भागीदारी करती थी। 1945 में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की स्‍थापना से पहले जन कल्‍याण के क्षेत्र में काम करने वाली स्‍वयंसेवी संस्‍थाएँ और संगठन अपने नाम के साथ ‘इंटरनेशनल’ विशेषण विशेष रूप से लगाते थे। यह विशेषण इस बात का द्योतक था कि मानवता की सेवा राष्‍ट्रवाद की संकीर्ण दीवारों से बढ़कर है। जब संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की स्‍थापना हुई और उसके मुख्‍य अंग के रूप में आर्थिक और सामाजिक परिषद् अस्तित्‍व में आई तो वैश्विक शांति सुनिश्चित करने के लिए दुनियाभर के देशों में समान रूप से आर्थिक और सामाजिक उन्‍नयन को अति आवश्‍यक माना गया। और इस क्षेत्र में दो या दो से ज्‍यादा देशों की सरकारों के आपसी समझौतों से जन्‍म लेने वाली विशेष संस्‍थाओं के साथ-साथ गैर सरकारी संगठनों को भी मान्‍यता दे दी गयी। इस प्रकार वैश्विक स्‍तर पर सत्‍तर के दशक के आरंभ से एनजीओ संज्ञा प्रचलन में आने लगी।

आगे बढ़ने से पहले में नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया के हर पूर्व औद्योगिक समाज में ग्रामीण समुदायों का अस्तित्‍व पारस्‍परिक सहयोग निर्भर रहा है और आज भी आदिवासी समाजों में सामूहिक सहयोग और पारस्‍परिक सेवा भाव देखा जा सकता है। कृषि उपजों का संग्रह, कमजोर और बुजुर्ग लोगों की सहायता, अनपढ़ लोगों को साक्षर बनाना और अकाल या बाढ़ के समय राहत कार्य जैसे मुद्दों पर जन कल्‍याण के भाव से पारस्‍परिक स्‍वयं सहायता की परम्परा पूर्व औद्योगिक समाजों में हम सर्वत्र पाते हैं। लेकिन औद्योगीकरण और पूँजीवाद के साथ जब हर सम्बन्ध को पैसों से तोला जाने लगा तो मनुष्‍य-मनुष्‍य के बीच स्‍वार्थ और अपरिचय की खाई बढ़ती गयी। जैसे-जैसे ग्रामीण समाज का नगर समाज में रूपांतरण हुआ, जैसे-जैसे सरकारें जनहित की तरफ से आँखें मूंदकर बाज़ार केंद्रित अर्थव्‍यवस्‍था की तरफ बढ़ती गयी, वैसे-वैसे सहानुभूति और पारस्‍परिक सहयोग के भाव रीतते गये। अपने से कमजोर लोगों और संकट से घिरी आबादी की सहायता करने की सहज संवेदना के सूख जाने पर यह जरूरी हो गया कि एनजीओ के माध्‍यम से रोती-बिलखती मनुष्‍यता को बचाने का संस्‍थागत उपक्रम शुरु किया जाए। किन्तु मार्क्‍सवादी चिंतकों का यह मानना है कि बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों और निगमों की लूट के खिलाफ बहुसंख्‍यक शोषित-वंचित आबादी में घर करते आक्रोश के वामपंथ की तरफ रुझान से डरा हुआ पूँजीवाद एक षड्यंत्र के तहत अपने अस्तित्‍व को बचाने के लिए एनजीओ तंत्र में भारी निवेश कर रहा है। यह भी देखा गया है कि कंपनियाँ बाज़ार में अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए भी लोक हित से जुड़े किसी विषय विशेष पर कार्यरत एनजीओ आदि को आर्थिक सहायता प्रदान कर रही हैं। भारत सरकार ने तो आयकर में छूट आदि के नाम पर अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता भी इस संदर्भ में स्‍वयं ही सुनिश्चित करने की छूट कंपनियों को दी हुई है। कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (निगमत सामाजिक दायित्व) का प्रावधान यहाँ उल्‍लेखनीय है।

यद्यपि एनजीओ संज्ञा पद पश्चिम से हमारे देश में आया है किन्तु लोक कल्‍याण की वैकल्पिक और कहीं ज्‍यादा बेहतर व्‍यवस्‍थाएँ हमारे यहाँ भी अतीत में जब तब देखी जा सकती थीं। वैसे तो प्राचीन भारत में जन हित से जुड़ी गतिविधियों और सामाजिक सेवाओं की जिम्‍मेदारी शासक और धर्म पर हुआ करती थी लेकिन इस संदर्भ में परम्परागत ग्राम पंचायतें और जातीय संगठन भी काम किया करते थे। मध्‍यकाल में आत्‍म निर्भर सहयोग और लोक कल्‍याण का चरित्र मूलत: सामाजिक था, कुछ अपवादों को यदि छोड़ दें, तो राज्‍य की इस क्षेत्र में कोई ख़ास भूमिका प्राय: नहीं दिखाई देती। यह तो आधुनिक राज्‍य के अस्तित्‍व में आने पर ही ‘स्‍वयंसेवी’ और ‘गैर सरकारी’ विशेषण लोक कल्‍याणकारी गतिविधियों के साथ जुड़ने शुरु होते हैं। वास्‍तव में ये विशेषण आधुनिक राज्‍य में सत्‍ता तंत्र की बढ़ती दखल की प्रतिक्रिया में ही सामने आते हैं।

औपनिवेशिक काल के दौरान 19 वीं सदी में हमारे यहाँ लोकहित से जुड़े मुद्दों पर दो प्रकार के गैर सरकारी उपक्रम समान्तर रूप से संचालित नज़र आते हैं। एक ओर औपनिवेशिक राज्‍य की वरदहस्‍ती में चर्च और ईसाई मिशनरियाँ मुख्‍यधारा से कटे हुए हाशिये के लोगों विशेषत: आदिवासियों के सामाजिक और धार्मिक जीवन में दखल देने लगती हैं। स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में इनका महत्‍वपूर्ण योगदान नकारा भी नहीं जा सकता। दूसरी ओर यहीं के प्रबुद्ध लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलन संगठित तौर पर चलाये जाते हैं। सुधार हेतु नये सामाजिक कानून लागू करने के लिए औपनिवेशिक राज्‍य पर दबाव डाला जाता है। इस प्रकार इस देश के इतिहास में शायद पहली मर्तबा राज्‍य और सामाजिक-धार्मिक सुधारों के बीच एक सीधा संवाद कायम होता है। सती प्रथा, पर्दा प्रथा और कन्‍या वध पर रोक से लेकर तलाक और विधवा विवाह के लिए वैधानिक स्‍वीकृति प्राप्‍त करना उस समय के सामाजिक आन्दोलनों के मुख्‍य विषय होते थे। राजा राम मोहन राय का ब्रह्म समाज, दयानंद सरस्‍वती का आर्य समाज, महात्‍मा फुले का प्रार्थना समाज आदि उस दौर में औपनिवेशिक राज्‍य के सहयोग से सामाजिक सुधारों के लिए आन्दोलन चलाने वाले गैर सरकारी संगठन ही तो थे। एक अन्‍य प्रकार के गैर सरकारी संगठन भी उस समय अस्तित्‍व में आये – जातियों के अपने जातीय संगठन जो अपनी जाति के सदस्‍यों के कल्‍याण हेतु संगठित तौर पर काम रहे थे। इन जातीय संगठनों का मुख्‍य कार्य क्षेत्र शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य था। अंग्रेजी शासन में उपलब्‍ध सरकारी नौकरी आदि के अवसरों को भुनाने के लिए अपनी जाति को आधुनिक ढंग की अंग्रेजी शिक्षा देने के लिए छात्रावास और विद्यालय-महाविद्यालय खोलना तथा अपनी जाति के जरूरतमंद विद्यार्थियों को वज़ीफा आदि देना इनके उल्‍लेखनीय कार्य थे। आज भी जातीय हितों के लिए लामबंद ऐसे गैर सरकारी संगठन सक्रिय मिलते हैं।

इन गैर सरकारी सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों और जातीय संगठनों की गतिविधियों पर निगरानी रखने और इन्‍हें विनियमित करने के लिए ही औपनिवेशिक भारतीय राज्‍य ने 1860 में सोसायटी पंजीकरण अधिनियम बनाया था। इस अधिनियम के संदर्भ में यह भी ध्‍यातव्‍य है कि 19 वीं सदी के अन्त और 20 वीं सदी की शुरुआत के साथ ही हमारे देश में सामाजिक और धार्मिक सुधारों के लिए काम करने वाले संगठनों और संस्‍थानों के चरित्र में ब्रिटिश उपनिवेशवाद विरोधी राजनीतिक चेतना घर करने लगी थी। कांग्रेस की स्‍थापना के साथ ही सुधार आन्दोलन उपनिवेशवाद विरोधी राजनीतिक आन्दोलनों के साथ अपने को जोड़ने लगे थे।

भारतीय स्‍वाधीनता आन्दोलन में गाँधी के आगमन के साथ ही कांग्रेस के नेतृत्‍व में चल रही आज़ादी की लड़ाई में एक नया आयाम सृजनात्‍मक कार्यों का जुड़ जाता है। गाँधी जी के दिशा निर्देशन में कई सारी संस्‍थाएँ बनाई जाती हैं जो आजादी के आन्दोलन को सीधे-सीधे समाज सेवा के साथ जोड़ देती हैं। गाँधीवादी समाज सेवा के मुख्‍य कार्य क्षेत्र थे – खादी और ग्राम उद्योग, बुनियादी शिक्षा, साफ-सफाई, स्‍वास्‍थ्‍य और अछूतोद्धार आदि। गाँधी ने पूर्व को सभ्‍य बनाने के पश्चिमी अहंकार को सीधे चुनौती देते हुए अपने लोगों की भौतिक और आध्‍यात्मिक बेहतरी के लक्ष्‍य को ध्‍यान में रखते हुए अपने ही संसाधनों के सुप्रबंधन पर बल दिया। इस प्रकार गाँधी रचनात्‍मक कार्यों के माध्‍यम से लोगों के स्‍वत: सशक्तिकरण का रास्‍ता दिखाते हैं। सामाजिक आन्दोलन और राजनीतिक स्‍वराज्‍य के इस मेल ने औपनिवेशिक सत्‍ता को सामाजिक सुधारों के मार्ग में साधक के रूप में देखने की दृष्टि बदल डाली। अब हम विदेशी सत्‍ता को सामाजिक गतिशीलता के मार्ग में बाधा स्‍वरूप देखने लगे। आजादी के बाद विनोबा भावे के नेतृत्‍व में भूमिहीनों के पक्ष में अतिरिक्‍त भूमि के वितरण को राष्‍ट्रीय मुद्दा बनाकर चले भूदान आन्दोलन को भी गाँधीवादी रचनात्‍मक कार्यों की ही कड़ी में रखना चाहिए।

स्‍वाधीनता आन्दोलन के अंतिम चरण में कांग्रेस के अंदर गाँधीवादियों और समाजवादियों के बीच वैचारिक मतभेद की खाई काफी गहरा गयी थी। कांग्रेस से बाहर रहकर काम करने वाले वामपंथी पहले से ही कांग्रेस की आर्थिक नीतियों से असहमत थे। आजादी के बाद 60 तक आते-आते समाज सेवा से जुड़े गाँधीवादी संगठनों की ऊर्जा भी सरकारी सहायता हथियाने के चक्‍कर में चुकने लगी थी अत: समाजवादी-मार्क्‍सवादी विचारधारा से जुड़े आन्दोलनकारी संगठनों की ओर आम जन का आकर्षित होना स्‍वाभाविक ही था। वामपंथी विचारधारा से जुड़े ये संगठन शोषक और शोषित के परस्‍पर विरोधी हितों की टकराहट को मुद्दा बना रहे थे। अब व्‍यवस्‍था में सुधार की जगह, राज्‍य से याचना की जगह परिवर्तन और अधिकारों की बात होने लगती है। इनके लिए स्‍वयंसेवी सहायता समूह चलाना एक मिशन की तरह था। इन गैर सरकारी स्‍वयंसेवी समूहों ने सामाजिक-आर्थिक न्‍याय के क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण कार्य किये, जैसे – भूमि सुधार, भू अधिकार, न्‍यूनतम मजदूरी, बंधुआ मजदूरी और बेगार की समाप्ति आदि के लिए जनचेतना फैलाना। आगे चलकर इंदिरा गाँधी सरकार द्वारा लगाये गये आपात काल के खिलाफ भी इन्‍होंने संघर्ष किया। आदिवासी इलाकों में राष्‍ट्र निर्माण की आड़ में जारी आंतरिक उपनिवेशवाद का भी इन्‍होंने विरोध किया और नवउदारीकरण के साथ आदिवासी इलाकों में संसाधनों की लूट का जो नया दौर शुरु होता है, उसमें ये ही लोग हैं जो आज भी बेहद ईमानदारी के साथ न्‍यायिक अधिकारों के लिए सरकार और देशी-विदेशी कंपनियों के साथ जमीनी स्‍तर पर लड़ाई लड़ रहे हैं। वन्‍य उपजों के वाजिब मूल्‍य का मुद्दा हो या विकास परियोजनाओं से विस्‍थापित आदिवासियों के पुनर्वास का संघर्ष हो, इन सहायता समूहों ने प्रशंसनीय कार्य किये हैं। जनहित याचिका के अधिकार ने इनके संघर्ष को एक नई धार दी। लेकिन एक तरफ माओवादियों और नक्‍सलियों द्वारा इन पर वर्ग संघर्ष को कम करने का आरोप मढ़कर इनके खिलाफ हिंसक कार्रवाइयाँ की जाती रही हैं, वहीं दूसरी तरफ नब्‍बे के बाद पूँजीवाद का क्रीतदास बन चुका राज्‍य इन पर पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी हितों के नाम पर विकास परियोजनाओं के मार्ग में अवरोध खड़े करने के आरोप लगाता रहा है। मनरेगा और सूचना अधिकार कानून के पीछे जिस किसान-मजदूर शक्ति संगठन की भूमिका बड़ी महत्‍वपूर्ण रही थी, उसे भी बदनाम करने में पूँजीवादी सरकारें जब तब लगी रहती हैं। आजकल तो सरकार और भगवा ताकतें इन्‍हें अर्बन नक्‍सली कहकर इन पर राष्‍ट्र विरोधी होने का ठप्‍पा तक लगा रही हैं। दलितों, आदिवासियों और अल्‍पसंख्‍यकों के मानवाधिकारों की बात करने वाले एनजीओ पर आज विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फेमा) की आड़ में कार्यवाहियाँ की जा रही हैं। फोर्ड फाउंडेशन और ग्रीन पीस पर भारत विरोधी गतिविधियों में संलग्‍न होने के आरोपों को भी इसी संदर्भ में देखा जाना जरूरी है।

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एनजीओ क्षेत्र में आज के नवउदारवादी दौर में जो नयी प्रवृत्ति देखी जा रही है, वह है सरकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं के क्रियान्‍वयन में सरकार और लक्षित वर्ग के बीच मध्‍यस्‍थ की भूमिका निभाना। वस्‍तु और सेवा अदायगी के तंत्र के रूप में इन एनजीओ का रूपांतरण साफ-साफ दृष्‍टव्‍य है। और यही कारण है कि आज इन एनजीओ और सरकार के बीच की विभाजक रेखा मिटने लगी है। सेवाधर्मी आन्दोलनधर्मिता की जगह अब सरकारी सहायता और विदेशी डॉलरों से स्‍वयं का विकास करने के लिए प्रबंधन से जुड़े लोग एनजीओ क्षेत्र में उतर रहे हैं। पहले एनजीओ चलाना समाजसेवा हुआ करता था और लोग सेवानिवृत्ति के बाद समाज के प्रति अपने कुछ दायित्‍व बोध से संचालित हो इस क्षेत्र में आते थे लेकिन अब तो पेशेवर युवा वर्ग इस क्षेत्र में अपना कैरियर देख रहा हैं। आज के किसी एनजीओ के वास्‍तविक चरित्र को समझने के लिए उसके लोकसेवा से जुड़े कार्यों की जगह उसके वित्‍तीय लेन-देन की पड़ताल कहीं ज्‍यादा जरूरी है। एनजीओ और दानदाता एजेंसी के बीच के गूढ़ रिश्‍तों की पहचान जरूरी है। किन्तु खेद की बात है कि इन रिश्‍तों के बारे में प्रमाणिक आंकड़ें जुटाने और उन्‍हें सार्वजनिक करने में हमारी सरकारों की कोई रुचि नहीं रही है। जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई को भोंथरा करने के लिए दक्षिणपंथी सांप्रदायिक संगठनों द्वारा भी एनजीओ की आड़ में भगवा राजनीति के पक्ष में जनमत तैयार करने का काम किया जा रहा है। सरकारी पैसा पार्टी कार्यकर्ताओं और अपने आनुषंगिक संगठनों की जेबों में स्‍थानांतरित करने के लिए भी एनजीओ पुल का काम कर रहे हैं।

अस्‍तु, एनजीओ के मूल में चाहे नि:स्‍वार्थ सेवा भाव का आदर्श रहा हो किन्तु आज की 21वीं सदी की वस्‍तुस्थित यह है कि बहुत सारे एनजीओ ऐसे भी हैं जिनके पीछे सही में देखा जाए तो नि:स्‍वार्थ सेवा भाव दूर-दूर तक नहीं होता है। आज कॉरपोरेट कल्‍चर में ढले उच्‍च और मध्‍यवर्ग के पेशेवर लोग पेशेवर ढंग से एनजीओ चला रहे हैं। स्‍पष्‍ट है कि स्‍वयंसेवी संगठनों के लिए एनजीओ संज्ञा का प्रयोग यथोचित नहीं कहा जा सकता।

(संपर्क :– डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जिला स्‍कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार–845401, ईमेल – pramod.pu.raj@gmail.com, pramodmeena@mgcub.ac.in; दूरभाष – 7320920958 ) 

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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