मैं कहता आँखन देखी

जम्मू-कश्मीर के इन सवालों पर बोलना खतरनाक है

 

  • नवल किशोर कुमार

आज का लेख सुगठित नहीं बन पा रहा। कारण कि कई सारे सवाल हैं। दरअसल जिस देश में हम अभी हैं वहां कुछ भी सुगठित-सुव्यवस्थित नहीं है। आर्थिक मंदी का सवाल तो है ही, साथ ही कुछेक राज्यों में चुनाव भी होने हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में बाढ़ के कारण उपजे सवाल हैं। लेकिन सोचता हूं कि आज जम्मू-कश्मीर की बात की जाय। पता लगाया जाय कि वह जम्मू-कश्मीर जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के मुताबिक 70 साल बाद भारत का हिस्सा बना है, वहां रहने वाले लोग कैसे हैं। आखिर वे भी हमारी तरह ही भारत के नागरिक हैं। हालांकि यह बात मैं भारत का नागरिक होने के नाते कह रहा हूं। अमेरिका का नागरिक होता तो मेरे विचार शायद कुछ और होते। दरअसल, यही सबसे बड़ी पेंच है जो आपको किसी न किसी कटघरे में खड़ा कर देती है। पाकिस्तान में जन्मा व्यक्ति केवल पाकिस्तान की बात बोले, चीन के लोग चीन और अमेरिका के लोग केवल अमेरिकी हित सोचें, यही तो हमारे हुक्मरान चाहते हैं। उनके चाहने का विरोध करने का परिणाम कुछ भी हो सकता है।

खैर, भारत सरकार के विदेश मंत्री ने आज ही अमेरिकी शहर वाशिंगटन में कहा है कि 70 साल तक कश्मीर में उनका राज था जिनका निजी स्वार्थ था। साथ ही उन्होंने सीमा पार के स्वार्थ की भी बात कही। इसके अलावा उन्होंने कहा है कि अब कश्मीर में विकास होगा तो सीमा पार से 70 साल से रचा जा रहा षडयंत्र का खात्मा होगा। गृह मंत्री अमित शाह के हौसले बुलंद हैं। वे अब भी अनुच्छेद 370 को हटाये जाने को तर्कसंगत और लोकतांत्रिक बता रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन को भी सुनें तो कुल मिलाकर बात जो सामने आती है, वह दुनिया को यह संदेश देना है कि जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार ने जो किया है, उसमें कुछ भी गलत नहीं है। न तो अलोकतांत्रिक और न ही अनैतिक।

एक सवाल तो यही है कि आखिर भारत सरकार को इतनी सफाई क्यों देनी पड़ रही है? उनका एक जवाब यह हो सकता है कि पाकिस्तान जिसकी निगाह कश्मीर पर रही है, वह भारत के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहा है और उसका काट जरूरी है। लेकिन आज की तारीख में पाकिस्तान की सुन कौन रहा है। वहां के वजीर-ए-आजम यह कबूल चुके हैं कि जम्मू-कश्मीर के सवाल पर विश्व समुदाय उनके पक्ष को नहीं सुन रहा है।

जम्मू-कश्मीर से जुड़ी एक और खबर पर निगाह डालते हैं। त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के तहत पहली बार ब्लाक डेवलपमेंट काउंसिल (बीडीसी) चेयरपर्सन के चुनाव की घोषणा बीते एक अक्टूबर को हो चुकी है। मतदान जम्मू कश्मीर और लद्दाख में एक ही चरण में 24 अक्टूबर को होगा।  नामांकन की आखिरी तिथि 9 अक्टूबर है। अमर उजाला द्वारा इस संबंध में प्रकाशित खबर का यह हिस्सा काबिले गौर है।

“नामांकन की जांच दस अक्टूबर तक होगी। नाम वापिस लेने की आखिरी तिथि 11 अक्टूबर को रहेगी और जरूरी हुआ तो 24 अक्टूबर को मतदान होगी और इसी दिन मतगणना भी होगी और नतीजे भी घोषित हो सकते है। ”

बताते चलें कि यह चुनाव दलगत आधार पर होने जा रहे हैं। मुख्य चुनाव अधिकारी शैलेंद्र कुमार की ओर से रविवार को बीडीसी चुनाव का शेड्यूल जारी कर दिया गया। मतदान 24 अक्तूबर को सबह नौ से दोपहर एक बजे तक होगा। चुनाव शेड्यूल की घोषणा के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के पंचायत हल्कों और राजनीतिक पार्टियों, उम्मीदवारों और केंद्र व राज्य सरकार के विभागों के लिए चुनाव आचार संहिता भी लागू कर दी गई है।

है न दिलचस्प खबर! एक तरफ जम्मू-कश्मीर के लोग किन हालातों में हैं, इसे लेकर भारत सरकार की मीडिया कुछ स्पष्ट तौर पर बता नहीं रही है। वहां के लोग क्या वाकई इस चुनाव को लेकर तैयार हैं? इस मामले में भी मुरदघट्टी वाली खामोशी है।

इस संबंध में ऑल इंडियान फेडरेशन ऑफ एससी, एसटी, ओबीसी के जम्मू-कश्मीर के संयोजक आर. के. कलसोत्रा ने दूरभाष पर जानकारी दी कि यह एक तरह की साजिश है जिसका लाभ हिन्दुस्तानी हुकूमत को नहीं मिलने जा रहा। उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर के सारे नेता (भाजपाइयों को छोड़कर) या तो जेलों में बंद हैं या फिर नजरबंद हैं। यानी नेता अंदर और चुनाव होंगे पालिटिकल पार्टियों के आधार पर। कलसोत्रा का कहना है कि बेहतर तो यह होता कि सरकार बीडीसी का चुनाव पार्टी के आधार पर नहीं करवाकर नन पॉलिटिकल रखती। इससे आम लोगों के मन में उत्साह जगता। वे खुलकर सामने आते। अपनी बात रखते। संभव था कि इससे उनके मन में भारत के संविधान के प्रति आस्था जगती।

यही बात सेंट्रल युनिवर्सिटी ऑर जम्मू-कश्मीर के प्रो. राशिद ने भी कही है। उनका भी मानना है कि जम्मू-कश्मीर में हालात वैसे नहीं हैं जैसा कि इंडियन मीडिया द्वारा दिखाया जा रहा है। उनके मुताबिक कश्मीर अब भी शेष दुनिया से कटा हुआ है। यहां तक कि जम्मू में भी इंटरनेट सेवा बहाल नहीं है।

बहरहाल, जम्मू-कश्मीर का सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। इस एक सवाल ने देश के सभी सवालों को गौण बना रखा है। सवाल जम्मू-कश्मीर के लोगों का भी है जो सरकार के फैसले का विरोध सिविल नाफरमानी के जरिए कर रहे हैं। सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद वे सड़कों पर पहले की तरह नहीं निकल रहे हैं। वे जरूरत की चीजें खरीदने ही अपने घरों से बाहर आते हैं। सरकारी दफ्तरों में श्मशानी दृश्य अब भी कायम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर में हालात बेहतर होंगे। कैसे होंगे और कौन इन हालातों को बेहतर करेगा, फिलहाल सोचना भी जटिल है। वैसे अभी तो बाबरी मस्जिद को लेकर चिरप्रतीक्षित फैसला आना शेष ही है। देखते जाइए आगे-आगे होता है क्या।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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