राजनीति

राजनीति से यूं तकलीफदेह रवानगी के लिए क्या सुमित्रा खुद ही जिम्मेदार है?

  • संजय रोकड़े

 

सत्ता का सुख बड़ा ही बेहूदा होता है। इसका लालच भी हद दर्जे का होता है। जब सत्ता का सुख अपने हाथ से जाते दिखे तो तमाम ढोंग रचने पड़ते है। याने इसको बचाने के लिए साम-दाम-दंड भेद के साथ ही प्रेशर पोलिटिक्स भी करना पड़ता है।  वैसे भी अब राजनीति में सुचिता, आत्म सम्मान का क्या काम। गर राजनेता इन बातों पर अमल कर ले तो फिर क्यों किसी को-

‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले…..’
वाली कहावत का शिकार होना पड़े।
इंदौर संसदीय क्षेत्र की सांसद और लोकसभा की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को, इस बार यहाँ से उम्मीदवार न बनाए जाने के कयासों के चलते, जनता के साथ चिठ्ठी का भावनात्मक खेल खेलना पड़ा है। जब सब तरफ से हताशा नजर आने लगी तो उन्होंने लेटर की राजनीति को ही मुफीद समझा। इसिलिए तो उन्होंने आनन-फानन में एक बेहद भावनात्मक पत्र के माध्यम से इस बात की मंशा जाहिर कर दी कि अब वे इंदौर से चुनाव नहीं लदेंगीं, हालांकि उनका यह पत्र ‘हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और’ ही साबित हुआ है। अक्सर राजनीति में जो कहा जाता है वो सच नहीं होता है। और जो सच होता है वह कहा नहीं जाता है। दरअसल सच तो यह है कि आज भी सुमित्रा महाजन  की राजनीतिक महत्वकांक्षा उतनी ही जवां है जितनी तब थी जब वह इंदौर से पहली बार 1989 में सांसद का चुनावी पर्चा भरने को गई थी। वे अपनी इस राजनीतिक महत्वकांक्षा का इजहार जब-तब सार्वजनिक रूप से करती भी रही हैं। अपने संसदीय क्षेत्र की जनता के नाम लेटर जारी करने के बाद उन्होंने ने जब बंद कमरे में अपने समर्थकों व भाजपा नेताओं से  चर्चा की तब भी टिकट नहीं मिलने का दर्द बयां कर दिया। वे  बोलीं कि मैं व्यथित हूं। संगठन को मुझे टिकट देना होता तो इतना समय नही लगता। हालांकि इसके पूर्व भी वे टिकट को लेकर बयानबाजी करती रही हैं। एक मौके पर वे कहने लगी – मैंने कभी नहीं कहा कि यह मेरा आखिरी चुनाव है। अभी मैं स्वस्थ हूं। संगठन जो तय करेगा, उसे मानूगीं। लेकिन वे अक्सर संगठन की आड़ में छुप कर अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को साधती रही हैं। वे हमेशा यही कहती रही कि इंदौर की चाबी सही समय पर उचित व्यक्ति को मिल जाएगी, अभी तो चाबी मैं अपने पास ही रखूंगी। मतलब साफ था कि वह किसी और को अपना विकल्प बनने देने की सोच ही नही रही थीं। जब उनको अपनी उम्मीदवारी हाथ से जाने का डऱ सताने लगा तब फिर एक नया दांव खेलते हुए कहने लगी -इंदौर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़े तो कैसा रहेगा। हालांकि वे यह बात शहर भाजपा की बैठक में बोली थीं। लेकिन जब इस बात को शहर की जनता हाथों हाथ लेने लगी तो पल में पलट कर कहने लगी क्या मैं मजाक भी नही कर सकती हूं। फिर कहने लगी संगठन को मेरा विकल्प खोजना चाहिए। चाबी किसको देना है ये काम संगठन तय करे। मैंने चुनाव नहीं लडऩे का ऐलान कर संगठन को चिन्ता मुक्त कर दिया है।

बहरहाल उन्होंने  जाँच समय तक टिकट मिलने के लिए पैतरेंबाजी की। जब बात बनते नही दिखी तो हार थक लेटर बम का सहारा लेकर जनता की भावनाओं के साथ भावनात्मक खेल खेलने से भी नही चूकीं। हालांकि, यहाँ तक भी ठीक था लेकिन हद तो तब हो गई जब लेटर बम जारी करने के दूसरे दिन अपने संसदीय क्षेत्र के समर्थकों को खुद के घर मजमा लगवा कर दबाव की राजनीति करने लगीं। समर्थक भी सुबह-सुबह उनके घर के सामने झंडे-डंडों व बैनर पोस्टर के साथ नारेबाजी करने लगे। समर्थकों के हाथ में एक बैनर था जिसमें साफ लिखा था- इंदौर करे पुकार ताईजी फिर एक बार। असल में समर्थक बैनर में जो नारा लिख कर लाए थे वह सच्चाई से कोसों दूर था। क्योंकि जब सुमित्रा ने लेटर के माध्यम से चुनाव नही लडऩे की घोषणा की थी उसके बाद शहर में खासकर भाजपा के एक खेमें में भी खुशी जाहिर की जा रही थी। इसका मतलब साफ है कि सुमित्रा के नेतृत्व से छुटकारा मिलने की घोषणा पर जनता में गम कम खुशी अधिक थी। लेकिन इस बात को उनके समर्थक पचा नही पा रहे थे। कुछ चुन्नु-मुन्नु किस्म के व्यक्तिवादी नेता व व्यापारिक हित साधने वाले, जिनको सुमित्रा के सत्तानशी होने से कुछ ज्यादा ही फायदा हो रहा था, वे इस खेल को हद से अधिक हवा दे रहे थे।
दरअसल इंदौर शहर के लोगों को अपना नेता खोने का गम इसलिए भी अधिक नही हुआ कि सुमित्रा महाजन ने सांसद या लोकसभा की अध्यक्ष रहते हुए आम गरीबों के हक में आवाज बुलंद करने की बजाय चंद व्यक्तियोंका हित किया। वे अक्सर अपने इर्द-गिर्द कुछ लालचियों को ही रखती थीं। इतने बड़े संसदीय क्षेत्र की नेता होने के बावजूद उनके कार्यकर्ताओं की फेहरिस्त में वही इने-गिने लोग होते थे, जो चुनाव जीतने के बाद उन्हें घेर लेते थे। सुमित्रा की उम्मीदवारी को जाते देख इन्ही चंगु-मंगुओं की जमीन खिसक रही है। इनको एक ही डऱ सता रहा है कि सुमित्रा के न रहने के बाद व्यापार-धंधे का क्या होगा। डर तो यह भी सता रहा है कि जितने कम समय में बेईमानी से कमाया है कहीं उस पर पार्टी का ही कोई नेता जाँच न बिठवा दे। अभी ताई की चुनाव नही लडऩे की चिट्ठी ने सबसे ज्यादा किसी को हैरान परेशान कर रखा है तो वह है उनके समर्थक। चिठ्ठी के खेल के बाद दूसरे दिन उनके निवास पर समर्थकों के मान-मनौव्वल का नाटक चलता रहा। इस नाटक में शहरवासियों के नाम एक भावनात्मक पत्र भी लिखा गया। पत्र में आग्रह किया गया कि संगठन ने ताई को भरोसा दिलाया था कि टिकट आपको ही मिलेगा। लेकिन जब इंतजार लंबा खिंच गया तो ताई ने खुद को टिकट की दौड़ से अलग कर लिया। इसमें यह भी लिखा गया कि उनकी उम्र 5 अप्रैल को तिथि से 75 वर्ष और 358 दिन हैं, लेकिन फिटनेस में वे 65 वर्ष की हैं। अब ताई ने अपना निर्णय ले लिया इंदौर की जनता को अपना निर्णय लेना है। 40 वर्ष राजनीति की काल कोठरी में रहकर भी बेदाग रहने वाली ताई की ऐसी विदाई के लिए क्या शहर तैयार है। शहरवासी ताई से आग्रह करेंगे कि वे अपना निर्णय वापस लें ।

 

 

सुमित्रा के इस कदम के बारे में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने साफ कहा कि ताई ने भले ही लोकसभा चुनाव नहीं लडऩे का एलान किया लेकिन पार्टी उन्हें ही टिकट देगी और वे पहले से ज्यादा वोटों से चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बनाएंगी। इधर कांग्रेस ने भी सुमित्रा के इस कदम का जम कर राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की। कांग्रेस के एक मीडिया समन्वयक ने कहा कि ताई ने खुद को प्रत्याशी मानकर बहुत पहले से चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था, लेकिन भाजपा उन्हें योग्य नहीं मान रही है। एक सांसद को राजनीतिक सम्मान बरकरार रखने के लिए पत्र लिखकर अपना दुख जनता तक पहुँचाना पड़ रहा है। भाजपा ने इनका अपमान किया है। कांग्रेस की सहानुभूति उनके साथ है। बहरहाल ये अवसर ही कुछ ऐसा है जो हर कोई इसे भुनाने का प्रयास करेगा। फिर चाहे गैर हो या अपना। असल सवाल तो यह है कि आखिर क्यों किसी बड़े नेता ने सम्मानजनक तरीके से  जाँच करना उचित नही समझा या फिर सुमित्रा की हठधर्मिता ही उनकी राजनीतिक साख पर भारी पड़ गई। जिस तरह उम्र के फेर में दूसरे उम्रदराज नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया गया ठीक उसी तरह से सुमित्रा को भी दिखाना ही था लेकिन ये सब ड्रामेबाजी क्यों। कुछ भी हो पर मुझे लगता है कि पार्टी की इस वयोवृद्ध महिला नेत्री की विदाई दूसरे अंदाज में भी की जा सकती थी। हालांकि यहाँ सुमित्रा की व्यक्तिगत महत्वकांक्षा भी उतनी ही जिम्मेदार मानी जा सकती है। अच्छा होता कि 2019 के चुनाव परिणाम के बाद अगर मन में कोई दबी इच्छा होती तो उसे पूरा कर दिया जाता। जैसा हम अक्सर क्रिकेटरों के मामले में देखते है। वह पहले ही घोषणा कर देते है कि विश्व कप या सीरीज के बाद वह संन्यास लेने जा रहे हैं। उनके समर्थकों में भी एक सहानुभूति बनती है। अखबारों में भी लंबे-लंबे महानता के लेख लिखे जाते पर सुमित्रा के मामले में यहाँ चूक हुई है। खैर| पार्टी के उम्रदराज नेताओं व आमजन को यह भान रहना चाहिए कि अब पार्टी में सत्ता अंहकारी पीढ़ी के हाथों में आ चुकी है। यह सत्ता के संक्रमण के इस दौर की शुरूआत है जब पार्टी या गठजोड़ की सियासत एक व्यक्ति विशेष के सामने बौनी साबित होती जा रही है। सच तो यही है कि बहुत जल्दी नरेन्द्र मोदी ने अपना कद इतना बढ़ा लिया या बढ़ गया कि कोई खिलाफत की सोच भी नही सकता है। अब वे पार्टी में ही नही बल्कि कथित तौर पर देश के सर्वमान्य नेता बन गए है। बहरहाल अच्छा तो तब होता जब चिठ्ठी का यह खेल सुमित्रा चुनावी घोषणा के आसपास या पार्टी की लिस्ट जारी होने से पहले राजनीतिक संन्यास लेने की घोषणा करके खेलती। गर ऐसा करती तो इतनी तकलीफदेह रवानगी न झेलनी पड़ती। असल में यह कटु सत्य है कि दिग्गज किसी भी क्षेत्र का हो एक न एक दिन उसे अपने हथियार ड़ाल कर पवैलियन लौटना ही पड़ता है। पर इस समीकरण को बिठाने में पार्टी की ये बुजुर्ग नेता चूक कर गईं। हालांकि टिकट मोह में सुमित्रा कुछ बड़ा विद्रोही कदम भी उठा सकती थीं लेकिन वह ये नही चाहती थीं कि जिस पार्टी को लंबे समय तक अपने खून पसीने से सींचा, आगे बढ़ाया उसके खिलाफ जाकर वह अपनी मेहनत को इतिहासकारों की नजर में कम अंकवाती। वह शायद यही चाहती थी कि भाजपा के साथ उनका नाम हमेशा जोड़ा जाए और इतिहास में वह अपनी ही पार्टी के खिलाफ मुंह खोलने वाली नेत्री के तौर पर बदनाम न हों। दरअसल, सच्चाई तो यही है कि आज की तरह ही सुमित्रा ने भी कभी हठधर्मिता और अंधा बांटे रेवड़ी अपनों-अपनों को दे कि सियासत की शुरूआत की थी। यह बात अलग है कि आज न चाहते हुए भी कुछ लोगों के दिलों में उनके प्रति सहानुभूति की लहर पैदा हो गई है। जैसा कि अक्सर होता भी है। मैं इस मौके पर एक बात यह भी कहना जरूरी समझता हूं कि कांग्रेस व दूसरे दलों को सुमित्रा के मुद्दे पर सियासत करने से बचना चाहिए। किसी भी प्रकार की टीका-टीप्पणी करने से पहले अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए। यहाँ भी ऐसे अनेक हादसे भरे पड़े मिलेगें। जाते-जाते इतना भर की इस घड़ी में ईश्वर सुमित्रा को मान-अपमान झेलने की शक्ति प्रदान करे और भविष्य में भाजपा बहुमत लेकर केन्द्र आए तो पार्टी उनकी बची-खुची महत्वकांक्षा को भी पूरी करें।

लेखक पत्रकारिता जगत से सरोकार रखने वाली पत्रिका मीडिय़ा रिलेशन का संपादन करते है और सम-सामयिक मुद्दों पर कलम भी चलाते है।

सम्पर्क- +919827277518, mediarelation1@gmail.com .

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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