आँखन देखी

क्या शब्बीर चाचा नहीं रहे ? – मणीन्द्र नाथ ठाकुर

 

  • मणीन्द्र नाथ ठाकुर

 

एक दिन अचानक मेरे एक मित्र का फ़ोन आया| पूर्णियाँ में कम्प्यूटर की उसकी एक दुकान है| कहने लगा कि एक आदमी मेरे सामने बैठा है| कह रहा है कि वह आपको जानता है| क्या आप उनसे बात करना चाहेंगें? मैं काफ़ी व्यस्त था लेकिन बात अपने शहर की हो और कोई आपको जानता हो तो उत्सुकता होनी  लाज़िमी है| मैंने कहा  बात करवा दो| उसने अपना परिचय दिया: ‘चाचा मैं मुख़्तार का बेटा हूँ’| मुझे एक मिनट भी नहीं लगा मुख़्तार को पहचानने में| मुख़्तार मासियुर्र रहमान उर्फ़ मसी चाचा का भांजा है | उनका गाँव मेरे गाँव से थोड़ा ही दूर है| मेरे चाचा के मित्र थे| हर सोमवार को मेरे घर के पास लगने वाले हाट में आया करते थे और काफ़ी समय हमारे घर गुज़रा करते थे|| उनसे मिले हुय अब मुझे तीस पैंतीस साल तो हो ही गए होंगे| लेकिन यादें बिलकुल ताज़ा हैं| ग़फ़्फ़ार के बेटे को तो मैंने देखा भी नहीं है| मैंने सबकी ख़ैरियत पूछी और अपने मित्र को कहा कि इसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ| वह भी अचम्भित था| लेकिन अब आप समझ सकते हैं कि मैं इस बात का ज़िक्र क्यों कर रहा हूँ| यह था सीमांचल जहाँ  हिन्दू मुस्लिम तो हैं  ज़रूर लेकिन उनके बीच एक रिश्ता था| लोग एक दूसरे का क़द्र किया करते  थे| उस टेलिफ़ोन ने मुझे उस सीमांचल की याद दिला दी जिसमें मेरा बचपन गुज़रा है| पिछली बार जब बागडोगरा हवाई अड्डे के लिए मुहर्रम के दिन निकलना था तो लोग मना करने लगे, मुझे हैरत भी हुई और दुःख भी हुआ| सवाल उठा कि क्या सीमांचल इतना बदल गया है?

बचपन में मेरा एक पसंदीदा आदमी था लतीफ़ मियाँ| हर सोमवार को हटिया  में बकरा काटता था| मुझे याद नहीं है कि झटका या हलाल किस तरह से काटता था| जहाँ तक मुझे याद है कि हिन्दू हो या मुस्लिम सब उसके पीछे लगे रहते थे| जिस सोमवार को लतीफ़ नहीं आता था वह सोमवार ही नहीं होता था| यदि हटिया में बकरा ही नहीं कटा तो फिर हटिया कैसा| मैं बचपन में ही शाकाहारी हो गया था| पूरा परिवार मांसाहारी था और उन्हें हर दिन दोनों समय के भोजन में मांसाहार पसन्द था|  शायद उससे ऊब का मैंने बचपन में ही छोड़ दिया था| वैसे एक पालतू हिरन को लोगों ने काट कर खाया था, उसके विरोध में मैंने यह निर्णय लिया था| मुझे जानवरों को काटा जाना बिलकुल पसन्द नहीं था, लेकिन लतीफ़ मियाँ पसन्द थे| सोमवार की सुबह से मचान पर जम जाते थे| छोटा क़द, मुश्किल से उगी हुई बकरे जैसी दाढ़ी, सफ़ेद गंजी और चेक वाली लूँगी, यही उनका हमेशा का गणवेश था| ख़ूब सारी कहानियाँ सुनाते थे| बड़े बुज़ुर्गों को आस पास की ख़बर भी देते थे| कहाँ झगड़ा हो गया, किसकी ग़लती थी और उसमें मुखिया जी को क्या करना चाहिये, सबकुछ शालीनता के साथ कह जाते थे| सोने से पहले दादा जी मचान पर सो रहे हर आदमी से पूछते थे कि खाना खाया या नहीं| हर सोमवार को यह सूचना कि सबने खाना खा लिया है लतीफ़ मियाँ की आवाज़ में सुनने को मिलती थी| हमें कभी लगा नहीं कि लतीफ़ हमसे अलग हैं| यह तो मालूम था कि वे मुसलमान हैं, लेकिन इतना ही लगता था कि वह भी एक तरह की  जाति  है, जिसके जीने का तरीक़ा कुछ अलग है|

पूर्णियाँ, कटिहार, अररिया और किशनगंज इन चार जिलों से बनता है सीमांचल का इलाक़ा| नेपाल की सीमा से लगा है, इसलिये इसे सीमांचल कहते हैं| इसी इलाक़े को फ़णीश्वर नाथ रेणु ने ‘मैला आँचल’ कहा था, जो उनके एक उपन्यास का नाम है| और भी बहुत से लेखक यहाँ हुए हैं| उदाहरण के लिए, बांग्ला के केरदारनाथ बंदोपाध्याय और रेणु के गुरु सती नाथ भादुड़ी, मैथिली के कुमार गंगानंद सिंह, एवं लिली रे, उर्दू के वफ़ा मलिकपुरी एवं तारिक  जमिलि, हिन्दी के अनूपलाल मंडल, लक्ष्मीनारायण सुधांशु एवं चंद्रकिशोर जायसवाल जैसे अनेकों साहित्यकारों ने इस इलाक़े को धन्य किया है|  इस इलाक़े की ख़ास बात रही है यहाँ की तहज़ीब| अनेक धर्मों, अनेक भाषाओं और अनेक संस्कृतियों का संगम होने के बावजूद यहाँ इन सबों को लेकर कोई आपसी मतभेद नहीं था| मैं इस इलाक़े में हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों की की कुछ कहानियाँ सुनाना चाहता हूँ जिसका मैं लगभग चश्मदीद गवाह भी हूँ|

इसके पहले कि मैं शब्बीर चाचा के बारे  में आपको बताऊँ, तीन और कहानियाँ सुनाना चाहता हूँ| एक तो कहानी है मोईन शेख़ की| बात साठ  के दशक की है लेकिन मैंने उनसे सुना है जो इसमें भागीदार थे| मोईन शेख़ और गाँव के मुखिया बीच ठनी हुई थी| दोनों एक दूसरे से  नफ़रत ही करते थे| यह नफ़रत केवल दो व्यक्तियों के बीच था| वैसे तो मुखिया ब्राह्मण और मोईन मुस्लिम था लेकिन लड़ाई का इसका आधार धार्मिक तो था ही नहीं| ज़मीन की लड़ाई थी| एक बार मोईन शेख़ ने एक लड़के को  थप्पड़ मारा और लड़का मर गया| पुलिस गाँव के मुखिया के पास पहुँची| मोईन शेख़ को लगा कि अब जेल जाने की तैयारी करनी होगी| मुखिया जी तो निश्चित रूप से उनके  ख़िलाफ़ बोलने वाले हैं| उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब पता चला कि पुलिस उसके घर आए बिना ही वापस चली गयी| पता चला कि मुखिया जी ने पुलिस को बताया कि उसने इसकी जाँच व्यक्तिगत तौर पर की है और पाया कि इसमें दोष मोईन का नहीं था | बच्चा पहले से ही बीमार था और मृत्यु थप्पड़ मारने  से नहीं बल्कि बीमारी से हुई है| मोईन शेख़ आँखों में आँसू लिए मुखिया जी के सामने थे| कृतज्ञता से रोना आ रहा था| उसकी जान बच गयी थी| लेकिन मुखिया जी का जवाब उल्लेखनीय है| उनका कहना था कि झगड़ा अपनी जगह है और न्याय अपनी जगह| मैंने वही किया जो न्याय संगत था| लेकिन हमारी लड़ाई आगे जारी रहेगी| ध्यान देने की बात है कि मुस्लिम बस्ती के लोग इस लड़ाई में मुखिया जी की साथ थे| इस बस्ती को बसाने में उनका बड़ा हाथ था| यहाँ तक कि उनके लिए श्मशान की भूमि भी मुखिया जी ने दी थी| ऐसी कहानियाँ आपको सीमांचल के अनेक गाँवों में मिल सकती है|

एक हाल की घटना भी का  ज़िक्र करना चाहता हूँ| अब माहौल कुछ बदल-बदल सा रहा है| राजनीति में दक्षिण पंथ का प्रभाव बढ़ता जा रहा है| कुछ साल पहले मैं गाँव  पहुँचा तो पता चला कि माहौल  गरम है| हिन्दू सशंकित हैं  कि इलाक़े में मुस्लिम नौजवानों की  बहुत चहल-पहल है| काफ़ी लोग मोटर बाइक पर अरबी में लिखे हुए एक झंडा लगा कर घूम रहे हैं| झंडे का कपड़ा और उसमें लगा डंडा कुछ विदेशी लग रहा है| उनके हाव-भाव में साम्प्रदायिकता की बू आ रही है| मैं सीधे मुस्लिम बस्ती में गया| अभी भी इतनी समाजिकता तो बची हुई है कि मेरे जाते ही कई लोग जमा हो गए| अपने पुराने जानकार मूसा अली के बैठक खाने पर बातचीत शुरू हुई| मूसा अली अपने को बजरंग बाली भी कहते हैं| बताते हैं कि उनके दादा जी के पिता जी ने इस्लाम धर्म अपनाया था और हाल तक उनके घर हिन्दू-और मुस्लिम दोनों त्योहार मनाए जाते थे| वैसे भी मेरे गाँव में किसी समय होली गानेवालों की टोलियों के लिए मुस्लिम बस्ती में जाना और वहाँ मालपुआ खाना इस त्यहार का अनिवार्य अंग था| मुहर्रम का ताज़िया हिन्दू बस्ती में ज़रूर धूमता था| उनसे जानकारी मिली कि ये नौजवान मुहम्मद साहब का जन्म दिन मनाने की तैयारी कर रहे थे| इस छोटी सी जानकारी ने गाँव का माहौल बदल दिया| मैंने देखा कि मुस्लिमों का एक बड़ा सा जुलूस निकला जिसका स्वागत हिंदुओं ने सड़क पर निकल कर हाथ हिला-हिला  कर किया और जगह-जगह उनके लिए पानी का इंतज़ाम किया| आज कल उनके बीच संवाद की सम्भावनाओं को ही ख़त्म किया जा रहा है| मेरे मुस्लिम दोस्तों ने शिकायत की कि उनकी बस्ती में कहीं से दो मौलवी आ गए हैं और एक मदरसा खुल गया है| शुक्रवार का उनका तक़रीर भड़काऊ होता है| बहुत सी रवायतें जो यहाँ की अपनी थीं उसे ग़ैर इस्लामिक बताया जा रहा है| उनके कारण ही यहाँ मुस्लिमों में बरेलवी और देववंदी का झगड़ा शुरू हो गया है| मारपीट तक हो गयी| दोनों तरफ़ धर्म का अस्मितावादी साम्प्रदायिक स्वरूप सामने आने लगा है|

अब आते हैं शब्बीर चाचा की कहानी पर| जिस दिन मुझे ख़बर मिली की चाचा नहीं रहे तो मुझे लगा कि मेरा अपना शहर ही बेग़ाना हो गया| मेरे सबसे छोटे चाचा के मित्र थे| मुझे याद नहीं कि मैंने उन्हें पहली बार कब देखा था| बचपन से उन्हें रोज़ घर पर आते देखा था| मेरे ख़याल से उनकी मित्रता सातवीं कक्षा से शुरू हुई थी और आख़िरी तक अच्छी निभी| जो छवि मुझे उनकी अब याद आती है उसमें वे छोटी क़द के दुबले पतले आदमी दिखते हैं| अलीगढ़ि  पाजामा और लम्बा कुर्ता जिसकी बाहें मुड़ी रहती थी| शायद उनके इस कुर्ता-पाजामा छवि ने ही मेरे अन्दर कहीं डेरा जमा लिया होगा इसलिये मैं भी कुर्ता छाप हो गया| उनका एक ख़ास दर्ज़ी था जो कुर्ते  में मशीन की जगह हाथ का काम ज़्यादा करता था| जब तक वह ज़िंदा रहा मेरे सारे कुर्ते वही बनाता था| यहाँ तक कि शादी के समय मेरी शेरवानी बनवाने के लिए शब्बीर चाचा से पैरवी करवानी पड़ी थी| शायद यह उसकी  आख़िरी शेरवानी थी| अभी भी मुझे कानपूर के एक मौलवी साहब के सिले कुर्ते फ़ैब इंडिया के कुर्तों से ज़्यादा सही लगते हैं| उनके पास मेरे कुर्ते का नाप पड़ा है| चाहनेवालों को पता है और यदा कदा उस नाप का उपयोग कर लिया करते हैं|

मैं बता रहा था कि वे रोज़ घर पर आते थे| घंटों चाचा के कमरे में दोस्तों का जमघट रहता था| राजनीति से लेकर साहित्य तक पर बहस होती थी| एक मज़ेदार बात यह थी कि उनके लिए बर्तन अलग थे| अक्सर उनका खाना  पीना भी मेरे घर होता था| उन्हें भी अपने बर्तनों की पहचान थी| कभी यदि सेवक ने ग़लती से उनके काँच के  गिलास  में उन्हें पानी नहीं दिया तो कहते ‘आम यार मेरा गिलास लेकर आओ, अभी भाभी देख लेगी तो डाँट पड़ेगी’|  मैं आज तक नहीं समझ पाया इस बात को| आज यदि ऐसा हो तो लोग तरह-तरह की बातें करेंगे| लेकिन उस समय यह एक सहज सी बात थी| इसमें किसी को कोई नाराज़गी नहीं होती थी| सांस्कृतिक भिन्नता को सम्मान देने की बात थी| जब कभी उनके घर भोजन के लिए हमें बुलाया जाता था तो इस बात का ख़ास ख़याल रखा जाता था कि हमारे व्यवहार के अनुकूल सबकुछ हो| उनके पिता कांग्रेस के सांसद थे| जीतने के बाद भोजन  पर आमंत्रण मिला| उन्होंने ख़ास तौर पर कई व्यंजन बनवाया था| केवल हम लोगों के लिए भोजन लगाया गया| कई बार आग्रह करने के बाद भी सबलोग साथ नहीं बैठे| उनका कहना था कि उनके खाने  के तरीक़े में जूठे का ख़याल नहीं रखा जाता है, इसलिये  परिवार के लोग बाद में खाना खाएँगे|

एक वाक़या बड़ा मज़ेदार है| जब उनके पिता सांसद बने तो समस्या यह हुई कि सरकार से मिलने वाले उनके मानदेय या वेतन को कहाँ रखा जाए| सरकार का निर्देश था कि बैंक में खाता खुलवाना ज़रूरी है| लेकिन उनके पिता का इस्लाम इस बात के इजाज़त उन्हें नहीं देता था कि उन्हें कोई सूद मिले| मेरे पिता जी को ख़बर मिली कि इस समस्या का कोई निदान खोजें| पता किया गया कि बैंक में करेंट अकाउंट भी होता है जिसमें खातादार को कोई सूद नहीं मिलता है| जब भी दिल्ली से घर जाते थे, हमारे यहाँ मिठाई के डब्बे आ जाते थे| ख़ास तौर पर पुरानी दिल्ली के ‘घंटावाला’  की प्रसिद्ध मिठाई का हमें इंतज़ार रहता था| यह ज़माना था जब बजाज  स्कूटर ख़रीदने के लिए लम्बी लाइन लगी रहती थी| उनके कोटे से आने वाला पहला स्कूटर हमें मिला| उनके पिता ने एक जीप ख़रीदी थी| अक्सर चाचा जीप लेकर हमारे  घर आते थे और फिर हमारी चाँदी होती थी| पूर्णियाँ एक छोटा सा शहर है, लेकिन बचपन में हमें बहुत बड़ा लगता था| जीप से हम सैर करते थे| होटल ब्लू स्टार उनकी सबसे पसंदीदा जगह थी जहाँ इनकी चौकड़ी जमती थी| हमें भी वहाँ का मुग़लई पराँठा और मैंगो सेक या कोका -कोला अक्सर मिला जाया करता था| कभी फ़र्क़ नहीं पता चला कि शब्बीर चाचा मेरे अपने चाचा से कुछ अलग हैं| बाद में तो आना जाना कम हो गया| हम लोग भी पढ़ने-लिखने बाहर चले गए| मेरे चाचा और उनके मित्र भी अपनी पढ़ाई के लिए निकल गए| मुलाक़ातें कम होने लगीं| लेकिन बाज़ार में जब भी कभी मिल गए बिना रसगुल्ला खिलाए मानने का सवाल ही नहीं था| सवाल-जवाब कि क्या चल रहा है, पढ़ाई कैसी चल रही है वग़ैरह के बाद फिर बदलते शहर के बारे में  बातें होती थी|

शब्बीर चाचा ने अलीगढ़ से पढ़ाई-लिखाई की और मेरे चाचा भी भागलपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में टॉप किया| लेकिन दोनों इतने स्वच्छंद थे कि नौकरी के नाम से ही भड़क जाते थे| चाचा गाँव में रहने लगे और शब्बीर चाचा शहर में| शब्बीर चाचा को मेरे गाँव के ज़्यादातर लोग जानते थे| कारण था कि जब भी कोई बीमार होकर इलाज के लिए गाँव से पूर्णियाँ आता था साथ में चाचा की चिट्ठी होती थी कि ‘शब्बीर भाई ज़रा इसकी सहायता करें बहुत ग़रीब आदमी है’| बस फिर क्या था पूर्णियाँ का मेडिकल हब लाइन बाज़ार में ही उनका घर था, निकल पड़ते थे उस आदमी के साथ| लगभग सभी डाक्टर उन्हें पहचानता था| कई बार मरीज़ को मुफ़्त में दिखाते भी थे और ऊपर से डाक्टर से मुफ़्त की दवाइयों भी दिलवा दिया करते थे| एक बार मेरी मुलाक़ात हुई तो पता चला कि शहर के प्रसिद्ध डाक्टर पर बेहद नाराज़ थे| कहने लगे जब से वह हज से लौटा है लालची हो गया है| इन सब बातों को कहने का उनका अन्दाज़ बड़ा मज़ेदार हुआ करता था, उसमें  सादगी होती थी और सपाट बयानी भी| कभी तो डाक्टरों को ही सीधे कह देते थे कि ज़नाब इन ग़रीबों का इतना पैसा लेकर आप कहाँ जाओगे|

क्या अगली पीढ़ी भी  सीमांचल की ऐसी कहानियों को याद कर सकती है? क्या उनका भी कोई मसी चाचा, ग़फ़्फ़ार भाई और शब्बीर चाचा होगा? शब्बीर चाचा की कहानी अभी अधूरी है| उनका व्यापार की अनैतिकता से परेशान होना, मुझसे मिलने जेएनयू  आना और फिर कम उम्र में ही बीमार हो कर चल बसना, बहुत कुछ शामिल हो सकता है| हमारा समाज ऐसे लोगों से बनता है| आज हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों के बहुत पुराने इतिहास को खंगाला जा रहा है; शासकों की बर्बरता को याद किया जा रहा है| लेकिन इन सम्बन्धों को याद नहीं कर रहा है जो हमारा वर्तमान है  और भविष्य हो सकता है|

लेखक समाजशास्त्री और जे.एन.यू. में प्राध्यापक हैं|

सम्पर्क- +919968406430, manindrat@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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