Uncategorized

क्या प्रगतिशीलता वैचारिक संकीर्णता के दायरे मे सिमट रही है?

 

  • राजेन्द्र सिंह गहलौत

 

लमही का कथा समय 1 वर्तमान साहित्य की प्रतिष्ठित महिला साहित्यकार और महिला लेखन पर केन्द्रित था उसमे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार चित्रा मुदग्ल को शामिल न किये जाने पर मुझे ताजुब हुआ विरोध मे मैने प्रतिक्रिया भी भेजी । अभी विजय राय जी का संपादकीय पढ कर ज्ञात हुआ कि चित्रा मुद्ग्ल पर आलोचक एवं प्रगतिशील लेखक संघ लखनऊ की सचिव उषा राय ने लेख लिखा था तथा लमही मे वह प्रकाशित होने जा रहा था लेकिन ऊषा राय ने उसे सिर्फ इसलिये वापस ले लिया कि चित्रा मुदगल ने नरेन्द्र मोदी का समर्थन किया और उन्हे वोट देने की अपील की।

चित्रा मुद्गल

समझ नही पाता हूं कि लेखक की क्या कोई निजी जिंदगी नही होती उसे अपनी पसंद जाहिर करने की क्या स्वतंत्रता नही होती उसे अपने देश का प्रतिनिधि किसे चुनना है इसका हक नही होता क्या वह सिर्फ खास विचारो का बंधुआ मजदूर बन कर जिये तभी वह प्रगतिशील कहलायेगा ? मोहतरमा साहित्यकार की वैचारिक स्वतंत्रता उसका मौलिक साहित्यिक अधिकार है आपने लेख उनके स्रृजन पर लिखा था सहमत या असहमत हो कर लिखा था उसे जिस कारण से आपने वापस लिया उसका कोई औचित्य नही है ? क्या प्रगतिशीलो मे यह परंपरा है कि सिर्फ अपने वामपंथी विचारों के समर्थकों का ही प्रसस्ती गान करेगा और यदि कोई उनके विचारों से इतर जायेगा तो वह कितना ही महत्वपूर्ण लेखक क्यों न हो उससे मुंह मोड लेगे ? क्या चित्रा जी का लेखन जनहितकारी नही है ? क्या उनने अपने लेखन मे आम आदमी की पीडा अभाव जिजीविषा के चित्र अंकित नही किये ? उनकी रचनाओं मे दलित शोषितो के जीवन के चित्र अंकित हुये उनके एक दर्जन से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हुये है क ई उपन्यास प्रकाशित हो चुके है उन्हे अंतरराष्ट्रीय इन्दु कथा सम्मान प्राप्त हो चुका है यह सब उपलब्धियां उनका जनकल्याणकारी लेखन सिर्फ एक व्यक्ति मोदी को वोट देने की अपील से क्या धुंधला गया ?

माफ कीजियेगा ऊषा राय जी आपने उन पर लिखा आलेख प्रकाशित होने के पूर्व वापस ले कर प्रगतिशील विचारों का परिचय नही दिया बल्कि प्रगतिशीलो की संकीर्णता का प्रमाण प्रस्तुत किया है । हां आपके अपने लेख वपस लेने से उनके कद उनके सम्मान मे कोई फर्क नही पडने वाला है ।

साहित्यिक अभिरुचि का एक पाठक राजेन्द्र सिंह गहलौत बुढार जिला शहडोल मध्यप्रदेश

लेखक भूतपूर्व अध्यक्ष प्रगतिशील लेखक संघ बुढार इकाई और निबंधकार, समीक्षक एवं कहानीकार हैं|

सम्पर्क- +919329562110, rajendra.dnp5@gmail.com

.

Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *