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क्या चुनाव का पूर्वानुमान लगाना संभव है?

 

  • विशेष प्रताप गुर्जर

 

आजादी के पहले भारत को लोग जादूगरों और साँप-सपेरों के देश की तरह देखते थे, आज जब भारत आधुनिकता के पथ पर आगे बढ़कर हर क्षेत्र में तरक्की कर रहा है, एक तिलिस्म ऐसा है जो आधुनिक भारत में ही इजात हुआ है। यह तिलिस्म है भारत के चुनाव का पूर्वानुमान लगाना और ये बताना की आने वाली सरकार किस पार्टी की बनने जा रही है। मेरा व्यक्तिगत विचार है की भारतीय चुनाव की पूर्वानुमान लगाना एक ज्योतिषी की तरह हाथों की लकीरों और जन्मपत्री को देखकर व्यक्ति का भविष्य बताने जैसा है। ऐसा  मैं  2 प्रमुख कारणों से कह रहा हूँ, एक तो ये की भारतीय समाज में लोग अपने मताधिकार को सम्पति से भी बढ़कर पवित्र मानते है, वो आपको सभी जानकारी सही दे सकते हैं मगर आने वाले चुनाव में वो मत किसको देंगे, इसका वो वर्णन कभी खुलकर नहीं करते। यह बात विशेषकर एक बड़े सामाजिक हिस्से जैसे कि आर्थिक रूप से अस्वतन्त्र लोग, महिलाऐं, पिछड़े और कुछ हद तक अल्पसंख्यकों पर लागू होती है। मताधिकार को लेकर इन वर्गों के मन में एक बहुत बड़ा निजता का भाव है, जोकि इनके सामजिक स्थान के कारण उत्पन्न होता है। अर्थात किसी भी पूर्वानुमान में अगर हम लोगो के मत के बारे में जान पाते है तो यह मान कर चलिए कि वो लोग कहीं न कहीं सामजिक रूप से अपनी बात रखने में सक्षम है, अर्थात उन्हें बोलने या किसी के साथ खुलकर दिखने में कोई हर्ज नहीं है, ऐसा ज्यादातर वो लोग करते है जो या तो आर्थिक रूप से  मजबूत हैं, पढ़े लिखे हैं, किसी राजनेता के करीब हैं, पार्टी के कैडर हैं, या फिर सामजिक कार्यकर्त्ता हैं। चूँकि सर्वे में सिर्फ चुनिंदा लोगो की आवाज़ सुनाई पड़ती है, तो आप ये मानकर चलिए कि पूर्वानुमान लगते वक़्त आप इसको सबकी आवाज़ मानेंगे, जबकि यह सिर्फ सामाजिक रूप से मजबूत वर्ग की आवाज़ होती है।

दूसरा कारण जो पूर्वानुमान लगाने में बाधक बनता है वो है हाथों की रेखाओं के सामान हमारी ज़मीन पर भी अत्यधिक विविधताएं है, ये विविधताएँ ऐसी है जिनका एक अपना खुद का इतिहास रहता है, जैसे मिसाल के तौर पर आप सर्वे में पाएंगे कि जाति और धर्म को अत्यधिक महत्व देते हैं, जिससे वो सीटों के समीकरण लगाने में मदद हासिल करते है, हम सब जानते हैं कि एक व्यक्ति मताधिकार प्रयोग करते वक़्त जरुरी नहीं कि सिर्फ अपनी किसी एक पहचान का ही उपयोग करे,  हो सकता है कि वह व्यक्ति उसदिन अपनी पत्नी से लड़कर आया हो और चुनाव में क्यूंकि महिला उम्मीदवार है तो वह उसे वोट न देकर किसी पुरुष को वोट दे, या ये भी हो सकता है कि किसी बगल वाले अपनी जाति के व्यक्ति से उसका झगड़ा रहा हो, जिसके कारण वह उसके विपरीत ही मतदान करेगा, या फिर कोई और स्थानीय या राष्ट्रीय समस्या से वह प्रभावित रहा हो, ऐसे अनेकों मुद्दे होते हैं जो केवल और केवल चुनाव के दिन या उसके कुछ समय पहले ही मतदाता का मन किसी उम्मीदवार के पक्ष में करते हैं।

तो क्या फिर चुनाव का पूर्वानुमान लगाना बंद किया जाए ?

जी नहीं, पूर्वानुमान लगाना एक मुश्किल काम है मगर इसका मतलब ये नहीं कि आप इसे नहीं कर सकते, चुनाव में किसकी हवा है और कौन जितने वाला है, स्थानीय लोग, जो किसी इलाके के निवासी रहे है आपको बता सकते है की कहाँ कौन जीत रहा है, क्यों जीत रहा है और क्या सम्भावनाएं है। इसलिए राजनैतिक पंडितो को चाहिए कि वह अपना आंकलन जल्दबाजी से न करके इत्मीनान से क्षेत्र के हर एक इलाके में घूम-घूम कर, उन सभी जगहों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जानकार ही वहाँ का आंकलन करें। ऐसा करना समय लेने वाला जरूर होगा मगर तभी हम चुनाव का सही पूर्वानुमान लगा पाएंगे और बता पाएंगे की मुद्दे कौन से हैं और किसके लिए क्यों मायने रखते है?

स्थानीय समीकरण के साथ-साथ दो बातें जो बेहद जरुरी है वो ये कि आप खुद क्या हैं? आपकी अपनी पहचान किस प्रकार आपके सवाल तैयार करने में या कुछ और सवाल पूछने में आपको सक्षम बनाती हो। ऐसा जरुरी नहीं कि जो सवाल आप पूछ रहे हैं और जो आपके दिल के सबसे करीब है वही सवाल जवाब देने वाले के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण हो और उतनी ही गहराई से वह उसका उत्तर आपको दे। मिसाल के तौर पर, इस बार के चुनाव में ज्यादातर लोगों की जानने की इच्छा यह है कि क्या मोदी दोबारा प्रधानमन्त्री बनेगें? जितना दिलचस्पी लोगो को इस बात को जानने में है उतना लोगो को इसका जवाब देने में नहीं है, क्यूंकि हो सकता है वो किसी और नेता जोकि प्रभावशाली हैं और उतार चढ़ाव के कारण प्रधानमन्त्री पद की दावेदारी कर सकता है को जनता ही न हो, अर्थात अपने रेस्पोंडेंट को आपने ऐसा सवाल पूछकर जवाब देने के लिए निष्क्रिय कर दिया, मगर उसका मत तो अभी उसके पास है जिसका सदुपयोग करना वह खूब जानता है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि क्या आप जिस प्रकार किसी मुद्दे की समझ रखते है, जवाब देने वाला भी उसकी समझ उसी प्रकार से रखता है, उदाहरण के तौर पर जब आप किसी से पूछते हैं कि क्या नौकरी, बेरोजगारी मुद्दा है या नहीं, तो क्या आप ये जानते है कि उस व्यक्ति को “रोजगार क्या होता है?” इसका एहसास आजतक नहीं हुआ, क्यूंकि आजतक कोई व्यक्ति उसके परिवार से नौकरी नहीं पाया है, तो फिर आप उसके जवाब पर विश्वास कैसे कर सकते है जबकि वह तो उसके लिए मायने ही नहीं रखता था। इस बात का एक और उदहारण लीजिए की नोटबन्दी के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी को हुआ है तो वह छोटा कार्य करने वाले लोग, किसान, मजदूरों को हुआ है, मगर फिर भी ऐसा क्यों है कि वो अपने इस नुक्सान को मानने से इंकार कर रहा है और बजाय इसकी तारीफ कर रहा है। मेरे अनुसार समाज के निचले तबके ने नोटबन्दी के फैसले के नुकसान को पब्लिक्ली इसलिए नहीं माना क्यूंकि विपक्ष इनको ‘गरीब’ की तुलना देकर इनकी वकालत कर रहा था। बढ़ते भारत की मध्यम वर्गीय मानसिकता में कोई भी व्यक्ति अपने को गरीब या गरीबी से कोसों दूर रखना चाहता है। तो हाँ आपके सर्वे में हो सकता है कि वह व्यक्ति अपना मध्यम वर्गीय परिचय देते हुए नोटबन्दी का समर्थन कर दे, मगर जरुर नहीं कि वोट देते समय वह भूल जाए की किस प्रकार उसके घर में चार दिन खाना नहीं बना, कैसे न फसल की बुआई हुई, या किस प्रकार वह काम की खोज में दर बदर भटका और फिर साहब ने मजूरी दी भी तो पुराने बंद हो चुके नोटों में।

चुनाव का पूर्वानुमान लेना हमारी अब आदत बन चुकी है मगर कई बार सर्वे द्वारा हासिल किये परिणाम को ही हम दिल से लगाकर बैठ जाते है और भूल जाते है की चुनावी सर्वे चुनाव नहीं होते बस चुनाव पर की गई बातचीत होती है।

लेखक आईआईटी दिल्ली में शोधार्थी एंव स्वतंत्र राजनैतिक विश्लेषक हैं।

सम्पर्क- +918527584666, visheshgurjar@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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