पर्यावरण

बढ़ता तापमान, बढ़ती आबादी, घटता जल, घटता जीवन – राहुल सिंह

 

  • राहुल सिंह

 

धरती का बढ़ता तापमान जिस ढंग से हमारी चिन्ता का विषय होना चाहिए, उस ढंग से होना तो दूर उसका हम संज्ञान तक लेने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। बिना किसी तकनीकी ज्ञान और विशेषज्ञता के आम शब्दों में इसे ऐसे समझें कि पर्यावरण को नुकसान दो तरीकों से पहुँचाया जा रहा है। एक व्यापक पैमाने पर और दूसरा खुदरा स्तर पर। व्यापक पैमाने वाले नुकसान में सरकार और कारपोरेट की संगठित भागीदारी है, जिसके मूल में अकूत मुनाफा है। वैश्विक स्तर पर इसे समझना हो तो अमेजन के वर्षा वनों की कटाई के ताजा उदाहरण से इसे समझा जा सकता है और देश के धरातल पर इसे समझना हो तो छत्तीसगढ़ के जंगलों की कटाई का जो ठेका अडाणी ने खनन के पूर्व लिया है, उसके आलोक में इसे समझा जा सकता है। साथ ही इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि सरकार कांग्रेस की हो या भाजपा की कारपोरेट हित के आगे सब बौने हैं। प्राकृतिक और मानव संसाधनों के दोहन से जो धन उगाही की कारपोरेट की लिप्सा है, उसके आगे आम आदमी की कोई बिसात नहीं रह गयी है। यह हमारे दौर का एक नंगा और कड़वा सच है। जाहिर है सरकार की प्राथमिकता सूची में आम आदमी नहीं है। फौरी तौर पर इसे समझना हो तो बिहार के मुजफ्फरपुर के इलाके में ‘चमकी बुखार’ से होने वाले बच्चों की मौत पर राज्य सरकार और केन्द्र सरकार दोनों के रवैये को देखकर उनकी गंभीरता या प्राथमिकता का आकलन किया जा सकता है। कारपोरेट हित के आगे सरकारें लोककल्याणकारी राज्य की अपनी भूमिका से हाथ खींचना तो काफी पहले शुरू कर चुकी थी, पर अब मामला इसलिए ज्यादा गंभीर है कि वइ इसे जरूरी सवाल के बतौर भी सार्वजनिक बहसों और चिन्ताओं से बाहर करने में कामयाब हो गयी है। अब लोकहित और लोकनिर्माण के नाम पर सरकारे ऐसीं छूटें हासिल कर रही हैं जिस पर आपत्ति दर्ज करने का आन्दोलन के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं रह गया है। और आन्दोलनों को कुचलना किसी भी पहले के दौर की तुलना में आज ज्यादा सहज है।

पिछले पन्द्रह बीस सालों में एक परिघटना जो एक ही ढंग से पूरे देश में घटी है वह है तेजी से हो़ता शहरीकरण। शहरीकरण की इस गतिविधि को समझने की जरूरत है, जिसने खुदरा स्तर पर पर्यावरण की सेहत को बिगाड़ने में घनघोर भूमिका अदा की है। पहला काम तो यह हुआ की शहरीकरण ने आबादी को एक खास इलाके में संघनित होने में प्रेरक का काम किया। जो इलाका शहरीकरण की जद में आ गया उसके जमीन की कीमतें बेतहाशा बढ़ती चली गईं। जब रिहाइशी जमीन की कमी हुई तो उसकी जद में कृषि योग्य जमीनें आईं फिर हर शहर में ग्रीन लैंड जैसी जमीनें आईं, जिसमें खेती-बाड़ी छोड़ कर कुछ नहीं किया जा सकता था। नियमों को ताक पर रख कर बड़े पैमाने पर ऐसी जमीनों की प्रकृति बदल कर निबंधन का काम जोरों पर चला। यह ग्रीन लैंड एक तरीके से बारिश के पानी का सबसे बड़ा संग्रहण क्षेत्र हुआ करता था, जिसे हमने खत्म किया। एक शहर जो शहर के तौर पर विकसित नहीं हुआ था अचानक शहरीकरण की जद में आने की वजह से बढ़ती आबादी की वजह से हलकान होने लगा। ट्रैफिक की समस्या से निजात के लिए फौरी तौर पर सड़कों का चौड़ीकरण किया गया। इससे हुआ सिर्फ इतना कि सड़कों के किनारे लगे पचास से सौ साल पुराने पेड़ देखते देखते काट डाले गये। यह जो पेड़ों की खुदरा हत्यायें हुईं, यह हमारी बहस का हिस्सा नहीं बन सका। सड़कों के चौड़ीकरण के बाद भी जाम से मुक्ति नहीं है। अब तो सौंदर्यीकरण एक नया चोंचला बीते पाँच साल में चलन में आया है। इससे हुआ यह है कि सड़कों के किनारे जो कच्ची सड़क जैसी चीज हुआ करती थी, उसे पेव्स निगल गये हैं। राँची जैसे शहर में तो सड़क के दोनों ओर एक इंच जमीन देख पाना मुश्किल है। सबको इस कदर ढाल दिया गया है कि बारिश के जल से जमीन का संपर्क होना मुश्किल हो गया है उसकी एक ही गति है कि नाली के रास्ते वह नाला या नदी तक शीघ्रातिशीघ्र पहुँच जाये। वैसे जानकारी के लिए बताता चलूं कि इस साल तकरीबन पन्द्रह से बीस हजार बोरिंग अकेल राँची में पानी देने में विफल साबित हुए हैं।

शहरीकरण ने एक और काम किया आबादी के एक खास दायरे में सीमित होने के कारण जमीन की उपलब्धता कम होती चली गयी तो पोखर और तालाब तक को पाट दिया गया। अपार्टमेंट कल्चर ने मुहल्लों का सिर्फ हुलिया ही नहीं बिगाड़ा। सबसे पहले वे कुँओं को बंजर कर गये। डीप बोरिंग ने कुँओं को अप्रासंगिक कर दिया। गर्मियों में जब पानी का स्तर नीचे चला जाता था तब कुओं में ईंट और पत्थर के बीच छूट गयी जगहों में गौरया अपना घोंसला बनाती थी, क्योंकि वहाँ ठंडक होती थी। सदियों से वे इसी ढंग से अपनी आबादी बनाये हुए थे। अब गौरया का वह प्राकृतिक आवास हमने छीन लिया है। कबूतर और मैना तो अपार्टमेंट के वेंटीलेशन और पाईप में शिफ्ट कर गये हैं लेकिन गौरया मारी-मारी फिर रही है।

अपार्टमेंट से निकलने वाले गंदे पानी को नाले के जरिये किसी तरह शहर की नदियों तक की राह दिखा दी गयी। इससे नदियाँ भी नालों में तब्दील होकर आखिरी साँसे गिनने लगीं। एक बहुत बड़ी आबादी उन नदियों में पाई जाने वाली गेतू, पोठी, चिंगड़ी, गरई, मांगुर जैसी छोटी मछलियों से अपने दोपहर का पोषण प्राप्त करती थीं, अब वह बीते जमाने की बात है। इन नदियों का पानी अब नहाने लायक भी नहीं रह गया है। बहते प्लास्टिक और कूड़ों के अंबार ने उनको एक दुर्गन्धयुक्त नाले में तब्दील कर दिया है। हाँ यह जरूर है कि नदियों के किनारे खेत में सिंचाई के लिए अब भी वे इसी पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। मजे की बात यह है कि इस प्रदूषित पानी ने से सिंचित सब्जियाँ सामान्य सब्जियों की तरह ही दिखती हैं। हमने अभी तक वह पद्धति विकसित नहीं की है जिससे एक आदमी सहजता से इन सब्जियों को सामान्य सब्जियों से अलगा सके। कीटनाशक युक्त और प्रदूषित जल से सिंचित सब्जियों के दैनिंदन उपयोग से कैंसर के बढ़ते मामलों का एक अदृश्य सम्बन्ध है।

यह सब कुछ हम सब की आँख के सामने रोज घटित होता रहा। लेकिन चलता है, वाले अंदाज में हम मूकदर्शक बने रहे। मौसम के इस बदले मिजाज से खेती-किसानी बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है, छोटे किसान हाथ खींच रहे हैं। इस साल मटर और पालक की फसल इस ओर मारी गयी। खेती की दुश्वारियाँ तो खैर और भी हैं। अब आलम यह है कि इस साल तापमान में हुए इजाफे ने पहली बार चिन्ता की रेखायें खींच दी हैं। चेतने का समय है। ना चेते तो धीरे-धीरे हम भी डायनासोर हो जायेंगे। और कुछ तो हमारे बस का नहीं है पर बारिश का मौसम सामने है। इतना करें कि बारिश में अपने आस-पास, घरों में जहाँ भी खाली जगहें हैं, वहाँ एक-दो पेड़ लगायें।

लेखक हिन्दी के युवा आलोचक हैं |

सम्पर्क- +917979847926, alochakrahul@gmail.co

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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