मध्यप्रदेश

भाजपा-कांग्रेस दोनो दलों के लिये संकट है मप्र में बढ़ती अफसरी निरंकुशता

 

  • डॉ अजय खेमरिया

 

भाजपा के पूर्व विधायक  श्री सुरेन्द्रनाथ सिंह के पक्ष में खड़े होकर मप्र के जनसम्पर्क मन्त्री श्री पीसी शर्मा और विधायक श्री कुणाल चौधरी ने अभिनंदनीय कार्य किया है। स्वस्थ्य लोकतन्त्र के लिये ये स्टैंड जितना सराहनीय है उतना ही मप्र शासन के लिये शर्मनाक पहलू है। लगे हाथ सुरेन्द्रनाथ सिह की पार्टी के लिये भी विचारण को विवश करने वाला घटनाक्रम है की क्यों पार्टी उनके साथ खड़ी नही हुई? जबकि उन्होंने जनता के लिये भोपाल की सड़कों पर संघर्ष किया था भाजपा के झंडे लेकर लोगों को एकत्रित किया था। बाबजूद इसके मप्र में किसी भाजपा नेता ने सुरेन्द्रनाथ सिंह के साथ खड़े होने की हिम्मत नही दिखाई। तो क्या यह माना जाए कि सुरेन्द्रनाथ के साथ मप्र भाजपा नही है और आन्दोलन करने के उनके कृत्य को भाजपा गलत मानती है? उनके विरुद्ध भोपाल पुलिस ने 23 लाख का जुर्माना ठोका है। लेकिन अभी तक भाजपा ने कमलनाथ सरकार की आलोचना तक नहीं की है।

लोकतन्त्र में जनता के मुद्दों को लेकर संघर्ष करना एक अनिवार्य तत्व है। 70 साल बाद भी हमारे तन्त्र में मौजूद अफसरशाही औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर आने के लिये तैयार नही है सुरेन्द्रनाथ सिंह के मामले में यही मानसिकता प्रदर्शित हुई है। पुलिस ने 23 लाख का जुर्माना इसलिये लगाया क्योंकि धरना प्रदर्शन पर पुलिस को अपने कर्मचारियों को अलग से ड्यूटी पर लगाना पड़ा उन कर्मचारियों की एक दिन की वेतन 23 लाख ठहरती है। सुरेन्द्रनाथ पर बगैर अनुमति धरना प्रदर्शन का आपराधिक प्रकरण अलग से बनाया गया। यहाँ प्रश्न यह भी है कि क्या किसी अपराध की आर्थिक कीमत आंकने की शक्तियां मप्र पुलिस के पास है? अगर अपराध के विरुद्ध जुर्माने की कारवाई कर दी गयी तो फिर आईपीसी की धाराओं में मुकदमे का औचित्य क्या है? प्रश्न यह भी है कि क्या सुरेन्द्रनाथ ने किसी निजी उद्देश्य से यह अपराध कारित किया? क्या जन समस्याओं को लेकर आवाज उठाना हिन्दूस्तानी जम्हूरियत में अपराध की श्रेणी में ला दिया गया है? यह विचारणीय सरकार के स्तर पर इसलिये भी गंभीर है क्योंकि जिस दिन मप्र पुलिस यह करवाई कर रही थी उसी दिन राहुल गांधी श्रीनगर में लोकतन्त्र की रक्षा की दुहाई दे रहे थे पिछले 5 सालों से वह लगातार प्रधानमन्त्री मोदी पर विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप लगाते रहे है। अच्छा हुआ मप्र सरकार के जनसम्पर्क मन्त्री पीसी शर्मा और विधायक कुणाल चौधरी ने सरकार की इस करवाई का सार्वजनिक विरोध कर अफसरशाही की औपनिवेशिक मानसिकता पर करारा प्रहार कर दिया। पीसी शर्मा मप्र में 15 वर्षो तक भोपाल में ऐसे अनेक आन्दोलन कर चुके है युवक कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कुणाल चौधरी भी सड़को पर सरकार को घेरते रहे है इसलिये दोनो ने बगैर सरकार की परवाह किये सुरेन्द्रनाथ सिंह के साथ खड़े होने का साहस दिखाया है इस  प्रकरण में भाजपा का रवैया मप्र में उसकी संघर्ष क्षमताओं को प्रश्नचिन्हित कर गया क्योंकि इस मामले को लेकर उसे सरकार की घेराबन्दी करनी चाहिये थी लेकिन ऐसा नही हुआ। और कांग्रेस के इन दो नेताओ ने न केवल अफसरशाही को आइना दिखा दिया बल्कि भाजपा के लिये भी रक्षात्मक स्थिति में ला दिया।

 

असल में केवल लोकतांत्रिक नजरिये से इस घटनाक्रम को देखने और समझने की जरूरत है कि कैसे आज भी अफसर सरकारों के शिखर पर बैठे लोगों को शीर्षासन कराते रहते है|

मप्र के मुख्यमन्त्री कमलनाथ सुदीर्ध राजनीतिक अनुभव वाले शख्स है लेकिन मप्र की सियासत में वे दिग्विजय सिंह जैसे संगठन और संघर्ष से तप कर नही निकले है। इस मामले में अफसरशाही ने जिस तरह कमलनाथ की भी किरकिरी कराई है वह सरकार के स्तर पर सोचने का गंभीर विषय है। आज भी मप्र कांग्रेस और भाजपा  में लगभग सभी  सफल नेता छात्र जीवन से निकल कर आये है उनके पास संघर्ष का तजुर्बा है इसलिये इस मामले को सतही तौर पर सिर्फ सुरेन्द्रनाथ प्रकरण मानकर नही लेना चाहिये बल्कि मप्र में अफसरशाही के लगातार निरंकुश होने की प्रवर्ति की गंभीर चुनौती के रूप में समझने और निबटने की सयुंक्त रणनीति पर काम  करने की आवश्यकता के हिसाब से लेने की जरूरत है। यह एक तथ्य है कि वर्तमान प्रदेश सरकार के अधिकतर मन्त्री अपने अफसरों की असुनवाई से पीड़ित है। प्रदेश सरकार  में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले सामान्य प्रशासन मन्त्री डॉ गोविंद सिंह पिछले दिनों अवैध उत्खनन को लेकर मुख्यमन्त्री को खुला खत लिख चुके है उन्होंने जनता से सार्वजनिक माफी मांगी है क्योंकि वे 15 साल तक जिस तरह इस मामले को लेकर भाजपा सरकार को आरोपित करते थे अपनी सरकार आने और मन्त्री होने के बाबजूद स्थितियों में कोई बदलाब नही करा पाए। सीहोर जिले में राजस्व मन्त्री गोविन्द सिंह राजपूत ने लगातार शिकायतों पर करवाई की तो प्रदेश भर के अफसर उनके विरूद्ध उठ खड़े हो गए। छह बार विधायक रहे केपी सिंह भी कुछ इसी तर्ज पर तन्त्र के विरुद्ध अपनी नाराजगी व्यक्त कर चुके है। मप्र विधानसभा के पिछले दोनो सत्रो की करवाई का अवलोकन किया जाए तो साफ है कि कैसे मंत्रियों से जबाब दिलाये गए जिनसे सरकार में आई कांग्रेस को शर्मिंदगी झेलने पड़ी। जिस मंदसौर गोलीकांड को लेकर कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल बनाया उसे लेकर विधानसभा पटल पर ही कांग्रेस सरकार पलट गयी। कहा जा सकता है कि सरकार के मंत्रियों को जबाब पढ़ने चाहिये थे लेकिन जबाब बनाने का काम तो अफसरशाही ही करती है। 45 दिन पुराने मंत्रियों से हम ये अपेक्षा नही कर सकते कि वे विधायी कार्य मे इतने निपुण हो। ऐसे अनेक मामले है जहाँ मप्र सरकार के  विधानसभा में जबाब खुद  काँग्रेस पार्टी की अधिकृत लाइनों से परे जाकर पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की नीतियों और निर्णयों की वकालत करते हुए दस्तावेजी ध्वनि करते दिखे। ऐसा नही है कि सिर्फ कांग्रेस सरकार ही अफसरी रवैये से परेशान हो भाजपा सरकार के अन्तिम कार्यकाल को अफसरी सरकार कहा जाता था| पार्टी के अधिकतर कार्यकर्ता इस हद तक नाराज थे कि उन्होंने भोपाल जाना तक छोड़ दिया था| मुख्यमन्त्री कार्यालय में जिस प्रमुख सचिव से लगभग सभी विधायक नाराज रहते थे, उसे कमलनाथ ने भी उसी हैसियत से बरकरार रखा। शिवराज सरकार के आखिरी तीन सालों में जिलों में कोई ट्रांसफर तक कार्यकर्ताओं के कहने पर नही हुए।

सच्चाई यह है कि अफसरशाही सदैव इस मानसिकता में रहती है कि हर दल के निर्वाचित प्रतिनिधियों को इस बात का अहसास कराया जाता रहे कि वे विधि के जानकार है और नेताओं को कुछ नहीं आता है वे अक्सर मंत्रियों को भय दिखाते रहते है कि नियमों में ऐसा नही है लेकिन जब मामला गांधी एक्सप्रेस पर सवार हो तो यही अफसर नियमों को खूंटी पर टांग देते है। जबकि सच्चाई यह है कि अफसर न तो जनता के प्रति जबाबदेह होते है न ही उनकी मनोवृति समस्याओं के निराकरण में रहती। मप्र में हर मंगलवार हर सरकारी अफसर को अपने दफ्तर में जनसुनवाई लगानी होती है, लेकिन हकीकत यह है कि जिला मुख्यालय पर कलेक्टर की जनसुनवाई में बेतहाशा भीड़ उमड़ती है जाहिर है जिले में नीचे के दफ्तरों में जनता की कोई सुनवाई नही हो रही है इसीलिए लोग न्याय की आशा में कलेक्टर के यहाँ गुहार लेकर आते है। स्वतन्त्र अध्ययन कर इस जनसुनवाई को आधार बनाकर ही मप्र में अफसरशाही की संवेदनशीलता, जनोन्मुखी सोच, ततपरता को कटघरे में खड़ा करने के लिये पर्याप्त है।

जाहिर है अफसरशाही का जड़तावाद, कदाचरण और अहंकार के साथ अनुत्तरदायित्व आज हमारे लोकतन्त्र के लिये एक खतरनाक चुनौती के रुप में सामने खड़ा है। दलीय आधार के आग्रह दुराग्रह से ऊपर उठकर व्यवस्था के पुनरुद्धार के लिये समवेत होने की आवश्यकता है।

सुरेन्द्रनाथ सिंह का प्रकरण मप्र में इस साझी चुनौती के रूप में स्वीकार की जाना चाहिये।

पुनश्च:लोकप्रशासन में अफसरशाही को एक आवश्यक बुराई माना गया है। इसे भी हमे ध्यान रखना चाहिये।

लेखक मप्र के विभिन्न अखबारों में नियमित रूप से लिखते रहते है तथा राजनीति विज्ञान के अंशकालिक शिक्षक हैं|

सम्पर्क-   +919109089500, ajaikhemariya@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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