चर्चा में

युद्ध के नहीं बुद्ध के देश में

 

  • डॉ. अमिता

 

इस बार दशहरे के दिन किसी काम से बाजार की तरफ जाना हुआ। इस दौरान जगह-जगह पर इतनी भीड़ मिली की कहीं पांव भी रखने की जगह नहीं थी। हर तरफ रावण के बड़े-बड़े पुतले दहन के लिए खड़े कर दिये गये थे। रावण किस व्यक्ति को बनाया जाये, उसे भी ढूंढने की प्रक्रिया लंबे समय से जोरों पर थी और यह बात अखबारों में खबरों को हिस्सा भी बन चुकी थी। सांसद और विधायक के बीच में भी रावण को जलाने की होड़ मची होती है।

हर मां-बाप प्रायः अपने छोटे-छोटे बच्चों को यही बता रहे थें कि ”देखो बेटा यह रावण है, जो कि राक्षस था, इसको जलाकर हम बुराई को जलाते हैं और अच्छाई पर जीत पाते हैं।“ माता-पिता के द्वारा बच्चों को यह ज्ञान देना कोई नया नहीं है, हमारे बचपन में भी यही बात हमे अपने माता-पिता द्वारा बतायी गयी थी। कभी होलीका को जलाकर तो कभी रावण को जलाकर इतिहास की पुनरावृत्ति के रूप में एक हिंसात्मक घटना को हम अपने बच्चों को करने के लिए कहीं न कहीं प्रेरित करते हैं। शायद इसी का परिणाम है कि आज देश में हर कोई कानून अपने हाथ में लेने लगा है, भीड़ खुद ही फैसला देने लगा है। इस देश के प्रधान द्वारा यह कहा जाता है कि “हमने दुनिया को युद्ध नहीं बुद्ध दिया है”, यही देश गांधी की अहिंसा परमो धर्मः की भी बार करता है, फिर उसी देश में ऐसी परंपराओं की पुनरावृत्ति मेरे समझ से परे है।

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बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में एक बात गौर करने वाली मैंने पायी कि यहां प्रायः सभी घरों में होलिका की तरह रावण का दहन भी अनिवार्य रूप से किया जाता है। अधिकांश घरों के भीतर रावण का अधजला पुतला बिखरे पड़े थे। इस तथाकथित राक्षस रूपी रावण के नाम पर भीड़ का जो हुजुम देखने को मिलता है, वह किसी आश्चर्य से कम नही है। इस तथाकथित राक्षस रूपी रावण के नाम पर लोग जिस तरीके से कमाई करते हैं, वह भी देखने लायक होता है। रावण के पुतले को बेचने वाले लोगों से जब मैंने बात की तब उन्होंने बताया कि एक रावण के पुतले की कीमत न्यूनतम 400-500 रूपये हैं। पुतले के अलावा मेले के नाम पर विभिन्न प्रकार के सामानों की बिक्री और बिक्री में लूट का मिश्रण भी सर्वविदित है। इस रावण के नाम पर लोग जिस तरीके से रोजगार पाकर कमाई कर रहे थें, वह भी देखने योग्य था। हर तरफ रावण के जलने और जलाने का उत्साह लोगों के मन में चरम पर था। इस दौरान मेरे मन में लगातार यह बात आ रही थी कि एक तरफ तो रावण को राक्षस कहा जाता है जिसके कारण इस बेरोजगारी के दौर में इतने लोगों ने अपने पेट के आग को बुझायी, वहीं दूसरी ओर हमारे बीच अनगिनत इंसान रूपी राक्षस मौजूद हैं, जिनके कारण चारों तरफ बेरोजगारी, मंदी और भ्रष्टाचार चरम पर है।

इस दौरान एक बात और गौर करने वाली रही कि मीडिया भी हर तरफ रावण को खलनायक के रूप में ही पेश करता है। उन मान्यताओं से बिलकुल अछूता है यह मीडिया जिसमें रावण को भगवान की तरह पूजा जाता है, देश के विभिन्न हिस्सों में। इसके अलावा सिर्फ हर तरफ विजयादशमी के त्योहार के रूप में ही इसे दिखाया गया, जबकि इसी दिन बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी, नागपुर में। इस दिन को सम्राट अशोक विजयादशमी के रूप में भी मनाया जाता है, लेकिन मीडिया सिर्फ एकपक्षीय मान्यताओं से ही ओत-प्रोत दिखता है।

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इस रावण के पुतले को जलाने के लिए तो लोग बहुत उतावले दिखते हैं लेकिन रावण के रूप में अपने भीतर की बुराईयों को जलाने की शायद ही कभी कोशिश करता है। इस कर्मकांड की आड़ में अधिकांश लोगों ने अंधविश्वास को बढ़ावा दिया है, जिन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि ”मुंह में राम बगल में छुरी“। रावण को जलाने के लिए पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भी अनदेखी की जाती है और धमाकेदार पटाखे और उसकी धुएं से ध्वनि और वायु प्रदूषण को भी भरपूर बढ़ावा दिया जाता है। साथ ही डीजे से होने वाली मौत भी किसी से नहीं छुपी है। डीजे से होने वाली बुजुर्गों के मौतों के मद्देनजर छत्तीसगढ़ की सरकार ने तो बिना अनुमति डीजे बजाने पर ही रोक लगा दी है और ऐसा करने वालो पर सख्त से सख्त कार्यवाही करने का आदेश भी जारी कर दिया गया है।

इस प्रकार हम प्रायः देखते हैं कि पर्व-त्योहार की आड़ में पर्यावरण से लेकर सामाजिक मूल्यों को भी अधिकांश नुकसान पहुंचाया जाता है। बच्चों के मन में हिंसा की बीच बोयी जाती है। रक्तपात की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाता है। आस्था के नाम पर पंडाल से लेकर विसर्जन तक में चिकनी चमेली, मुन्नी बदनाम हुयी, चुम्मा-चुम्मा दोगे आदि जैसी गाने सभी आस्थाओं को धाराशायी कर देता है। जहां महिलाओं की पूजा की जाती है, उसी देश में महिलाओं से तरह-तरह की हिंसा होती है और उन्हें न्याय तक नहीं मिल पाता है। फिर इस देश में हम किस पर विजय प्राप्त कर विजयदशमी का त्योहार मनाते हैं, यह गंभीर सवाल पैदा होता है।

लेखिका गुरू घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छ.ग.) में सहायक प्राध्यापक हैं |

सम्पर्क-   +91940600960, amitamasscom@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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