मैं कहता आँखन देखी

राजीव धवन के समर्थन में

 

  • नवल किशोर कुमार

 

इन दिनों भारत के उन्मादी ऊंची जातियों के निशाने पर हैं राजीव धवन। उन्मादी उन्हें लानत भेज रहे हैं। सोशल मीडिया पर उन्हें गालियां दी जा रही हैं। उन्हें गद्दार की संज्ञा दी जा रही है। धवन कोई और नहीं, बाबरी मस्जिद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में परसों खत्म हुई जिरह के दौरान मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ता हैं। ऊंची जातियों के लोगों को यही नागवार गुजर रहा है।

ताजा मामला यह है कि सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिट प्रकरण में सुनवाई के अंतिम दिन राजीव धवन ने मुख्य न्यायाधीश की सहमति से कथित तौर पर हिन्दू पक्ष के वकील द्वारा अदालत में प्रस्तुत एक नक्शे को फाड़ दिया। इसे लेकर कई तरह के अफवाह (खबरें) अखबारों, न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया पर प्रकाशित/प्रसारित किए गए। इसके कई मतलब भी निकाले गए। कईयों ने तो इसे राजीव धवन का ‘फ्रस्टेशन’ करार दिया और इसके आधार पर संभावित फैसले की घोषणा भी कर दी।

राजीव धवन को ट्रोल करने वालों में उन्मादी आरएसएस समर्थक तो हैं ही, कुछ खास लोग भी हैं। मसलन, आसाम के पूर्व डीजीपी रहे (पद्मश्री) प्रकाश सिंह ने ट्वीटर पर लिखा है -“राजीव धवन जयचंद और ओमीचंद की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।” यह तो एक बानगी है। एक जगदीश शेट्टी हैं जिन्होंने ट्वीटर पर अपने परिचय में खुद को विराट हिन्दुस्तान संगम का राष्ट्रीय महासचिव कहा है। उन्होंने ट्वीटर पर राजीव धवन को रावण की संज्ञा दी है। ट्वीटर पर उन्हें जान से मारने की धमकी भी परोक्ष रूप से दी जा रही है।
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1943 में जन्में राजीव धवन भारत के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। वकालत के क्षेत्र में इनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान रही है। वे मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स के आयुक्त भी रहे हैं। राजीव धवन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की। बाद में उन्होंने कैंब्रिज और लंदन विश्वविद्यालय में भी पढ़ाई की। वे क्वीन्स यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट लंदन और टेक्सास यूनिवर्सिटी में अध्यापक रहे हैं। भारत में इंडियन लॉ इन्स्टीच्यूट के मानद प्रोफेसर हैं। धवन की पहचान एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में रही है। वे पब्लिक इंट्रेस्ट लीगल सपोर्ट एंड रिसर्च सेंटर का नेतृत्व भी करते हैं। इसके जरिए धवन युवाओं को कानून व संविधान के बारे में जागरूक बनाने के लिए कई तरह के प्रयास करते हैं। साथ ही वे जरूरतमंद गरीबों को कानूनी सहायता भी देते हैं।

राजीव धवन को लेकर फब्तियां उस वक्त भी कसी गयी थीं जब उन्होंने सुन्नी वक्फ बोर्ड का पक्ष अदालत में रखना स्वीकार किया था। उस वक्त जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाबरी मस्जिद मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि विवादित भूखंड को तीन हिस्सों में बांट दिया जाना चाहिए, धवन ने आगे बढ़कर हाई कोर्ट के फैसले की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था – यह पंचायती न्याय है जो मुसलमानों को उनके कानूनी अधिकार से वंचित करता है।

बहरहाल, कहना अतिश्योक्ति नहीं कि राजीव धवन को अपना पक्षकार बनाकर भारत के मुसलमानों ने एक मिसाल पेश किया है। वे जो हिन्दुओं के ठेकेदार बने बैठे हैं, क्या उनमें इतना नैतिक बल है कि वे अपने लिए किसी मुसलमान अधिवक्ता को अपना पक्षकार बना सकें। राजीव धवन अभिनंदन के पात्र हैं जिन्होंने भारतीय संविधान का मान रखा है। उन्हें विजय मिले और भारत में उन्माद की पराजय हो।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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