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शख्सियत : पं. अनोखे लाल की स्मृति में

बनारस पुरातन काल से संस्कृति एवं संगीत का प्रधान केन्द्र रहा है। तबला वादन में बनारस घराना जग प्रसिद्ध है। यहां एक से एक उदभट्ट तबलावादक हुए हैं जिन्होंने देश विदेश में भारत के गौरव में वृद्धि की है। उसी गौरवशाली कड़ी में तबला सम्राट पं. अनोखे लाल मिश्र का नाम आता है। वे संगीत जगत के क्षेत्र में धुमकेतु की तरह प्रकट हुए, अपनी आभा बिखेर कहीं और आलौकित करने चले गए। यह बात अबतक कायम है कि उस प्रकाश रेखा से निकले हुए कई तारे शिष्य प्रशिष्य के रुप में अपने तबलावादन से विश्व में आलौकित हो रहे हैं। भारतीय संगीताकाश के दैदिप्यमान नक्षत्र चर्तुमुखी तबलावादक महर्षिकल्प पं. अनोखे लाल मिश्र जो ना धिन धिन ना के बादशाह और तबला में प्रयुक्त धिरधिर बोल के विशेषज्ञ के रुप में भी कला संसार में लोकप्रिय हुए।

महान तबलावादक पं. अनोखे लाल मिश्र को जिन्होंने देखा है, जिन्होंने उनका वादन सुना है या जो उनके संपर्क में आए हैं वो अवश्य यह स्वीकार करेंगे कि अद्भुत वादन, मिजाज और व्यक्तित्व की दृष्टि से वो सही अर्थ में अनोखे थे। पं. अनोखे लाल मिश्र ने अत्यन्त कलात्मकता के साथ नाविन्यपूर्ण रुप में, अपनी प्रतिभा एवं रियाज के बल पर जीवन भर अपनी कला को प्रभावपूर्ण रुप में प्रस्तुत किया है। आपकी बुलन्द महफिलों, वादन वैशिष्टयों एवं आपके विषय में अन्य महानकलाकारों द्वारा प्रकट किए गए प्रशंसोद्गार के किस्से, घटनाओं, आख्यायिकाओं को सुनते हुए हमें आज भी आनन्द प्राप्त होता है। हमारे शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भावनाएं विल़़क्षण रुप में संवेदनशील बन जाती हैं और इन सब प्रकियाओं में कभी हम सद्गदित भी हो जाते हैं। आपके प्रति हमें अभिमान एवं गर्व महसूस होता है।

अभावों के उस दलदल में जन्में जो कभी भी उन्हें डुबो सकता था, पं. जी ने सफलता की जिस शीर्ष उचाई को स्पर्श किया था, वह अत्यन्त रोचक एवं प्रेरणास्पद है। 6 महीने के अबोध बालक से उसकी माता की गोद तथा छह वर्ष की अल्प आयु में पिता का साया छीन जाना होनी का क्रूर अन्याय ही था। आपके लालन पालन का दायित्व आपकी दादीजी को निभाना पडा और 6 वर्ष की आयु में बनारस के संतहृदय तबला वादक पंडित भैरव मिश्र से शिक्षा लेना प्रारम्भ किया। सच्ची लगन, अथक परिश्रम एवं गुरु कृपा के फलस्वरुप आप जल्द ही प्रगति करने लगे और अपनी साधना के मध्य आने वाले हर व्याघातों को हंसते हुए सहते रहे तथा अपनी साधना की अवधि को परस्पर बढ़ाते हुए 18 घंटे प्रतिदिन करने में समर्थ हुए। इसके लिए आपको शारीरिक कष्ट भी भोगना पड़ा, परन्तु आपने साधना में बाधा नहीं आने दी।

पड़ोसियों को असुविधा न हो इसलिए ढाई फीट लंबे, डेढ़ फीट चौड़े तथा तीन इंच मोटी लकड़ी के पीढ़े पर रियाज करने लगे। एक विचित्र काष्ठ का तबला बनवाया, जिसकी पूड़ी काष्ठ की थी। उस पर अभ्यास द्वारा घिसाव के निशान पड़ गए थे। उन्होंने रचनाओं की सरलता, संतुलन और सौन्दर्य पर विशेष ध्यान दिया था। वे भाव को विशेष महत्व देते थे। अहर्निश भावभीना दिव्य नाद् सुनते रहते थे और अपने तबले से निकालने में सफल थे। उनकी नजर में कोई भी रचना साधारण या असाधारण नहीं होती। सबकी कीमत सधने के बाद ही होती हैं। सध गई तो साधारण में ही असाधारण प्रभाव उत्पन्न हो गया और नहीं सधी तो असाधारण की भी कोई कीमत नहीं। पंडित जी का मानना था कि भाव की हत्या करके संगीत को जिन्दा नहीं रखा जा सकता। इसलिए जब एक दिन वो अपने अभ्यास कक्ष में बैठकर अभ्यास कर रहे थे उसी समय उस रास्ते से एक संगीत से अनभिज्ञ व्यक्ति सिर पर बोझ लिए जा रहा था। उसे उनका तबलावादन अत्यधिक अच्छा लगा और वह घंटों खड़ा रह कर सुनता रहा। उस अवधि में उसे यह भी ज्ञात नहीं रहा कि उसके सिर पर बोझ है।

पंडित अनोखे लाल मिश्र को बॉम्बे रेडियो स्टेश्न से सोलो बजाने के लिए एक घंटा समय मिला था। उन्होंने जब बजाना शुरु किया तो डायरेक्टर आदी सभी आकाशवाणी के कलाकार एवं कर्मचारी स्टुडियो में एकत्रित हो गए। वह प्रोग्राम सीधे ब्रॅाडकास्ट हो रहा था। वे एक घंटा चालीस मिनट बजा गए। सब लोग कार्यक्रम सुनने में ऐसे तल्लीन हो गए थे कि उन्हें प्रोग्राम खत्म होने पर भी ध्यान नहीं रहा कि ब्रॅाडकास्टिंग बंद कर दें। डायरेक्टर ने कहा कि ये अनोखे लाल जी तो अनोखे हैं उन्हाने अपनी उंगलियों के चमत्कार से सबको विभोर कर दिया है। ऐसा चमत्कारिक और सम्मोहक तबलावादन था उनका। पंडित अनोखे लाल मिश्र के अनेक शिष्य हैं जिन्होंने भारतवर्ष के अतिरिक्त विदेश में भी अद्धितीय तबलावादन से अत्यधिक ख्याति अर्जन की है तथा अपनी एक अलग पहचान बनाई है, जिनके प्रमुख नाम हैं- स्व. पं. राम जी मिश्र, स्व. पं. महापुरुष मिश्र, स्व. पं. छोटे लाल मिश्र, पं. ईश्वर लाल मिश्र इत्यादि।

पं. अनोखेलाल जी अपने जीवन काल में लोकप्रियता के शिखर पर रहे, और उनकी श्रेष्ठता को लेकर भी किसी को संशय नहीं था। 10 मार्च 1958 में उनका निधन हो जाने के बावजूद सन् 2017 तक में लोग उन्हें आदर एवं श्रद्धा से याद करते हैं और करते रहेंगे। ऐसा इसलिए है कि श्रेष्ठ तबलावादक होने के साथ साथ वह संत हृदय प्राणी भी थे।

उस्ताद अल्लारखा खां ने पंडित अनोखेलाल मिश्र के विषय में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा था कि ’’धिर धिर’’ को पब्लिक में पब्लिश करने वाले वे ही थे। उनके ढंग से ‘धिर धिर’ बजाना मेरे वश की बात नहीं थी। मैंने ‘धिर धिर’ को तिरकिट की तरह बजाया जिसकी वे अक्सर तारीफ करते थे। पं. अनोखे लाल मिश्र विलक्षण सितार वाद्क उस्ताद विलायत खां के सर्वाधिक प्रिय तबला वादक थे। पं. अनोखे लाल मिश्र जी की विशेषता यह थी कि वह जितना अधिक बजाते थे उतनी ही उर्जा उन्हें मिलती थी। कई बार रोगग्रस्त अवस्था में भी विलायत खां के साथ झाले में तीनताल हो या एकताल शुद्ध पूर्ण वादन से अतिद्रुतलय में उनका अनोखापन उस समय भी यथावत रहता था। इसलिए विलायत खां उन्हें ‘रबड़ भैया’ कहते थे। पंडित जी देश के पहले तबला वादक हैं जिनके ‘व्यक्तिव एवं कृतित्व’ के उपर डॉ. प्रेम नारायण सिंह द्वारा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में शोध कार्य हुआ है जो कनिष्क प्रकाशन द्वारा ‘पुस्तक’ के रुप में उपलब्ध है। आपकी जीवनी विभिन्न पुस्तकों एवं पाठ्यक्रमों में विद्यमान है। जो संगीत प्रेमियों के लिए प्रेरणा स्रोत है. आपकी स्वतंत्र वादन की रिकार्डिंग ‘लीजेंड्री लिगेसी’ मुम्बई द्वारा सीडी एवं कैसेट में उपलब्ध है।

उल्लेखनीय है कि कई वर्षों से उनके प्रशिष्य डॉ. ऋषितोष द्वारा दिल्ली में नादऑरा सांस्कृतिक संस्था के माध्यम से प्रतिवर्ष अखिल भारतीय संगीत समारोह सफलता पूर्वक आयोजित किया जाता है। इस समारोह में देश के गणमान्य मूर्धन्य कलाकार अपना व्यावसायिक पारिश्रमिक त्याग कर श्रद्धापूर्वक संगीत की सेवा प्रदान कर रहे हैं। संस्था भी इन कला साधकों का सम्मान करती है। यह संगीत साधकों द्वारा उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि ही है।

 

जागृति

योग गुरू एवं कला समीक्षक

सचिव-नादऑरा

मो.- 9013501478

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