देशमुद्दा

मानव का मानव से अलगाव ही जेट एयरवेज की डूबने की कहानी है

 

  • दीपक भास्कर

 

मुझे याद है, तब मैं जेएनयू का छात्र था। एक जेट एयरवेज में काम करने वाले मित्र के यहाँ कभी-कभी जाता था। जब भी उनके घर जाता, खूब बातचीत होती और मैं बातचीत में कहता की जेम्स प्रौधन ने कहा कि “पूँजी(कैपिटल) कुछ नहीं, बस चोरी है” तो वो मन भर मुझे कोसते। मार्क्स का नाम लेते ही, मुझे लगता कि वो सामने रखी नास्ते की प्लेट छीन लेंगे। वो शायद तब ये सोचते थे कि जेएनयू में पढ़ने वाले छात्र, यूं ही “पूँजीवाद” के खिलाफ होते हैं। वो हमारे संघर्षों का मजाक भी उड़ा देते थे, कहते कि जेएनयू वालों को यूनिवर्सिटी ही, जंतर-मंतर पर शिफ्ट कर देना चाहिए। तब उन्हें शायद यह भान भी न था कि एक दिन वो खुद जंतर-मंतर की सड़क पर संघर्ष कर रहे होंगे। आज वो रो रहे हैं, बिलख रहे हैं, गुहार लगा रहे हैं, सरकार से अपील कर रहे हैं। जब मैं सरकार की जिम्मेदारी बात करता था वो भड़क जाते थे वो कहते कि सरकार की क्या जरूरत है? लेकिन आज जब उनको देख रहा हूँ कि उनके बच्चे भी स्कूल जाने से महरूम होने वाले हैं, वो कह रहे हैं हम भूखे मर जायेंगे, उनका ईएमआई कौन भरेगा, पिताजी बीमार हैं उनका इलाज कौन करायेगा वगैरह-वगरैह। मेरा दुखी होना लाजिमी है लेकिन असल दुख इस बात का है कि वो तब हमारे संघर्ष को एक सिरे से नकार देते थे। तब हम एयर इंडिया को बचाने की बात करते तो क्रोधित हो जाते, कहते कि घाटे में है तो बंद हो ही जाना चाहिए। वो कहते कि टैक्स पेयर के पैसे से एयर इंडिया को क्यों बचाया जाए। मैं मुस्कुराते हुए कहता कि एक दिन आप समझेंगे। आज जेट एयरवेज के कर्मचारी सरकार से कम्पनी बचाने के लिए हजारों करोड़ मांग रहे हैं। ये वही लोग हैं जो अभी कुछ दिन पहले महज बीस प्रतिशत गरीब लोगों की आय को सालाना 72000 रुपये करने की नीति पर, सवाल दाग रहे थे कि पैसा कहाँ से आएगा? तो जेट एयरवेज को बचाने के लिए पैसा कहाँ से आएगा। इनकम टैक्स देने वाले यह भूल जाते हैं कि जीडीपी का यह एक छोटा सा हिस्सा है। इस देश की असल आय तो इनडाइरेक्ट टैक्स से आती है। खैर! यही इस देश का मिडल क्लास है। जो अमीर बनने के लिए, किसी गरीब को गुलाम बनाने की प्रक्रिया को तर्कसंगत बना दे।

लेकिन आज भी उनके संघर्ष और हमारे संघर्ष में सिर्फ इतना अंतर है कि वो आज भी खुद के लिए संघर्ष कर रहे हैं और हम, तब भी और आज भी, इस देश और दुनिया के तमाम लोगों के लिए संघर्ष कर रहे थे, कर रहे हैं।

यह लगभग उसी तरह है जब जया प्रदा, आजम खान के भद्दे कमेंट से आहत होकर, दहाड़ने लगती हैं। लेकिन यही जया प्रदा देश भर में औरतों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ एक शब्द के साथ भी, संसद में खड़ी तक न हुई। जब मुलायम सिंह ने “लड़को से गलती” वाली बात कही तो उसकी निंदा तक नही की। लेकिन आजम खान हो या भोगी आदित्यनाथ हो, ऐसे तमाम लोगों के खिलाफ हम सदैव खड़े थे और रहेंगे।

बहरहाल, जब जेट एयरवेज का “टाइटैनिक” अंत हुआ है तो उसमें बीसों हजार की संख्या में लोग मारे गए हैं, बेरोजगार हुए हैं। काश ये लोग, झारखंड, छतीसगढ़, ओडिशा की उस “कॉर्पोरेट लूट” के खिलाफ खड़े हुए होते, भात-भात पुकारते दम तोड़ने वाली भारत की बेटी के लिए बस दुखी ही हो जाते, लाखों की संख्या में आत्महत्या कर रहे किसानों के लिए उमड़ पड़ते, दाना मांझी के दर्द को समझते, लाखों मजदूरों के दर्द को अपना बना लेते, तमिलनाडु के किसान के जंतर-मंतर के संघर्ष के साथ खड़े हो जाते तो शायद आज इस टाइटैनिक अंत में कोई भी न मरता, सब जिंदा होते, जहाज डूब भी जाता तो क्या हम एक दूसरे का  हाथ पकड़कर समुंदर पर कर जाते। जिस आन्दोलन को आप नकारते रहे आज उसी आन्दोलन से आपको भी उम्मीद है। ये अच्छा है! देर से ही सही, आप भी आन्दोलन में हैं, सड़क पर न सही तो, कम से कम मन ही मन में आंदोलित हो जाना चाहिए, उससे भी आप देश के और देश आपका हो जाता है।

मैं जब गरीबी की बात करता, बेरोजगारी की बात करता तब वो कहते कि लोग काम ही नहीं करना चाहते इसलिए गरीब हैं लेकिन आज जेट एयरवेज का कर्मचारी, बीएसएनएल का हर आदमी काम करना चाहता है फिर भी……!

बात काम करने की नहीं है बल्कि काम होने की है, काम करने देने की है। काश! हम सब ये समझ पाते कि देश सिर्फ सीमाओं पर नहीं होता, सीमा तो किसी भी देश का अंत होता है, जब अब आप सीमाओं पर चले जाते हैं तो आप अंत पर चले जाते हैं, देश सीमाओं से शुरू नहीं होता बल्कि देश का केंद्र तो लोग हैं वहीं से शुरू होता है। काश! हम समझ जाते कि क्यों हम हिन्दू-मुसलमान में बंट रहे हैं। अलग क्यों होना है? अलग तो हैं ही, इन्हीं अलग-अलग लोगों को जोड़कर ही तो देश बनता है।

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आइये, एक दूसरे के संघर्ष के साथ खड़े हों, समझे कि अगर दिल्ली विश्विद्यालय का परमानेंट और एडहॉक शिक्षक सड़क पर खड़ा है तो वो इस देश को अच्छी पढ़ाई देने के लिए संघर्ष कर रहा है। मैं सरकार से कुछ नहीं कहूँगा बस आपसे कहूँगा, बीएसएनएल, एमटीएनएल, एयर इंडिया, एलआईसी, पोस्ट ऑफिस , डीयूटीए, एफईडीसीयूटीए  जैसे तमाम आन्दोलन एक साथ हों। शायद फिर सरकार से कुछ कहना या मांगना ही न पड़े।

क्योंकि सत्य के साथ खड़ा होना ही देश को बचा लेना है।

#सत्यमेवजयते

दिल्ली विश्विद्यालय के दौलतराम कॉलेज में राजनीतिशास्त्र पढ़ाते है और सामाजिक एवं राजनैतिक मुद्दे पर बेबाकी से लिखते हैं।

deepakbhaskar85@gmail.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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