चर्चा में

संघ में छिपे हुए गांधी को समझे बिना मोदी से कैसे लड़ेगा विपक्ष?

 

  • डॉ अजय खेमरिया

 

महात्मा गांधी 150 वी जयंती पर आरएसएस के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने बकायदा लेख लिखकर गांधी के प्रति अपनी वैचारिक और कार्यशील प्रतिबद्धता को सार्वजनिक किया। इस बीच हैश टेग गोडसे भी जमकर  ट्रेंड हुआ।  देश के बड़े बुद्धिजीवी वर्ग ने ट्विटर पर गोड्से के ट्रेंड को आरएसएस के साथ जोड़ने की कोशिशें की। कांग्रेस के बड़े नेता अक्सर गांधी की हत्या से संघ को जोड़ने का प्रयास करते है राहुल गांधी खुद इस आरोप का अदालत में सामना कर रहे है वह कानूनी रूप से कोई तर्क कोर्ट में प्रस्तुत नही कर पा रहे है जो आरोप उन्होंने संघ पर  सार्वजनिक रुप से लगाये है।

सवाल यह है कि क्या गांधी के साथ संघ का कोई जमीनी रिश्ता वास्तव में कायम है क्या? क्या कांग्रेस और दूसरे संघ विरोधी राजनीतिक सामाजिक संगठनों ने महात्मा गांधी की वैचारिकी के साथ कोई कार्य सबन्ध है भी क्या? सरसंघचालक मोहन भागवत ने गांधी के भारतीयता के विचार को रेखांकित किया है इसे गांधी और संघ के परिपेक्ष्य में समझने का प्रयास किया जाए तो संघ गांधी के नजदीक दिखाई देता है और कांग्रेस एवं वामपंथी तुष्टिकरण की नीतियों पर खड़े दिखते है। तुष्टीकरण और अल्पसंख्यकवाद की राजनीति ने ही संघ की स्वीकार्यता को भारत के बड़े वर्ग में स्थापित करने का काम किया है। दुनिया के किसी देश में अल्पसंख्यक की संवैधानिक अवधारणा नही है लेकिन भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जहां अल्पसंख्यक शब्द को वैधानिक दर्जा देकर समाज को बहुसंख्यक -अल्पसंख्यक में बांटा गया है। यह एक तथ्य है कि पिछले कुछ दशकों खासकर राजीव गांधी के दौर से देश की राजनीति अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की ओर झुकती चली गई। भारत के बहुसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाओं को जिस अतिशय और बेख़ौफ अंदाज  में  गैर भाजपा दलों ने ताक पर रखा है उसने बहुसंख्यक समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया कि इस वोट बैंक की राजनीति ने उसके भारत में महत्व और अस्तित्व तक को खतरे में तो नही डाल दिया है?

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गांधी ने अपने पूरे दर्शन में भारतीयता को प्रमुखता प्रदान की। रामराज्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, मधनिषेध, जैसे आधारों पर अपनी वैचारिकी खड़ी की। ये सभी आधार भारतीयों के लोकजीवन को हजारों साल से अनुप्राणित करते आ रहे है। राम भारतीय समाज के आदर्श पुरुष है और गांधी के प्रिय आराध्य। अब यह आसानी से समझा जा सकता है कि गांधी किस भारतीयता के धरातल पर खड़े थे। कांग्रेस और वामपंथी भारत के उस प्राणतत्व जिसे गांधी ने अधिमान्य किया है के स्थान पर कतिपय बहुलतावाद और विविधता की गलत, विकृत प्रयोजित व्याख्या कर देश की राजनीति पर थोपते रहे है। सेक्यूलरिज्म को जिस स्वरूप में सिर पर रखा गया वह  धर्मपरायण गांधी के भारत औऱ विश्वबन्धुत्व से बिल्कुल अलग है। गांधी को कभी अपने हिंदू होने पर एतराज नही था वे हर परिस्थितियों में प्रार्थना करते थे राम उनकी चढ़ती उतरती सांसों में थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गांधी के इस पक्ष को अपने दैनिक कार्य मे शामिल कर रखा है लेकिन संघ को बाहर से कोसने वाले नेताओं और कतिथ बुद्धिजीवियों को पता ही नही है कि कैसे संघ ने अपने आप को भारत की अधिसंख्य चेतना में  गांधी की तरह स्थापित कर लिया। आज मोदी सरकार को बड़े बहुमत से देश ने फिर सत्ता सौंपी है तो यह केवल संसदीय राजनीति का एक चुनावी घटनाक्रम मात्र नही है। यह गांधी के देश में संघ औऱ उसकी वैचारिकी की नई पीढ़ी के साथ एक युग्म की शुरुआत भी है।

आज  गांधी के गैर-संघी उतराधिकारियो के पास क्या पूंजी है? क्या धर्मांतरण को लेकर गांधी के विचारों को अल्पसंख्यकवाद की सियासत करने वाले लोगों ने समझा औऱ पढ़ा है? क्या  जिस छुआछूत औऱ जातिवर्ग के विरुद्ध गांधी खड़े थे उसकी वकालत में नही खड़े है  अन्य राजनीतिक दल? किस संगठन या राजनीतिक दल के एजेंडे में सामाजिक समरसता का तत्व है? संघ एक कुंआ एक श्मसान। एक घर एक रोटी। समरसता सम्मेलन, समरसता मंच जैसे अन्तहीन प्रकल्पों के जरिये भारत में हिंदुओं को एकीकृत कर रहा है तो इसमें गांधी का अनुशीलन है या विरोध? वस्तुतः गांधी भी तो दलित बस्तियों में जाते थे। संघ को किराए पर गाली बकने वाले इस सामाजिक जुड़ाव को इसलिय नही देख पाए क्योंकि वे खुद उस अर्थ में मनुवादी है जिसे वह विकृत कर  संघ के विरुद्ध प्रस्तुत करते है।

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गांधी के दर्शन में सेवा कार्यों की अपरिहार्यता है लेकिन नेहरू युग से कांग्रेस की पूरी इबारत में यह तत्व कहीं नजर ही नही आएगा। संघ ने गांधी के इस आह्वान को इतनी संजीदगी से अपने संगठन में उतारा की आज सेवाकार्यों के मामलों में संघ दुनिया का सबसे बड़ा और व्यापक संगठन है। सेवा भारती, वनवासी कल्याण परिषद, एकल विद्यालय, परिवार प्रबोधन, विद्या भारती, जैसे बीसियों  अनुषांगिक सँगठन दिन रात देश भर में सेवा के ऐसे ऐसे प्रकल्पों में जुटे है जिसकी कल्पना भी आलोचकों को नही है। कहीं भी बाढ़, रेल दुर्घटना, भूकम्प आने के तत्काल बाद आपको संघ के गणवेशधारी लोग सेवा करते नजर आएंगे ही। लेकिन वामपंथी दलों के वे लोग जो भारत की बर्बादी तक जंग का एलान करते है, जिन्हें भारत मे अफजल गुरु की बरसी मनाने की आजादी चाहिये आपको सिवाए टीव्ही के कहीं किसी सेवा कार्य मे नजर नही आ सकते है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि राहुल गान्धी इन आजादी के लड़ाकों को समर्थन देने जेएनयू तक दौड़ लगाते है।

गांधी सम्पर्क औऱ सेवा के बल पर भारत की आवाज बने थे संघ ने सम्पर्क और सेवा के जरिये आज करोडों दिलों में अपनी जगह बनाई है। वैचारिकी अधिष्ठान के गौरव भाव को गांधी हमेशा प्राथमिकता पर रखते थे द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भरी सभा के दौरान उन्होंने अपनी प्रार्थना के लिये सँवाद रोक दिया था। क्या ऐसा आग्रह किसी कांग्रेस नेता में आज अपने धर्म और अन्तःकरण की आवाज के लिये दिखाई देता है? सिवाय चुनावी भाषण के दौरान अजान की आवाज पर भाषण रोक देने के। क्या अधिकाँश नेता  अल्पसंख्यकवाद की राजनीति के बंधक नही बन गए है? रोजा इफ्तार पीएम हाउस में गर्व से हो पर दिवाली मिलन या रामनवमी  से सेक्युलर दिखने के चक्कर में परहेज क्या गांधी वाद का अनुशरण है?

 

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गांधी मूलतः पत्रकार थे उन्होंने अपने जीवन मे आठ अखबार निकाले 40 हजार से ज्यादा लेख लिखे। यह इसलिए कि भारतीय विचार दुनिया के सामने लाये जा सकें। गांधी के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने पत्रकार गांधी की विरासत को कितना बढाया है? कहां है हरिजन, नवजीवन, जैसे प्रकाशन?

नेशनल हेराल्ड अखबार की सम्पति मामले में कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों ही जमानत पर ह| यह गांधी के पत्रकारीय पक्ष पर कांग्रेस की प्रतिबद्धता का प्रमाण है वहीं संघ के मुखपत्र हिन्दी में पांचजन्य और अंग्रेजी में ऑर्गनाइजर 70 साल से लगातार प्रकाशित होकर पूरी दुनिया मे अपने पाठकवर्ग को बढ़ा रहे है। इन्ही अखबारों से निकलकर अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमन्त्री तक बन गए। यानी संघ ने बुनियादी प्रचार की गांधी तकनीकी को आत्मसात कर करोड़ों भारतीयों को आत्मगौरव का अहसास भारत और भारत से बाहर कराया है। हाउड्डी मोदी, मेडिसन मोदी जैसे आयोजन के पीछे संघ के विचार प्रवाह की भी बड़ी भूमिका है।

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समझा जा सकता है कि संघ आज आम चेतना के साथ कैसे सयुंक्त हुआ। समाजविज्ञान का एक स्थाई तत्व यह है कि समाज अपनी चेतना के साथ किसी बाहरी तत्व को जोड़कर ही चलता है वह तत्व जीवन मे कोई धर्मात्मा, धर्म गुरु, अभिनेता, राजनेता, गायक, यहां तक कि मोहल्ले की कोई लड़की या लड़का भी हो सकता है। मोदी, संघ, हिंदुत्व के साथ आज यही जुड़ाव नए भारत के लोग महसूस करते है इसे शायद संघ औऱ मोदी के टेलीविजन पर बैठे आलोचक आज तक समझ ही नही पाए है। गांधी के बाद भारतीय राज्य व्यवस्था ने जिस चुनावी ध्येय को आगे रखकर भारतीय गौरव भाव को तिरोहित करने की कोशिश की उसी का परिणाम है कि आज भारत की संसदीय राजनीति में भाजपा के आगे सभी दल बोने और निःशक्त नजर आने लगे है।

यही संघ की ताकत है क्योंकि संघ ने करोड़ो मनों में भारत के सनातन मान बिंदुओं को गर्वोक्ति के साथ  स्थापित किया है। यह सफलता गांधी के मार्ग पर चलकर ही अर्जित की गई है।

इसे आप राजनीति रुप से मोदी युग कह सकते है लेकिन इसके मूल में संघ की अहर्निश सेवा ही है।

संघ के आलोचक बौद्धिक जुगाली से ऊपर उठकर इसके सिस्टम में छिपे गांधी को तलाशने की कोशिश करें तो अच्छा होगा। गोडसे के साथ संघ का अकाट्य रिश्ता खोजने और थोपने वाले आलोचक गांधी के संग संघ का नाता भी खोजने की कोशिशें करें।

लेखक मप्र के विभिन्न अखबारों में नियमित रूप से लिखते रहते है तथा राजनीति विज्ञान के अंशकालिक शिक्षक हैं|

सम्पर्क-   +919109089500, ajaikhemariya@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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