नाटक

राजेश कुमार के नाटकों में गाँधी

 

  • आशा

 

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी एक ऐसी शख्सियत हैं जिनके व्यक्तित्व ने साहित्यकारों को विशेष रूप से आकर्षित और प्रेरित किया हैl आधुनिक हिन्दी साहित्य की लगभग सभी विधाओं में गाँधीजी और उनके विचार किसी-न-किसी रूप में अनुस्यूत रहे हैंl नाटक भी इससे अछूता नहीं हैl गाँधीजी के जीवित रहते और उनकी मृत्यु के बाद एक चरित्र और विचार के रूप में उनके व्यक्तित्व को केंद्र में रखते हुए कई नाटककारों ने नाट्य-रचना की हैl समकालीन हिन्दी नाट्य-साहित्य में राजेश कुमार ने गाँधीजी की विचारधारा और उनके जीवन के अलग-अलग पक्षों को केंद्र में रखते हुए चार नाटक लिखे – ‘अम्बेडकर और गाँधी’, ‘गाँधी ने कहा था’, ‘हिन्द स्वराज’ और ‘मार पराजय’l

राजेश कुमार हाल ही में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हुए हैंl इनके सर्जनात्मक साहित्य की शुरुआत ‘सारिका’ और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं से हुईl शुरू-शुरू में दर्जन-भर कहानियाँ लिखने के बाद ये रंगकर्म की और मुड़ गयेl किसान-छात्र आन्दोलन के दौरान इनका नुक्कड़ नाटकों से गहरा जुड़ाव हुआl उत्तर प्रदेश पॉवर कारपोरेशन में बतौर मुख्य अभियंता के रूप में राजेश कुमार आरा, शाहजहाँपुर, अलीगढ़, लखनऊ जैसे शहरों में रहे, रंगकर्म भी साथ-साथ चलता रहाl राजेश कुमार ने रंगमंच का उद्देश्यपरक प्रयोग वैचारिक प्रबलता, संघर्ष और सर्जनात्मक स्तर पर कियाl इसी क्रम में ये ‘युवा नीति’, ‘दिशा’, ‘दृष्टि’, ‘धार’, ‘अभिव्यक्ति’ जैसी नाट्य-संस्थाओं की स्थापना से भी जुड़े और लगातार नुक्कड़ और पूर्णकालिक नाटकों का सृजन करते रहेl देश-भर की विभिन्न नाट्य-संस्थाओं द्वारा राजेश कुमार के नाटकों का सफल मंचन हो चुका हैl

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प्रस्तुत लेख में राजेश कुमार के नाटकों में गाँधीजी के विचारों और उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं के विश्लेषण का प्रयास किया जा रहा है l

‘अम्बेडकर और गाँधी’ राजेश कुमार का सर्वाधिक चर्चित और मंचित नाटक हैl इस नाटक के देश-भर में अनेक प्रदर्शन हो चुके हैंl सबसे अधिक प्रदर्शन दिल्ली की नाट्य संस्था ‘अस्मिता’ ने अरविन्द गौड़ के निर्देशन में किये हैंl यह नाटक भारतीय समाज के जाति, वर्ण, अस्पृश्यता, धर्म – के जवलन्त और विवादास्पद मुद्दों पर गाँधीजी और डॉ. भीमराव अम्बेडकर के दृष्टिकोण के मिलान और टकराव के विभिन्न बिन्दुओं को सशक्त ढंग से दिखलाता हैl नाटककार राजेश कुमार इस नाटक के सम्बन्ध में लिखते हैं – “नाटक का उद्देश्य केवल दो नायकों को मंच पर लाना नहीं हैl न उनकी कोई जीवन गाथा दिखानाl यह नाटक दो विभिन्न प्रकार की विचारधाराएँ सामने लाता हैl गाँधी ह्रदय परिवर्तन में विश्वास करते हैंl उनका मानना था कि मनुष्य के अंतर्मन में होने वाला बोध और परिवर्तन ही सुधार का वास्तविक माध्यम हैl सवर्णों के मन में छोटी जातियों और दलितों के प्रति अस्पृश्यता के जो भाव हैं, ह्रदय परिवर्तन के द्वारा ही इसमें सुधार संभव हैl वे दलितों को हिन्दू समाज का अंग मानते हैं इसलिए गोलमेज कांफ्रेंस में अम्बेडकर की पुरजोर खिलाफत करते हैंl वे हिन्दू धर्म के विभाजन के पक्ष में नहीं हैं इसलिए वे पूरी ताकत से कहते हैं कि इस बात का विरोध करने वाला यदि मात्र अकेला रह जाऊँगा तो भी अपने प्राणों की बाजी लगाकर इसका विरोध करूँगाl उनका सोचना था कि हिन्दू समाज आज इसी कारण जीवित रह सका है क्योंकि वह वर्ण व्यवस्था पर आधारित हैl जबकि अम्बेडकर का मानना था कि यह व्यवस्था हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी हैl जब तक वर्ण व्यवस्था समाप्त नहीं होगी, जात-पाँत का रोग समाप्त नहीं होगाl समाज में व्याप्त असमानता, ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं मिट सकताl उनका कहना था सामंतवाद को खत्म करके ही वर्णाश्रम व्यवस्था को समाप्त किया जा सकता है और अपने विकास में अम्बेडकर इसलिए हिन्दू धर्म से बाहर चले जाते हैंl”

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गोलमेज सम्मलेन और पूना पेक्ट के हवाले से दलितों के अलग निर्वाचन क्षेत्र को लेकर गाँधीजी और डॉ. अम्बेडकर के बीच होने वाली विचारोत्तेजक बहस दर्शक/पाठक को आलोड़ित करने वाली हैl अम्बेडकर और गाँधी –  दोनों ही भारत से अस्पृश्यता को खत्म कर सामाजिक स्तर पर समरसता स्थापित करना चाहते थे, किन्तु दोनों की विचारधारा और तरीके परस्पर भिन्न थे – डॉ. अम्बेडकर राजनीतिक मजबूती तो गाँधीजी ह्रदय परिवर्तन के पक्षधर थेl भिन्न मतांत होने के बावजूद वे एक-दूसरे को सम्मान और सद्भाव की दृष्टि से देखते हैं, कहीं भी संयम और मर्यादा नहीं खोतेl

‘गाँधी ने कहा था’ राजेश कुमार का दूसरा चर्चित नाटक हैl इसका पहले-पहल मंचन शाहजहाँपुर की नाट्य-संस्था ‘अभिव्यक्ति’ के अंतर्गत राजेश कुमार ही के निर्देशन में 1999 में हुआl इस वर्ष भी गाँधीजी की डेढ़ सौवीं जयन्ती के उपलक्ष्य में इस नाटक के भी खूब प्रदर्शन हुएl इस नाटक के लिखे जाने के कारणों के बारे में राजेश कुमार भूमिका में लिखते हैं – “’गाँधी ने कहा था’ हरगिज़ नहीं लिख पाता यदि मराठी नाटक ‘मी नाथूराम गोडसे बोलतोय’ के लेखक प्रदीप दलवी का यह बयान पढने को नहीं मिलता कि इस नाटक का शो देखने के बाद निकले दर्शक रास्ते में बनी गाँधी की प्रतिमाओं को तोड़ने लगे तो वह अपना शो सार्थक समझेगाl एक लेखक व निर्देशक का एक रचना और दर्शकों से इस हद तक अपेक्षा को सोचकर मैं सकते में रह गया l सोचने को विवश हो गया कि कोई नाटक से इस सीमा तक लोगों में घृणा, नफ़रत व साम्प्रदायिकता का सैलाब भर देने को उद्यत हैl दर्शकों को भावुकता के स्तर पर इस हद तक पहुँचा देना चाहता है कि वह जो चाहता है, दर्शकों से कराने को तत्पर हो जाता हैl क्या एक नाटक का यही उद्देश्य है कि वह बुद्धि और विचार के स्तर पर कुंठित कर दर्शकों के अन्दर इतना आवेग संचार कर दे कि उन्हें कुछ पता न चले कि सही क्या है, गलत क्या है? क्या सकारात्मक है, क्या नकारात्मक? ……. ‘गाँधी ने कहा था’ इसी जद्दोजहद का परिणाम हैl दिलों को पास लाने की दिशा में एक छोटा सा प्रयास हैl एक तरफ यह नाटक अगर तोड़ने वाली ताकतों को बेनकाब करता है तो दूसरी तरफ यह जोड़ने वालों को शक्ति प्रदान करता हैl”

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‘गाँधी ने कहा था’ नाटक स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के भारत में गाँधीवादी आदर्शों की उपस्थिति के बारे में हैl इस नाटक पर रिचर्ड एडिनबरो निर्देशित फिल्म ‘गाँधी’ के एक दृश्य का भी आंशिक प्रभाव हैl 1947 में भारत-पाक विभाजन की कीमत पर मिली आज़ादी को लेकर भड़के साम्प्रदायिक दंगों को बुझाने के लिए महात्मा गाँधी उपवास करते हैंl दंगे शांत होने पर गाँधीजी द्वारा अनशन तोड़ने के समय अपने बच्चे को दंगों में खो चुका एक आक्रोशित हिन्दू युवक आकर रोटी फेंकता है और पूछता है कि वह अब क्या करेl गाँधीजी मित्रवत व्यवहार से उसे एक मुस्लिम बेसहारा बच्चे को इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुरूप पालने की सलाह देते हैं –

“गाँधी : यही एक रास्ता है तारकेश्वर … तुम्हें अपने दर्द से उबरने का … तुम्हें अपने जख्म, गुस्सा और बदले की भावना का शमन करने का l देखना तुम्हें सुकून मिलेगाl मन को शान्ति मिलेगीl सत्य को शक्ति मिलेगीl (दर्शकों की तरफ बढ़ते हुए) और हिंसा को मिलेगी हार … अधर्म को शिकस्त … फिरकापरस्ती को एक करारा झटका …

(तारकेश्वर निर्णय लेने की अवस्था में आने लगता है)

तारकेश्वर : करूँगा बापू …

गाँधी : ईश्वर भला करे l

तारकेश्वर : वो सब करूँगा जिससे मन को शान्ति, सत्य को शक्ति मिले l

गाँधी : निर्बल के बल राम l”

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तारकेश्वर अपने समाज और पत्नी की मर्जी के खिलाफ जाकर एक अनाथ मुस्लिम बच्चे को पालता-पोसता है क्योंकि उसे ऐसा करने के लिए गाँधी जी ने कहा थाl समय के साथ वह बच्चा उच्च-शिक्षित युवक बन जाता हैl कुछ कट्टर फिरकापरस्तियों के बहकावे में आकर, तारकेश्वर और उनके सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए वह धर्म के नाम पर हिंसा करने लगता हैl किन्तु, समय बीतने के साथ, उसे वास्तिवकता का पता चलता है, सत्य और अहिंसा के मूल्य का आभास होते ही उसे अपनी गलती का अहसास होता हैl वह समझ जाता है कि लड़ाई हिन्दू-मुस्लिम की नहीं है बल्कि धर्म के नाम पर भ्रमित इंसानी विचारों की है – जो हर हाल में थमनी ही चाहिए –

“आफताब : …. तब लगा कि सवाल हिन्दू या मुसलमान … हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी का नहीं, दरअसल लड़ाई इंसानियत और हैवानियत के बीच हैl जिन सवालों के जवाब ढूँढने अपना घर छोड़कर गया था वहाँ उनके जवाबों की जगह और भी सुलगते सवाल मुँह बाये खड़े थे … जिस आतंक के विरोध में हमने आतंक का सहारा लिया था, वही अब हमारे बीच उगने लगा था … रह-रहकर हमें लहूलुहान कर रहा था …. अब्बू, सत्य मरा नहीं हैl सत्य ज़िंदा है l तुम हारे नहीं हो अब्बू … (तारकेश्वर पांडे के बिलकुल पास आ जाता है, उन्हें छूकर) हारी तो हिंसा है … चुका तो वह विचार है जो आदमी और आदमी में फर्क बताता है … घृणा-नफ़रत की तालीम देता है (पॉज) अब्बू, अगर मैं गाँधी का विश्वास था, उनका सत्य था … तो मेरा भी एक सत्य है, विश्वास है …”

नाटक वर्तमान समय में, विशेष रूप से राजनीति के क्षेत्र में गाँधीजी के नाम से हो रहे दिखावे की भी पोल खोलता है –

“तारकेश्वर: …. और केवल 30 जनवरी, 1948 को गाँधी नहीं मारे गयेl आज भी गाँधी मारे जाते हैं l आज भी हजारों गोडसे भ्रष्टाचार, जातिवाद, हिंसा के नकाब लगाकर हर रोज़, हर पल गाँधी के आदर्शों का गला घोंट रहे हैंl स्वयं गाँधीवादियों ने कई बार उनका गला घोंटा हैl उनके विचारों और सिद्धांतों की हत्या करना क्या उनका मारा जाना नहीं है l (पॉज) फिर भी गाँधी जीवित हैl विचार के रूप में आज भी ज़िंदा है क्योंकि वो एक सत्य है और सत्य कभी मरता नहीं l वो एक विश्वास है और विश्वास कभी नहीं मरताl”

गाँधीजी सर्व-धर्म-समभाव के समर्थक थेl हिंसा और नफ़रत फैलाने वाले किसी भी विचार को वे धार्मिक नहीं मानते थेl ‘गांधी ने कहा था’ नाटक इसी विचार का पोषण करता हैl वर्तमान भारत की स्थितियों में यह नाटक और अधिक प्रासंगिक हैl

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‘हिन्द स्वराज’ राजेश कुमार लिखित तीसरा नाटक है, जो महात्मा गाँधी की इसी नामधारी पुस्तक पर आधारित हैl इस नाटक का सर्वप्रथम मंचन राजेश कुमार के ही निर्देशन में ‘धार’ थियेटर ग्रुप के तत्वाधान में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी में हुआl द्वि-पात्रीय इस नाटक में स्वयं गाँधीजी और एक जिज्ञासु की परिकल्पना नाटककार ने की है –

“गाँधी : आ गए?

जिज्ञासु : आना ही थाl

गाँधी : जब भी कोई संशय उठता है, आ ही जाते होl

जिज्ञासु : दीया जला रहे हैं, आज कोई ख़ास बात है?

गाँधी : कार्तिक में दीया जलाने की परम्परा हैl

जिज्ञासु : दीये का नाम हिन्द स्वराज तो नहीं?

गाँधी : स्वराज अभी दूर है …

जिज्ञासु : फिर किसे भगा रहे हैं?

गाँधी : अपने अंतर के अँधेरे से उठने वाले सवालों से जूझ रहा हूँl

जिज्ञासु : क्या वे सवाल केवल आपके हैं?

गाँधी : वे मेरे हैं और मेरे नहीं भी हैंl वे मेरे हैं क्योंकि वे मेरे अंतर में बस से गए हैंl वे मेरे नहीं हैं क्योंकि वे मेरे ही दिमाग की उपज हों, सो बात नहीं हैl

जिज्ञासु : क्या करेंगे इन सवालों का?

गाँधी : वे तीर की तरह मेरी तरफ आ रहे हैंl मैं ही पूछ रहा हूँ और मुझे ही जवाब देने हैंl

जिज्ञासु : स्वराज्य मिल जाने के बाद क्या वे सवाल बने रहेंगे?

गाँधी : जहाँ सवाल जन्म लेना बंद कर देते हैं, वहाँ न सत्य रहता है, न आज़ादी और न सपने …”

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दूरदृष्टि से सम्पन्न महात्मा गाँधी आज़ादी के बाद के भारत के बारे में भी चिंतन-मनन करते रहते थेl उन्हें यह भली-भाँति पता था कि आज़ाद भारत को किन-किन समस्याओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और उनसे कैसे निपटा जा सकता हैl ‘हिन्द स्वराज’ नाटक में गाँधीजी जिज्ञासु से सवालों का जवाब देने के क्रम में ‘स्वराज’ के वास्तविक अर्थ को बतलाते हुए अपनी विचार-दृष्टि सामने रखते हैंl ब्रिटिश हुकूमत की व्यापारी मानसिकता, भारतीयों की अकर्मण्यता, पार्लियामेंट और मंत्रिमंडल के सदस्यों की स्वार्थी प्रवृति, पाश्चात्य सभ्यता का उपयोगितावादी दृष्टिकोण और भारतीयों का उसके प्रभाव में आना, धार्मिक पाखंड और कट्टरता, वकीलों और अदालतों का भ्रष्टाचार, मशीनीकरण के कारण समाप्त हो रहे रोजगार, ख़त्म होते मानव-मूल्यों से गाँधी जी बहुत चिंतित थेl हथियार बनाने की दौड़ में लगी दुनिया में वे बुनियादी शिक्षा की जरूरत और धर्म की वास्तविक व्याख्या समझाते हुए ‘सत्याग्रह’, ‘ब्रह्मचर्य’ के रास्ते से ‘स्वराज’ प्राप्त करना चाहते थेl बेशक, नाटक में आये गाँधीजी के कुछ विचार आज के सन्दर्भों में कई स्थानों पर अप्रासंगिक, अतार्किक लगें किन्तु उनसे दो-चार हुए बिना विकास का रास्ता भी दिखाई नहीं देगाl

राजेश कुमार द्वारा लिखित ‘मार पराजय’ गाँधीजी के ब्रह्मचर्य प्रयोग पर केन्द्रित नाटक हैl इस नाटक का पहले-पहल मंचन शाहजहाँपुर (उत्तर प्रदेश) की नाट्य-संस्था ‘संस्कृति’ के तत्वाधान में 14 दिसंबर 2002 को स्वयं राजेश कुमार की परिकल्पना और निर्देशन में हुआl इस नाटक के उद्देश्य के विषय में राजेश कुमार लिखते हैं – “आज मन-वचन, कर्म और ज्ञानेन्द्रियों के नियंत्रण पर जिस तरह की गिरावट आयी है उसका जीवंत उदाहरण आज का हमारा समाज, राजनीति, धर्म और संस्कृति का का वर्तमान स्वरुप हैl लोग बड़ी-बड़ी बातें तो खूब करते हैं, लेकिन अन्दर से इतने खोखले हैं कि उनकी सारी लड़ाई कागजी नज़र आती हैl असली मोर्चे पर आते ही वे धराशायी हो जाते हैंl मुझे लगा मूल बातों को पकड़ने की आवश्यकता हैl ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी ने तरह-तरह के प्रयोग किये, वे सारे उनकी लम्बी लड़ाई की तैयारी थीl मेरे नाटक का मकसद उन तैयारियों का विश्लेषित कर उनके मजबूत होने का असली कारण ढूँढना था l कोई भी व्यक्ति एक दिन में महान नहीं होता, एक दिन में कोई नायक से महानायक नहीं बनता l एक दिन में कोई व्यवस्था धराशायी नहीं होती … उसकी एक प्रक्रिया होती हैl … उसी प्रक्रिया को ढूँढना ‘मार पराजय’ एक प्रयास भर हैl”

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गाँधीजी ने साम्राज्यवाद से टक्कर लेने से पहले अपनी चारित्रिक मजबूती के लिए सत्य, संयम और सत्याग्रह को साधा थाl साधना के इस क्रम में उन्हें किन-किन व्यक्तिगत, घरेलू और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा? गाँधीजी अपने जीवन में व्यक्तिगत स्तर पर काम-भावना, खान-पान, रहन-सहन आदि को लेकर अनेक प्रयोग किये, बहुत बार वे असफल हुए किन्तु उन्होंने स्वयं से लड़ाई जारी रखी और अपने-आपको साधाl ये प्रयोग उनकी पत्नी कस्तूर और बच्चों पर भी लागू हुए, किन्तु क्या कस्तूर और बच्चों ने सहजता से गाँधीजी के निर्णय को मान लिया? पत्नी कस्तूर और बच्चों से संयम-साधना को लेकर बहुत बहसें हुए, कस्तूर ने तो अंत तक उनका साथ दिया किन्तु अपने बेटों को वे इच्छित राह पर नहीं ला सकेl यह लड़ाई आसान बिल्कुल भी नहीं थी, यह लड़ाई एक दिन की भी नहीं थीl उनकी दृढ़ संकल्प-शक्ति का यह सिलसिला ताउम्र चला जिसके परिणामस्वरूप वे पहले दक्षिण अफ्रीका और फिर भारत में स्वतंत्रता की लड़ाई को आगे बढ़ा सकेl  ‘मार पराजय’ नाटक में इतिहास में कल्पना का समावेश करते हुए नाटककार ने गाँधीजी को सहज इंसानी रूप में प्रस्तुत किया है जो आज के राजनेताओं के लिए एक जरूरी सबक हैl

समग्रतः कहा जा सकता है कि नाटककार राजेश कुमार द्वारा लिखित उपरोक्त चारों नाटकों के अध्ययन से ‘मोहनदास’ से ‘महात्मा’ बनने की यात्रा को सहजता से समझा जा सकता हैl इन नाटकों में गाँधीजी एक आम इंसान से लेकर विवेकशील राजनेता और चिन्तक के रूप में चित्रित हैंl निश्चित रूप से गाँधीजी के कुछेक विचार परस्पर विरोधाभासी भी रहे हैं, तत्कालीन और समसामयिक दोनों सन्दर्भों में उनसे असहमत भी हुआ जा सकता है, किन्तु ऐसा होने से उनका महान व्यक्तित्व और भारत की आज़ादी में दिया गया योगदान कम नहीं हो जाताl यदि उनके सिद्धांतों और विचारों को ईमानदारी से समझने का प्रयास किया जाय तो आज भी वे स्वस्थ-संतुलित-सकारात्मक राह दिखा सकते हैं, दिखाते रहे हैंl पिछले डेढ़ सौ वर्षों से गाँधीजी भारतीय जनमानस पर व्यापकता से छाये हुए हैं, राजेश कुमार के ये नाटक उनकी इस छवि को और अधिक सुदृढ़ करते हैंl

लेखिका अदिति महाविद्यालय, दिल्ली में हिन्दी की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं|

सम्पर्क-  +919871086838, drasha.aditi@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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