नाटक

गाँधी और अम्बेडकर का रंगमंचीय आत्मसंघर्ष

 

  • राजेश कुमार

 

 

लेखन का कार्य पूर्ण होने के बाद भी नाटक पूर्ण नहीं होता है बल्कि निर्देशक और कलाकार का कार्य तो उसके बाद ही प्रारंभ होता है। वर्णवाद के सवाल पर लिखे गये नाटक ’अम्बेडकर और गांधी ’ के अब तक कई मंचन हो चुके हैं लेकिन लगता है नाटक का जो कार्य है, जिस मकसद के लिए लिखा गया है, वह फिलहाल पूर्ण नहीं हुआ है और न आने वाले कुछ सालों तक होने वाला है। यह जो नाटक है, समाज में व्याप्त वर्ण व्यवस्था को लेकर जो विभिन्न मत हैं, उसी को केंद्र मे रखकर लिखा गया है। वर्ण व्यवस्था की जड़ समाज में जितनी गहरी फैल गयी है, यह किसी से छिपी नहीं है। कुछ लोग इस व्यवस्था में भी सकारात्मक तत्व ढूढ़ने की कोशिश करते हैं, नये संदर्भ में परिभाषित करते हैं, तो कुछ लोग समूल जड़ से उखाड़े बिना समानता न आने की तर्क देते हैं। यह नाटक पक्ष-विपक्ष की दलीलों को विज्ञान व तर्क की कसौटी पर कसने का प्रयास करता है, इसलिये इस नाटक का जो उद्देश्य है, बरकरार रहेगा। जब भी नाटक मंचित होगा, सकून से बैठने नहीं देगा। सोचने के लिए, तर्क करने के लिए विवश करेगा, इसका मुझे खूब एहसास है।

प्रथम पाठ से मंचन तक यह नाटक कई सवालों को लेकर मेरे सामने आता रहा। किसी ने नाटक में दृश्य की कमी की ओर ध्यान खींचा तो किसी ने इसमे संवादों की बहुलता की ओर इशारा किया। कुछ की प्रतिक्रिया थी कि नाटक में अधिकतर समय पात्र बातचीत करते नजर आते हैं। नाटक महज वार्तालाप नहीं है। उसमें कुछ घटित होते दिखना चाहिए। जब नाटक सुनने मे आनन्द आ जाए तो मंचन की क्या आवश्यकता है? कई लोंगो ने नाटक के स्ट्रक्चर पर ही प्रश्नचिन्ह खडा कर दिया। कुछ लोगों की आपत्ति थी कि इसमें क्लासिकल जैसा कुछ नहीं दिखता है। एक प्रतिक्रिया बार- बार आयी कि इसमें गांधी के चरित्र को कमजोर किया गया है। लेखक का झुकाव अंबेडकर की ओर सायास दिखता है। जिज्ञासाएं और सवालों का तांता रूकने का नाम नहीं ले रहा था। कुछ तो कह रहे थे, वर्ण व्यवस्था को लेकर गांधी के इस अवधारणाओं के बारे में तो हमें पता ही नहीं था। कुछेक पूना पैक्ट का और ब्यौरा की मांग कर रहे थे। लब्बेलुआब यह था कि नाटक लोगों को चैन से बैठने नहीं दे रहा था।

 

नाटक पाठ के बाद जब सारे लोग अपनी प्रतिक्रिया दे देते थे तब सबसे अंत में मुझसे अपनी बात रखने के लिये कहा जाता था। सफाई में अपनी तरफ से कुछ कहने के लिये कठघरे में खडा करते थे। ऐसा ही कुछ इस नाटक के मंचन के बाद भी होता था जब निर्देशक अरविंद गौड़ दर्शकों से बातचीत का न्यौता देते थे। दर्शकों के बीच से नाटक में प्रस्तुत गांधी- अम्बेडकर विवाद पर ज्यादा सवाल खडे़ होते थे जिनसे कभी अरविंद गौड़ तो कभी मैं जूझते रहते थे। कभी-कभी तो यह बहस घंटे- आधे घंटे तक खींच जाती थी। बहस बंद करनी पड़ती थी। मुझे खुशी होती थी कि नाटक कम से कम इस मुद्दे पर कुछ सोचने के लिये उकसा तो रहा है।

नाटक का कथ्य इतिहास से लिया गया है लेकिन इतिहास का यह टुकडा़ न उस वक्त के यथार्थ से अलग था, न आज के यथार्थ से कटा है। इतिहास का यह टुकडा़ कोई कहानी नहीं है, एक घटना है जिसने समाज के अंदर एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाया। और बदस्तूर आज भी जारी है। इतिहास में केवल किस्सा कहानी ही नहीं है, ऐसे बहुतेरे खंड है जो आज भी अपने विषय वस्तु को लेकर प्रांसगिक है। अमूमन लोग इतिहास को उसी भक्ति भाव से लेते हैं जो दर्ज होता है। मेरा प्रयास उस इतिहास के पीछे जो एक और इतिहास छिपा है या जान-बूझकर उसे बाहर नहीं लाया जा रहा है, लोगों के बीच लाना है और इस पर बजावता बहस कराना है। आज की बहस, सारी समस्याओं की जड़ कहीं न कहीं इतिहास में है और उनका हल वहीं से निकाला जा सकता है। लेकिन यह इतना सरल भी नहीं है। इतिहास की जड़ में जो सवाल दबा है, उस पर बहस करना तभी सार्थक होगा जब लोग अपने- अपने पूर्वाग्रहों से बाहर निकले। अपने अंदर बैठे जड़वाद को उखाड़ फेंके वरना उस अंधमोह मे कोई तर्क सुनने के लिये तैयार नहीं होगा चाहे वह तर्क कितना भी सम सामायिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक हो। ऐसा कदापि संभव नही है कि एक तरफ आप वर्ण व्यवस्था के घनघोर हितैषी हो और दूसरी तरफ अपने आप को उस पंक्ति में भी खडा करने की कोशिश करें जहाँ यह मत है कि सब बराबर हैं, परस्पर कोई भेदभाव नहीं है।

नाटक में जिस तरह की कहानी होती है निसंस्देह उस तरह की बनी- बनायी कहानी मैंने नाटक के लिये चुनी भी नहीं है। मैंने नाटक के परम्परागत ढां़चे को कथ्य की दृष्टि से तोड़ने का प्रयास किया है। मैं स्पष्ट था, मुझे कोई कहानी नहीं कहनी है। एक मुद्दे पर बहस करानी है, उस द्वंद को सामने लाना है जो गंाघी और अंबेडकर से शुरू हुआ था और आज भी जारी है।

कहने को यह मुल्क लोकतांत्रिक व धर्म निरपेक्ष है जिसके पास अपना संविधान है और यह नागरिको को संवैधानिक अधिकार भी प्रदान करता है लेकिन यथार्थ में जो समाजिक व्यवस्था है, इसका वैचारिक दर्शन ब्राह्मणवाद है तथा जीवन पद्धति कर्मकांड पर आधारित है। इसी ने वह जमीन तैयार की है जिस पर सांमती अवशेष टिका है। इसी सामंतवाद की उपज है वर्ण व्यवस्था जिसे सींच रही है ब्राह्मणवादी विचारधारा। यह ऐसी व्यवस्था है जहाँ एक व्यक्ति को जन्म से ही शासक बनाती है, वहीं दूसरे को शासित व शोषित। यदि भारतीय समाज को आधुनिक व लोकतांत्रिक बनाना है तो मनुष्य व मनुष्य के बीच की इस गैर बराबरी को समाप्त करना जरूरी है। यह नाटक पारंपरिक कथाओं की अपेक्षा गांधी और अंबेडकर के बीच जाति, वर्ण, अस्पृश्यता व धर्म के विषय पर जो लम्बी बातचीत हुई थी या जिन मुद्दों को लेकर आपस में विवाद रहा, पर केंद्रित है। भले आज गांधी-अम्बेडकर नहीं हैं लेकिन उस वक्त का विवाद आज तक नहीं सुलझा है। दो विचारधारा वाले लोग आज भी मौजूद हैं। चाहे वह क्षेत्र राजनीति का हो या संस्कृति का।

जो लोग वर्ण व्यवस्था के हितैषी हैं, वे कहीं न कहीं समतामूलक विचारधारा के भी विरोधी होते हैं। आज जहाँ जाति, वर्ण का खुला खेल हर तरफ चल रहा है, उन चेहरों को बेनकाब करने के दायित्व से नाटक अपने को विलग नहीं कर सकता। यह स्पष्ट है कि आज समाज जिस वर्ण व्यवस्था के धरातल पर टिका है, उसे नष्ट किए बिना न तो जातिवाद को खत्म किया जा सकता है न अस्पृश्यता मिटाई जा सकती है। बल्कि यह वर्ग संघर्ष की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। जो लोग यह सोचते है, वर्ण व्यवस्था भी चलता रहे और अस्पृश्यता भी कम होता रहे, भ्रम के सिवा कुछ नहीं हैं।

कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि नाटक में नया क्या है? इसमें तो केवल इतिहास को नाटक के रूप में रख दिया गया है, नई व्याख्या तो कुछ है ही नहीं। जवाब तो हर सवाल का किसी न किसी रूप में निकल सकता है। अगर नहीं भी निकल रहा हो तो जबरन निकाला जा सकता है। हमारी ऐसी कोई कोशिश नहीं है। लेकिन ऐसे सवाल किस मानसिकता से, किस पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर निकलते हैं, इसकी भी पड़ताल होनी चाहिए। नाटक में नया होना जरूरी नहीं है, जरूरी है उसकी नीयत क्या है? कितना हमने लोगों को छुआ है, झकझोरा है। इसमें कोई शक नहीं, नाटक को देखकर दर्शक बर्फ नहीं बने, नाटक खत्म होने के बाद उठकर सीधे घर नहीं गये बल्कि घंटे-आधे घंटे पर विचार विमर्श, बहस-मुवाहिसा किया। संतोष नहीं हुआ तो उसके बाद भी जारी रखा। ऐसा इसलिए होता था कि हमने यथास्थिति को बनाये रखने का काम नहीं किया था। इतिहास के बहाने वर्ण के बर्रे में पत्थर मारा था। गांधी-अम्बेडकर तो माघ्यम थे। आज भी वर्ण के सवाल पर बड़े-बड़े बुद्धिजीवी, प्रगतिशील, जनवादी लोगों का ऑफ़ द रिकार्ड को गोली मारिए, ऑन द रिकार्ड जिस तरह के बयान आने लगे हैं, वह आकस्मिक नहीं है, न उम्र के इस पडा़व का अचेतन मूर्छित अवस्था है। यह वर्षो के अंदर का वो ब्राह्मणावाद है जो किसी विचार, पार्टी के दवाब से दबा हुआ था। जरा सा दवाब कम हुआ, भभक कर वह सामंती दृष्टिकोण सबके सामने आ गया।

इस नाटक को देखकर कई लोग हतप्रभ थे कि क्या सचमुच गांधी का वर्ण व्यवस्था के प्रति यही नजरिया था। क्या वे वर्ण व्यवस्था को स्वीकारते थे, उसमें उनकी गहरी आस्था थी? मैंने इस नाटक में कोई नयी व्याख्या स्थापित करने की कोई घोषणा नहीं की है। लेकिन वह पक्ष जरूर लाने का प्रयास किया है जिससे लोग परहेज करते हैं, जानबूझ कर उन सवालों से मुठभेड़ करना नहीं चाहते हैं। वर्ण व्यवस्था में आस्था जताने वाले गांधी ने जहाँ- जहाँ इसके पक्ष में तर्क दिये, मैंने यथावत रखने का प्रयास किया और उसके प्रतिपक्ष में अम्बेडकर जिस तरह खडे हुए, उसे भी लाने में कोई संकोच नहीं किया। नाटक में जो बहस है, तर्क-वितर्क है, वे मेरे संवाद नहीं हैं, दोनो महापुरूषों के हैं। मैंने तो केवल नाटक का रूप दिया है। इसके लिए मैं उन सभी लेखकों का भी आभारी है जिन्होंने गांधी-अम्बेडकर विवाद को लेकर शोध ग्रंथ, जीवनी, उपन्यास, नाटक का लेखन किया है और जिनका सन्दर्भ इस नाटक में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में प्रकट हुआ है।

आजादी के इतने वर्षो के बाद भी वर्ण व्यवस्था, जात-पात, अस्पृश्यता खत्म नहीं हो पाया है। क्यों नहीं हो पाया जब कि गांधी ने अम्बेडकर को कहा था ‘अभी स्वराज्य के लिए संघर्ष करना प्रमुख है। आजादी मिल जाने के बाद वर्ण व्यवस्था को मिल-जुलकर खत्म कर देंगे।’ कुछ ऐसी ही बातें संसदीय वामपंथ से जुडे लोग भी कहते हैं ‘क्लास स्ट्रगल होने के बाद कास्ट स्ट्रगल अपने आप खत्म हो जायेगा।’ आजादी को मिले कई साल हो गये, यह वर्ण व्यवस्था खत्म होने के बदले और मजबूत हो गयी है। क्लास स्ट्रगल की रट लगाने वाले पालियामेंट्री स्ट्रगल में ऐसे उझरा गये कि अब उन्हें अपने आस्तित्व को बचाना भी भारी पड़ रहा है।

हर आदमी जो वर्ण व्यवस्था के प्रति मोह रखता है चाहे वह राजनीति में हो या साहित्य में, इसे टरकाये रखना चाहता है। मैंने इसे बहस के घेरे में लाकर रख दिया, शायद यही नया हो वर्ना नया के नाम पर यहाँ क्या- क्या हो रहा है किसी से छिपा नहीं है।

कुछ लोगों ने यह भी कहा है कि इस नाटक मे गांधी-अम्बेडकर की तुलना में कमजोर क्यों है?

किसी को कमजोर और किसी को मजबूत करना इस नाटक की मंशा नहीं है। सवाल है आपकी पक्षधरता किस तरफ है? गांधी और अम्बेडकर सिर्फ दो व्यक्ति नही, दो स्कूल हैं। दो वैचारिक केन्द्र हैं, दो संस्थायें हैं। दोनों आधुनिक भारत के सर्वाधिक विवादास्पद चरित्रों में हैं। चूँकि दोनों लीक से हटकर चले, इसलिए उन पर उनके समय से लेकर आज तक सवाल उठाए जा रहे हैं। दोनों की मंजिल एक दूसरे से जितनी मिलती थी, रास्ते उतने ही जुदा थे। दोनों के संदर्भ मे सर्वाधिक दुखद यह है कि दोनों के अनुयायियों ने दो ऐसे विशाल खेमे बना लिए हैं, जो आपस मे संवाद की कोई जरूरत नहीं समझते। अंबेडकरवादियों के लिए गांधी दलित विरोधी हैं तो गांधीवादियों के लिए अंबेडकर देशद्रोही। गांधीवादियों से अम्बेडकर को पढ़ने की क्या अपेक्षा कि जाए, वे गांधी को भी नहीं पढ़ना चाहते। कुछ ऐसी ही स्थितियाँ अंबेडकरवादियों की है। इसका परिणाम यह हुआ कि अंबेडकर और गांधी के मूल्य और उनका संघर्ष कहीं पीछे छूट गया है।

नाटक का उदे्श्य केवल दो नायकों को मंच पर लाना नहीं है। न उनकी कोई जीवन गाथा दिखाना। यह नाटक दो विभिन्न प्रकार की विचारधारायें सामने लाती हैं। गांधी हृदय परिवर्तन में विश्वास करते हैं। उनका मानना था कि मनुष्य के अन्तर्मन में होने वाला बोध और परिवर्तन ही सुधार का वास्तविक माध्यम है। सवर्णों के मन मे छोटी जातियों व दलितो के प्रति अस्पृश्यता के जो भाव हैं, हृदय परिवर्तन के द्वारा ही इसमें सुधार संभव है। वे दलितों को हिन्दू समाज का अंग मानते हैं इसलिए गोलमेज कांफ्रेंस में अबेडकर का पुरजोर खिलाफत करते हैं। वे हिन्दू धर्म के विभाजन के पक्ष में नहीं हैं इसलिए वे पूरी ताकत से कहते हैं कि इस बात का विरोध करने वाला यदि मात्र अकेला रह जाऊंगा तो भी अपने प्राणों का बाजी लगाकर इसका विरोध करूंगा। उनका सोचना था कि हिन्दू समाज आज इसी कारण जीवित रह सका है क्योंकि वह वर्ण व्यवस्था पर आधारित है। जबकि अंबेडकर का मानना था कि यह व्यवस्था हिन्दू धर्म की सबसे बडी कमजोरी है। जबतक वर्ण व्यवस्था समाप्त नहीं होती, जात- पात का रोग खत्म नहीं होगा। समाज में व्याप्त असमानता ऊँच- नीच का भेद भाव नहीं मिट सकता। उनका कहना था, सामंतवाद को खत्म कर के ही वर्णाश्रम व्यवस्था को समाप्त किया जा सकता है और अपने विकास में इसलिए अंबेडकर हिन्दू धर्म से बाहर चले जाते हैं।

नाटक में कुछ लोगों को गांधी कमजोर लगते हैं क्योंकि उनके अंदर गांधी की जो पारम्परिक छवि बैठी हुई है, वह कुछ दूसरी है। यहाँ गांधी की जो तस्वीर देखने को मिलती है उससे बहुत सारे लोग अभी भी अपरिचित है। कम्यूनल एवार्ड, पूना पैक्ट, वर्ण व्यवस्था व जाति व्यवस्था को लेकर गाँधी जी की जो सोच है, गांधी के प्रति अंधभक्ति रखने वालों को झटका दे सकता है लेकिन यह सत्य है गांधी के जीवन मे कई अतर्विरोध रहे हैं। उन्होंने अन्र्तजातीय विवाह व सहभोज का साफ विरोध किया है। वर्ण व्यवस्था के वे प्रबल समर्थक रहे हैं । बल्कि वे यहाँ तक कहते हैं कि जो व्यक्ति जिस वर्ण मे पैदा हुआ है, उसे वही कार्य अपनाना चाहिए। व्यक्ति का वर्ण उसके जन्म से ही गिना जाएगा बल्कि वर्ण के मुताबिक ना जीकर वह अपना ही नुकसान करता है। वह गिरी हुई हालत में पहुचंता है, पतित होता है। निसंस्देह इतिहास के इस पहलू से जो अपरिचित नहीं होंगे, उन्हें गांधी अंबेडकर की तुलना में कमजोर नजर आएगा। या जिनकी वर्ण व्यवस्था पर आस्था नहीं हैं, उन्हे गांधी का यह रूप जरा हल्का लगेगा अगर गांधी उनके लिए परम पुरूष हो, आदर्श हो।

बहरहाल तमाम मतभेदों के बावजूद अम्बेडकर और गांधी एक दूसरे से घृणा नहीं करते थे। गांधी की हत्या से अम्बेडकर आहत होते हैं, वहीं दूसरी तरफ गांधी की इच्छा है कि अगर मेरा दोबारा जन्म हो तो महाशूद्र के रूप में हो। दोनों के मन मे एक दूसरे को अपनी बात न समझा पाने की कसक है।

जो बहस अधूरी रह गयी थी वह आज भी जारी है। गांधी और अम्बेडकर के बीच में जो संवाद हुए थे, वे समाप्त नहीं हुए है। उस संवाद को जारी रखना ही मेरे नाटक का उद्देश्य है। शायद कभी, किसी वक्त, इतिहास के किसी मोड़ पर इसका हल निकल सके।

लेखक धारा के विरुद्ध चलकर भारतीय रंगमंच को संघर्ष के मोर्चे पर लाने वाले अभिनेता,निर्देशक और नाटककार जो हाशिये के लोगों के पुरजोर समर्थक हैं.  +919453737307,  rajeshkr1101@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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