व्यंग्य

वित्तमंत्री हमें माफ करें – वेद प्रकाश भारद्वाज

 

  • वेद प्रकाश भारद्वाज

 

हे वित्तमंत्री जी, हम भारत देश के करोड़ों लोगों की तरफ से मैं आपसे माफी मांगता हूँ। आप कहेंगी कि किस बात की माफी मांग रहे हैं। आपकी बात का जवाब देने से पहले कुछ कहना चाहता हूँ
पूछो कोई दरबार में किस किस को क्या मिला
सोने को जमीं ओढ़ने को आसमां मिला।
यह शेर तो वैसे ही मुंह से निकल पड़ा, आप अन्यथा न लें। हम जो न गरीब हैं और न ही अमीर, हमारे पास गम छुपाने के लिए गीत गाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। हम मध्यवर्ग के लोग हैं और मैं उन सबकी तरफ से आपसे माफी मांगता हूँ कि हम शायद ही आपकी उम्मीदों पर खरे उतर पाएँ। आपके बहीखाता पेश करने की ऐतिहासिक घटना के उल्लास में हम भूल गये थे कि जन्नत की हकीकत क्या है। कल तो मन बड़ा खुश था कि चलो इस बार सरकार के बहीखाते में हमारी देनदारियाँ नहीं हैं। अब जब सुबह औंधे मुंह गिरकर उठे हैं तो खुद पर ग्लानि हो रही है। अखबार पढ़ कर जाना कि आपको और देश को हम मध्यवर्गीय लोगों से कितनी उम्मीदें हैं। पेट्रोल डिजल की कीमत बढ़ गयी तो कोई बात नहीं। ट्रक वाले भाड़ा बढ़ा कर भरपाई कर लेंगे। चीजें कुछ महंगी हो जाएंगी तो हम उनमें कटौती कर एडजस्ट कर लेंगे। आप भी देश तो देश के बहीखाते में एडजस्ट करेंगी। थोड़ा हम भी कर लेंगे। समस्या यह नहीं है। समस्या है उन उम्मीदों को पूरा करने की जो आपने मध्यवर्ग से लगाई हैं।
आपने बड़े उदार मन से 45 लाख का घर खरीदने पर टैक्स में छूट की घोषणा की है। इलेक्ट्रॉनिक वाहन पर छूट की पेशकश की है। निवेश में छूट की बात कही है। कितनी कृपालू हैं आप। लोग नाहक कह रहे हैं कि आपने मध्यवर्ग को कुछ नहीं दिया। आपने बस अमीरों से लिया और गरीबों को दे दिया है। यह सही नहीं है। आपने मध्यवर्ग के लिए बहुत कुछ रखा है। यह अलग बात है कि मध्यवर्ग उसे ले न पाए। अब घर की ही लीजिए। दिल्ली के लक्ष्मी नगर, संगम विहार, बदरपुर जैसे इलाकों में एक कमरे में तीन-चार लोग एक साथ रहने वाले हम नौकरीपेशा लोग खुश तो बहुत हुए कि चलो देश की वित्तमंत्री ने उनके लिए घर की सोची। मध्यवर्ग भी सोचता रहता है इस बारे में। देशभर में लाखों लोगों की कमाई बिल्डरों के पास फंसी है। घर का सपना उनके गले की फांस बन गया है। अब इस फांस को तो आप निकाल नहीं सकतीं। आपके हाथ में जो था वह आपने कर दिया, छूट दे दी। अब हम ही न ले सकें तो आप भी क्या कर सकती हैं। दस, बीस या तीस हजार की नौकरी करने वाले हम मध्यवर्गी लोग अपनी कॉलर कभी मैली नहीं होने देते। साबुन महंगा हो जाएगा तो कोई बात नहीं, थोड़ा कम लगाएंगे पर कॉलर को चमका कर रखेंगे। इलेक्ट्रॉनिक वाहनों पर भी आपने छूट दी है। यहाँ तो ‘रहने को घर नहीं सारा जहां हमारा’ की स्थिति है। खुद चौपाया बने हुए हैं फोर व्हीलर कहाँ से लायें। हाँ, आपको सहयोग करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक साइकिल खरीद सकते हैं। वैसे तो लोन पर सब कुछ मिल जाता है पर दिक्कत यह है कि लोन लेने के बाद चुकाना भी पड़ता है। सबकी किस्मत चोकसी, मोदी या माल्या जैसी नहीं होती। वैसे सुना है कि आजकल उनकी भी हालत खराब है। पर अपने को क्या? अपने को तो अपना फर्ज निभाना है जो हम निभा नहीं पाएंगे।
हम इस बात के लिए भी आपसे क्षमा चाहेंगे कि आपकी इच्छानुसार हम निवेश नहीं कर सकेंगे। नंगा क्या नहाए और क्या निचोड़े। एक तो ‘आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपया’ है उसपर भी कुछ बचा लिया तो निवेश के नाम पर ही डर लगता है। शेयर मार्केट तो आपके भाषण को सुनते ही गिर गया। बैंक डूबे हुए कर्ज के गम में डूबी हुई हैं। प्रॉपर्टी बाजार में हाहाकार मचा है। रेलवें में निवेश करने के नाम पर हम टिकट खरीद कर यात्रा करते हैं यही बहुत है। सुरक्षित निवेश के नाम पर तमाम योजनाएँ आपके पास हो सकती हैं परंतु ‘घर में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने’ की हकीकत को कैसे नकारा जा सकता है। वैसे भी कहा गया है कि आदमी को उतने ही पैर पसारने चाहिए जितनी चादर हो। मध्यवर्ग की आकांक्षाओं के पैर तो लम्बें हैं पर साधनों की चादर हमेशा छोटी रही है। ऐसे में हम आपसे सिर्फ माफी ही मांग सकते हैं।
माफी तो और भी बहुत सी बातों के लिए मांगनी है। देश के बहीखाते की लाज रखने के लिए हमारे पास कुछ नहीं है। हम मध्यवर्ग के लोग हैं। हम तनख्वाह पाते हैं जो हमारा तन खाती है। हम ईमानदारी से टीडीएस कटाते हैं। हमारी मजबूरी है या तो कटाओ या कटौती करो। हम टीडीएस कटाते हैं, देश हित में हम कटौती को पाप समझते हैं। आपने कितनी उम्मीदों के साथ यह आशा की है कि मध्यवर्ग खर्च करेगा तो देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। अब आपको नाउम्मीद तो नहीं किया जा सकता। पर फिर एक बार माफी मांगते हैं कि शायद हम उतना खर्च न कर पाएँ जितनी आपको आशा है। क्या करें, मजबूरी है। हमारी अपनी सीमा है। खर्च तो बहुत करना चाहते हैं पर कर नहीं पाते। हमारे खर्च किये से मॉल, फाइव स्टार होटल, रेस्तरां, फैशन स्टोर आदि आदि का गुजारा मुश्किल है। दोपहर में सड़क किनारे ठेले पर तीस-चालीस रूपये का लंच और रात को टंच के बीच झूलती अपनी जिंदगी में हम आपके लिए इतना ही कर सकते हैं कि ज्यादा से ज्यादा जनपथ के पटरी बाजार के दुकानदारों की खुशहाली में कुछ इजाफा कर सकें, बशर्ते वह खुशहाल हों। इसलिए हे वित्तमंत्री जी, हमें माफ कर देना। हम कोशिश करेंगे कि देश की तरक्की के पहियें में कुछ तेल-पानी का सहयोग कर सकें। इससे अधिक हम कुछ नहीं कर पाएंगे, हमें क्षमा करें।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं|

सम्पर्क-  +919871699401,  bhardwajvedprakash@gmail.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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