शख्सियतसिनेमा

फिल्म अभिनेता व निर्देशक : रायमोहन

 

  •  वीरेन नंदा

 

मुजफ्फरपुर के ब्राह्मण टोली में एक मकान आज भी जीर्ण अवस्था में है, जो कभी ‘बैजू बाबरा’ फ़िल्म में बैजू के गुरु बने हरिदास का चरित्र निभाने वाले राय मोहन का हुआ करता था। बाद में यह मकान उन्होंने अपने ममेरे भाई दुर्गा प्रसाद नंदा व श्रीनारायण नंदा के हाथों बेच दिया।

रायमोहन चोपड़ा फिल्मों में रायमोहन के नाम से जाने जाते थे। आरा के तिवारी को फ़िल्म में ले जाने का श्रेय उन्हीं को है। मुजफ्फरपुर में ‘हिन्दी नाट्य संघ’ के संस्थापकों में से एक श्रीनारायण नंदा ललितकुमार सिंह ‘नटवर’ उर्फ लतीफ हुसैन को साथ कलकत्ता ले जाकर रायमोहन से परिचय कराया। उन्हीं के सहयोग से नटवर जी का फिल्म में पदार्पण हो सका था। श्रीनारायण नंदा रायमोहन के साथ वर्षों कलकत्ता रहे। चार्ली चैप्लिन जब कलकत्ता आएं थे तो रायमोहन के साथ उनसे मिलने वालों में श्रीनारायण नंदा भी थे। ये वही श्रीनारायण नंदा (उर्फ शिल्लु बाबू) हैं जिन्होंने पृथ्वीराज कपूर को उनके मुजफ्फरपुर आगमन पर सम्मान स्वरूप एक थैली अपने नाटक संघ की ओर से भेंट की थी जिसका जिक्र आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री ने अपनी पुस्तक “नाट्य-सम्राट पृथ्वीराज कपूर” में की है।

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विश्व पटल पर फिल्म की शुरूआत फ्रांस से हुई। लुमिएर बन्धु ने एक-एक मिनट की फिल्म बना पेरिस के ग्रैंड कैफे में इसका प्रदर्शन 28 दिसंबर 1895 को किया जिससे पहली बार दुनिया फिल्म से परिचित हुई। हालांकि फ्रांस में उन्होंने इसका प्रयोग 7 जुलाई 1895 में किया था, लेकिन 7 जुलाई 1896 को जब बम्बई के वाटसन होटल में वे अपनी उस लघु फिल्मों का प्रदर्शन किया तो उसे अपार सफलता मिली। इससे उत्साहित हो उन्होंने बम्बई के नॉवेल्टी थियेटर और फिर 1897 में कलकत्ता में इसे प्रदर्शित किया। लुमिएर बन्धु की फिल्में देख कुछ भारतीय भी इस ओर अग्रसर हुए और इस तरह भारत में फिल्म बनाने की शुरूआत हुई और शुरुआती केंद्र बना कलकत्ता।

1897 में ‘कलकत्ता थियेटर’ में प्रो.स्टीवेंस ने एक स्टेज-शो किया, जिसे हीरालाल सेन नामक एक भारतीय व्यक्ति ने कैमरे में कैद कर 1898 में एक फिल्म बनायी– “द फ्लावर ऑफ पर्शिया”। बम्बई के हैंगिंग गार्डन में एक कुश्ती चल रही थी जिसे एच.एस.भाटवडेकर (सावे दादा) ने शूट कर 1899 में “द रेसलर” नाम से वृतचित्र बनायी। एक नाटक ‘पुंडलीक’ का फिल्मांकन कर दादा तोरणे ने उसे 1912 में फीचर फिल्म की शक्ल दे बम्बई के कोरोनेशन सिनेमा हॉल में प्रदर्शित किया। लेकिन सही मायने में हिन्दी फीचर फिल्म की शुरुआत ढुंडी राज गोविन्द फाल्के (अर्थात दादा साहेब फाल्के) की फिल्म “राजा हरिश्चन्द्र” से हुई। यह मूक फिल्म 3 मई 1913 में बम्बई में प्रदर्शित हुई। दादा साहेब फाल्के को फिल्म बनाने की प्रेरणा मुम्बई में ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ फिल्म देखने से मिली। दक्षिण भारतीय पहली फिल्म “कालिदास” और “जुमई शास्ति” पहली बंगला फिल्म थी।

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पहली भारतीय सवाक(बोलती) फिल्म “आलम आरा” 14 मार्च 1931 में रिलीज हुई जिसे अर्देशिर ईरानी ने बनाया था। इस फिल्म को देखने लोग उमड़ पड़े। कहा जाता है कि इसी फिल्म से टिकटों की कालाबाजारी की भी नींव पड़ी।

फ़िल्म उद्योग की स्थापना के बाद जब सवाक फिल्में बनने लगी तब फिल्मी दुनिया में जाने का जनून रायमोहन चोपड़ा के सिर ऐसा चढ़ा कि घरबार पत्नी-बच्चे को छोड़छाड़ कलकत्ता पहुँच गये। वहाँ पहुंच वे ‘कलकत्ता थियेटर’ से जुड़े और वहाँ नाटकों में अभिनय करते हुए फिल्मों के लिए भी जोरआजमाइश करने लगे। फिल्मों में काम करना तब सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतिकूल माना जाता था लेकिन इन सब बातों से बेपरवाह हो कई वर्ष ‘कलकत्ता थियेटर’ में संघर्ष करने के बाद अंततः उन्हें फिल्मों में प्रवेश मिला। सवाक फिल्मों का सफर करते हुए उन्होंने पचास से अधिक हिंदी और बांग्ला फिल्मों में काम कर अपने अभिनय से लोगों का मन मोहा। वे कलकत्ता और बम्बई की ‘कलकत्ता सिनेटोन कंपनी’, आर.आर, प्रोडक्शन, ‘भवनानी प्रोडक्शन’, ‘प्रकाश पिक्चर्स’ आदि बैनर के तले बनने वाली फिल्मों में अपने अंतिम समय तक काम करते रहे। पृथ्वीराज, हिमालय की बेटी, रोके नहीं रुकेंगे, अंजनगढ़, यांगरीला, नव जीवन, बनफूल, डबल क्रास, प्रेम सागर, बैजू बाबरा, संत कबीर, श्री चैतन्य महाप्रभु आदि उनकी महत्वपूर्ण फिल्में थी।

1947 में भारत विभाजन के बाद कलकत्ता से उठकर जब फ़िल्म नगरी बम्बई पहुँची तो वे 1950 में बम्बई चले गए और वहाँ बनने वाली फिल्मों में अपना बेहतरीन किरदार निभाया। उनकी अंतिम फ़िल्म ‘रास्ता’ थी।

1938 में भवनानी प्रोडक्शन के बैनर तले बनी फिल्म ‘हिमालय की बेटी’ में इनाक्षी रामाराव, रामानंद, पूरी, माया चटर्जी, डेविड, बद्री प्रसाद के साथ काम किया तो उसी प्रोडक्शन की फ़िल्म ‘डबल क्रॉस’ में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। इसमें बिमला कुमारी, एस.बी.नयनपाली, फैटी प्रसाद, डेविड, अमीना, ज्ञानी, आर.दिवाकर, मास्टर हुसैन, मास्टर किशोर आदि कलाकार थे। इस फ़िल्म में एक स्टंट सीन करते हुए वे घायल भी हुए। फिल्म के एक दृश्य में उन्हें पहाड़ पर से छलांग लगाना था। नीचे जाल बांधा गया था। जब वे छलांग लगाएं तो जाल इतना कसा था कि उस पर गिड़ते ही वे उछल कर दूर जा गिरे, जिस कारण उन्हें बुरी तरह चोट लगी। यह बात उनके पुत्र गोपाल चोपड़ा ने बतायी।

गोपाल चोपड़ा

1939 में फैंज ऑस्टिन के निर्देशन में बनी फिल्म ‘नव जीवन’ में हंसा वाडेकर, रामा शुक्ल, भी.एच.देसाई, मुमताज अली, सरोज वाडेकर के साथ काम किया। इस फिल्म को हिमांशु राय और देविका रानी ने प्रोड्यूस किया था। इसके असिस्टेंट डायरेक्टर भी रायमोहन थे। संगीत दिया था सरस्वती देवी ने। 1940 में मोहन भवनानी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘झूठी शर्म’ में त्रिलोक कपूर, विमला, शरीफा, नवीन याज्ञनिक के साथ अभिनय करते हुए रायमोहन ने एक मुकाम हासिल की और फिल्म उद्योग में अपनी गहरी पैठ बनायी।

उनके अभिनय से प्रभावित हो 1940 में उन्हें अच्छा ब्रेक मिला और वे मोहन भवनानी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘प्रेम नगर’ में हुस्न बानो के साथ मुख्य किरदार की भूमिका में नजर आएं। इस फिल्म में उनदोनों के अलावा रामानन्द सागर, नागेन्द्र, मिस गुलजार भी थे। बैजू बाबरा से पहले 1942 में रिलीज हुई फ़िल्म ‘संत कबीर’ में भी वे भारत भूषण के साथ काम किया, जिसका निर्देशन रामेश्वर शर्मा ने किया था और संगीत दिया था- हिमांशु दत्ता ने। इस फ़िल्म में मेहताब, मजहर खान, पद्मा देवी, अंसारी, ज्ञानी और रमेश सिन्हा थे। जी.के.मेहता द्वारा 1943 में निर्देशित व अश्वनी कपूर की कविता पर आधारित फिल्म ‘भाईचारा’ में भारत भूषण, रमेश सिन्हा, अंसारी, मो.हदी, राजकुमार बेदी, सुमित्रा के साथ रायमोहन भी प्रमुख भूमिका में थे। इस फ़िल्म में भी हिमांशु दत्ता का संगीत था। 1945 में रायमोहन की दो फिल्म आयी। नीरेन लेहिरी के निर्देशन में आर.आर. प्रोडक्शन के बैनर तले बनी फिल्म ‘वनफूल’, जिसमें कानन देवी के साथ उन्होंने काम किया। इसमें कृष्णकांत, अहिंद्र चौधरी, देब मुखर्जी, श्याम लाहा, बिजली आदि कलाकार थे और दूसरी फिल्म थी ‘राजलक्ष्मी’। इस फ़िल्म में कानन देवी, छवि विश्वास, नटवर, जहार, इफ्तेखार, पूरी और तलत महमूद थे, जिसे प्रेेेमेंंद्र मित्रा ने निर्देशित किया था।

1952 में प्रकाश पिक्चर्स के बैनर तले ‘बैजू बाबरा’ का निर्माण हुआ। विजय भट्ट के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने न केवल फिल्मी दुनिया के इतिहास में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया बल्कि भारत भूषण और मीना कुमारी को स्टार भी बना दिया। शकील बदायूंनी के लिखे गीत और नौशाद के संगीत ने इसे चिरकाल के लिए अविस्मरणीय बना दिया। भारत भूषण के गुरु बने हरिदास की भूमिका करने वाले रायमोहन के अभिनय की भी खूब चर्चा हुई।

निर्देशक व म्यूजिक डाइरेक्टर हिरेन बोस ने 1953 में कामिनी कौशल को लेकर एक फिल्म ‘रामी धोबन’ बनायी, जिसमें रायमोहन के अतिरिक्त अभिभट्टाचार्य, तिवारी, रमेश व्यास, सचिन घोष, सोना चटर्जी, टुनटुन और सुलोचना भी थी।

विजय भट्ट के निर्देशन में 1954 में रिलीज हुई फ़िल्म ‘श्री चैतन्य महाप्रभु’ में वे फिर भारत भूषण के साथ नजर आए। इस फिल्म में संगीत दिया था- रायचन्द बोरल ने और अन्य कलाकार थे- अमिता, दुर्गा खोटे, कन्हैयालाल चतुर्वेदी, व्यास, कृष्णा कुमारी, सुलोचना चटर्जी, मदन पूरी व उमाकांत। लेकिन इस फिल्म के प्रोड्यूसर ने लोगों को पैसा नहीं दिया इसलिए इसपर केस हो गया जिस कारण यह बम्बई के बाद अन्य जगहों पर प्रदर्शित नहीं हुई।

उमाशंकर चोपड़ा

रायमोहन चोपड़ा के कुल पाँच बच्चें हुए जिनमें दो पुत्र और एक पुत्री बचपन में ही चल बसे। शेष दो पुत्रों में बड़े का नाम उमाशंकर चोपड़ा था तथा छोटे का गोपाल चोपड़ा है। दोनों भाई रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया में थे। उमाशंकर चोपड़ा का निधन हो चुका और उनका परिवार पटना में रहता है। गोपाल चोपड़ा भी सेवा निवृत्त हो इलाहाबाद में बस गए। गोपाल चोपड़ा कहते हैं – ” ‘रिश्ता’ फिल्म का जब प्रीमियर बम्बई में हुआ तो भैया वहाँ गए थे। इस फिल्म में करण दीवान और उषा किरण थी।” वे आगे बताते हैं कि ” 1954 में पिता का जब निधन बम्बई में हुआ तो भैया वहाँ गए। भारत भूषण ने उनसे कहा कि तुम अब यहीं मेरे पास रहो और फिल्मों में काम करो, किन्तु उनके लाख कहने पर भी भैया वहाँ रुके नहीं और लौट आये।

पटना में रहकर अथाह दुख झेली उनकी पत्नी ने भी अपने बच्चों को फिल्मी दुनिया में भेजने से साफ मना कर दिया और कष्ट झेलते बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा किया। स्व. उमाशंकर चोपड़ा की पत्नी उमारानी चोपड़ा से रायमोहन के बारे में पूछने पर कहती हैं कि मैंने तो उन्हें देखा नहीं। जब शादी करके आयी तो उनकी एक तस्वीर देख पूछा कि ‘कौन हैं ?’ तो बताया गया कि यह मेरे ससुर रायमोहन जी की तस्वीर है जो फिल्मों में काम करते थे। यह तस्वीर ‘पृथ्वीराज’ फिल्म की थी जो आज भी पटना के उनके घर में टंगी है।

लेखक वरिष्ठ कवि और संस्कृतिकर्मी हैं|

संपर्क- +919835238170, virenanda123@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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