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रवीश कुमार को मिले मैग्सेसे पुरस्कार से खुश नहीं है कुनबा – राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी

 

  • राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’

 

यह याद रखना चाहिए कि जहाँ ज्यादा अपेक्षाएँ होती हैं विरोध भी उतना ही मुखर होता है..

आज एक नये राजनीतिक दर्शन के विषय में ज्ञान प्राप्त हुआ कि भारतीय संस्कृति को टुकड़े-टुकड़े करने के लिए ही रवीश कुमार को मैग्सेसे पुरस्कार मिला। यह काम अन्तरराष्ट्रीय स्तर से रवीश जी को सौंपा गया। मिर्ची लगने की भी हद है। रवीश जी को मिला तो मैग्सेसे पुरस्कार दो कौड़ी का और चाटुकारों को मिले तो एशिया का नोबल। अरे भाई रवीश जी मोदी विरोधी हो सकते हैं लेकिन वह समाज विरोधी तो नहीं हैं। लोगों का नज़रिया है, सरकारों के साथ बनता-बिगड़ता रहता है। विद्वज्जन को चाहिए कि वह प्रपञ्चों से दूर व्यक्ति की कर्मनिष्ठा का मूल्यांकन करे। रवीश जी का व्यक्ति विशेष के प्रति दुराग्रह उनके कार्यों से कमतर है।

रवीश की रिपोर्टिंग आज भी समकालीन पत्रकारों से बेहतर है। ख़बर क्या है यह उन्हीं को देखकर पता लगता है। हाँ मोदी की आलोचना के प्रयास में कभी-कभी वह अच्छी बातों को भी अनुचित ठहराने का प्रयास करने लगते हैं। लेकिन पत्रकारिता में जनपक्षधरता केवल उनमें ही दिखती है। शेष और विशेष ग्रह विशेष के उपग्रह हैं।
पत्रकारिता में जनपक्षधरता के वह हिमायती हैं और यह उनकी बेबाक़ पत्रकारिता में दिखता भी है। मोदी जी तो आलोचकों को मन्त्री बनाते हैं (एम जे अकबर, जिन्होंने गुजरात दंगों पर मोदी जी को आरोपित बनाते हुए Riot After Riot पुस्तक का सहारा लिया था)।

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देश का प्रधानमंत्री इतने बड़े दिल वाला है लेकिन आप सब इतने छोटे मन वाले कैसे हो सकते हैं?  रवीश बाबू की पत्रकारिता देखिए राजनीति तो बनती और बिगड़ती रहती है।

रही बात अच्छा पत्रकार होने की तो वह आज भी निष्पक्ष पत्रकार हैं। हाँ मोदीधारा के विपरीत हैं और इसी क्रम में वह कभी-कभी वह राजनीतिक व्यक्ति की तरह पेश आने लगते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि देश का बड़ा वर्ग उन्हें सच्चाई का अलमबरदार मानता है। रवीश कुमार को यह याद रखना चाहिए कि जहाँ ज्यादा अपेक्षाएँ होती हैं विरोध भी उतना ही मुखर होता है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं|

सम्पर्क – withraghav@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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