जम्मू-कश्मीरसामयिक

इतिहास की हर घटना एक मोड़ होती है, मंज़िल नहीं – अब्दुल ग़फ़्फ़ार

 

  • अब्दुल ग़फ़्फ़ार 

 

थोड़ी सख़्ती ही सही लेकिन मुल्क के इस इस जन्नतनुमा हिस्से में स्थाई अमन व शांति की कोई राह निकलती है तो इसका स्वागत होना चाहिए।
जम्मू कश्मीर में अब तक लाखों मुसलमान, हज़ारों हिन्दू और अनगिनत फौजी अपनी जान गंवा चुके हैं। मैं प्रधानमंत्री मोदी का ज़बरदस्त समर्थक कभी नही रहा और गृह मंत्री अमित शाह का तो बिल्कुल भी नहीं, लेकिन कश्मीर से 370 हटाने, पुर्ण राज्य का दर्जा वापस लेने और लद्दाख को अलग करने के लिए मैं उनकी भरपूर सराहना करता हूं। इस मौक़े पर मैं अपने देश, अपनी सरकार और अपनी सेना के साथ खड़ा हूं। अचानक ही सही लेकिन बड़ा ऑपरेशन हुआ है। जुड़वा बच्चों को अलग करके उन्हें राष्ट्रपति शासन के आईसीयू में रखा गया है। ऑक्सीजन सिलेण्डर भरपूर है लेकिन स्थानीय लोगों को विश्वास में लिए बिना इन नवजात शिशुओं को ज़िंदगी नही बख़्शी जा सकती है।
यह सही है कि संविधान की धारा 370 के आगे ‘अस्थाई’ शब्द लिखा है। संविधान के भाग 21 का ये पहला अनुच्छेद है। भाग 21 में अस्थाई, ट्रांजिशनल और विशेष प्रावधानों वाली धाराओं का ज़िक्र किया गया है।

इस भाग में धारा 370 के आगे लिखा गया है : जम्मू-कश्मीर राज्य को लेकर अस्थाई प्रावधान :- – – लेकिन अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भले ही धारा 370 के आगे ‘अस्थाई’ शब्द लिखा हो, लेकिन ये अस्थाई नहीं है। 1969 में संपत प्रकाश मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने धारा 370 को अस्थाई मानने से इनकार कर दिया था। उस वक़्त पांच सदस्यीय खंडपीठ ने इसे स्थाई प्रावधान करार दिया था।
हालांकि संविधान विशेषज्ञ इसे बेहतर समझा सकते हैं लेकिन मेरे कहने का मतलब कश्मीर समझौते के लिए नेहरू को पानी पी पी कर कोसना, बेवक़ूफ़ी के सिवा और कुछ भी नहीं है। वक़्त और हालात के हिसाब से हर वक़्त की मौजूदा हुकूमतें फ़ैसला लेती रही हैं। उस समय परिस्थिति के अनुरूप नेहरू ने कश्मीर समझौता किया था और इस समय परिस्थिति के अनुरूप मोदी ने ये काम किया है। ऐसे बड़े फैसलों के समय हमें भाजपाई, कांग्रेसी, जनसंघी, वामपंथी, हिन्दू या मुसलमान बनकर नही बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ एक हिंदुस्तानी बनकर सोचना चाहिए।

जम्मू कश्मीर अबतक अगर क़ीमत चुकाता रहा है तो वह पड़ोसी देश के साथ हमारे ख़राब संबधो के चलते। इसमें धारा की कहीं बाधा नही रही। दरअसल इसको हटाने की कवायद प्रतीकात्मक रूप से आज़ाद होने के अहसास के अलावा कुछ भी नही है। अलबत्ता इसके अनेक दूरगामी फ़ायदे ज़रूर नज़र आ रहे हैं।
वाज़ेह रहे कि धारा 370 के स्वरूप को नागालैंड में 371A, असम में 371B, मणिपुर में 371C, आंध्र प्रदेश में 371D, सिक्किम में 371E, मिजोरम में 371G, अरूणाचल में 371H और गोवा में 371I में पहले से ही लागू कर रखा गया है, और ये भी जान लें कि बाहरी लोग हिमाचल में भी ज़मीन नही ख़रीद सकते। यहां कश्मीर को मुस्लिम बहुल राज्य मानकर कोई भी सोच क़ायम करना, सांप्रदायिकता के सिवा कुछ भी नहीं। ये ख़ुश्फ़ह्मी छोड़ दें कि हम और आप जैसे लोग अब भी कश्मीर में ज़मीन ख़रीद सकते हैं। अब वहां भू माफ़िया के रूप में देश के बड़े बड़े कार्पोरेट घराने आपसी रस्साकशी करते नज़र आएंगे जिससे कश्मीर की कश्मीरीयत मजरूह होगी और वहां का वातावरण भी प्रदुषित होगा। नशे में झूमते लोगों को एक दिन रोते भी देखा है इतिहास ने, आख़िर कश्मीरी भी 1948 में कबायलियों को भगाकर हिंदुस्तानी झंडा लिए जश्न मना ही रहे थे।


सबके बावजूद इस फ़ैसले से मैं बेहद ख़ुश इसलिए हूं कि कश्मीर से जो हिन्दू भाई दर-बदर किए गए थे उन्हें अपनी ज़मीन में अब फिर से पनाह मिलेगी, मुट्ठी भर सियासी परिवारों की इज़ारेदारी और उनके द्वारा संसाधनों की लूट पर लगाम लग सकेगी, प्रदेश के बाहर शादी करने वाली कश्मीर की बेटियों को अपनी पैतृक संपत्ति में उनका जायज़ अधिकार हासिल हो सकेगा, जम्मू-कश्मीर में अब अलग झंडा नहीं लहराएगा, राज्य के विधानसभा का कार्यकाल अब देश के अन्य राज्यों की तरह 6 साल का नहीं बल्कि पांच सालों का होगा, अब भारतीय संसद को जम्मू-कश्मीर संबंधित क़ानून बनाने के लिए राज्य सरकार की मंज़ूरी नही लेनी पड़ेगी और सबसे बड़ी बात कि कश्मीरी नौजवानों को अब बलि का बकरा नही बनाया जा सकेगा।
बहरहाल इस मुद्दे पर आज मैं देश के साथ मज़बूती से खड़ा हूं और सबको होना चाहिए।

 

लेखक कहानीकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं, तथा लेखन के कार्य में लगभग 20 वर्षों से सक्रिय हैं|
सम्पर्क-+919122437788, gaffar607@gmail.com
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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