चर्चा में

एक प्यार का नगमा हैं..

 

  • अब्दुल ग़फ़्फ़ार 

 

निसंदेह लता मंगेशकर महान हैं और रहेंगी भी लेकिन वो भी तो आख़िर एक इंसान हैं। उनके अंदर भी इंसान की तमाम ख़ूबियों के साथ साथ तमाम खामियों का मौजूद होना लाज़मी है।
कुछ दिन पहले सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें भिखारी जैसी दिखने वाली एक महिला बेहद सुरीले अंदाज़ में ‘शोर’ फ़िल्म का गीत ‘एक प्यार का नग़मा है’ गा रही थी। सूखे हुए बेजान होठों से दिलकश आवाज़ का निकलना लोगों को हैरान कर रहा था। गंदे दांत और गंदे बालों वाली इस बुढ़िया के लिए इंटरनेट वरदान साबित हुआ।


खोजबीन करने पर पता चला कि वायरल वीडियो में गाना गा रही महिला का नाम रानू मंडल है, जो पश्चिम बंगाल के राणाघाट स्टेशन पर गाना गाकर गुज़ारा करती हैं। सॉफ्टवेयर इंजीनियर एतिंदर चक्रबर्ती को उनकी आवाज़ में एक कशिश महसूस हुई। उन्होंने उनका वीडियो बनाया और उसे अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर पोस्ट कर दिया। जो बाद में ज़बर्दस्त रूप से वायरल हुआ। इतना वायरल हुआ कि आज रानू मशहूर गायक-संगीतकार हिमेश रेशमिया की आगामी फिल्म ‘हैप्पी, हार्डी और हीर’ के लिए एक गाना रिकॉर्ड कर चुकी हैं और कई सिंगिंग रियलिटी शो में भी नज़र आ चुकी हैं। फिर क्या था, रानू मंडल को सोशल मीडिया पर दूसरी लता मंगेशकर बताया जाने लगा।


पिछले दिनों जब लता जी से रानू मंडल की पॉपुलरटी के बारे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि रफ़ी, मुकेश या मेरे गाने और मेरी आवाज़ की नक़ल करने के बजाय उन्हें अपने गाने गाकर प्रसिद्धि हासिल करनी चाहिए। अगर आशा भोंसले ने अपना अलग अंदाज़ नही अपनाया होता तो आज तक वो भी मेरी परछाईं बनी रहतीं।
लता मंगेशकर का बयान सामने आते ही कई लोग नाराज़ हो गए हैं। उनका कहना है कि लता मंगेशकर को अपने क़द और गरिमा का ख्याल रखते हुए रानू मंडल का सपोर्ट करना चाह‍िए न कि उन पर कमेंट करना चाहिए। जबकि मेरा मानना है कि लता जी के इस बयान को एक मशविरा और नसीहत के रूप में देखे जाने की ज़रूरत है।
हालांकि ये प्रकरण देखकर मुझे सुमन कल्याणपूर जी की सुरीली आवाज़ याद आ रही है जो हु बहू लता जी जैसी ही गाती थीं लेकिन उन्हें उस ज़माने में मसल कर ज़मीनदोज़ कर दिया गया। बेचारी रानू मंडल की उम्र लता जी के आसपास की ही लगती है। कितने दिनों का मुस्तक़्बिल बचा है अब इन दोनों का। फिर भी इंसान के भीतर बैठा उसका ग़ुरूर, अहंकार, हसद, जलन कब उसके आभामंडल पर सुरूर बनकर छा जाए और उसकी मिट्टी पलीद कर जाए, कहा नही जा सकता।
राजनीति से लेकर लेखन, गायन, खेल हर जगह पर भस्मासुर बने सीनियर लोग बैठे हुए हैं जो अपने क़द के आसपास भी नए लोगों को फटकने नही देना चाहते जबकि बदलाव प्रकृति का अकाट्य नियम है। जबतक पूराने पत्ते गिरेंगे नहीं तबतक नई कोंपलें खिलेंगी नहीं।

लेखक कहानीकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं|
सम्पर्क-+919122437788, gaffar607@gmail.com
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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