शख्सियतस्मृति शेष

डॉ. मिथिलेश कांति : होना एक शिक्षक का – मणीन्द्र नाथ ठाकुर

 

  • मणीन्द्र नाथ ठाकुर 

 

बहुत से लोग जानते हैं कि बिहार-झारखंड का एक प्रसिद्ध विद्यालय है जिसका नाम नेतरहाट है।इसे बिहार सरकार ने 1954 में स्थापित किया था। बिहार के प्रमुख व्यक्तियों जिसमें जगदीशचंद्र माथुर जैसे लोग शामिल थे, इसकी कल्पना की थी और इसे साकार करने के लिए एस जी पीयर्स को लंदन के इंडिया लाइब्रेरी से ख़ास तौर पर बुलाया गया था। चार्ल्स नेपियर को पहला प्राचार्य बनाया गया  और जीवननाथ दर ने पंडित नेहरू के अनुरोध पर दून स्कूल छोड़ कर वहाँ जाना तय किया। नेतरहाट विद्यालय दून स्कूल, ऋषि वैली स्कूल, मेयो कॉलेज और सिंधिया स्कूल की श्रेणी में  एक नया प्रयोग था। गांधी और नेहरू के विचारों के मेल से बना एक आधुनिक भारतीय संस्करण।

लेकिन बहुत से लोग जो इस विद्यालय के छात्रों के हिन्दी प्रेम से प्रभावित होते हैं उन्हें यह नहीं पता होता है कि यह डा0 मिथिलेश कांति का महती योगदान था।उनकी पहली कक्षा में ही छात्रों को निर्देश मिलता था कि छात्र साहित्य पढ़ने की आदत डालें, हमेशा अपने पास एक पुस्तक रखें, कक्षा में शिक्षकों के आने के बीच में जो समय मिलता है उसमें कुछ पन्नों को पढ़ लें, तरह-तरह का पुस्तक चिह्न बनाएँ और उन्हें ही पढ़े-अनपढ़े पन्नों के बीच रखें।यह निर्देश कक्षा सात के बच्चों को देने के बाद वह फिर देखते थे कि छात्र क्या पढ़ रहे हैं? अचानक किसी से सहज भाव से ही पूछ डालते थे कि आप क्या पढ़ रहे हैं और फिर उस पर थोड़ी बातचीत हो जाती थी। स्वयं भी हमेशा एक पुस्तक अपने पास रखते थे। छात्रों के आने के पहले और उनके जाते ही डूब जाते थे पुस्तक में।आज भी उनके छात्र यदि उनकी छवि याद करते हैं तो उनकी वही मूर्ति सामने आती है: एक छोटा सा व्यक्ति पूरी गम्भीरता के साथ अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं और एक मेज़ के दोनों तरफ़ पुस्तकें रखी हैं। एक पुस्तक में डूबे हुए हैं। आपके आते ही नज़र उठा कर देखेंगे और फिर आपसे बैठने कह कर थोड़ी देर लेंगे पुस्तक के एक पैराग्राफ़ को ख़त्म करने में। हम मज़ाक़ में कहते थे कि कांति जी तो दाढ़ी बनाते समय भी पढ़ते रहते हैं, शायद यह सच भी रहा होगा।

उनकी डाली हुई आदत का परिणाम था कि कम समय में ही छात्र हिन्दी साहित्य के मुर्धन्य लेखकों और कवियों को पढ़ चुके होते थे। उनमें से बहुत से छात्र आज भी उनकी बनाई हुई इस आदत से प्रभावित हैं। कई बार पत्नियाँ नाराज़ भी होती हैं कि आप हेमशा पुस्तक में क्यों डूबे रहते हैं? साहित्य के रसास्वादन की जो आदत उन्होंने लगाई उसने नेतरहाट विद्यालय के छात्रों को हिन्दी प्रेम के लिए प्रसिद्ध कर दिया।उनका ही देन था कि विद्यालय का पुस्तकालय हिन्दी साहित्य की उच्चतम पुस्तकों से भरा था और मौक़ा मिलते ही हम लोग उसी खंड में जा कर जम जाया करते थे। पुस्तकों को पढ़ कर शांत रहना तो हमारा स्वभाव नहीं था. इसलिए एक दूसरे से पूछते रहते थे कि क्या पढ़ा और फिर उनकी अच्छी ख़ासी समिक्षाएँ हो जाया करती थीं। अभी भी याद है कि अज्ञेय के ‘शेखर: एक जीवनी’ और मन्नू भंडारी के ‘आपका बंटी’  के लिए पुस्तकालय में लम्बी लाइन लगी रहती थी। शेखर को लेकर तो कितनी बहस हम लोगों के बीच होती रहती थी और ‘आपका बंटी’ ने तो इतना भावुक कर दिया था कि हमने कहानी को आगे बढ़ा कर पति-पत्नी को मिला दिया और बंटी को होस्टल से घर ला दिया था। हिन्दी साहित्य के प्रति यह  संजीदगी उनका ही देन थी जिसने वर्षों तक विद्यालय को सींचा और उसे उसकी आत्मा प्रदान की।

साहित्य के प्रति अनुराग बढ़ाने के लिए उन्होंने हिन्दी कविताओं की अन्त्याक्षरी शुरू करवाई. यह कार्यक्रम इतना अद्भुत था कि आज भी पुराने छात्रों को उसकी याद से रोमांच हो जाता है। अभी-अभी विद्यालय के पूर्ववर्ती छात्रों के संगठन ने दिल्ली के केंद्रीय विद्यालयों के साथ मिल कर उस परम्परा को काव्यंजलि के नाम से विस्तार देने का प्रयास शुरू किया है. इसके नियमवाली को देखा जा रहा था तो कांति जी की याद आ गयी। किस बारीकी के साथ उन्होंने इसका निर्माण किया था कि आज भी उतना ही सही है जितना वर्षों पहले रही होगी.
उनके साथ मेरा एक व्यक्तिगत अनुभव भी है. विद्यालय में फूटबाल मैच चल रहा था. तीन आश्रमों का एक सेट होता था और इन सेटों के बीच खेल के सारे टूर्नामेंट होते थे। हर खेल के लिए अलग-अलग शील्ड तो था ही, साथ में सभी खेलों और अन्य प्रतियोगिताओं  को मिला कर भी एक शील्ड था. मेरे सेट को यह शील्ड मिलने वाला था. आख़िरी मैच चल रहा था। हम लोग बेहद उत्तेजित थे। आख़िरी दस मिनट बचे थे। गेंद हमारे  गोल्पोस्ट के क़रीब था और अचानक दूसरी टीम के एक खिलाड़ी ने हमारी टीम के गोलकीपर को धक्का दे दिया। उसकी नाक में चोट लगी और नाक टेढ़ी हो गई। उसे तुरंत ही चिकित्सालय ले जाया गया। जीत तो हमारी हुई, लेकिन इस चोट ने मज़ा को आधा कर दिया। घायल छात्र क़रीबी दोस्त भी था। बहुत ग़ुस्सा आया. मुस्किल से जीत का जश्न मनाने की अनुमति मिली।जुलूस के उस छात्र के आश्रम  के क़रीब पहुँचते ही मैं अपने ग़ुस्से पर क़ाबू नहीं रख पाया और मैंने बहुत भला बुरा कहा। ज़ाहिर है मेरे ख़िलाफ़ शिकायत उन तक पहुँच गई. उस समय कांति जी नये-नये प्राचार्य बने थे।

शिक्षकों की मीटिंग हुई. मुझे दोषी क़रार दिया गया। आरोप यह लगाया गया कि मैं ने उस छात्र को अपशब्द कहा है। संयोग की बात थी कि वह छात्र मुस्लिम था. इसलिए आरोप का दूसरा हिस्सा यह भी था कि मैंने उसके धर्म को लेकर भी गालियाँ दी थी। और तय हुआ कि मुझे सम्मेलन में सामूहिक माफ़ी माँगनी चाहिए। मेरे हिसाब से सभी आरोप सही नहीं थे और जो कुछ मुझे उत्तेजित करने के लिए खेल के मैदान में कहा गया था उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया था। शायद दंड ज़्यादा था। कुछ लोगों का मानना था कि नये प्राचार्य के ऊपर दवाब था कि अपने प्रसाशानिक क्षमता का परिचय दें।

लेकिन कहानी अब शुरू होती है. इस दंड को निर्धारित करने के बाद मेरे आश्रम में आये। मुझसे बहुत सी बातें की। मुझे आश्वस्त करने का प्रयास किया कि दंड उचित है और मेरे अंदर इतनी सहिष्णुता होनी चाहिए, आदि-आदि। शायद उन्हें भय भी था  कि मैं सम्मेलन में या तो जाऊँ ही नहीं या फिर जाकर कुछ और न कह दूँ।शुरू में तो मैंने भी सत्याग्रह का विचार बना लिया था। लेकिन उनके व्यक्तित्व के आगे ऐसा करना सम्भव नहीं था। सबकुछ उनके मन के अनुसार हुआ। संयोग की बात थी कि उस रात आश्रम के किसी छात्र ने खाना नहीं खाया। मुझे मालूम नहीं था कि ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि मैं तो सम्मेलन से लौटने के बाद रोते-रोते सो चुका था। लेकिन कांति जी मेरी और अन्य छात्रों की प्रतिक्रियाओं को लेकर सजग थे। सुबह-सुबह फिर आश्रम आ गये। आश्रमाध्यक्ष के घर मुझे बुलाया गया। बहुत देर तक मुझे समझाया। शिक्षक होने के नाते मैं उनका मन अब समझ सकता हूँ। उनके जैसे व्यक्ति के लिए किसी को दंडित करना स्वाभाविक नहीं रहा होगा. शिक्षक और प्राचार्य के बीच द्वंद्व चल रहा था. इस घटना के बाद मेरे लिए उनका प्रेम और बढ़ गया, ऐसा मुझे लगता था. उनके समझाने का ही प्रभाव था कि इस घटना को लेकर मेरे अंदर कोई कुंठा नहीं पनपी। अन्यथा विद्यालय में सामूहिक माफ़ी माँगा जाना अपमानजनक माना जाता था जिसे न स्वयं भूलना सम्भव होता था न ही अन्य छात्र उसे भूलने देते थे।

शायद शिक्षक प्राचार्य के इस द्वंद्व को बहुत दिनों तक झेल नहीं पाए और अंत में उन्होंने प्राचार्य पद से इस्तीफ़ा दे दिया। स्वभावतः डा0 मिथिलेश कांति एक शिक्षक थे। हर समय छात्रों के लिए सोचते थे। आज जब उनके छात्र उन्हें याद कर रहे हैं तो पता चल रहा है कि उनका थोड़ा-थोड़ा अंश हर किसी में कैसे समाया हुआ है। शिक्षा के निजी क्षेत्र की बड़ी हस्ती एमिटी यूनिवर्सिटी और स्कूल की डायरेक्टर अमिता चौहान ने मुझ से पूछा कि नेतरहाट विद्यालय में ऐसा क्या है जो उनके विद्यालय में नहीं है।तब से मैं खोजता हूँ कि ऐसा क्या था इस विद्यालय में? शायद उसके शिक्षक बहुत अलग थे। कांति जी जैसे शिक्षक हमारी नयी पीढ़ी को नहीं मिल सकते हैं। कहीं किसी विश्वविद्यालय में हो सकते थे, लेकिन विद्यालय में ही होना तय किया। हिन्दी के आलोचक नामवर जी भी उनकी प्रशंसा किया करते थे।एन सी आर टी की बैठकों में उनकी मुलाक़ातें उन्हें याद थी। बल्कि उनके लिए कांति जी ही नेतरहाट की पहचान थे। ऐसा होना उचित भी था। कांति जी ने नेतरहाट की आत्मा  को गढ़ा था।

 

लेखक समाजशास्त्री और जे.एन.यू. में प्राध्यापक हैं|

सम्पर्क- +919968406430, manindrat@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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