मुद्दाशिक्षा

मेरे देश के प्रिय छात्रों – दीपक भास्कर

मेरे देश के प्रिय छात्रों। मैं तुम्हारा शिक्षक बोल रहा हूँ। मैं तुम्हारी क्लासेज के बाद सड़क पर संघर्ष कर रहा हूँ। जब मैं सड़क पर संघर्ष कर रहा हूँ तो तुम्हें ये पता होना चाहिए कि मैं तब भी तुम्हारे क्लास में ही हूँ और तुम्हारे लिए एक रास्ता ढूंढ रहा हूँ, वो रास्ता है “संघर्ष” का। संघर्ष तो जीवन है और वो सबको करना है लेकिन क्या यह समझना जरूरी नहीं कि संघर्ष कैसा होगा, इसको कैसे किया जाएगा?
राज्य की सत्ता जिसके पास हमने ‘लेजिटिमेट वायलेंस’ की शक्ति दे रखी है, उससे कैसे लड़ा जाएगा? इसलिए तुम्हारा यह शिक्षक उद्वेलित भावनाओं के परे, हर वक्त तर्क की संगति के लिए ही, तुम्हे प्रेरित करना चाहता है। भावनाओं से खेलना तो आम बात है वो आजकल हर रोज टीवी चैनल्स और नेताओं की चुनावी रैली हो ही रही है लेकिन तर्क की बात करना ही मेरा काम है।  तुम थक से जाओगे, ऊब जाओगे, भावनाएं जोर मारेंगी लेकिन क्या तब भी तर्क को पीछे कर दिया जा सकता है?
मैं दिल्ली विश्वविद्यालय का शिक्षक हूँ। शिक्षक परमानेंट हों, उनका प्रमोशन हों, उन्हें पेंशन मिले, पढ़ने-लिखने एवं पढ़ाने की आजादी मिले, विश्विद्यालयों से डर अथवा भय का माहौल खत्म हो इत्यादि, मांगे मेरी भी हैं। शिक्षक आंदोलन हो या कोई और, जो भी आंदोलन, मुझे एक जरूरी एवम सही संघर्ष लगता है उसमें अपना योगदान देना, मुझे आवश्यक लगता है। मेरा उद्देश्य भी साफ है और मेरा संघर्ष भी।
मैं तुम्हें बता दूं, मुझे किसी भी हालत में शिक्षक की भूमिका से बाहर निकलना कतई मंजूर नहीं। मुझे नेता बनने का अगर थोड़ा भी मन होता तो उसके लिए काफी जमीन बनी भी हुई है और जनमानस में जाकर बनाई भी जा सकती है। लेकिन उस उद्देश्य को मैं बिहार से दिल्ली आने वक्त ही छोड़ चुका हूँ। राजनीति का छात्र और शिक्षक होने के नाते, राजनीति की समझ पर बात करना, विश्लेषण करना जरूरी समझता हूँ।
हम सब प्रजातांत्रिक देश में रहते हैं। यह याद रखना जरूरी है कि ये लोकतंत्र उपहार नहीं है बल्कि हमारे पूर्वजों के बलिदानों का परिणाम है।
सत्ता वर्ग अथवा सरकार तो बिना लोकतंत्र के भी रही हैं, जब राजतंत्र था तब भी सरकार होती थी, जब ब्रिटिश हुकूमत थी तब भी सरकार होती थी इसलिए सत्ता वर्ग के लिए लोकतंत्र महज एक सत्ता पाने का साधन हो सकता है लेकिन हमारे लिए ये जीवन है, इसके बिना तो मृत्यु भी हमें मंजूर नहीं। तुम्हें याद रहे कि लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ लोगों पर होती है, सत्ता वर्ग या सरकार तो, इसे बस एक शासन करने भर का तरीका मानती है। यूं कहें तो सरकारें हर वक्त जनमानस को अलोकतांत्रिक होने को उकसायेंगी, वो तुम्हें इतना दुख देंगी जितने में तुम यह भूल जाओ की लोकतंत्र तुमने क्यों अपनाया है। जब सरकार तुम्हें हिंसा पर उतारू करेगी तब वो तुम्हें बड़ी आसानी से अलोकतांत्रिक घोषित कर, खुद लोकतंत्र का मसीहा बन जाएगी। लेकिन तुम ऐसा न होने देना। क्योंकि तुम्हें पता है कि लोकतंत्र तुम्हारा जीवन है जबकि सरकार के लिए, यह मजह एक तंत्र। लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करना मुश्किल है, लेकिन क्या हमने हिंसा का रास्ता खोल दिया है।
बहरहाल, तुम्हें पता है कि आंदोलन में लगातार जुड़े रहने के बावजूद मैं अपने शिक्षक कर्म से कभी किसी भी तरह से समझौता नहीं करता हूँ। मुझे पता है कि मेरा दर्द भी है लेकिन जब तुम सब आकर कहते हो कि सर। ये आपसे पढ़ना है तो सब कुछ भूल जाता हूँ। जब किसी और विषय का छात्र आकर कहता है कि सर।आप हमें ये बात बता दीजिये तो फिर और कुछ नहीं सूझता। तब मुझे आंदोलन के लिए अप्रतिम ऊर्जा मिलती है। मैं इसे अपना सौभाग्य की तरह मानता हूँ। सरकारें क्या समझती है, क्या कर रही है वो सबको पता है। तुम्हें भी पता ही है।
लेकिन मुझे पता है की जिस दिन मैं एक बेहतरीन शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों के बीच रहूंगा उस दिन हमारा हर आंदोलन हम जीत जाएंगे। आज तक यही हुआ है। लेकिन मैं तुमसे ये सब इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जब तुम कभी भविष्य में किसी बात के लिए आंदोलन करोगे, तो कुछ बातें याद रखनी होगी।
मैं आंदोलन की मर्यादा को बखूबी समझता हूँ और अपने साथियों के दर्द को भी। तुम सोचो मैं तुम्हें पढ़ाते वक्त किसी विश्विद्यालयों में शिक्षक बनने को कैसे प्रेरित करूँ? यह मेरे लिए कितना मुश्किल होता होगा।
लेकिन मेरा दर्द, मेरी मर्यादा की समझ को खत्म नहीं कर सकता।
मैं भगत सिंह के बम फेंकने को याद करता हूँ। वो चाहते तो संसद ही उड़ा देते, कितने लोग मारे भी जाते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वो जानते थे बड़ी लड़ाई, राजनीतिक तरीके से ही लड़ी जानी है। सो वो लड़े। बम फेंके भी तो बस जेल जाने के लिए ताकि जेल से एक सम्पूर्ण राजनीतिक लड़ाई लड़ी जा सके। ये सच है, बाकी ये होता तो, वो हो जाता, सिर्फ कमजोर लोगों द्वारा की गई किवंदन्तियाँ है। गांधी जी को पता था कि चौरी-चौरा इस देश के स्वतंत्रता संग्राम के मुहिम को वर्षों पीछे धकेल देगा। हमारे लिए ये कहना आसान होता है कि अगर गांधी ने आंदोलन वापस न लिया होता तो हम 1922 में ही आजाद हो जाते। ये बातें हम इसलिए कह देते हैं क्योंकि हम 50 दिन की भूख हड़ताल पर बैठने से पहले ये सोचते हैं कि कहीं मैं मर गया तो? आमरण अनशन का एलान कर ये सोचते रहते हैं कि कौन आकर जूस पिला जाए? दूसरों के लिए हम जान क्यों दे दें? हम ऐसा इसलिए कह पाते हैं क्योंकि एक छोटे से लाठी चार्ज में हम भाग खड़े होते हैं। लेकिन क्या वो इतिहास भी गलत है कि लाला ने सर पर लाठियां खाई और “साइमन गो बैक” कहते रहे। अंत में शहीद हो गए। आंदोलन से पहले तुम्हें ये बताना होगा की तुम आज जान देने वाले हो ताकि लोग उसके लिए तैयार हो सकें, तुम्हें लोगों को विश्वास दिलाना होगा कि तुम्हारा जान देना क्यों आवश्यक है ताकि जनमानस तुम्हारी मृत्यु का शोक न मनाए, तुम्हारी मृत्यु उनके लिए ऊर्जा का काम कर सके। तुम याद करो भगत सिंह ने भी बम फेंकने से पहले यही किया था।
यही आंदोलन की मर्यादा होती है। मेरे प्रिय देश के कर्णधारों, ये याद रहे कि आंदोलन की अपनी सत्ता होती है। अगर सत्ता है, तो इसकी मर्यादा भी है, और आंदोलन के सिद्धांत भी है, वो आंदोलन कभी किसी के लिए कुछ भी नहीं ला सकता जिसमें आदर्श न हो। आदर्श ही आंदोलन की रीढ़ होती है। आदर्श टूटेगा तो तुम्हारे आंदोलन को, राज्य बस कुछ लोगों द्वारा अपने हित का साधन बताकर, खत्म कर देगा।
गुस्सा मेरे अंदर भी है, कहीं ज्यादा, सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि उन तमाम मेरे साथियों के लिए, मेरे विद्यार्थियों के लिए, मेरे विश्विद्यालयों के लिए, मेरे देश के लिए। क्या है सबका भविष्य? ये सवाल मुझे झकझोर देता है। मैं टूटने लग जाता हूँ। लेकिन आंदोलन में टूटने की जगह नहीं बल्कि लगातार मजबूत होने की है।
विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के लिए मैं, तमाम शिक्षक एवम तुम विद्यार्थी तथा जनता सिर्फ संख्या में गिने जाते होंगे लेकिन मेरे लिए, ये सब लोग तो अनमोल रत्न हैं जिनके कंधों पर मैं इस देश की बागडोर देकर, चैन से मर सकूंगा। तुम्हें पता है कि मैंने तुम्हें किसी भी घड़ी, हिंसा का रास्ता अपनाने को नहीं कहा। राज्य के हिंसात्मक क्रूरता के खिलाफ भी, “बुद्ध चेतना” के साथ खड़ा रहने को कहा है। जब ऐसा लगे कि इस जीवन का क्या करें, जब सरकारों ने सब कुछ छीन ही लिया है, इस जीवन का क्या होगा, जब हर आदमी मुझे इस्तेमाल ही कर रहा है तब भी शांति का पथ के सिवा दूसरा कोई पथ नहीं है तुम्हारे लिए। क्योंकि हमारा अथवा तुम्हारा संघर्ष, हमारे जीवन के साथ खत्म नहीं होगा। ये संघर्ष सामाजिक है, न्याय के लिए है, जिसे तुम्हारे बाद, मेरे बाद भी होते रहना है। अगली पीढ़ी को, एक संघर्ष का शांतिपूर्ण रास्ता अख्तियार कर, हम सब को ही देना है। लेकिन मेरे प्रिय, जब मैं शांति की बात करूं तो मुर्दा शांति न समझना। मैं तो जीवंत-संघर्ष का पक्षधर हूँ। लेकिन तुम याद रखना की  हर संघर्ष के साथ, हमें और तुम्हें, शांति के लिए भी संघर्ष करना है। और ये भी याद रखना कि शांति का संघर्ष इतना आसान नहीं होगा। इस दुनिया ने आजतक यही संघर्ष किया है, संततियों से यही संघर्ष हो रहा है। शांति का संघर्ष, शांति के लिए संघर्ष और शांति के द्वारा संघर्ष। बहुत कुछ खोना होगा, एक असिसटेंट प्रोफेसर या फिर आईएएस और कोई नौकरी मिलने से, नौकरी का संघर्ष तो खत्म होगा लेकिन शांति का संघर्ष कभी न खत्म होगा। अगर शांति के पथ से अलग, कोई भी मार्ग है तो उस मार्ग पर कुछ भी नहीं, वो एक अंतहीन सड़क है। अंतहीन! उद्देश्य विहीन!
अंततः यह कहूंगा कि आंदोलन साधन भी है और साध्य भी। तो फिर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि साधन का रूप कैसा होगा? हिंसा करने के लिए तुम्हें तमाम तर्क गढ़ने होंगे जबकि अहिंसा अपने आप में एक तर्क है। आजतक की सभी बड़ी लड़ाइयों को इसी तर्क के साथ जीता गया है। क्या तुम ये नहीं देखोगे की हर हिंसात्मक संघर्ष का भयावह अंत हुआ है। नक्सलवाद को ही देख लो। क्या मिला? लेकिन जयप्रकाश के अहिंसात्मक आंदोलन ने सत्ता एवम सरकार को मजबूर कर दिया वो लोकतांत्रिक बने, लोकशाही की गरिमा को समझे। तुम तर्क अवश्य ढूंढ़ना लेकिन तर्क, हिंसा के लिए नहीं, “मत्स्य न्याय” के लिए नहीं बल्कि सामाजिक न्याय के लिए। जब हिंसा अपने चरम पर हो तब भी तुम “बुद्ध-चेतना” से आगे बढ़ना क्योंकि अगर ऐसा न हुआ तो आने वाली पीढियां जब हिंसात्मक आंदोलन में मारी जाएगी तो ढेर पड़ी हुई लाशों से एक आवाज निकलेगी की तुमने मेरे लिए जीवन का नहीं बल्कि मृत्यु का रास्ता चुना था। तब क्या जबाब होगा हमारे पास?
आंदोलन, लोकतंत्र बचाने की है वो भी लोकतांत्रिक तरीके से। याद रहे साधन ही तुम्हारा साध्य सुनिश्चित करेगा। मैं आदर्शवादी नजर आऊंगा लेकिन बिना आदर्श इस जीवन का क्या मोल। बिना सत्य के इस जीवन का क्या अर्थ।
भावनाएं थोड़ी देर के लिए तुम्हारी पिपासा अवश्य शांत करेगी लेकिन तर्क, संघर्ष को धीरे-धीरे आसान बनाता जाएगा। इसलिए आंदोलन के लिए लिया गया तुम्हारा निर्णय ही तुम्हारे आंदोलन की परिणति को निर्धारित करेगा। सत्य के साथ रहो और अगर तुम्हें लगा कि सत्य हार रहा है तो जान लो कि तुम्हारे जीतने का कोई मतलब नहीं रह जायेगा।
#सत्यमेवजयते


डॉ दीपक भास्कर

दिल्ली विश्विद्यालय के दौलतराम कॉलेज में राजनीतिशास्त्र पढ़ाते है और सामाजिक एवं राजनैतिक मुद्दे पर बेबाकी से लिखते हैं।

deepakbhaskar85@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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