पुस्तक-समीक्षा

दास्तान ए ग़दर – राजीव राय

 

  • राजीव राय

 

मूल किताब उर्दू में लिखी गई है। अंग्रेज़ी में इसका तरजुमा राना  साफवी ने किया है। इस किताब के दो भाग हैं। पहले हिस्से में 1857 के विद्रोह, जिसे लेखक ज़हीर देहलवी ने सिर्फ़ ‘गदर’ कहा है, का ज़िक्र है। मेरठ से आए और भिन्न जगहों से दिल्ली में जमा हुए विद्रोहियों को ज़हीर देहलवी ने ‘सवार’, सवारन-ए-फौज’, ‘बागिया’, ‘फ़ौज-ए-बागिया’ का नाम दिया है। विद्रोह के किसी नेतृत्वकारी शख़्सियत या रहनुमा की पहचान किताब में नहीं की गयी है। पूरे किताब में कुछ जगह विद्रोहियों (लेखक के अनुसार सवार’, सवारन-ए-फौज’, ‘बागिया’, ‘फ़ौज-ए-बागिया’) ने बहादुर शाह ज़फ़र को जब भी बग़ावत की रहनुमाई की गुज़ारिश की, उनके द्वारा हमेशा उसे ठुकरा दिये जाने की बात कही गई है। जहीर देहलवी की बात मान ली जाए तो बहादुर शाह ज़फ़र 1857 की बग़ावत के आलोचक थे तथा पूरे प्रकरण से नाख़ुश और नाराज़ थे और सिर्फ़ नाम भर के बादशाहत के भी चले जाने की आशंका से ग्रसित और खिन्न थे जो तारिखी हक़ीक़त के ख़िलाफ़ है। दिल्ली में हुए पूरे घटनाक्रम को बलवाईयों और स्थानीय लफ़ंगों, लम्पटों, गुंडों के द्वारा बिना किसी रहनुमा के, गैरयोजनाबद्ध तरीक़े से हुए अराजकता, दंगा और लूटपाट का रूप दिया गया है, जिससे एक दो ओहदेदारों को छोड़ कर लाल क़िले के लोग भी त्रस्त बताए गए हैं। ऐसा लगता है कि लेखक ने हाल-ए-दिल्ली पर अपनी मनोभावना को बहादुर शाह ज़फ़र के मुँह में डालने की कोशिश की है। पूरी किताब में विद्रोह में किसी प्रकार की जनभागीदारी, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिदृश्य का ज़िक्र नहीं है जो इसी विषय पर लिखे गए तबसिरों किताबों से उलट है। लेखक के अनुसार तात्कालीन सल्तनत से उनकी निकटता के मद्देनज़र बग़ावत और पूरे घटनाक्रम पर उनसे राजनैतिक और सामाजिक पहलू पर चर्चे की उम्मीद थी। पूरे रिपोर्ताज को भी संजीदा और तारीखी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि ज़्यादातर वाकये तारीख़ों, वक़्त या जगह से महरूम हैं।

दिल्ली में हुए हिंसा, लूटपाट का लेखक ने बहुत जीवंत तश्वीर पेश किया है। ऐसा लगता है मानो पूरा वाक़या आँखों के सामने से गुज़र रहा हो। दिल्ली में रहने वाले मुसलमानों, यहाँ के वासिन्दों, लाल क़िले के अन्दर रहने वालों ख़ास कर बहादुर शाह ज़फ़र के ख़ानदान के लोगों पर अंग्रेज़ों ने जो क़हर बरपाने का और दिल्ली के बासिव्दों ख़ास कर मुसलमानों के क़त्लेआम और बचे खुचे लोगों के पलायन का जो ज़िक्र लेखक ने किया है वो आज भी दिल दहलाने वाला और ख़ून खौलाने वाला है हालाँकि विद्रोहियों के दिल्ली पहुँचने के बाद हुए हिंसा और अंग्रेज़ों द्वारा विद्रोह को कुचलने की कार्यवाई के ज़िक्र में लेखक अवाम की मुश्किलातों, परेशानियों के लिए विद्रोहियों को ही ज़्यादा ज़िम्मेदार ठहराते हुए भी नज़र आते हैं।
किताब का दूसरा हिस्सा लेखक के दिल्ली से मय ख़ानदान दर बदर हो कर ज़माने की ठोकरें खाने और ज़िन्दगी के जद्दोजहद की कहानी है। इस दौरान भी लेखक जिन राजो, रजवाड़ों, नबाबों के नज़दीक गए, उनके रियासतों में गए, वहाँ के अवाम पर विद्रोह के असरात, अंग्रेज़ी हुकूमत पर अवाम या रियासतों के रवैये में बदलाव, राजनैतिक हालात में बदलाव के लिए किसी प्रकार के जज़्बे पर कोई चर्चा नहीं है।
तरजुमा बहुत सुगम और अच्छा है। भाषा में बहाव है। लेकिन  जहीर देहलवी के शेरों का तरजुमा और अच्छी हो सकती थी। जो भी हो किताब पढ़ना एक बार शुरू करने के बाद बिना पूरा किए बग़ैर छोड़ने को जी नहीं चाहता है।
कुल मिला कर दास्तान-ए-ग़दर पढ़ने में अच्छी लगी।

 

लेखक पटना उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं|

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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