दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (74)

 

  • पवन कुमार सिंह

 

बाबूजी का आदेश था कि धनकुण्ड (सन्हौला) कामत की बची हुई जमीन बेचकर छोटी बहन अंजू का विवाह कर देना। उन्होंने लड़का पसंद कर रखा था और शादी के लिए खर्च का बजट भी पास कर दिया था। सो रिश्ता तय हो जाने के बाद कामत की शेष बची लगभग सोलह बीघे जमीन बेचने का काम जल्द निबटाना था।
धनकुण्ड शिवमंदिर के पूरब परबाबा के जमाने का कामत सोनाइचक मौजे में स्थित था। शायद हजार रुपए में कोई चकला खरीदा गया होगा, इस कारण बोलचाल में उसे हजरटक्की कामत कहते थे। सोनाइचक, चमरगामा, बेलगूंजरी, मकैता, सिंहपुर, बबुरा आदि राजस्व मौजों को मिलाकर बाघमारा वाले बाबा व बसुहार वाले बाबा का तीन-तीन सौ बीघे का और रायबहादुर बाबा का बारह सौ बीघे का कामत था वहाँ। उस जमाने में कुर्सेला में धान की खेती नहीं होती थी। चावल खाने के लिए पूर्वजों ने धनकुण्ड में वे खेत खरीदे थे। हमारे बाबा ने मेरे होश संभालने के समय लगभग दो दशक तक सोनाइचक कामत में प्रवास करके बहुत व्यवस्थित ढंग से धान की खेती की थी। भीत का दोतल्ला घर,छोटी दखिनाहा नस्ल की दर्जनों गायें, धनरोपनी के लिए मुफीद कई जोड़े बैल, हलवाहे, चरवाहे, सिपाही और रसोइया से सम्पन्न था हमारा वह कामत। गायें पाव भर या आधा सेर दूध ही देतीं, मिसरी जैसा मीठा और पौष्टिक दूध। कामत पर एक छोटा पोखर, एक पक्का कुआँ, आम, कटहल, बेल, जामुन, कहू आदि के पेड़ थे। धनकुण्ड महादेव की पूजा करने आने वाले श्रद्धालु कुएँ से पानी लेकर पेड़ों की छाया में सत्तू सानकर खाते और विश्राम करते तो बाबा बहुत आनंदित होते थे।
बाबा के जमाने में कामत की पूरी उपज का चावल बनवाकर बैलगाड़ी से घोघा गंगा घाट लाया जाता। फिर छपरबन्द नाव से कोसी नदी के कोशकीपुर घाट लाया जाता था। वहाँ से अपनी बैलगाड़ियों द्वारा ढोकर दरवाजे पर बोरियों की अलग-अलग छल्लियां लगायी जाती थीं। तुलसीमंजर, कतरनी, बासमती, बंगलुआ, जीरासार, दतखानी, कुम्हरसार आदि चावलों के नाम उसी समय जानने का अवसर मिला था। चावल भरी जूट की बोरियों पर किस्मों के नाम के नीचे ‘बाघमारा’ लिखा जाता था लाल रंग से। यह हमारे परिवार का प्रतीक चिन्ह था। अलग-अलग बोरियों की छल्लियों के बीच की गलियों में हम सब भाई-बहन चोरिया-नुकिया खेलते थे। तिरपाल से ढँके चावल हफ्तों दरवाजे पर पड़े रहते। नौकर-चाकरों, जन-मजदूरों, पौनी-पसारियों, पंडित-नाई, बढ़ई-लोहार आदि के हिस्से निकालने के बाद बचे चावल को ठेंक (बखार) में रखा जाता था। उसे एक मौसमचक्र के बाद ही खाने में इस्तेमाल किया जाता था। बाबा ने 1975 तक धनकुण्ड में प्रवास किया था। तबतक हमारे घर में नया चावल खाने का चलन नहीं था। बाबूजी ने बाबा को सक्रिय जीवन से अवकाश देकर उन्हें मूर्ति की तरह घर पर स्थापित कर दिया था और उनकी सुविधा का इंतजाम व उनकी देखभाल करके पितृभक्ति का ऐसा पैमाना तय कर दिया था, जिसका कोई अन्य उदाहरण मुझे आजतक नहीं मिल सका है।

खैर, बाबा के बाघमारा में स्थापित हो जाने के बाद धनकुण्ड कामत की खेती मनेजर-सिपाही के माध्यम से चलती रही। अगहनी की मुख्य फसल की तैयारी के लिए बाबूजी लगभग एक माह वहाँ प्रवास करते थे। अपने अध्ययनकाल में कतकी फसल तैयार कराने मैं भागलपुर से धनकुण्ड जाता था। साथ में किसी मित्र को लाता था और एक हफ्ते के मजेदार पिकनिक का मजा लेता था। सीलिंग एक्ट में जमीन छिन जाने के भय से और बहनों की शादी के खर्चे में गाँव से लेकर धनकुण्ड कामत तक की जमीनों को बाबूजी ने बड़ी बेरहमी से बेचना शुरू कर दिया था। बाबूजी के जीवन के उत्तरार्द्ध में जमीन बेचना उनका प्रमुख काम रह गया था। धनकुण्ड में अपने हिस्से की डेढ़ सौ बीघा जमीन में से केवल सोलह बीघा अंजू की शादी के निमित्त छोड़कर बाबूजी स्वर्ग सिधारे थे। वही हमें बेचनी थी। जमीन जोतने वाले सभी बटाईदार बाबूजी की अस्वस्थता के बाद से एनटीपीसी स्थित मेरे क्वार्टर आकर कई बार जमीन खरीदने का प्रस्ताव दे गये थे। सो उस समय के बाजार भाव से जमीन का बिक जाना मुझे बहुत आसान लग रहा था। पूरी आश्वस्ति के साथ मैंने भैया को बुला लिया और अपने स्कूटर पर उन्हें साथ लेकर धनकुण्ड पहुँच गया। चौराहे की एक परिचित चाय दुकान से बटाईदारों को खबर भिजवाई कि वे सभी कामत पर आ जाएँ, हम दोनों सड़क से लगभग पाँच सौ मीटर दूर स्थित कामत चले गये। लगभग उजाड़ हो चुके बासा पर बाबा के कुएँ के चबूतरे के अलावा बैठने को कुछ और नहीं था। उसी पर बैठकर कामत के गौरवपूर्ण अतीत की चर्चा करते और दुर्दशाग्रस्त वर्तमान पर दुख प्रकट करते हुए हम दोनों भाई दो-तीन घंटे इंतजार करते रहे थे। अप्रत्याशित रूप से कई ख़रीदारों में से केवल एक उपस्थित हुआ, वह भी खोजकर बुलवाने के बाद। उसने भी बाजार भाव से लगभग आधी दर के प्रस्ताव के साथ जमीन लेने की स्वीकृति दी थी। हमने कुछ पहचान के लोगों से बात करके मालूम किया कि मामला क्या है! मालूम हुआ कि तीन पीढ़ियों से हमारे परिवार से जुड़े और पूर्वजों के विश्वासपात्र रहे लोगों ने हमारी मजबूरी का फायदा उठाने का षड्यंत्र रच दिया था। बहन की शादी तय हो गयी है, इस दबाव में बाबूसाहब कौड़ियों के भाव जमीन बेचकर जाएँगे, ऐसा उन दुष्ट और कृतघ्न लोगों ने ठान लिया था। रहस्य खुल जाने पर मैंने भैया से कहा कि अब यहाँ एक पल भी और रुकना अपनी इज्जत मिट्टी में मिलाने के समान होगा। भैया का विचार भी यही था। अंततः हम वहाँ पर एक संदेश छोड़कर वापस लौट आये थे कि बहन की शादी के पहले कोई भूलकर भी मेरे पास जमीन की बात करने नहीं आये , वरना मैं उसे जूते मारूंगा दस और गिनूंगा एक। शादी करने के बाद अपनी शर्तों और कीमत पर जमीन बेचूंगा। लौटते हुए टिपटिप बारिश के बीच रास्ते में भैया ने पूछा था, “दंगल अब क्या होगा? पैसा कहाँ से आयेगा?”
मैंने कहा, “मैं दूँगा भैया!”

“हुँह, तुम कहाँ से दोगे? तुम्हारा वेतन ही कितना है जो कुछ बचता होगा!”
“भैया मेरे पास पैसे नहीं हैं पर लोग बहुत हैं। आप केवल घर के काम से मुझे मुक्त रखिये। जैसे-जैसे पैसे की जरूरत हो, आदमी भेजिये। मैं ड्राफ्ट बनवाकर भेजता जाऊँगा। मैं एक-एक हजार रुपए एक व्यक्ति से लूँगा। कोई वापसी के लिए तकादा नहीं करेगा। बाद में जमीन बेचकर सबको लौटा देंगे।”
लौटते हुए हम त्रिमुहान में दीदी के यहाँ रुके थे। पाहुन सहित सभी लोगों ने सहानुभूति प्रकट करते हुए चिंता नहीं करने की सलाह दी। मोहन बाबू ने बिना मांगे साठ हजार रुपए का चेक देते हुए कहा था, “इस पैसे का अभी कोई काम नहीं है। कुछ और रिजर्व रखता हूँ। जरूरी हो तो मांग लीजिएगा।”
अगले दिन भैया को एक लाख का ड्राफ्ट देकर विदा किया था। लगभग एक दर्जन हितैषियों ने सहयोग करके अंजू की शादी करवा दी थी। शादी तक धनकुण्ड के सारे ग्राहक दुबकी लगाये रहे थे। बाद में दीप्तिनगर के डेरे पर एक साथ तीन लोग आये तो उन्हें देखते ही दंगल सिंह का नैसर्गिक हिंस्र रूप प्रकट हो गया था और सचमुच जूते खोलकर मारने दौड़ गया था। महीनों बाद मानमनौव्वल करके लोग मेरा सामना कर सके थे। अपनी कीमत और शर्तों पर जमीन बेची गयी थी। बाबा के बसाए कामत की डीह, पोखर, कुआँ और पेड़ के साथ ग्यारह कट्ठा रकबा बाबा की याद में सार्वजनिक हित में छोड़ दिया गया है, जिसका उपयोग गाँववाले और धनकुण्डनाथ के भक्तगण करते हैं। जब कभी उधर से गुजरने का मौका मिल जाता है, थोड़ा रुककर सड़क से ही बासा को निहारता और बाबा को याद करता हूँ। हाल में गौर किया कि लगभग सभी पेड़ गायब हैं और एक पीपल बड़ा हो गया है। इच्छा है कि कभी सोद्देश्य जाकर बाबा की याद में छोड़ी जमीन की खोज-खबर लूँ।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
.
Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *