दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (73)

 

  • पवन कुमार सिंह

 

किसी लड़की के लिए बरतुहारी करते समय लगभग सभी लोगों को अपनी जाति से नफरत हो जाती है। हमारे समाज की परम्परावादी जकड़न इस बात के लिए मजबूर करती है कि लड़की के विवाह का प्रस्ताव लेकर हम अन्य जाति के परिवार में नहीं जा सकते। भले ही अंतरजातीय प्रेमविवाह के मामलों में समाज थोड़ा उदारवादी हो गया है। फिर भी ऐसे प्रेमविवाहों को समाज के कड़े प्रतिरोध का सामना करना होता है। कुछ गिने चुने अपवादों को छोड़ दें तो अंतरजातीय रिश्तों के प्रस्ताव का चलन हमारे यहाँ शुरू नहीं हो सका है। और स्वजातीय लोगों के यहाँ रिश्ता लेकर जाने वाले लड़की वालों के साथ लड़के वाले आमतौर पर जो सलूक करते हैं कि “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” नारे की हवा निकल जाती है। इस प्रसंग में एक और तथ्य उल्लेखनीय है कि जबसे दहेज विरोधी कानून में सख्ती आयी है, तबसे दहेजप्रथा अधिक पेंचीदी और मारक हो गयी है। पहले पूरे समाज के संज्ञान में पारदर्शी और प्रत्यक्ष रूप से दहेज की शर्तें तय होती थीं। वर पक्ष की अतार्किक औऱ अनुचित माँगों में समाज कारगर हस्तक्षेप करता था और रिश्ते तय होने में समाज की गारंटी होती थी। सामाजिक सहभागिता के कारण खानदान और कन्याओं की ख्याति के आधार पर अधिकांश रिश्ते बिना दहेज के तय हो जाते थे। अब सबकुछ बहुत गोपनीय तरीके से होता है। यदि लड़के वाला लड़की वालों को जबह भी कर रहा हो तो वे चीख भी नहीं सकते। समाज की गवाही और गारंटी बिल्कुल नहीं रही। यहाँ प्रकारान्तर से जातिप्रथा का क्रूरतम चेहरा प्रकट होता है और स्वजातीय लोगों से घृणा उपजती है।


बाबूजी के स्वर्गवास के बाद अपनी सबसे छोटी बहन अंजू की बरतुहारी में सम्पूर्ण बिहार की खाक छानने के दरम्यान मुझे कई पीड़ादायक अनुभवों से दो चार होना पड़ा था। जातिबन्धन और दहेजप्रथा के काले चेहरे का साक्षात्कार करने का वह दौर जब भी याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हालांकि बाबूजी ने एक गोतिया के लिए बरतुहारी के क्रम में एक लड़का अंजू के लिए पसंद कर रखा था। तब लड़के की उम्र कम थी और अंजू भी शादी की उम्र से छोटी थी। मृत्यु से कई माह पहले बाबूजी ने हमें कह दिया था कि अंजू का विवाह उसी लड़के से कर देना। उन्होंने खर्च के लिए हजरटक्की (धनकुण्ड, सन्हौला) कामत की बची हुई जमीन बेचने का आदेश भी दे रखा था। कटिहार में 1973 ईसवी में सुलेखा दीदी की शादी हुई थी, जब मैंने मैट्रिक पास की थी। सुलेखा दीदी ने कटिहार के राजपूत समाज में आदर्श बहू के रूप में सिक्का जमा लिया था। उनकी ख्याति के कारण हमारी अन्य तीन बहनें शैलन दीदी, रेखा और मीना सहित गोतियारी की आधी दर्जन लड़कियों का विवाह कटिहार हो चुका था। बाबूजी द्वारा अंजू के लिए पसंद किया गया लड़का सुलेखा दीदी के परिवार की गोतियारी में था। लड़के की नौकरी तटरक्षक बल में लगी थी और पिता जी सेना के रिटायर सूबेदार थे। बाबूजी के आदेश के बावजूद हम सीधे उनके पास प्रस्ताव लेकर जाने में असमर्थ थे, क्योंकि सुलेखा दीदी के ससुर जी की सहमति आवश्यक थी। भैया उन्हीं के सौजन्य से जूट मिल में नौकरी करते हुए वहीं रह भी रहे थे। बरतुहारी में भैया कहीं नहीं निकलते थे। मुझे त्रिमुहान वाले पाहुन के साथ रने-बने भटकना पड़ता था। भैया शनिवार की शाम घर आते और सोमवार की सुबह कटिहार लौट जाते थे। बार-बार की असफलता से थक-हार कर मैं भैया से बाबूजी की पसंद वाले लड़के के यहाँ जाने की चर्चा करता तो वे यह कहकर मना कर देते कि बुढ़उ की रजामंदी नहीं है। भैया अपने अंतर्मुखी स्वभाव और अतिरिक्त लिहाज के कारण बुढ़उ से तर्क-वितर्क नहीं कर पाते थे। उकता कर एक दिन मैं बड़का पाहुन को साथ लेकर उनके पास पहुँच गया और बाबूजी के आदेश का हवाला देकर सूबेदार साहब के यहाँ चलने का आग्रह किया। उन्होंने साफ मना करते हुए कहा, ” तुम लोग नहीं सकोगे। बाबूजी का इलाज कराने में और उनका श्राद्ध करने में परिवार पूरा टूट गया है पूंजी से। सूबेदार साहब बहुत दहेज माँगेंगे। वहाँ जाना बेकार है।” उनकी सहमति और सहयोग के बिना आगे बढ़ना असम्भव था। सो एक बार फिर दौड़धूप व संघर्ष का सिलसिला चल पड़ा। फिर कई बार असफल होने पर उकता गया और भैया से बोला कि हमें सूबेदार साहब के यहाँ चलना चाहिए। दीदी के ससुर जी केवल वहाँ जाने से रोकते हैं, कोई विकल्प क्यों नहीं बताते हैं? मेरी जिद और इस तर्क पर भैया निरुत्तर हो गये थे। अगले सप्ताह एक दिन हम दोनों भाई दीदी के ससुर जी को बिना बताये सूबेदार साहब के घर पहुँच गये। उनका घर सुलेखा दीदी के घर की पीछे वाली गली में लगभग दो सौ मीटर दूर था।

सूबेदार साहब अपने बरामदे में अकेले बैठे कुछ पढ़ रहे थे। हमपर नजर पड़ते ही उन्होंने जो कहा था वह मुझे अक्षरशः याद है। “आव$ आव$ बबुआ लोगिन। बहुत दिन से इंतजार कर रहल बानी। मुदा देर हो गईल।”
“का देर हो गईल बाबूजी? केहू के वचन दे देहनी का?” मैंने चरणस्पर्श करते हुए पूछा था। उन्होंने बहुत अफसोसजनक लहजे में उत्तर दिया, “हाँ बबुआ, हमर दामाद जी के अगुअई में सहरसा के एक लड़की वाले के ज़बान दे देले बानी। अगिला बीफे के छेका के डेट बाटे। अब का कहिं, एक्को हफ्ता पहिले आइल रहित$ तूँ लोगिन!” हम दोनों भाई जैसे आसमान से जमीन पर गिर पड़े। बकर-बकर एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे थे। कुछ बोल नहीं पा रहे थे। हमारी दशा पर तरस खाते हुए सूबेदार साहब ने हमें चाय पीकर जाने को कहा। हम बैठ गये थे तो कुछ बात करनी ही थी। बाबूजी की इच्छा और आदेश के सहारे मन के किसी कोने में आशा की लौ टिमटिमा रही थी। मैंने एक बार फिर से बात का एक सिरा तानते हुए कहा था, “जी, अगर गुरुवार को लड़की वाले किसी कारण से छेका देने नहीं आ सकें तो हमें मौका मिलेगा क्या?”
“अरे बबुआ तूँ त हमार मने के बात बोल देल$। जदि बीफे के सांझ ले ऊ लोग ना अइहें त शेखर तोहार बा।”
हम वहाँ से विदा होकर दीदी के पास आये। दीदी और पाहुन को सारी बातें बताईं। पता नहीं क्यों उस दिन बाबूजी की हम तीनों संतानों की आशा बलवती हो गयी थी कि यह रिश्ता बन जायेगा। जानबूझकर हमने दीदी के ससुर जी से यह बात छिपा ली थी। उस संघर्षकाल में स्कूल प्रबंधन ने मेरा बहुत साथ दिया था। मुझे अतिरिक्त छुट्टियों की छूट मिली हुई थी।
अगले गुरुवार को मैं कटिहार पहुँच गया। भैया तो वहाँ रहते ही थे। सुबह से ही भांजे-भांजियों को सूबेदार साहब के घर की खबर ले रहे थे और विधाता से प्रार्थना कर रहे थे कि किसी कारण से छेका देने वाले लोग न आ सकें। शायद हमारी याचना स्वीकार हो गयी। सहरसा वाले लोग नहीं आये। शाम के पाँच बजे भांजे पप्पू को भेजकर सूबेदार साहब से पुछवाया गया कि क्या अब हमें वहाँ पहुँचना चाहिए? वहाँ से हरी झंडी मिलने पर हमने दीदी के ससुर जी को बताया कि हमें सूबेदार साहब के यहाँ जाना है, क्योंकि छेका देने वाले नहीं आये हैं। उन्होंने थोड़ी नाराजगी जाहिर की कि उनको बिना बताये हम वहाँ तक कैसे और कब पहुँच गये! बड़े बेमन और भारी कदमों से वे हमारे साथ चले आये थे। कुछ और गण्यमान्य लोगों को भी सूबेदार साहब ने बुलवा लिया था। वहाँ पहुँचते ही पाहुन के पिता जी ने उनसे पूछा, “का हो राम जनम, सहरसा वाला रिश्ता टूट गईल का?”
“हाँ भैया, आज छेका के दिन तय रहल ह। ऊ लोग ना चहुँपले त ई लोगिन के बुला लेहलीं। आव$ बईठ के तय करवा द$ बियाह।”
लोग बैठे। चाय-पानी चलने लगा। इसी बीच सूबेदार साहब ने इशारे से मुझे अलग बुलाकर धीरे से कान में कहा, “बबुआ जे-जे माँगब से गछ लीह$, आ जे चली बनी से दे दीह$।” बस इतना कहकर वे समूह में आकर बैठ गये। फिर दहेज की बातचीत की अगुवाई की पाहुन के पिताजी ने। उन्होंने कहा, “राम जनम, सहरसा वाले लोगों से जो लेन-देन की बात तय हुई थी सो बताइये। क्या दमन सिंह और दंगल सिंह उतने पर तैयार हैं? इनसे पूछ लीजिए।”

“हाँ भइया।” कहकर सूबेदार साहब ने पहले से तय लेनदेन की पूरी फेहरिस्त सस्वर सार्वजनिक कर दी। फिर पूछा, “बबुआ आपलोग तैयार हैं?” भैया मेरे पास ही बैठे थे। अपने स्वभाव के अनुरूप वे मौन रहे। मैंने बिना किसी मीनमेख के हामी भर दी। इधर मैंने देखा कि भैया के माथे पर इतना पसीना आ गया कि कनपटी से टपक पड़ा। उस बैठकी के दरम्यान पूरे समय भैया तनावग्रस्त रहे थे। वहाँ से उठकर चलते हुए उन्होंने नाराजगी भरे स्वर में पूछा था, “इतना पैसा कहाँ से लाओगे?” तब मैंने सूबेदार साहब द्वारा मेरे कान में कही बात बतायी और वे आश्वस्त हुए थे।
तिलक के पहले एक दिन सूबेदार साहब ने मुझे बुलाकर कह दिया कि फल और मिठाई के अलावा हमें कुछ नहीं लाना है। उपहार के सारे सामान वे ख़रीदकर हमारी ओर से भेजा बोलकर मंगवा लेंगे। इस तरह शानदार तिलक सम्पन्न हुआ। फिर विवाह में हमने बारात की अच्छी खातिरदारी और विदाई की। विदाई के समय मैंने सूबेदार साहब के पाँव छूकर कहा, ” बाबूजी, यदि कुछ कमी रह गयी हो तो माफ कर दें और बता भी दें ताकि यदि सम्भव हो तो भूल सुधार सकूँ।” उन्होंने दोनों बाँहों में भींचते हुए भींगे स्वर में कहा था, “ना बबुआ, जितना सोचे थे, उससे बहुत ज्यादा कर दिये तुमलोग। बाबूजी की बीमारी और श्राद्ध बोझ से उबर भी नहीं पाये थे फिर से इतना बड़ा काम कर लिये। तुमको कोई दिक्कत हो तो बताओ। हम तुम्हारे पिता के बतौर खड़े हैं।”
अपने परिवार और हितैषियों की लड़कियों की बरतुहारी के तकलीफदेह अनुभवों के बीच सूबेदार साहब वाला प्रकरण रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह है।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

One thought on “दास्तान-ए-दंगल सिंह (73)

  1. Dr Gulabchand Patel Reply

    बहुत ही उम्दा कहानी हे हार्दिक बधाई

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