दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (69)

  • पवन कुमार सिंह

 

हमारा बेटा स्नेह सागर शैशवावस्था से ही बड़ा जेहनी था। स्कूल जाने के पहले वह ज्यादातर अपने नाना-नानी के साथ रहा था। नानी जी प्यार से उसे नंदगोपाल बुलाती थीं। कालांतर में नाम संक्षिप्त होकर नंदू हो गया। आज भी परिजन और परिवार से जुड़े लोग उसे इसी नाम से पुकारते हैं। लगभग दो साल की उम्र होने पर उसके नामकरण का विचार आया। किसी बुजुर्ग ने कभी बताया था कि बेटे का नाम माँ के नाम पर और बेटी का नाम पिता के नाम पर रखने से शुभ होता है। सो मैंने उसका नाम रखा था ‘सेतुबंध’। जातिगत उपनाम ‘सिंह’ जोड़ना मुझे पसंद नहीं था। सेतुबंध नाम सुधा को पसंद नहीं आया, तब मैंने उसे बदलकर ‘स्नेह सागर’ कर दिया। मेरा मानना है कि नाम का असर व्यक्तित्व पर अवश्य होता है। मेरी इच्छा थी कि हमारे बेटे का हृदय सागर की तरह विशाल हो, जिसमें स्नेहरस भरा हो।


स्नेह सागर का शारीरिक और मानसिक विकास उत्साहवर्धक था। वह चंचल भी बहुत था। तीन साल चढ़ने तक उसे घर के भीतर संभालना काफी कठिन हो गया था। किंतु मैं चाहता था कि चार साल के पहले उसे स्कूल नहीं भेजूँ। उसे वश में रख पाना अब नानी के बूते में नहीं रह गया था। सुधा ने इस अवस्था में उसे ननिहाल में छोड़ना उचित नहीं माना और हम उसे अपने साथ ले आये थे। जब वह तीन साल चार महीने का हुआ तब संत जोसेफ्स स्कूल में नये सत्र का आरम्भ हो रहा था। मेरी मर्जी के विपरीत सुधा ने उसका नामांकन एलकेजी में करवाने की जिद ठान ली। मजबूरन मुझे उसका एडमिशन कराना पड़ा था। अपनी बुद्धि और शरीर से वह वर्ग में अपनी उम्र से बड़े बच्चों के बराबर दिखता था। सीखने की क्षमता भी किसी से कम नहीं थी। स्कूल का नया भवन हमारे क्वार्टर के एकदम पास था। रोज वह मेरी उंगली पकड़कर स्कूल जाता और साथ ही लौटता था। मध्यांतर में सुधा स्कूल जाकर उसे खाना खिला आती थीं। सबकुछ ठीक चल रहा था। आवास के पास ही बड़ा खेल मैदान था और स्टाफ के बच्चों के लिए स्कूल का मैदान भी उपलब्ध था। क्वार्टर के सामने सड़क पर भी खेलने लायक जगह थी। हमउम्र साथियों के साथ वह शाम में एक-डेढ़ घंटे खेलता-कूदता था।
कुछ दिनों बाद हमने एक बात महसूस की कि नंदू का समाजीकरण संतोषजनक ढंग से नहीं हो रहा है। उसमें अपना-पराया वाली विभेदक प्रवृत्ति विकसित हो रही थी। खिलौने या खाने-पीने की वस्तुओं को अन्य बच्चों के साथ साझा करने से वह बचने लगा था। इस बात को लेकर अपने दोस्तों से प्रायः झगड़ पड़ता था। यह हम दोनों के स्वभाव के और उसके अपने नाम के विपरीत बात थी। हमारा बच्चा इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है! कभी मैं मज़ाक में सुधा से पूछता कि “यह हमारा ही बच्चा है न जी?” सुधा मुस्कुरा देती थीं, किन्तु चिंतित भी हो जातीं। नंदू की वर्ग शिक्षिका काफी अनुभवी नन सिस्टर क्लेयर थीं। उनसे मिलकर हमने सलाह माँगी तो वे शाम में हमारे आवास आयीं। क्लास और स्कूल के बाहर नंदू के क्रियाकलापों पर उन्होंने हमसे विस्तृत चर्चा की तब उपचार बताते हुए बोलीं, “पवन सर, यू मस्ट थिंक फॉर अनदर चाइल्ड। स्नेह को अपना कोई भाई-बहन मिलने से वह प्यार और चीजें बाँटना सीखेगा। यह बहुत जरूरी है। वैसे आप दोनों की मर्जी।” यह सलाह हमारे लिए एक गुरुमंत्र की तरह थी। उस समय बेटे की उम्र चार साल की थी। सिस्टर क्लेयर उस सलाह के बाद हमारे मन में दूसरी संतान की इच्छा जाग्रत हुई थी। मेरी प्रबल कामना थी कि दूसरी औलाद बेटी हो। बेटी के बिना परिवार पूरा नहीं हो सकता। बेटी मिलने के बाद ही माँ-बाप को जिम्मेदारी का पूरा अहसास हो पाता है। इसी अर्थ में पुत्री को लक्ष्मी कहा जाता है। उस प्रकरण के साथ ही हमारी बिटिया के जन्म की पृष्ठभूमि तैयार हुई थी।
इसके बाद हम जब भी किसी बुजुर्ग से मिलते तो चरणस्पर्श करके उनसे बेटी के लिए आशीर्वाद माँगते। जब भी किसी देवी-देवता के दर्शन करने जाते तो उनसे बेटी का वरदान माँगते थे। शुभेच्छुओं की दुआ और हमारी प्रार्थना का सुफल शीघ्र ही मिल गया। सुधा की कोख फिर से हरी हुई और घर-परिवार में खुशियों की लहर-सी उठने लगी। पता नहीं कैसे और क्यों मेरे मन में यह बात बैठ गयी थी कि हमारे घर एक बिटिया आने वाली है। सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था। समय-समय पर भागलपुर की डॉ0 एस रॉय मित्रा से जाँच और उपचार हो रहा था।

सातवाँ महीना पूरा हुआ ही था कि एक बड़ा हादसा हो गया। मेरे पीएचडी के गाइड प्रोफेसर तिवारी की पुत्री की शादी में मैं पटना गया हुआ था। सुधा अपने मायके में थीं। उसी रात ससुर जी के घर में डाका पड़ गया। डाकुओं को देखकर पौने पाँच साल का हमारा बेटा नंदू शोर मचाने लगा। उसे चुप कराने के लिए एक डकैत ने उसकी कनपटी में पिस्तौल सटा दी। यह दृश्य देखकर सुधा को गहरा सदमा लगा। डाकू तो धन लूटकर चले गये, पर सुधा की तबीयत खराब हो गयी। चिकित्सा का कोई असर नहीं हुआ और दूसरे दिन आपातकालीन स्थिति में कहलगाँव की माया दीदी के नर्सिंग होम में अपरिपक्व भ्रूण के रूप में बेटी का जन्म हो गया। बेटी के रूप में विधाता ने हमारी मुँहमाँगी मुराद पूरी की, किन्तु उसकी हालत देखकर हम बहुत निराश थे। उसके बचने की उम्मीद की कोई किरण नहीं नजर आ रही थी। उस दिन मैंने गिड़गिड़ाते हुए सुधा से कहा था, “सुधा, कैसे भी करके हमारी बेटी को बचा लो।” बिटिया का वजन एक किलोग्राम से भी कम था और आकार हथेली के बराबर। सिर पिलपिला और हाथ-पाँव लुचपुच। उस जमाने में इन्क्यूबेटर का चलन भागलपुर तक में नहीं था। काठ के खुले बॉक्स में रुई को सरसों तेल में भिंगोकर उसके ऊपर नवजात बच्ची को इस तरह लिटाया जाता कि दोनों बगल से भी रुई का कुशन बना रहे। उसकी माँ के दूध नहीं उतरा था, जिसके लिए विशेष चिकित्सा की जा रही थी। घरेलू नुस्खे से लेकर एलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेद सहित झाड़-फूँक तक सबकुछ किया जा रहा था। दूध की बोतल के निप्पल से दूध पीना बच्ची के लिए सम्भव नहीं था। निप्पल उसके मुँह में घुस नहीं पाता था। रुई की बत्ती बनाकर उसे बून्द-बून्द गाय का दूध पिलाया जाता था। छट्ठी संस्कार के पहले एक नया संकट पैदा हो गया। बिटिया की नाभि में संक्रमण हो गया था। उसके मामा जी ने यह कहकर छट्ठी पूजा का विरोध किया कि लोग बच्ची के लिए कपड़े, खिलौने आदि लेकर आएँगे, बच्ची मर जायेगी तो सुधा उन उपहारों को देख-देखकर रोया करेगी। पर मेरा विचार था कि दस लोग असीसेंगे तो मेरी बेटी की मौत टल जायेगी। काफी उधेड़बुन के बाद अंततः छट्ठी संस्कार किया गया। हितैषियों ने दही-हल्दी का टीका लगाकर उसे आशीर्वाद दिया। सचमुच दुआएँ असरकारी रहीं। उसके बाद से निरंतर उसके स्वास्थ्य में सुधार होता गया था। पर अगले एक महीने तक उसे अपने हाथों में उठाने से मैं डरता रहा था। डर था कि कहीं मेरे कारण उसका कोई अंगभंग न हो जाए! उसे सुधा, नानी और मामी के अलावा पहली बार अपनी हथेली पर उठाया था मेरे प्रिय मित्र अरुणजय जी ने। तब मैं भी उसे उठाने का साहस कर पाया था। जन्म के दो महीने बाद बिटिया का आकार और वजन उतना हुआ था जितना एक स्वस्थ बच्चे का जन्म के समय होता है। इसके पहले मुझे इस बात का भी डर सताता था कि कहीं उसके अंग टेढ़े-मेढ़े न हो जाएँ! पर ईश्वर की दया से ऐसा कुछ नहीं हुआ। तीन-चार महीने बाद वह बिल्कुल तंदुरुस्त हो गयी थी। उस समय तक सुधा के दूध उतर आया था और अपने हमउम्र ममेरे भाई के हिस्से से बचा मामी का दूध भी उसे मिलने लगा था। समुचित देखभाल और पर्याप्त पोषण मिलने से बिटिया गोलमटोल हो गयी थी। उस साल एनटीपीसी की महिला समिति और चिकित्सा विभाग द्वारा आयोजित ‘वेल बेबी शो’ के ज़ीरो ईयर एज ग्रुप में उसे प्रथम चुना गया था। महिला समिति की तत्कालीन अध्यक्षा अरुणा नागमोती ने उसे प्यार और आशीष सहित उसे पुरस्कृत किया था।

इसी दरम्यान बिटिया के साथ एक और बड़ा हादसा हो गया था, जिसमें वह मरकर बची थी। सुधा उसे अपने पाँवों पर लिटाकर तेल मालिश कर रही थीं। वह अपनी कलाइयों में काले धागों से बँधे चाँदी के छोटे घुंघरुओं को होठों के बीच लेकर आनंदित हो रही थी। दुर्भाग्य से धागा टूट गया और एक घुंघरू जाकर उसके कंठ में अटक गया। उसकी साँस बन्द होने से वह छटपटाई तब सुधा का ध्यान गया। वह बेटी को लेकर चीखती-चिल्लाती अस्पताल की ओर दौड़ पड़ी। अस्पताल लगभग दो मीटर दूर था। किसी ने आकर हमें स्कूल में खबर दी। मैं दो-एक सहकर्मी को बोलते हुए अस्पताल की ओर दौड़ा। मेरे पीछे प्राचार्य सहित लगभग सभी लोग भागे। उस दिन साप्ताहिक भ्रमण पर भागलपुर के शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ0 ए के जायसवाल आये हुए थे। इमरजेंसी के लोगों ने बच्ची को उनके पास पहुँचाया। तबतक बच्ची का शरीर नीला पड़ने लगा था। डॉक्टर ने उसे उल्टा लटकाकर छाती और पीठ पर जोर-जोर से थपकी लगायी। मुँह में फूँक मारकर और छाती पर पम्प मारकर साँस चलाने की कोशिश की। अंततः कोशिश कामयाब रही। साँस पलट आयी और उसे नया जीवन मिल गया। एक्सरे से पता चला कि घुंघरू पेट में है। तीन-चार दिनों बाद मल के साथ घुंघरू बाहर आ गया तब हमारी जान में जान आयी थी। वह एक्सरे प्लेट अब भी हमारे पास रखा है। हमारी लाड़ो स्वस्थ और सानन्द अपनी गृहस्थी बसाकर जी रही है। अपनी समझदारी से वह हमारे परिवार की गार्जियन बनी हमें जरूरी सुझाव देती रहती है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में मास्टर डिग्री की गोल्डमेडेलिस्ट हमारी बिटिया को हम प्यार से निक्की बुलाते हैं। उसका नामकरण मेरे नाम पर ‘प्रीति सागर’ रखा गया जो बिल्कुल सार्थक है।

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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