दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (67)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

एक बार जो एनटीपीसी के अधिकारियों की अंदरूनी राजनीति के कारण स्कूल के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हुआ तो मामला ठंडा होने के बाद भी उस प्रकरण का असर बना रह गया था। एक तो कैथोलिक सोसायटी के लोगों के मन में भविष्य की आशंकाओं ने जड़ जमा ली थीं, दूसरे कॉलोनी के बाहर भी एक बड़े स्कूल के सफल होने की संभावना नजर आने लगी थी। एनटीपीसी से बाहर के अभिभावकों की तरफ से बच्चों के एडमिशन के लिए दबाव भी निरन्तर बढ़ रहा था। रोज-रोज झुंड के झुंड लोग स्कूल आकर प्राचार्य की खुशामद करते कि यदि इस स्कूल में उनके बच्चों का एडमिशन नहीं ले सकते तो नया स्कूल ही खोलें। दीप्तिनगर वाले स्कूल को एनटीपीसी प्रबंधन के मुताबिक सीबीएसई से सम्बन्धन लेना था, जबकि ईसाई मिशनरियों के प्रायः सभी स्कूल आईसीएसई बोर्ड से सम्बद्ध होते हैं। बाहर स्कूल खोलने के प्रयास के पीछे यह भी एक बड़ा कारण था। तो एक अवांछनीय अप्रिय प्रसंग ने कहलगाँव में एक और संत जोसेफ्स स्कूल के विचार का बीजारोपण कर दिया था।
कुछ दिनों के अंतराल पर फादर जोसेफ ने नये स्कूल की चर्चा फिर से शुरू कर दी थी। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा, “पवन सर, अब बिल्डिंग नहीं, लैंड खोजना है। किसी सड़क के किनारे कम-से-कम पाँच एकड़ लैंड खोजिए।” यह स्वागत योग्य एक रचनात्मक कार्य था, सो मैं कहलगाँव के निकटवर्ती क्षेत्र की विभिन्न सड़कों से लगी जमीन खोजने में जी जान से लग गया। इसके लिए जरूरी होने पर मुझे वर्गाध्यापन से छुट्टी भी मिल जाती थी। तबतक मैंने अपना स्कूटर खरीद लिया था। उस स्कूटर की खरीदगी की भी दिलचस्प कथा है। एक दिन कक्षाएँ शुरू हो जाने के बाद फादर जोसेफ ने मुझे बुलाकर कहा कि आदेशपाल ज्योति प्रकाश को साथ लेकर बाजार जाऊँ और स्टेशनरी खरीद लाऊँ। उन्होंने फिर पूछा कि इस काम में कितना समय लगेगा? मैंने जोड़कर बताया कि रिक्शे से जाने-आने में एक घंटा और खरीदारी में एक से डेढ़ घंटा लग जाएगा। उन्होंने कहा, “आप एक टू व्हीलर क्यों नहीं खरीद लेते हैं?”
मैंने जवाब दिया, “फादर, उसके लिए अतिरिक्त पैसा चाहिए न!”

“मैं दे रहा हूँ अतिरिक्त पैसा। छोटे किस्तों में लौटा दीजिएगा। आज छोड़िये स्टेशनरी। भागलपुर जाकर गाड़ी ले आइये।” उन्होंने अपनी अलमारी से दस हजार रुपये निकालकर मेरे सामने रख दिये। मैं रुपये लेकर डेरा आया और सुधा को खुशखबरी सुनाता हुआ रेलवे स्टेशन चला गया। उस समय टीवी पर नर्मदा स्कूटर का विज्ञापन आता। उसमें ट्रॉली पर सवार हाथी को स्कूटर से खींचते हुए दिखाया जाता था। उस विज्ञापन का मुझपर गहरा असर था। मन में यह बात बैठी थी कि जब भी टू व्हीलर खरीदूंगा तो नर्मदा ही लूँगा। सो भागलपुर जाकर नर्मदा के शोरूम से हरे रंग की नर्मदा ले आया। पहले फादर को और फिर सुधा को दिखाया। हमारे दाम्पत्य जीवन में यह पहली बड़ी खरीदगी थी। स्कूटर आ जाने के बाद मेरी गतिविधियों में तेजी बढ़ गयी थी। इससे नये स्कूल के लिए जमीन ढूँढने के काम में काफी मदद मिली। लगभग प्रतिदिन स्कूल के किसी अभिभावक, रिश्तेदार या परिचित से किसी जमीन का पता-ठिकाना मालूम करता। फिर खुद जाकर मुआयना कर लेता और पसंद आ जाने पर फादर को साथ ले जाकर दिखाता। कहीं लोकेशन नहीं जँचता तो कहीं कीमत नहीं पटती थी। उस समय एनटीपीसी प्रोजेक्ट आ जाने से कहलगाँव शहर के आसपास जमीन की कीमतों में अचानक उछाल आ गया था। प्लॉटिंग करके ऊँची कीमत पर प्लॉट बेचने का चलन शुरू हो गया था। प्लांट के लिए अधिसूचित जमीनों के अधिग्रहण का काम पूरा नहीं हुआ था। इसी क्रम में कुछ सरकारी अधिकारियों, नेताओं और स्वार्थी तत्वों के गठजोड़ से अधिसूचित क्षेत्र में डिसमिल-डिसमिल जमीन के टुकड़ों की खरीद-बिक्री करके नकली भूविस्थापित बनाने का घृणित खेल भी चल रहा था। इन नकली भूविस्थापितों के कारण कालांतर में वास्तविक रूप से प्रभावित लोगों की व्यापक हकमारी की गयी थी। नतीजतन एनटीपीसी से प्रभावित क्षेत्र में नौकरी व पुनर्वास के मामलों में भयंकर पक्षपात हुआ, जिसके कारण प्लांट के आसपास की आबादी में गहरा असंतोष पनपा। बाद के वर्षों में एनटीपीसी प्रबंधन चाहकर भी संतुलन नहीं बना पाया और दो पीढ़ियों के बाद भी वह असंतोष नासूर बनकर रिसता रहता है। आज भी प्रभावित आबादी में रह-रहकर असंतोष का लावा भड़कता है और महारत्न कम्पनी के साथ राष्ट्र को क्षति उठानी पड़ती है।

बहरहाल एक दर्जन से भी अधिक असफल प्रयासों के उपरांत कहलगाँव-भागलपुर रोड के किनारे पकड़तल्ला गाँव में एक जमीन पर बात बन जाने की आशा बलवती होने लगी। उस जगह सड़क के दोनों और एक ही खानदान के लोगों की जमीनें थीं। उसी खानदान के पकड़तल्ला निवासी धीरेंद्र कुमार सिंह उर्फ धीरो बाबू अपनी सड़क किनारे की जमीन स्कूल के लिए बेचने को तैयार हुए। उनका छोटा पुत्र कुमार अभिषेक हमारे स्कूल में पढ़ रहा था। उनसे निर्णायक बातचीत करने जब फादर को लेकर उनके घर गया तो एक नया अप्रत्याशित बखेड़ा खड़ा हो गया। उनके गोतिया बाबा श्रीमोहन प्रसाद सिंह उर्फ मुखिया जी ने साफ शब्दों में धीरो बाबू को जमीन बेचने से मना कर दिया। उनका विरोध ईसाई मिशनरी को जमीन देकर बसाने को लेकर था। वे अड़ गये थे कि ऐसा कभी नहीं होने देंगे। धीरो बाबू उन्हें मनाने की स्थिति में नहीं थे। यह भगीरथ प्रयास मुझे ही करना था। उस दिन हम लोग वापस लौट आये। इस नाजुक मुद्दे पर थोड़ा धैर्य और समय देने की जरूरत थी। दो-तीन दिनों के अंतराल पर मैं स्वयं जाकर मुखिया जी से मिला। जैसे ही बात शुरू की कि वे बिल्कुल हत्थे से उखड़ गये और बोले, “पवन बाबू, आप जात-कुटुंब हैं, पर ईसाई मिशनरी के एजेंट का काम कर रहे हैं। हो सकता है कि आपकी नीयत अच्छी हो, किन्तु बाद में ये लोग क्या करेंगे, शायद आपको अनुमान भी नहीं होगा। स्कूल की आड़ में ये धर्मांतरण का खेल खेलेंगे। तब आप और हम कुछ नहीं कर पाएंगे। हाथ मलते रह जाएंगे। मत करिए यह प्रयास। हमने धीरो को भी समझा दिया है।”

परिवार में उनका ऐसा दबदबा था कि बिना उनको राजी किये काम नहीं बनने वाला था। अतः मैंने उन्हें खुशामदी लहजे में समझाने की कोशिश की, “घर के सामने एक उच्च स्तर का पब्लिक स्कूल चलेगा। इसका सबसे बड़ा फायदा आपके परिवार को मिलेगा। अभी बच्चे या तो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जिनका हाल आपको पता ही है; या तो देहरादून, दिल्ली अथवा दार्जिलिंग भेजकर हजारों रुपये खर्च करना पड़ता है। घर बैठे वह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी तो नयी पीढ़ी सुशिक्षित होगी। एक और फायदा यह होगा कि बड़ा स्कूल खुल जाने से आसपास की जमीनों की कीमत भी बहुत बढ़ जायेगी। आसपास तो केवल आपके परिजनों की ही जमीन है।” पर उनको नहीं मानना था और नहीं माने। उन्होंने कहा कि वे अपने जीतेजी यह कभी नहीं होने देंगे। मिशनरी को बिल्कुल नहीं बसने देंगे। फिर से उन्होंने मुझे चेताया कि मैं यह प्रयास छोड़ दूँ। लेकिन मैंने भी ठान लिया था कि यह अभियान जरूर पूरा करूँगा। मुखिया जी माने तो माने, नहीं तो चुपचाप केबाला करवा दूँगा तब बताऊँगा। जब जमीन के मालिक राजी हैं तो ये अधिक दिनों तक रोक नहीं पाएँगे। मेरे बड़का पाहुन को जब पूरी कथा मालूम हुई तो उन्होंने एक उपाय सुझाया कि इलाके भर के राजपूत समाज से प्रभावशाली लोगों को बुलाऊँ और मुखिया जी पर दबाव डलवाने का प्रयास करूँ। यह नुस्खा कारगर रहा। त्रिमुहान के अनिरुद्ध बाबू ,हरेन्द्र बाबू और मोहन बाबू, कासड़ी के केदार बाबू और जहानाटिकर के रामनारायण बाबू आदि के समझाने-बुझाने के बाद मुखिया जी बेमन-से माने। इस प्रकार अंततः धीरो बाबू की चार एकड़ जमीन भागलपुर कैथोलिक सोसायटी को प्राप्त हो सकी। बिशप अर्बन मेगारी द्वारा पकड़तल्ला संत जोसेफ्स स्कूल का शिलान्यास किया गया। फादर जोसेफ तानी परमपिल को स्कूल बनवाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी, जिन्होंने इसके पहले भी कई मिशनरी स्कूल बनवाये थे। फादर ने मुझे स्कूल बनवाने का प्रस्ताव देते हुए कहा था कि मुझे कुल लागत का 10 प्रतिशत पारिश्रमिक के रूप में मिलेगा। प्रस्ताव काफी लाभप्रद था, किन्तु इसी समय मेरे बाबूजी बहुत बीमार हो गये। नौकरी करते हुए यथासंभव घर पर समय देना जरूरी था, इस कारण मैं वह प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सका। मेरे इनकार करने के चलते स्कूल के निर्माण में विलम्ब भी हुआ था, क्योंकि कैथोलिक सोसायटी के अधिकृत अभिकर्ता डेविड लाल अस्वस्थ थे। वे भागलपुर से कहलगाँव आकर काम करने में असमर्थता जता रहे थे। किंतु मेरे इनकार करने के बाद स्वास्थ्य सुधरने पर उन्होंने काम आरम्भ कर दिया।

लगभग एक साल के निर्माण-कार्य के पश्चात 3 अप्रैल 1989 को संत जोसेफ्स स्कूल पकड़तल्ला का शुभारंभ हो गया। स्कूल के शिलान्यासकर्ता बिशप अर्बन मेगारी गम्भीर रूप से बीमार होने के कारण अवकाश ग्रहण कर चुके थे, इसलिए नये बिशप जॉर्ज सुपाइन ने उद्घाटन किया था। और इस तरह कहलगाँव को एक अच्छा इंग्लिश मीडियम पब्लिक स्कूल मिल गया। मैं व्यक्तिगत तौर पर उसे एनटीपीसी वाले घटनाक्रम का बाइप्रोडक्ट मानता हूँ। विगत तीन दशकों में दोनों स्कूलों ने हजारों अच्छे विद्यार्थियों का महत्वपूर्ण उत्पाद तैयार किया है। हमारे बच्चे देश-विदेश में बड़े-बड़े पदों की शोभा बढ़ा रहे हैं। बाद के वर्षों में दीप्तिनगर में केंद्रीय विद्यालय और डीएवी स्कूल की स्थापना हुई। हाल के दिनों में सम्पूर्ण अनुमंडलीय क्षेत्र के लोगों में बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की होड़ लग गयी है। देहाती इलाकों से बीघा दो बीघा जमीन बेचकर और शहर के पास कट्ठा दो कट्ठा खरीदकर लोग बस रहे हैं। शहर के एक तरफ तो गंगा बहती है। शेष तीनों ओर दर्जनों नये मुहल्ले बस गये हैं। इस कारण रिहायशी जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं। बच्चों की अच्छी तालीम के लिए लालायित लोगों की अप्रत्याशित भीड़ को संभालने में उक्त चारों पब्लिक स्कूलों की क्षमता कम पड़ने लगी तो फिर सरस्वती विद्या मंदिर, हैरिटेज पब्लिक स्कूल, गुरुकृपा एकेडमी, स्वामी विवेकानंद स्कूल, माउण्ट हिलैरिअस स्कूल आदि कई वर्षों से फल-फूल रहे हैं। इधर दस किलोमीटर दूर एक शिष्य ने प्रोपेल इंटरनेशनल स्कूल बनाया, जिसके प्रिंसीपल अपने मित्र डॉ0 विनोद कुमार चौधरी हैं। उन्होंने मेरी जिद पर संत जोसेफ्स स्कूल से अवकाश प्राप्त करने के पहले ही त्यागपत्र देकर यह जिम्मेदारी सम्भाली है। तीन साल में ही यह स्कूल अच्छे स्कूलों से होड़ लेने लगा है। एक और नया सावित्री देवी पब्लिक स्कूल खुला है जिसके प्रिंसीपल अपने मित्र देवेन्द्र नाथ झा हैं। अब तो इस कस्बाई शहर में महानगरों की भाँति किड्स प्ले स्कूल की संस्कृति भी पनपने लगी है।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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