दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (65)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

नये स्कूल में बच्चों को पढ़ाने में मन मगन हो गया था। पुराने स्कूल में केवल दाल में घी डालने का आत्मसुख मिलता था। यहाँ दाल बनाकर उसे घी से बघारने का आनन्द मिलने लगा था। नये स्कूल को तिनका-तिनका जोड़कर सजाने-सँवारने का अवसर मिला था। प्राचार्य फादर जोसेफ तानी परमपिल के नेतृत्व में बन्धन जैसा कुछ महसूस नहीं होता था। रचनात्मक और सकारात्मक विचारों का वे काफी सम्मान करते थे। समय बीतने के साथ शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ रही थी। इसी क्रम में देवेन्द्र नाथ झा ने पीटी टीचर के रूप में योगदान किया। वे हिन्दी से एमए थे अतः उनके आने से मेरे कार्यभार में थोड़ी कमी आयी, जिसका लाभ स्कूल के पाठ्यसहगामी व पाठ्यक्रमेतर क्रियाकलापों को मिलने लगा। झा जी से रिश्ता निरंतर गाढ़ा होता गया और हमारा परिवार से परिवार उम्र भर के लिए जुड़ गया।

हरेक साल एक-एक कक्षा बढ़ने के साथ स्कूल बड़ा हो रहा था। एनटीपीसी में भी कर्मियों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। कई कक्षाओं में सेक्शन बढ़ाने की जरूरत पड़ रही थी। बच्चों पर अतिरिक्त ध्यान देने और उनके विकास व व्यक्तित्व के निर्माण-कार्य में उनके अभिभावकों को सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करने के कारण मैं कॉलोनी और आसपास के क्षेत्र में लोकप्रिय होता जा रहा था। इस संदर्भ में कुछ घटनाएँ स्मृतिपटल पर स्थाई रूप से अंकित हो गयी हैं।
चौथी कक्षा का एक बच्चा था अभिजीत। उसके पिता सीनियर मैनेजर और मम्मी उच्च शिक्षा प्राप्त हाउस वाइफ थीं। कहलगाँव आने से पूर्व वे कहीं स्कूल में पढ़ा चुकी थीं इसलिए अमूमन स्कूल आकर शिकायत या सुझाव देना अपना अधिकार समझती थीं। शिक्षक-अभिभावक सम्मेलन में उन्हें झेलना सभी शिक्षकों को नागवार गुजरता था। अभिजीत बहुत शिष्ट और प्रतिभाशाली छात्र था और क्लास में फर्स्ट आता था; किन्तु खुलता नहीं, दबा-दबा-सा रहता था। खेल के मैदान में भी गंभीर और शिथिल रहता था। उसे इस हाल में देखकर मुझे काफी चिंता होती थी, जिसकी चर्चा मैंने कई बार प्राचार्य से की थी। उस समय तक सीबीएसई से स्कूल को सम्बन्धन नहीं मिला था, इस कारण हम अपने मनोनुकूल पाठ्यक्रम चला रहे थे। अन्य विषयों में एक-एक, किन्तु हिंदी और अंग्रेजी में दो-दो पत्र पढ़ाए जाते थे। एक में भाषा व दूसरे में साहित्य। चौथी कक्षा की सावधिक परीक्षा में अभिजीत को हिंदी में क्रमशः 94 और 96 अंक आये थे, जो दोनों सेक्शन में उच्चतम थे। वर्ग में उत्तर पुस्तिका दिखाकर हम बच्चों को उनकी गलतियाँ व सुधार के उपाय बताते थे। उस बार जब मैंने कॉपियाँ बाँटते हुए अभिषेक को उच्चतम अंक के लिए बधाई दी तो इस बात से हैरान हुआ कि मेरी बधाई का उसपर कोई असर नहीं हुआ था। वह स्थितप्रज्ञ-सा बैठकर पन्ने पलट रहा था। मैंने उसे अपने पास बुलाकर पीठ थपथपाई तो आश्चर्यजनक रूप से खुश होने के बजाय वह रो पड़ा। उसे अपने साथ सटाकर आँसू पोंछने की कोशिश की तो वह और भी जार-बेजार रोने लगा। उसकी घिग्घी-सी बँध गयी। वर्ग के सारे बच्चे अपनी कॉपियाँ देखना छोड़ हतप्रभ हो उसे देखने लगे। मैंने उसे रोका नहीं, रो लेने दिया। उसे शान्त व स्थिर होने में कुछ समय लगा तब पूछा, “क्या हुआ बेटे? दोनों सेक्शन में तुझे हाइएस्ट नम्बर मिले हैं। खुश होने के बदले तू रो क्यों रहा है?”
“सर, मम्मी पीटेगी।”
“क्यों?”
“पूछेगी कि 6 नम्बर और 4 नम्बर कैसे कट गये?”
उसका जवाब सुनकर मेरा माथा घूम गया। हे भगवान! अपनी दमित इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए कोई माँ या बाप इतना क्रूर भी हो सकता है? यह तो बेहद नाजुक मामला है।

ऐसे ही बच्चों में हताशा के चलते अवसाद और फिर सडेन कोलैप्स की मनोदशा विकसित होती है। अभिभावकों की इच्छापूर्ति के दबाव में मासूम बचपन कैसे कुचला जाता है, इसका ज्वलंत उदाहरण मेरे सामने था। मैंने बच्चे की डायरी में माँ-और पिता दोनों के लिए संदेश लिखा कि अनिवार्य रूप से अगली सुबह स्कूल आकर मुलाकात करें। पूरे मामले की विस्तृत जानकारी मैंने प्राचार्य को दी। अगले दिन फादर और मैंने मिलकर दोनों की गंभीर काउंसिलिंगस शुरू की तो पहले दोनों आपस में ही उलझकर एकदूसरे पर दोषारोपण करने लगे। फिर शांत हुए और अपनी गलती स्वीकार करते हुए अपने व्यवहार में सुधार करने का वचन दिया। दबाव हटने पर उस बच्चे के व्यक्तित्व में आशानुरूप परिवर्तन नजर आने लगा था। वह सातवीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ गया। उसके पिता का तबादला हो गया था। इस प्रकरण से मुझे बड़ी सीख मिली। बच्चे पर अपनी इच्छा कदापि नहीं थोपनी चाहिए। पिता को गमलों के नहीं, खुले बाग के माली की भूमिका में होना चाहिए। भोजपुरी की एक कहावत याद आयी कि “बेटवा आउर लोटवा बाहिरे चमकी।” पौधे को खुले आसमान में विकसित होने दीजिए। बेतरतीब बाढ़ को काटिए-छाँटिए। पाँच से दस साल के बीच यदि आवश्यक लगे तो उचित अवसर पर ताड़न का उपयोग कीजिए। माँ को एक साथ कई भूमिकाओं का निर्वाह करना होगा।संतान को संस्कार और मनोबल दे। लड़ने-भिड़ने का साहस और ऊर्जा दे। रिश्तों का महत्त्व बताए। पंछी जैसे खोंचा मार-मारकर घोंसला छोड़कर उड़ना सिखाए। उस घटना के बाद मैंने कभी नहीं चाहा कि मेरे बच्चे कभी फर्स्ट आने के दबाव में आएँ। अपने से जुड़े सभी लोगों को भी मैं यही सलाह देता हूँ।

बच्चों को उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ जानने से उनकी समस्याओं को समझने में आसानी होती है। दस से बीस प्रतिशत बच्चे किसी-न-किसी शारीरिक या मनोवैज्ञानिक समस्या से ग्रस्त होते हैं। उनकी समस्याओं का समय रहते निदान और उपचार करना उन्हें पढ़ाने-लिखाने से अधिक जरूरी होता है। कई बार सहानुभूति सहित कंधे पर हाथ रख देने या बच्चे की बातें धैर्य से सुन लेने मात्र से संकटग्रस्त बच्चे का जीवन बदल सकता है। ऐसे दर्जनों बच्चे हमारे जीवन में आये जिनकी दिक्कतों का उपचार हम शिक्षकों ने किया। एक दिलचस्प प्रसंग साझा करता हूँ। वर्ग में चॉक-डस्टर का इस्तेमाल मैं स्कूल में बहुत करता था, अब भी करता हूँ। कभी ब्लैकबोर्ड पर लिखने के बाद गौर करता तो देखता कि कोई-कोई बच्चा बोर्ड पर लिखी चीजों को पढ़ने में कठिनाई का सामना कर रहा है। आँखें छोटी करके अथवा हथेली से आँखें ढँककर उंगलियों के बीच झिरी बनाकर पढ़ने की कोशिश कर रहा होता। मैं टहलकर उसकी जगह जाकर बोर्ड को देखता तो पाता कि मुझे तो बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा है। इस परीक्षण से सुनिश्चित हो जाता कि बच्चे की आँख खराब हो चुकी है। बच्चे की डायरी में अभिभावक के लिए संदेश लिखता कि अविलम्ब बच्चे की आँखों की जाँच करवाएँ। अगले दिन बच्चे के माँ-बाप उपकार के बोझ से दबे-से आभार-ज्ञापन करने स्कूल आकर मिलते। वे अपनी लापरवाही के लिए माफी मांगते हुए कहते कि मेरा यह उपकार जीवनभर नहीं भूलेंगे और बच्चा तो जैसे भक्त ही हो जाता था। स्कूल में पढ़ाते हुए ऐसे दर्जनों बच्चों की मदद करने का सौभाग्य विधाता ने मुझे दिया है, इसके लिए उसका शुक्रगुजार हूँ। मैंने अपने सर्वेक्षण से जाना है कि छोटे कमरों में बड़े स्क्रीन वाले टीवी को अपेक्षाकृत अधिक निकट से देखने के कारण बच्चों की आँखों में गंभीर विकार उत्पन्न होता है। हरी साग-सब्जी नहीं खाने वाले बच्चों को भी नजर की समस्या से जूझना पड़ता है। मोटे फ्रेम के वजनी चश्मे लगाये बच्चों को देखकर मैं दुखी हो जाता हूँ। दुर्भाग्य से मेरे भी दोनों बच्चे चश्मिश हो गये हैं। जबकि मुझे 57 वर्ष की उम्र पार करने पर चश्मे की जरूरत महसूस हुई।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
.
Facebook Comments
. . .
सबलोग को फेसबुक पर पढ़ने के लिए पेज लाइक करें| 

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *