दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (64)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

केजी से पीजी तक के छात्रों को पढ़ाने का लम्बा अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद मैं बेझिझक यह स्वीकार कर सकता हूँ कि अबोध शिशुओं को पढ़ाना बड़ा काम है। इस अर्थ में मुझे प्राथमिक पाठशालाओं के गुरुजी विश्वविद्यालय के आचार्यों से बड़े और महान नजर आते हैं। उनके लिए मेरे मन में अपेक्षाकृत अधिक सम्मान है। छोटे बच्चों को लिखना-पढ़ना सिखाने और उन्हें उत्प्रेरित करके अच्छा इंसान बनने की ओर अग्रसर करने में मुझे कुम्हार या मूर्तिकार के आत्मसुख का अनुभव होता है। कच्ची मिट्टी के लोंदे को विभिन्न आकार देकर उन आकृतियों को आवाँ में पकाना विधाता का हाथ बनकर उसके अभियान में सहयोग करने का संतोष ऐसा है, जिससे अपना जीवन सार्थक हुआ-सा महसूस होता है। शिशुओं से गुरुजी का जुड़ाव भी बहुत गहरा और मजबूत हो जाता है। अच्छे गुरुजी को बच्चे और अच्छे बच्चों को गुरुजी आजीवन याद रखते हैं। यह जुड़ाव बड़ी उम्र के शिष्यों के साथ कदापि नहीं हो सकता। कॉलेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हुए कभी भी गढ़ने या रचना करने का सुख नहीं मिल सकता है। वहाँ तो बनी-बनायी मूर्तियों पर पॉलिश करने का भी अवसर मिल जाए तो बड़ा सौभाग्य मानिये।
भागलपुर के संत जोसेफ्स स्कूल में मात्र सवा साल पढ़ाया था, किन्तु प्रार्थना सभा में विदाई के समय बोलते हुए मैं रो पड़ा था। साथ ही सैकड़ों बच्चे और दर्जनों सहकर्मी भी रोने को मजबूर हो गये थे। केवल प्राचार्य फादर डॉ0 वर्गीस पनंगट ही प्रकृतिस्थ नजर आ रहे थे, लेकिन अच्छी तरह याद है कि उनकी आँखें भी भींग गयी थीं। मेरी विदाई के पहले मित्र विनोद जी और स्व0 अनिल जी को फादर वर्गीस ने योगदान करा लिया था। बाद में अनिल तो नौगछिया के नवांगीभूत मदन अहिल्या महिला कॉलेज चले गये, किन्तु विनोद जी 2016 तक संत जोसेफ्स में कार्यरत रहे और फादर वर्गीस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्कूल को अभूतपूर्व ऊँचाई तक ले गये।

इधर बमुश्किल एक साल भी नहीं बीता कि एक अवांछित प्रकरण के चलते स्कूल प्रबंधन और एनटीपीसी प्रबंधन के बीच खटपट शुरू हो गयी। एक प्रभावशाली वरिष्ठ प्रबंधक (नाम बताना अनुचित होगा) ने अपनी एक रिश्तेदार महिला को मानवीयता का हवाला देकर प्राचार्य फादर तानी परमपिल से स्कूल में नियुक्त करवा लिया था। वह उच्च शिक्षा प्राप्त एक परित्यक्त महिला थीं। कुछ दिनों तक पढ़ाने के बाद विभिन्न अभिभावकों से उनके विरुद्ध शिकायतें मिलने लगीं। प्राचार्य ने उन्हें कई बार समझाया-चेताया, किन्तु शिकायतों का सिलसिला चलता ही रहा। कुछ शिकायतें तो सही थीं और कुछ साजिशन और कृत्रिम थीं। उनके आश्रयदाता वरिष्ठ प्रबंधक के विरोधी सहकर्मियों का घनघोर षड्यंत्र चल रहा था। वे लोग चाहते थे कि या तो अन्य पढ़ी-लिखी महिलाओं को स्कूल में नियोजित किया जाये या उस महिला को निकाल दिया जाये। फादर के लिए ‘दूध-माछ दोनों बाँतर’ वाली स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। कुछ दिनों तक टालने के बाद मामला संभालना मुश्किल हो गया, तब प्राचार्य ने उन्हें कार्यमुक्त करने का निर्णय ले लिया। उन शिक्षिका को टर्मिनेशन लेटर मिलना था कि पूरा बवाल मच गया। उच्चाधिकारियों का एक बड़ा गुट स्कूल प्रबंधन से भिड़ गया। कैथोलिक चर्च के लोग इस प्रकार की विषम परिस्थितियों के अभ्यस्त नहीं थे। इस प्रकार के संयुक्त उपक्रम वाली संस्था चलाने का अनुभव भी उन्हें नहीं था, सो उधर से भी गंभीर प्रतिक्रिया हुई, जो सर्वथा स्वाभाविक थी। अनुबंध में उभय पक्ष को असंतुष्टि की स्थिति में एग्रीमेंट तोड़ देने का प्रावधान रखा गया था। कैथोलिक सोसायटी ने उस दिशा में सोचना शुरू कर दिया। फादर तानी को कॉलोनी के बाहर स्कूल खोलने का उपाय करने का निर्देश जारी कर दिया गया। स्कूल के अंदर और बाहर तेजी से चर्चा होने लगी कि स्कूल बन्द हो जाएगा। अभिभावकों में अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बेचैनी छा गयी। झुंड-के-झुंड लोग आकर प्राचार्य को घेरने लग गये। अंततः फादर ने उन्हें आश्वस्त किया कि जिन बच्चों का एडमिशन लिया गया है उनको पढ़ाने की जिम्मेदारी का निर्वहन किया जाएगा। एक दिन फादर ने मुझे बुलाकर कहा, “पवन सर, हमें कॉलोनी से बाहर अपना स्कूल खोलना है। अपनी जमीन खरीदकर भवन बाद में बनेगा। पहले कोई बड़ा-सा खाली मकान खोजना है। चलिये, आज से ही शुरू करते हैं।”

और उसी दिन से कहलगाँव शहर में घूम-घूमकर स्कूल के लिए मकान खोजने का कार्यक्रम शुरू हो गया। रोज सुबह प्रार्थना सभा के बाद मैं और फादर जीप में साथ निकलते तथा परिचितों के सहयोग से गली-मोहल्ले में अवस्थित बड़े और खाली भवनों का अंदर-बाहर से मुआयना करते। कई भवन अनुकूल लगे, पर फादर एक ही बात पर बिदक जाते कि “पवन सर, एसेंबली (प्रार्थना सभा) कहाँ लगेगा?” इस प्रकार उस जमाने में कहलगाँव शहर व आसपास के इलाके में अवस्थित लगभग सभी बड़े भवनों को हमने अंदर-बाहर से देख लिया, किन्तु कहीं मन नहीं जम सका।
दूसरी ओर एनटीपीसी प्रबंधन के अधिकांश लोग मान-मनौअल में जुट गये थे। कहते हैं, समय बड़े-से-बड़े घाव को भर देता है। लगभग एक महीने के उथल-पुथल के बाद शान्ति और सौहार्द कायम हो गया, किन्तु कैथोलिक सोसायटी के हृदय में एक स्थाई गाँठ बन गयी। कॉलोनी के बाहर अपना स्कूल खोलने का विचार नहीं मरा, जिसके परिणामस्वरूप कालांतर में पकड़तल्ला संत जोसेफ्स स्कूल का निर्माण हुआ। उस निर्माण की कथा लम्बी है, जिसपर आगे लिखूँगा।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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