दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (62)

 

  • पवन कुमार सिंह

 

संत जोसेफ्स स्कूल में नौकरी शुरू करने के लगभग चार महीने बाद सुधा गाँव से कहलगाँव आ गयी थीं। इधर एनटीपीसी से अपने बच्चों को लेकर स्कूल आने वाली महिलाओं से मेरा काफी मेल-जोल हो गया था। इसका फायदा यह हुआ कि प्रत्येक शनिवार की शाम एनटीपीसी वाली बस से बच्चों और उनकी मम्मियों के साथ मैं भी कहलगाँव चला जाता और सोमवार की सुबह वापस आकर स्कूल पकड़ लेता था। इस जाने-आने के क्रम में सारे रास्ते गपशप होता रहता था। उस समय एनटीपीसी परियोजना में बहुत कम लोग पदस्थापित थे। एक महाप्रबंधक, दो-चार उप महाप्रबंधक, लगभग एक दर्जन वरिष्ठ प्रबंधक सहित बमुश्किल एक सौ के करीब स्टाफ थे। बच्चों के साथ भागलपुर आने वाली सभी महिलाएँ प्रभावशाली उच्चाधिकारियों की पत्नियाँ थीं। वे सभी रोज-रोज के इस चक्कर से उकताने लग गयी थीं। बातचीत के क्रम में मैंने उन्हें एक आइडिया दिया कि क्यों नहीं प्रबंधन के लोग कॉलोनी में स्कूल खोलने के लिए भागलपुर कैथोलिक चर्च के उच्च पदस्थ पादरियों से बात करें! यदि एनटीपीसी प्रबंधन आधारभूत सुविधाओं और घाटानुदान के साथ स्कूल खोलने का प्रस्ताव दे तो बात बन सकती है। सफलता मिलने की उम्मीद जग जाने पर उन महिलाओं ने प्राचार्य फादर वर्गीस और सचिव फादर तानी से इस बाबत बात शुरू कर दी थी। मैं भी गाहे- बगाहे उन दोनों को प्रेरित करने में लगा रहता था।
इसके बाद कुछ दिनों तक एनटीपीसी के अधिकारियों का एक दल लगातार भागलपुर के बिशप रेवरेंड फादर अर्बन मैकगारी से मिलकर स्कूल के लिए बात आगे बढ़ाने में लगा रहा था। धीरे-धीरे बात पकने लगी थी। बातों को रफ़ू करने में मैं भी लगा हुआ था। कुछ आशंका या जिज्ञासा होने पर फादर वर्गीस और फादर जोसेफ तानी मुझसे सलाह-मशविरा करते थे। मैं हमेशा सकारात्मक विचारों के साथ उन्हें प्रेरित और प्रोत्साहित करने वाली बातें बताता था। सबकुछ सही दिशा में चल रहा था। कुछ दिनों के प्रयास से मामला सुलझ गया और स्कूल खोलने का अनुबंध कैथोलिक चर्च और एनटीपीसी प्रबंधन के साथ हो गया। अगले सेशन से एनटीपीसी कॉलोनी में संत जोसेफ्स स्कूल खोलने की बात तय हो गयी।
इसी बीच हमारे जीवन में एक बड़ी घटना हुई। सुधा ने वीटो का इस्तेमाल करते हुए अपना मन्तव्य सुना दिया कि अब वह नैहर-ससुराल का चक्कर छोड़कर भागलपुर में साथ रहेंगी। छोटी और अल्प वेतन वाली नौकरी है तो क्या, वह अच्छे से रह लेंगी। डेरा खोजने के लिए मुझे एक सप्ताह का समय मिला था। मैंने सभी स्नेही लोगों को यह बात बताते हुए घर खोजने के अभियान में लगा दिया। नयाबाजार मुहल्ले के सखीचन्द घाट रोड में एक डेरा मिल भी गया। एक कमरा, दो बरामदे और एक शौचालय। एक बरामदे में किचेन बनाने का जुगाड़ करना था। मकान मालिक (नाम नहीं लूँगा) निकृष्ट दर्जे के चंट थे। स्वयं किसी लाचार रिश्तेदार का घर कब्जा कर रखा था। हमारे लिए घर में रहने की शर्तें बहुत कड़ी और अव्यावहारिक थीं। सप्लाई वाटर का एक ही नल घर के अंदरूनी हिस्से में था, जिससे पानी लेना बिल्कुल मना था। आँगन के चापाकल से पानी लेना था, किन्तु बिना आवाज किये। अगले रविवार को एक कमरे के लायक फर्नीचर, कामचलाऊ बर्तन-बासन और राशन-पानी के साथ सुधा और बेटे को लेकर हम नये डेरे में बस गये थे। छात्र-जीवन शुरू होने के बाद पहली बार दोस्तों-यारों से अलग रहने का वह निर्णय मेरे लिए बहुत पीड़ाजनक था। मैं उदास था, लेकिन सभी साथी सान्त्वना देते हुए समझा रहे थे कि यह जीवन के नये और अनिवार्य दौर का आरम्भ है। वे इस बात से खुश थे कि अब भाभी के हाथों से घरेलू स्वाद वाले खाने का अवसर मिल सकेगा।


मकान मालिक के असहयोगात्मक रवैये के कारण हमारी गृहस्थी का आरम्भिक काल खासा तकलीफदेह रहा था। चापाकल का पानी खारा था। किसी तरह स्नान और कपड़े धोने का काम तो चल जाता था, पर दाल सिद्ध नहीं होती थी। प्रेसर कुकर में दर्जनों सीटियाँ लगाने के बावजूद दालें बकर-बकर ताकती रह जाती थीं। कई बार ससुर जी आदि अतिथियों के आने पर दाल सिझाने के लिए मैंने उस घर में नल के पानी की चोरी की थी, क्योंकि पानी माँगने पर निर्दयतापूर्वक मना कर दिया गया था। चापाकल चलाने में यदि जोर से कभी आवाज हो जाती तो बूढ़ा-बूढ़ी दोनों एक ही साथ पंचम सुर में चिल्लाने लगते थे। बुढ़ऊ सुबह काम पर जाते समय हमारे हिस्से के बिजली मीटर को देखते और वापस आने पर फिर देखते। प्रायः बेमतलब के टोक भी देते थे कि बिजली की खपत ज्यादा हो रही है। घर के सामने सड़क के दूसरी ओर एक संभ्रांत परिवार रहता था। उस परिवार की महिलाओं से सुधा का हेल-मेल हो गया था। वे सभी इस बात से काफी अचंभित थे कि राजपूत होते हुए भी ऐसे मकान मालिक की बदमाशियों को सहकर उसके साथ हम किस तरह महीनों से गुजारा कर रहे हैं! इसके पहले तो कोई किराएदार एक महीने से अधिक नहीं टिका है। हमने सोच रखा था कि किसी हाल में घर के मालिक से झगड़ा नहीं करेंगे। मैं जानता था कि यदि मेरे चाहने वालों को मकान मालिक के दुर्व्यवहार की जानकारी मिल गयी तो वे घर की ईंट से ईंट बजा देंगे। मैं सुधा को समझा देता था कि कुछ दिन और बर्दाश्त कर लेना है। इस तरह की अद्भुत सहनशीलता के पीछे मेरा आशावाद था। स्कूल प्रबंधन और एनटीपीसी प्रबंधन के बीच चल रही बातचीत की प्रगति सही दिशा में थी। पता नहीं क्यों, मुझे इस बात का भरोसा हो चला था कि अगर एनटीपीसी में स्कूल खुलेगा तो मुझे वहाँ भेजा जाएगा। आशा बलवती थी इसलिए लगता था कि अधिक से अधिक हमें इस यातनागृह में अगली होली तक ही रहना है।
उस समय मेरे शोधकार्य का निर्णायक दौर चल रहा था। सिलसिलेवार लिखाई, टंकण और प्रूफ रीडिंग के काम में व्यस्त रहने के कारण मैं गृहस्थी में कोई सहयोग नहीं कर पाता था। अकेले बच्चे को संभालना और रसोई का काम करने के साथ घर की सफाई आदि करते-करते सुधा पस्त हो जाती थीं। हमारे हाल पर तरस खाकर ससुर जी ने कहलगाँव से एक नौकरानी पहुँचा दी थी। तब जाकर हमारा दैनिक जीवन सुगम हो पाया था। स्कूल जाने-आने के लिए फादर वर्गीस ने स्कूल बस की सुविधा उपलब्ध करवा दी थी। स्कूल से लौटकर देर रात तक थीसिस का काम निपटाता था। इस क्रम में गाइड प्रो0 तिवारी के साथ मेरे रिश्ते में कुछ दिनों के तनाव की स्थिति बन गयी थी। मैंने प्रण करके शेविंग छोड़ दी थी। सर दाढ़ी बनाने के लिए टोकते तो कहता कि थीसिस जमा करने के बाद ही बनाऊँगा। मेरी दाढ़ी काफी बेतरतीब है, सो दाढ़ी बढ़ जाने के कारण चेहरा कुरूप लगता था। स्कूल से लेकर घर तक सभी लोग टोका- टाकी करने लगे थे, पर मैंने दाढ़ी तभी बनाई जब थीसिस जमा हो गया। दो बाह्य परीक्षक नियुक्त किये गये थे, एक थे साहित्य अकादमी के सचिव प्रोफेसर इन्द्रनाथ चौधुरी और दूसरे लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सूर्य प्रसाद दीक्षित। जनवरी में शोधप्रबंध जमा हुआ और मई में मौखिकी के बाद पीएचडी की उपाधि प्राप्त हुई। इस प्रकार दंगल सिंह अब डॉ0 पवन कुमार सिंह हो गये थे।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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