दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (56)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

बचपन से ही मेरी एक कमजोरी मुझे बार-बार असहज करती रही है। मैं किसी दुल्हन की विदाई देख नहीं पाता हूँ। यह दृश्य देखकर मेरे अंदर करुणा का आवेग उमड़ने लगता है। हृदय द्रवित होकर आँखों से आँसुओं के रूप में ढलक पड़ता है। इसके चलते कई-कई बार भीड़ में लज्जित होना पड़ा है। “देखो, दंगल सिंह की बहादुरी! लड़का होकर लड़कियों की तरह रोता है!” ऐसे तानों से बचने के निमित्त मैं प्रायः विदाई के समय भीड़ से अलग होकर दूर चला जाता हूँ। पर, हर बार ऐसा हो नहीं पाता। जब अपनी कोई निकट की लड़की विदा होते समय नाम लेकर पुकार दे तो कलेजा मुँह को आ जाता है। पूरा साहस बटोरकर आना ही पड़ता है और रोते हुए आशीष देकर विदाई देनी पड़ती है। अब कहिये कि अपनी दुल्हन की विदाई लेकर चलने के वक्त मेरे पास क्या विकल्प था! गाँठ जोड़कर मुझे सुधा के साथ बाँध दिया गया था। मैं आगे चल रहा था और पीछे जार-बेजार रोती वह आ रही थीं। साथ चल रही स्त्रियाँ उसकी अँजुरी में धान-चावल देकर सिर के ऊपर से पीछे उलिचवा रही थीं। आँगन से कार तक आने के क्रम में कई बार उसकी दाँती लग गयी थी। मेरी हालत क्या थी? अभी भी वर्णन कर पाने की कुव्वत मुझमें नहीं है।


घर से विदाई के बाद एलसीटी के जहाज से बारात के साथ हम काढ़ागोला घाट होते कुर्सेला लौटे। हमारे यहाँ सूर्यास्त के बाद ही दूल्हा- दुल्हन के गृहप्रवेश का रिवाज है। हम लगभग चार बजे घर पहुँच गये थे। सूर्यास्त होने तक हमें दरवाजे पर बाबा वाले बंगले में ठहराया गया। जून का पहला सप्ताह और बिना बिजली का घर। मैं तो इधर-उधर घूम-फिर रहा था, किन्तु बन्द घर में दुल्हन के भारी-भरकम लिबास में सुधा की हालत खराब हो रही थी। सहानुभूतिवश मेरी बहनें यथासंभव हाथ पंखे के सहारे उसे राहत देने की कोशिश कर रही थीं। उसकी बेचैनी देखकर मेरी एक दीदी ने कटाक्ष किया था, “इतनी सुकुमार थी तो पिताजी ने यहाँ क्यों ब्याह दिया?” उस कटाक्ष की पीड़ा इतनी गहरी थी कि सुधा आज भी उसे याद करती है और उस दीदी की छवि उसके हृदय में क्रूर ननद के रूप में स्थापित है। बाद में उस दीदी का अच्छा व्यवहार भी उस छवि को नहीं तोड़ सका। उस शाम पूरे रस्म-रिवाज के साथ गाँठ जोड़कर हमें गृहप्रवेश कराया गया। मंगल गीत गाती स्त्रियों के साथ सुधा को दरवाजे से आँगन तक डलिया में कदम रखते हुए ले जाया गया था। रात में दलही पुड़ी, खीर और तरकारी का भोज हुआ था। खाते-खिलाते तो देर हुई ही, गाँव के लंगोटिया यारों ने गपशप में उलझाकर और रात कर दी। बाद में भौजी ने आकर सबको भगाया, मुझे आँगन ले गयीं और कोहबर में धकेलकर दरवाजा बाहर से बंद कर दिया था। लालटेन की मद्धिम रोशनी में देखा कि सुधा निढाल सोयी है। लगातार तीन-चार दिनों के थकाऊ कार्यक्रम और आराम की कमी से ऐसा होना स्वाभाविक ही था। मैंने जगाना उचित नहीं समझा और सो गया।


अगले दिन चौठारी की रस्म थी। स्नानादि के बाद कुलदेवता नृसिंह भगवान की पूजा और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के साथ घर के दाएँ भाग में अवस्थित ग्रामदेवी भगवती की पूजा-अर्चना करायी गयी थी। कच्चे धागों से बँधे आम के पल्लव का जो ‘कंगन’ विगत पाँच दिनों से दोनों की कलाई में बँधा था, उसे पारम्परिक विधि-विधान के साथ खोलकर वर्जनाओं के बंधन से हमें मुक्त कर दिया गया। बारात में मांसाहार कर लेने की बात मालूम होने के कारण माई कल शाम में ही डाँट चुकी थीं, “जो रे छौंरा, दू दिन माँस-मछरी न खैते र त की बिगड़ जतउ र? कंगन खूले तक पवित्तर रहे के चाही।” चौठारी की रात गोतियों और पड़ोसियों के लिए मांस-भात का भोज हुआ था। उस दिन मुझे मांस-भात खाने की आजादी थी।

 

अगले दिन से सुधा कोहबर की सीमा से निकलकर अँगना में सक्रिय हो गयी थीं। छोटी ननदों से उसकी अच्छी दोस्ती हो गयी थी। माई और भौजी की कोठरी से लेकर देवता के घर तक नयी दुल्हन की पायलों की रुनझुन से माहौल जीवंत हो रहा था। अलबत्ता इच्छा प्रकट करने के बावजूद उसे चूल्हा छूने की इजाजत नहीं मिली थी। दूर-दराज से रोज कुछ हितैषी कनियाँ देखने आते और उसकी सुंदरता का बखान करते। माई उसके अच्छे संस्कार की चर्चा सभी से जरूर करतीं। एक दिन बाबूजी की अनुपस्थिति में सुधा माई की देहरी लाँघकर बाबूजी के बरामदे तक जा पहुँची। बाबूजी के स्वच्छ बिछावन पर लगे तकिए पर उसने एक छोटा तौलिया बिछा दिया था। बाबूजी लौटकर आये तो उन्हें अपने तकिये पर तौलिया देखकर सुखद आश्चर्य हुआ था। उन्होंने माई को बुलवाकर पूछा था, “ई छोटकी दुलहिन का काम है क्या जी? देखिए, कितनी समझदार है। आजतक किसी को समझ में आया था कि ऐसा करने से अच्छा होगा? इसे कहते हैं अच्छा संस्कार।” सुधा का यह छोटा-सा काम गाँव में बड़ी चर्चा का कारण बन गया था। मिलने आने वालों के सामने बाबूजी नयकी कनियाँ की प्रशंसा करते नहीं अघाते थे। इस दौरान यदि गाँव-जवार की किसी दुल्हन की चर्चा होती तो वे कहते, “जो भी हो! हम्मर कहलगाँव वाली दुलहिन से अच्छी नहीं होगी। कहिओ देखे हैं तकिया के खोल के ऊपर ढक्कन! और जानना चाहते हैं तो पूछिए दंगल की माई से। कइसे अपनी कोठरी के साथ पूरा घर-अँगना सजाती-सँवारती रहती है। ई तो साक्षात लक्ष्मी की औतार है मरदे!” शादी के बाद केवल बारह दिन ही सुधा ससुराल-वास कर सकी, किन्तु इतने ही दिनों में वह यशस्विनी हो गयी थीं। दसवें-ग्यारहवें दिन चूल्हा-छुआई की रस्म पूरी की गयी थी। पूजा-अर्चना के बाद उसने खीर पकाकर परिजनों को परोसा था।


सुधा के मायके में नवविवाहिता बेटी को सोलह दिनों के अंदर वापस बुलाने का रिवाज है। इस कारण बारहवें दिन ससुर जी विदाई कराने बाघमारा चले आये थे। रोकने की इच्छा रहते हुए भी बाबूजी ने उन्हें मना नहीं किया था। पर्याप्त मिष्ठान्न और परिजनों के कपड़ों के साथ तेरहवें दिन विदाई हुई। चलने के समय घर और पड़ोस की स्त्रियों के साथ-साथ सुधा भी खूब रोई थीं। मैं भी साथ ही ससुराल आया था। कई दिनों तक नजदीकी रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने नवदम्पती को आमंत्रित कर सुस्वादु भोजन कराया था। वस्त्रादि के उपहार भी दिये गये थे। एक सप्ताह तक चली इस रस्म-अदायगी के बाद हम त्रिमुहान जाकर दिदिया के घर दो दिन रह आये थे। वहाँ से लौटकर और तीन-चार दिन रहे तो एक दिन सुधा ने कहा, “लोग आपके वापस जाने का इंतजार कर रहे हैं और आप हैं कि जाने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। अभी चले जाइये, कुछ दिनों के बाद माय बुलवाएगी तब फिर आ जाइएगा।” इस बुझावन के बाद मुझे कोर्स में पढ़े “कांता सम्मित उपदेश” का वास्तविक अर्थ समझ में आया था और एक दिन बाद मैं अपनी मंडली के पास भागलपुर लौट आया था।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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