एतिहासिक

दास्तान-ए-दंगल सिंह (44)

 

  • पवन कुमार सिंह

 

स्वर्गीय अनिल जी को याद करते हुए कई मित्रों, परिचितों के साथ पुत्र कुमार आनंद और अनुज संजय कुमार सिंह की टिप्पणी से प्रेरित होकर पुनः लिखने को बाध्य हो गया हूँ। उनसे जुड़े संस्मरणों की शुरुआत अनन्य मित्र नीलकंठ पाठक की टिप्पणी को उद्धृत करते हुए कर रहा हूँ–

“मेरे कमरे से इतिहास की डकैती, चाकू की नोक पर उस समय की एक सनसनीखेज घटना थी। अनिल बाबू के वो चुनौती भरे शब्द इतने दिनों बाद भी अंदर गूंजते हैं” गंगा,जो नोट ले गए हो वो तो नकली है, असली नोट पाठक जी का लाल कपड़े में लपेटकर की टीएनवी कालेज ग्राउंड में रखकर एक झंडा गाड़ देते हैं, हिम्मत हो तो झंडा उखाड़ लो और नोट ले जाओ।” उनकी इस चुनौती ने गंगा के होश उड़ा दिए। और अगले दिन बुद्धं शरणम् गच्छामि।

बड़ा भावुक कर दिया आपने पवन बाबू। ट्रेन में हूँ हरिद्वार यात्रा के क्रम में, फिर भी कुछ लिखने और आपकी प्रशंसा से रोक नहीं पाया खुद को। अनिल बाबू को एवं मित्रता के  जज्वे को कोटि-कोटि नमन। तेरे जैसा यार कहाँ…..।”

अनिल जी के व्यक्तित्व का यह भी एक पहलू था। वे दुस्साहस के स्तर तक साहसी थे। ऐसा साहस जो शेरनी को दुह ले और शेर के मुँह में हाथ डालकर उसके दाँत गिन ले।

बहस में यदि कोई कुतर्क करता तो अनिल जी की गोरी और लम्बी हथेली सीधे उसकी नाक के सामने कुछ इंच की दूरी पर आकर ठहरती और कड़कदार आवाज आती, “सुनिये, फालतू भचर-भचर मत करिये।” और सामने वाले की बोलती बन्द हो जाती थी। बेरोजगारी के दिनों में बराबर एक साथ रेलयात्रा करने का अवसर मिलता था। रेलयात्रा के दो प्रसंग याद आते हैं। एक बार महादेवपुर घाट से थाना बिहपुर हम दोनों घटही गाड़ी से जा रहे थे। गाड़ी में खचाखच भीड़ थी। कहीं बैठ सकने की गुंजाइश नहीं थी। एक सज्जन सूट-बूट में खिड़की वाली सीट पर बैठे हुए थे। उन्होंने खिड़की की ओर बगल में अपना ब्रीफकेस खड़ा करके उस पर अपना हाथ रखा हुआ था। अनिल की नजर वहाँ ठहर गयी। मुझे समझते देर नहीं लगी कि अब उसकी मिट्टी पलीद होने ही वाली है। अनिल ने उस ‘सज्जन’ से कहा, “भाई साहब, अपना बैगवा ऊपर या नीचे रख लीजिये न। हम बैठ जायें।”

जवाब मिला, “क्या बन्धु, आप भी गजब करते हैं। इतनी-सी जगह में आप बैठ सकेंगे?”

“पहले हटाइये तो।”

“नहीं हटा सकते। इसमें महत्वपूर्ण सामान है।”

इतना सुनना था कि अनिल उसकी ओर झपट पड़े और ब्रीफकेस जबरन छीनकर उठाया और और उसके सिर पर रखते हुए डपटकर बोले, “महत्वपूर्ण है तो सिर पर राखिये। हटिये।” और उसे धकियाकर बगल में बैठ गये। उसका मुँह तो अपने जैसा हो गया और सारे तमाशबीन ठठाकर हँस पड़े।

एक बार हम भागलपुर से कहलगाँव की यात्रा पर थे। ट्रेन की सीट पर चार की जगह पाँच लोग बैठे हुए थे। अनिल ने किनारे बैठे व्यक्ति से कहा, “भैया जरा खिसक जाइये। हम बैठ जायें।”

“क्या भाई! आपको बैठा लेंगे तो हम पाँचों को दिक्कत हो जाएगी। भले तो खड़े हैं।”

“जरा उठिए तो।”

“क्यों उठें?”

“अरे उठिए न। हम जबर्दस्ती थोड़े न बैठेंगे।” वह यात्री खड़ा हो गया। उसके उठते ही अनिल बैठ गये और बोले, “अब वही बात बोलिये जो बैठकर बोल रहे थे। नहीं बोल सकिएगा आप। आप नहीं बैठाए, पर हम आपको बैठाते हैं। बैठिए।” वह लजा गया और सारे लोग मुस्कुराने लगे।

एमए के रिजल्ट तक मेरे सिवा लगभग सभी साथियों की शादी हो चुकी थी। अनिल को तो बीए में ही टीप लिया गया था। एक दिन हम दोनों एक रिश्तेदार से मिलने कहलगाँव आए हुए थे। अनिल ने सुधा जी को छत पर टहलते हुए देखा तो चिहुँककर कहा, “अरे बॉस, यह लड़की तो शादी करने लायक है। पता लगाया जाए कि इसका बाप कौन है?” सुधा जी नजर से ओझल हो चुकी थीं। मैं नहीं देख पाया था। किन्तु अनिल जिद पकड़ चुके थे। उन्होंने उन रिश्तेदार से चर्चा कर ही दी। पता चला कि लड़की के पिता स्वजातीय व शिक्षक हैं और उनके सुपरिचित भी। अनिल ने बात चलाने का अनुरोध किया और उन्हें बाबूजी से बात करने के लिए मास्टर साहब और मेरे बड़का पाहुन के साथ गाँव जाने को प्रेरित किया। इतना ही नहीं, बाबूजी की डाँट की परवाह किए बिना पैरवी करने के लिए दो दिन बाद खुद भी वहाँ चले गए। बाबूजी की कड़ी फटकार खाई , पर मेरा विवाह सुधा जी के साथ तय करवाकर ही लौटे।

मैं जब सेंट जोसेफ्स स्कूल एनटीपीसी में कार्यरत था तो अनिल नवगछिया में मदन अहिल्या महिला कॉलेज जॉइन कर चुके थे। कभी-कभार सीधे गंगा पार करके कहलगाँव आ जाते थे। ऐसे ही एक बार शायद अप्रैल महीने के शनिवार की शाम वे आए थे। हमारा दो कमरे का क्वार्टर था। अनिल बाहर वाले कमरे में सोए थे। हम दम्पति डेढ़ साल के बेटे के साथ बेडरूम में थे। लगभग चार बजे भोर में मैं टॉयलेट से लौटकर बिछावन पर लेटने ही जा रहा था कि धरती हिलने लगी। मैंने झिंझोड़कर सुधा को आवाज लगाई, “सुधा बउआ को लेकर भागो, भूकंप आया है।” बीवी और बच्चे की परवाह किये बिना उन्हें छोड़कर मैं बाहर निकल भागा। दहशत में यह भी याद नहीं रहा कि अनिल बाहर वाले कमरे में सोए हैं। कुछ ही पलों में सम्पूर्ण कॉलोनी के लोग बाहर निकल आए थे। मैं बाहर से सुधा को पुकार रहा था। तभी देखता हूँ कि अनिल गोद में नंदू को उठाए और सुधा का हाथ पकड़े बाहर निकल रहे हैं। सामना होते ही कड़कदार डाँट पड़ी, “बेहूदा आदमी! बीवी, बच्चा और दोस्त किसी की चिन्ता नहीं। अपनी जान बचाकर भाग निकले! कायर कहीं के!” इसके बाद जब भी दोस्तों के बीच अवसर मिलता, उस घटना के लिए अनिल मुझे जरूर कोसते थे।

पीजी पास करने के बाद मैं उसी होस्टल के रिसर्च विंग में रहने लगा था। अनिल परबत्ती स्थित पूर्णिया लॉज में ससुराल वालों के साथ रह रहे थे। हम दोनों के अनुजगण भी कॉलेज आ गए थे और साहेबगंज के एक लॉज में रह रहे थे। वह हमारा संघर्षकाल था। एक प्रण के तहत हमने घर से खर्चा-पानी लेना बन्द कर दिया था। फलतः घोर आर्थिक संकट का दौर था। मेरे दोनों अनुज काफी संयमी थे, किन्तु अनिल के अनुज संजय में उसी समय से साहित्यकार वाले सारे लक्षण प्रकट होने लगे थे। उसका व्यवहार और क्रिया-कलाप हमारे लिए अननुमेय होता था। हम उसके सारे नाज-नखरे उठाने की भरसक कोशिश करते। सतर्क रहते कि कलाकार के हृदय को हमारे कारण कहीं ठेस न लगे। इन दोनों भाइयों से जुड़ी एक घटना बरबस याद आ रही है। एक दिन संजय ने आकर अनिल को कहा, “भैया, आज हमरा एक जोड़ा पैंट-शर्ट आ जूता कीन द$ नै त बीस गो टका द$।”

“बीस टका के की करबहिं रे?”

“पढ़ाई छोरि क गाँव चैल जैबै।”

“नै रे गाँव मत जो। चल बाजार, चल।”

उसे साथ लिये अनिल मेरे पास आए। हम बाजार गये। एक व्यापारी मित्र से कर्ज लेकर अनुज की फौरी माँग पूरी की गयी तब जाकर जान में जान आयी।

और क्या लिखूँ, क्या छोड़ूँ! हरि अनंत हरि कथा अनंता! कृतज्ञ दोस्त का उस अद्वितीय दोस्त को नमन!

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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