एतिहासिक

दास्तान-ए-दंगल सिंह (43)

 

  • पवन कुमार सिंह

 

पीजी कैम्पस और हॉस्टल में बिताए दिनों को यदि अपने जीवन का स्वर्णकाल मानता हूँ तो केवल यार-दोस्तों के कारण। इस मामले में मैं बहुत धनी रहा हूँ। उस छोटे-से कैम्पस में गाछ-वृक्ष तक से दोस्ती हो गयी थी। अलबत्ता दर्जनों ऐसे दोस्त बने, जिनसे अटूट संबंध कायम हो गया। उनमें से कई अभिन्न दोस्तों को क्रूर काल ने हमसे छीन लिया। सदा के लिए बिछड़ गये ऐसे दोस्तों में सबसे पहले याद आते हैं अनिल जी। मधेपुरा जिले के नयानगर गाँव के एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में जनमे अनिल कुमार सिंह ने इंटरमीडिएट की परीक्षा में टॉप करके एकबारगी सबका ध्यान आकर्षित किया था। फिर उन्होंने इतिहास विषय से बीए में प्रथम आने के बाद एमए में नये कीर्तिमान के साथ टॉप किया था। अनिल जी की स्मरणशक्ति अद्भुत थी। साथियों की चुनौती का जवाब देने के लिए उन्होंने केवल एक माह में प्रोफेसर पंचानन मिश्र की लिखी लगभग एक हजार पृष्ठ की किताब कंठस्थ कर ली थी। उनसे जुड़े अनेक संस्मरण हैं, जिन्हें बाद में अवसर प्राप्त होने पर लिखूँगा। अभी इतना ही कि रिकार्डतोड़ रिजल्ट के बावजूद उन्हें लम्बा संघर्ष करना पड़ा और अन्ततः जब ठौर मिली तो विधाता ने उन्हें हमसे छीन लिया। उनके गुजर जाने से हम कई दोस्त भी कुछ-कुछ अंशों में मर गये। उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए आगे…
परीक्षा की मुकम्मल तैयारी और स्मरणशक्ति के मामले में इतिहास के नील कंठ पाठक (अध्यापक, केंद्रीय विद्यालय)और जन्तुविज्ञान के राजकिशोर सिंह( प्राचार्य , केंद्रीय विद्यालय।) का भी कोई जवाब नहीं था। पाठक जी तो स्कूली शिक्षा के समय ही पिताजी से प्रति चौपाई एक टॉफी पुरस्कार लेकर पूरी रामचरित मानस याद कर चुके थे। राजकिशोर जी पढ़ाकू ऐसे कि पेशाब करने के लिए भी शौचालय नहीं जाते थे। होर्लिक्स की खाली बोतल में पेशाब करते जाते और भर जाने पर खिड़की से नीचे फेंक देते। नीचे के कमरे वाले मित्र पूछते, “रहि रहि क की फेंके छो हो राजकिशोर जी?” तो जवाब देते, “भरि परिच्छा एहि रंग होथों भाय। नै पोसाय छौं त रूम बदलि ल।” परीक्षा के बाद उन मित्र को पता चल पाया कि वे पेशाब इकट्ठा करके फेंकते थे। उन्होंने परीक्षा के चार माह पूर्व ही अपने सारे नोट्स और किताबों को बक्से में बंद कर दिया था। टेबल घड़ी में एलार्म लगाकर दर्जनों बार उन्होंने मॉक एग्जाम दे दिये थे। उनका सिद्धांत था कि “परीक्षा में दिमाग चलाना जरूरी नहीं है, कलम का काम है उत्तर लिखना।” वे भी वार्डवाद के शिकार हुए और रिजल्ट में दूसरे स्थान पर ढकेल दिये गए। इस श्रेणी में संस्कृत के मोहन मिश्र ( सम्प्रति प्रोफेसर) सहित अन्य कई साथियों का नाम आता था।
इसके उलट फिजिक्स के शम्भु प्रसाद सिंह ( सुप्रीम कोर्ट के वकील। अब स्वर्गीय।), इतिहास के घनश्याम प्रसाद सिंह ( बैंक अधिकारी ) और राजनीतिशास्त्र के विजय कुमार (सम्प्रति प्रोफेसर ) आदि ने सभी पढ़ाकू साथियों को ‘भोंड़’ की उपाधि दे डाली थी। उनका सिद्धांत था कि “इंटेलेक्चुअल लोग रट्टूमल नहीं हो सकते। साहित्य पढ़ो। बहसें करो। कोर्स की किताबें अलमारी में रहने दो।” उन्होंने अपने ग्रुप का नाम ‘इंटेलेक्चुअल क्लब’ रखा था। प्रतिक्रिया में हमने अपने विशाल समूह का नामकरण ‘भोंड़ क्लब’ कर दिया था। बाद में प्रतापगंज वासी मारवाड़ी दोस्त नेपाल चंद गंग ( प्रॉक्टर, लाडनू विश्वविद्यालय। अब स्वर्गीय।) के पिता स्व0 भौम राज गंग के नाम पर ‘भौम क्लब’ कर दिया था। स्थिति यह थी कि इंटेलेक्चुअल क्लब वाले दोस्त हमें जितना चिढ़ाते, हम उतना ही मनोयोग से पढ़ते थे। एक दुर्भाग्यपूर्ण साजिश का शिकार होकर स्व0 शम्भु जी ने पीजी की पढ़ाई छोड़ दी थी और जेएनयू से कानून की पढ़ाई करके सुप्रीम कोर्ट में जम गये थे।
हिंदी के बीए टॉपर और सेकेंड टॉपर को तो दंगल सिंह ने तीसरे नंबर पर आने की चुनौती दे रखी थी, किन्तु उसे अपने लक्ष्य के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा के रूप में दिखाई देते थे राधानंद सिंह ( पुस्तकालयाध्यक्ष, केंद्रीय विद्यालय और अध्यक्ष गया हिंदी साहित्य सम्मेलन। राम साहित्य के मर्मज्ञ।)। उनकी अध्ययनशीलता और स्मरणशक्ति के आगे दंगल सिंह की सरस्वती मन्द हो जाती थी। पर पता नहीं क्यों उनका रिजल्ट मनोनुकूल नहीं हो सका था।
उस दौर में इतिहास में अधिकाधिक पृष्ठ लिखने की होड़ मची रहती थी। पाठक जी और अजय कुमार सिंह (सम्प्रति प्रोफेसर) के बीच की यह प्रतिस्पर्धा खूब चर्चित हुई थी। दोनों हरेक पेपर में 60 पेज के आसपास लिख आया करते थे। मैं सात पत्रों में 32 पेज की कॉपी नहीं भर सका था। केवल एक पेपर में एक अतिरिक्त कॉपी जोड़ने की जरूरत पड़ी थी।
पाठक जी की एक बड़ी कमजोरी को हम साथियों ने शॉकट्रीटमेंट से ठीक किया था। उनका पैसा खत्म होने की स्थिति में उन्हें काफी घबराहट होती थी। हमने पोस्टमैन से उनका मनीऑर्डर सीज करना शुरू किया था। पैसे उनके पास जाने ही नहीं देते थे। कुछ समय के बाद वे बिंदास हो गए थे। इसी प्रकार अपनी-अपनी तमाम कमियों और खूबियों के साथ विनय कुमार चौधरी, विजय कुमार, विवेकानंद राय, महेंद्र झा, श्यामसुंदर ठाकुर, कुमार मोती, पन्ना कुमार सिंह, बलराम सिंह, उदय कुमार मिश्र, सुनील राय, सुधीर सिंह, स्व0 काली चरण सिंह, कृपानाथ सिंह,अशोक सिंह, भवेश झा, धनंजय मिश्र, मिथिलेश कुमार मिश्र, राज शेखर मिश्र, रंजन किशोर, मणिकांत, शेखर सिंह,रणजीत सिंह, शेखर शर्मा, जफ़र अहमद, मुमताज अहमद, शब्बर रजा, ज्ञानानन्द मिश्र, केशव जी, गंगानंद सिंह, सच्चिदानंद भगत, रेवती रमण, मीना सिंह (मौसी), आशा, मंजुला, प्रतिभा, राधा आदि दर्जनों बैचमेट आज याद आते हैं। अपने व्यक्तित्व के निर्माण में मैं अपने उक्त सभी साथियों का योगदान मानता हूँ। इन सभी साथियों के अलावा दर्जनों सीनियर और जूनियर दोस्तों का भी कर्जदार हूँ, जिनपर आगे लिखूँगा।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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