एतिहासिक

दास्तान-ए-दंगल सिंह (42) – पवन कुमार सिंह

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

आन्दोलन का नेतृत्व संभालने के बाद जेपी ने समय-समय पर जो भी आह्वान किये, मैंने एक को छोड़कर सभी का अक्षरशः पालन किया। कुछ का पालन तो अब भी कर रहा हूँ। जेपी के एक अभियान की मैंने सविनय अवज्ञा की थी। उन्होंने स्कूल-कॉलेज छोड़ने और परीक्षाओं के बहिष्कार करने का नारा दिया था। आन्दोलन के दरम्यान मैंने कोई वार्षिक परीक्षा नहीं छोड़ी और यदि कॉलेज खुला हो तो क्लास भी नहीं छोड़ा था। सत्र विलम्बित हुआ, किन्तु इंटरमीडिएट और ग्रेजुएशन की परीक्षाएँ मैंने नियमित सत्र में ही पास कर ली थीं।

जनता पार्टी की सरकार के पतन और पुनः कांग्रेस की वापसी के बाद राजनीति से मोहभंग हो गया और मैं पूरी तरह पढ़ाई में डूब गया। मास्टर डिग्री की कक्षाएँ शुरू होने के कुछ ही हफ्तों बाद परिस्थितिवश भावनाओं में बहकर एक साथी की बेहूदी टिप्पणी के जवाब में मैंने क्लास के मित्रों के बीच सार्वजनिक रूप से घोषणा कर डाली  कि “इस बार मैं ही टॉप करूँगा और कवि मित्र विनय कुमार चौधरी सेकेंड टॉपर होंगे। अन्य प्रतिस्पर्धी साथी तीसरे स्थान के लिए प्रयास करें।” मुझमें एक बड़ा अवगुण यह था कि लगातार अधिक समय तक शांतचित्त बैठकर अध्ययन नहीं कर पाता था। आधा-पौन घंटे में उकताकर उठ जाता, कमरे से निकलकर बरामदे में टहलता और जिस साथी का कमरा खुला दिखता, उसमें घुस जाता। गप्पें लड़ाता अथवा अपने पसंदीदा गायक मुकेश के गीत सुनाता। उस समय विश्वविद्यालय में एक ही पीजी हॉस्टल था जिसमें कुल 110 कमरे थे। ग्राउंड फ्लोर में 55 छात्र प्रथम वर्ष के और फर्स्ट फ्लोर में 55 छात्र द्वितीय वर्ष (फाइनल ईयर) के। स्वाभाविक रूप से सभी विषयों के टॉप थ्री को ही होस्टल में जगह मिल पाती थी। सभी अधिवासी एक-से-एक पढ़ाकू। सबको मेरी गप्पबाजी और मुकेश के उदास भाव वाले गीतों से परेशानी थी। मेरे आतंक से बचने के लिए साथियों ने सामूहिक प्रस्ताव लेकर स्टडी आवर्स में कमरे में बन्द रखने का नियमित कार्यक्रम शुरू कर दिया। सुबह के दो घंटे और शाम के तीन घंटे मुझे कमरे में बन्द करके ताला जड़ दिया जाता। आदत से मजबूर मैं घंटे-आध घन्टे पढ़ाई करने के बाद अकेले गीत गाता या सो जाता था। पढ़ाई की अवधि बढ़ाने और अपने को दबाव में रखने के लिए मैं बराबर टॉप करने की प्रतिज्ञा सार्वजनिक जगहों पर दुहराया करता था। अपने जीवन निर्माता शिक्षकों के विषय में थोड़ा लिखने से काम नहीं चलेगा। विस्तार से आगे लिखूँगा। यहाँ बस इतना ही कि सभी गुरुजनों ने भी मान लिया था कि पवन अच्छे अंकों के साथ फर्स्ट आएगा।

उस समय तक एक परम्परा-सी बन गयी थी कि किसी शिक्षक की संतान यदि बैच में है तो वही टॉप करेगी। इस घृणित परम्परा का शिकार हमारे कई सीनियर हो चुके थे, जिनमें सबसे अधिक मुझे अखरा था तीन साल सीनियर श्री बहादुर मिश्र का टॉप नहीं होना। सम्प्रति श्री मिश्र हमारे विश्वविद्यालय में मानविकी संकाय के डीन हैं। मेरे बैच में मैदान साफ था। वार्ड टॉपर वाली बाधा नहीं थी इस कारण मेरा मनोबल बढ़ा रहता था। शुभचिन्तक साथी भी मुझे प्रण की याद दिलाकर प्रेरित करते थे। सो धीरे-धीरे मेरी तैयारी गति पकड़ने लगी थी। तैयारी के लिए मैंने अपना एक फार्मूला बनाया। कठिन लगने वाले पत्रों की प्राथमिकता सूची बनायी। कुल आठ पत्र थे, जिनमें सबसे कठिन काव्यशास्त्र वाला पत्र था फिर भाषाविज्ञान। वह वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का जमाना नहीं था। 20-20 अंको के कुल पाँच प्रश्नों के उत्तर देने होते थे। प्रश्नों के ट्रेंड के आधार पर दो दर्जन से अधिक सम्भावित प्रश्नों की अपनी सूची बनाकर मैंने सिलसिलेवार तैयारी शुरू की। जो जितना विकट था, उसे पहले पछाड़ा। संदर्भ ग्रन्थों पर आधारित पत्रों के ठोस नोट्स तैयार किये और टेक्स्ट बुक्स पर आधारित पत्रों के टेक्स्ट पढ़ने के साथ-साथ सहायक ग्रंथ पढ़ने की आदत डाली। अपने सारे नोट्स मित्र विनय और विजय को ईमानदारी से शेयर करता रहा था। परीक्षा निकट आने और अपनी लाचारी बताने पर मित्र विवेकानंद  को भी इस शर्त पर नोट्स दिये थे कि वे उन्हें सार्वजनिक नहीं करेंगे और एक बार में एक ही नोट्स लेकर जाएँगे। एक अन्य साथी ने (नाम बताना उचित नहीं है। वे कई साल सीनियर थे और परीक्षा ड्राप करते हमारे साथ आ गये थे।) चाकू दिखाकर मेरे नोट्स छीनने का उपक्रम किया था जिन्हें मैंने उन्हीं की भाषा में ‘समझा’ दिया था। दियारा क्षेत्र का कठिन जीवन जीने और जेपी आन्दोलन की कठिन चुनौतियों का सामना करने के कारण मैं भय पर विजय प्राप्त कर चुका था। उस साथी ने अंत में विनयपूर्वक मुझसे यह वचन ले लिया था कि जैसे-जैसे परीक्षा होती जाएगी उनको नोट्स देता जाऊँगा और वे कॉपी करके लौटाते जाएँगे क्योंकि वे फिर ड्रॉप करेंगे। हुआ भी वैसा ही। पहले पेपर की परीक्षा में उन्होंने बाहुबल से वॉकआउट करवाने का प्रयास किया पर हमने उन्हें सफल नहीं होने दिया। वे अकेले निकले और शाम में हॉस्टल आकर उस पेपर का सारा नोट्स ले गये। फिर न उन्होंने नोट्स लौटाये और न दूसरे पत्रों के नोट्स लेने कभी आये।

बीए ऑनर्स की परीक्षा में एक उद्धरण भूल जाने के कारण तनाव में मेरा एक पेपर खराब हो गया था। उसका असर बाद की परीक्षाओं पर भी हुआ और मैं विश्वविद्यालय में तीसरे स्थान पर अटक गया। एमए में फिर वैसी परिस्थिति उत्पन्न न हो, इसके लिए इस बार यह संकल्प लिया था कि किसी भी पेपर में उद्धरण चिह्न का प्रयोग नहीं करूँगा। किसी का कथन कोट करना यदि जरूरी हो तो बिना उद्धरण चिह्न के ही लिखूँगा ताकि बीए की तरह कलम रोकने और खीझने की नौबत न आने पाये। एक और संकल्प लिया था कि प्रश्नपत्र पूरा नहीं पढ़ूँगा। पहला मनोनुकूल प्रश्न मिलते ही लिखना शुरू कर दूँगा। फिर अगला प्रश्न देखूँगा ताकि दबाव से मुक्त रहकर लिख सकूँ। एमए की परीक्षा के दौरान उक्त दोनों संकल्पों का अनुपालन मैंने किया। प्रश्नपत्र मिलता, मैं देखता और जो भी पहला अनुकूल सवाल मिलता कि पेपर को कॉपी के अंदर घुसाकर  उत्तर लिखना शुरू कर देता। जबतक अन्य साथी सरस्वती वंदना की रश्म पूरी कर पूरा प्रश्नपत्र पढ़ते और लिखना शुरू करने के लिए वार्मअप जैसा कुछ करते, मैं दो से ढाई पेज लिख चुका होता था। दूसरे पेपर में भी ऐसा करते देख भाइयों को बर्दाश्त नहीं हुआ और अफवाह उड़ी कि पवन को पर्चा आउट है। मैं किसको और क्यों सफाई देता! सो ऐसा ही चलता रहा।

पेपरों के बीच एक सप्ताह का गैप था। छठे और सातवें पेपर के बीच लखीसराय वासी साथी अशोक कुमार ट्रेन दुर्घटना में अपना दाहिना हाथ गँवा बैठे। उस अवस्था में भी उन्होंने साहस बनाए रखा और राइटर मिलने पर परीक्षा देने का निर्णय लिया। हम दर्जनों साथी माननीय कुलपति से मिलने गए। पर, हाय रे अंधा कानून! कुलपति ने यह कहकर असमर्थता जताई कि केवल  नेत्रहीन के लिए राइटर देने का प्रावधान है। बाद में हमने सत्याग्रह किया तब अगले साल केवल बचे दो पेपर की परीक्षा के साथ रिजल्ट देने की छूट का समझौता हुआ। एक साल तक अशोक ने बाएँ हाथ से लिखने का अभ्यास करके अगले सत्र में एमए किया था। तत्कालीन विश्वविद्यालय प्रशासन अत्यंत सख्त रवैया अपनाता था। ऊँचे ज्ञान और चाल-चरित्र की शुचिता के कारण  प्रशासन का इकबाल कायम था। इसी परीक्षा की तिथि बढ़ाने की माँग लेकर हम सैकड़ों साथियों ने प्रभारी कुलपति विश्वविख्यात जन्तुशास्त्री प्रो. जे एस दत्तामुंशी का घेराव किया था। उनका दो टूक जवाब था, “बेवकूफ लड़को, दो साल के करीब सेशन लेट है और तुम डेट बढ़ाना माँगता है। नहीं बढ़ेगा। चाहे मेरा मुड़ी काट डालो, डेट नहीं बढ़ेगा।” हम गिड़गिड़ाते ही रहे। ऊँची आवाज भी नहीं निकाल पाए थे। सोचता हूँ आज की परिस्थितियों में वैसे नीतिवान आचार्यों की आज के छात्र क्या गत बना डालते!

परीक्षाओं का परिणाम विभागवार बारी-बारी से आने का चलन था। परीक्षा खत्म होने के बाद दंगल सिंह अपने गाँव में पुराने फॉर्म में मौज मस्ती और शिकार में मगन थे कि याद नहीं किस मित्र का पोस्टकार्ड मिला कि रिजल्ट घोषित हो रहा है, आ जाओ। अगले दिन भागलपुर पहुँच गया। हॉस्टल पहुँचते ही एक दर्जन भुक्खड़ों ने घेर लिया। एडवांस पार्टी दो! टॉप तो करबे करोगे दंगल सिंह। मैं केवल पाँच सौ रुपये लेकर आया था। पूरा जब्त। रात में मुर्गा और भात के साथ मोरारजी भाई की शराबबन्दी का मुर्दाबाद! तीन-चार विषयों के परिणाम आ गए थे। सुबह कार्यालय खुलने से पहले ही दर्जनों साथी परीक्षा विभाग के गेट पर जमा थे। अपनी ईमानदारी और सेवानिष्ठा के लिए विख्यात परीक्षा विभाग के बड़े बाबू चक्रवर्ती दा की हम प्रतीक्षा कर रहे थे। अगली पार्टी के लिए साथियों ने फाइनांस भी कर दिया था। चक्रवर्ती दा आए। सबने समवेत आग्रह किया कि वे हिन्दी का रिजल्ट बता दें। वे अड़ गए कि अभी कंट्रोलर का साइन नहीं हुआ है। आज हो जाएगा। पिछली बेला आओ तो रिजल्ट दिखा देंगे। साथी सिद्धेश्वर बरियार और पिनकाहा थे। उन्होंने चक्रवर्ती बाबू का कन्धा ‘दबाकर’ कहा, “दादा खाली टॉपर का नाम बताइए न!” आश्चर्यजनक रूप से दादा मान गए और पहले अंदर से दरवाजा बन्द कर लिया। फिर दो मिनट बाद दरवाजे की दरार से उनकी आवाज आई, “पवन कुमार सिंह”। आज तक उस दिन चक्रवर्ती दा के मुँह उच्चरित मेरा नाम स्मृति पटल पर अमिट है। उधर अंदर से आवाज आई और साथियों ने मुझे कन्धों पर उठा लिया। उस रात की पार्टी का बजट काफी बड़ा हो गया और मोरारजी भाई की शराबबन्दी की तो ऐसी की तैसी हो गयी थी। अगले दिन परिणाम प्रकाशित हुआ। बहुत ही अच्छा, जैसे कि परीक्षार्थी ने स्वयं सभी पेपरों के अंक भरे हों। सभी पत्रों में बैच में उच्चतम अंक। कोई भी एक पत्र हटा दें तब भी प्रथम वर्ग। जितने-जितने अंकों का अनुमान किया था लगभग उतना ही। बिल्कुल संतुलित मनभावन मार्कशीट। प्रमाणपत्र प्रथम वर्ग में प्रथम। केवल पाँच सौ रुपये का चेक, जिसे भुनाने के लिए एकाउंट खुलवाने की लाचारी। कहने को गोल्डमेडेलिस्ट,किन्तु आजतक गोल्ड मेडल के दर्शन नहीं।

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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