एतिहासिक

दास्तान-ए-दंगल सिंह (41) – पवन कुमार सिंह

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

आपातकाल की समाप्ति के बाद 1977 का आमचुनाव एक बड़े उत्सव की तरह था। 18 जनवरी 1977 को अचानक इमरजेंसी वापस लेकर और आमचुनाव की घोषणा करके इंदिरा जी ने हर खासोआम को चौंका दिया था। सारे राजनेता और आन्दोलनकारी जेल से रिहा कर दिये गये। टुकड़ों में बिखरा विपक्ष जेपी के नेतृत्व में एकत्रित होने की तैयारी करने लगा। मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी आदि ने गठबन्धन की रूपरेखा तैयार कर ली थी।  जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़कर इंदिरा जी को हतप्रभ कर दिया। किन्तु चाटुकारों से घिरी इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी को यह खुशफहमी थी कि इमरजेंसी के दौरान किये गए विकास और कल्याण के कार्यों से जनता प्रसन्न है, इसलिए उन्हें चुनाव में फायदा होगा। इधर जेपी के आह्वान पर शायद 23 जनवरी 1977 को दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में गैरवामपंथी सम्पूर्ण विपक्ष का समागम  हुआ और ‘जनता पार्टी’ नाम से एक नयी पार्टी का गठन किया गया। सभी पार्टियों का उसमें विलय हुआ और पूरी एकजुटता व दमखम के साथ चुनाव की तैयारी शुरू हो गई। उम्मीदवारों के चयन में सभी छोटे-बड़े मतभेद जेपी के हस्तक्षेप से दूर हो गए।

सारे-के-सारे आन्दोलनकारी युवा स्वतःस्फूर्त राजनीतिक कार्यकर्ता में परिणत हो गए। जेपी ने आह्वान किया कि कार्यकर्ता मतदाता से ‘एक नोट और एक वोट’ के लिए आग्रह करें। कार्यकर्ताओं की टोलियाँ जी-जान से इस अभियान में जुट गयीं। आम जनमानस में संजय गाँधी की जबरन नसबन्दी का खौफ समाया हुआ था। इस खौफ को आमचुनाव में खूब भुनाया गया। अशिक्षित और मासूम जनता को हमलोग बताते-समझाते थे कि यदि कांग्रेस जीतेगी तो सबकी नसबन्दी कराएगी। इसका अभूतपूर्व असर हुआ था। उत्तरी भारत की जनता में कांग्रेस के प्रति भीषण गुस्सा था।

सीमान्त क्षेत्र होने के कारण कुर्सेला पर कटिहार और खगड़िया दोनों लोकसभा क्षेत्रों का प्रभाव था। कटिहार से युवराज (जनता पार्टी) और तारिक अनवर (कांग्रेस) तथा खगड़िया से ज्ञानेश्वर प्रसाद यादव (जनता पार्टी) और जय नारायण मेहता (कांग्रेस) के बीच सीधा मुकाबला था। एक तरफ चक्र हलधर किसान और दूसरी तरफ गाय और बछड़ा चुनाव चिह्न। हमारे दरवाजे पर ठेक (बखार) की दीवार पर बाबूजी ने गाय-बछड़े का भित्तिचित्र बनवा रखा था, जिसके कारण लोग हमारे परिवार को खाँटी कांग्रेसी मानते थे। किन्तु वस्तुस्थिति बिल्कुल भिन्न थी। बाबूजी के सिवा परिवार का सारा वोट जनता पार्टी को जाने वाला था। अपने गाँव के सभी साथियों ने प्रण लिया था कि इस बूथ पर एक भी वोट कांग्रेस को नहीं जाएगा। इस प्रण के पूरा होने में सबसे बड़ी चुनौती थी बाबूजी को मनाना। हम लड़कों में तो उनका सामना करने का माद्दा नहीं था, सो उनके हमउम्र बसुहार के सूर्यवंश बाबा और लल्लन चाचा को हमने आग्रह करके यह जिम्मेदारी सौंपी थी। वे दोनों बाबूजी को समझाने उनके पास गये भी थे। पर बाबूजी का दो टूक जवाब था, ” हम तो कांग्रेस को ही वोट देंगे। अगर ये आन्दोलनकारी लड़के हमें वोट गिराने से रोक सकें तो रोक लें।” उन्हें रोकने का प्रयास हमारे लिए कल्पनातीत था। गाँव के मतदान केंद्र पर 90 प्रतिशत से भी अधिक मतदान हुआ किन्तु बाबूजी का एक वोट कांग्रेस को मिल ही गया और हमारा प्रण टूट गया।

चुनाव का परिणाम आशानुरूप ही हुआ। इंदिरा गाँधी और पुत्र संजय गाँधी दोनों की हार सहित सम्पूर्ण उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया। मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच प्रधानमन्त्री के पद को लेकर थोड़ी हील-हुज्जत हुई। जेपी के हस्तक्षेप से मामला सुलझा और मोरारजी भाई को प्रधानमन्त्री चुना गया। राजघाट में महात्मा गाँधी की समाधि के सम्मुख मंत्रिपरिषद को शपथ दिलाई गई।

मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार चल तो रही थी, पर अलग- अलग विचारधारा के घटकों से बने इस अवसरवादी कुनबे में अन्तर्विरोध लगातार बढ़ता  जा रहा था। आम जनता की आकांक्षाओं के विपरीत अन्दर ही अन्दर धींगामुश्ती शुरू हो गई थी। डायलिसिस के सहारे अपने जीवन के बचे-खुचे दिन काट रहे जेपी बेबसी से सबकुछ देख रहे थे। दो साल बीतते-बीतते कुनबा बिखरने लगा। इस बिखराव ने इंदिरा जी को राजनीति करने का अनुकूल अवसर प्रदान किया और जनता पार्टी ध्वस्त हो गई। इस ध्वंस से जेपी को कितनी पीड़ा हुई होगी, इसे मुझ जैसे हजारों कार्यकर्ताओं ने जरूर महसूस किया होगा। मेरा तो राजनीति से ऐसा मोहभंग हुआ कि राजनेताओं से ही नफरत हो गई। आज मेरी मानसिक दशा ऐसी है कि जिस व्यक्ति को सिर से पाँव तक सफेद पोशाक में देखता हूँ उसे अन्दर से उतना ही काला मानकर घृणा करने लगता हूँ।

इमरजेंसी में जेल की यातना सहने के बाद रिहा होने पर जेपी लगातार बीमार ही रहे। अपनी जिजीविषा के कारण डायलिसिस के सहारे भी वे लगभग ढाई साल जी गए। किन्तु मेरे मन में यह धारणा अमिट हो गई है कि उन्हें कैद के दरम्यान धीमा जहर देकर बीमार बनाया गया था। उनकी सुनियोजित हत्या की गई थी। इस देश में गाँधी जी, इंदिरा जी और राजीव जी की हत्या के कारणों का पता तो सबको है; किन्तु नेताजी सुभाषचंद्र, दीनदयाल उपाध्याय, गोपाल सिंह नेपाली, लालबहादुर शास्त्री, डॉ0 लोहिया, होमी जहाँगीर भाभा सहित दर्जनों परमाणु वैज्ञानिकों, संजय गाँधी, राजेश पायलट, माधव राव सिंधिया आदि की रहस्यमयी मृत्यु की गुत्थी आमजन को काफी बेचैन करती है। इस बेचैनी का मैं भी शिकार हूँ।

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

One thought on “दास्तान-ए-दंगल सिंह (41) – पवन कुमार सिंह

  1. Dr Kirti Vardhan Gautam Reply

    Superbbb….it should soon be converted into a life long book form …..we are desperately waiting to see it….and Sir u should continue writing more….”achcha likhte ho aap Sir”….

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