एतिहासिक

दास्तान-ए-दंगल सिंह (50)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

1983 के सेलेक्शन कमेटी के द्वारा नियुक्ति में झटका खाने के बाद हमें पहली बार यह महसूस होने लगा कि हम बेरोजगार हो गये हैं और अब लम्बा संघर्ष का दौर शुरू हो चुका है। कहीं भी ठौर ढूँढ़ लेने की अधीरता में हम जहाँ-तहाँ अप्लाई करने लगे थे। इसी क्रम में पता चला कि सोनपुर के रेलवे कॉलोनी में रेल कर्मियों और स्थानीय लोगों के संयुक्त उद्यम से एक डिग्री कॉलेज खोला गया है। उसमें वेतन भुगतान के प्रावधान सहित व्याख्याताओं की नियुक्ति के लिए वॉक इन इंटरव्यू आयोजित किया गया था। मैं और अनिल जी वहाँ पहुँच गये। वहाँ पहली बार इस सच्चाई से सामना हुआ कि अच्छा रिजल्ट भी कहीं अयोग्यता का आधार बन सकता है। बारी-बारी से हम दोनों को इंटरव्यू में एक ही बात कही गयी कि हम उनके काम की चीज नहीं हैं। हमारा कॅरिअर अच्छा है अतः हम देर-सबेर कॉलेज छोड़कर चले जाएंगे। उन्हें कमजोर रिजल्ट वाले लोग चाहिएँ जो वहीं टिके रहें। अनिल जी से यह भी पूछा गया था कि “मार्कशीट में नम्बर विश्वविद्यालय से भरा गया कि आपने अपने से भर लिया है?”
जवाब था, “सर, खुद नहीं भरा है। हाँ, नम्बर देने वालों को मजबूर जरूर किया है।”
दूसरा कड़वा अनुभव बंगाल में हुआ। पश्चिम बंगाल लोक सेवा आयोग से हिंदी लेक्चरर के दो पदों की रिक्ति विज्ञापित हुई थी। दोनों पद सामान्य वर्ग के लिए थे। डॉ0 राधानंद सिंह ( सहपाठी, जिन्हें हम आदर से भैया बुलाते हैं और जिन्हें मैं अपने टॉप करने के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौती मानता रहा था।) के साथ मैंने उसमें अप्लाई कर दिया। एक-डेढ़ महीने बाद हमें साक्षात्कार के लिए पत्र प्राप्त हुआ। कलकत्ता के राइटर्स बिल्डिंग में इंटरव्यू देना था। निर्धारित तिथि के दो दिन पहले ही हम दोनों कलकत्ता पहुँच गये थे। दोनों अलग-अलग अपने रिश्तेदारों के यहाँ ठहरे थे। चिठ्ठी मिलने के बाद से लगातार इंटरव्यू के लिए खूब पढ़ रहे थे। तैयारी कलकत्ता तक जारी थी। रिपोर्टिंग टाइम से थोड़ा पहले ही हम साक्षात्कार स्थल पर पहुँच गये थे। हमें एक वेटिंग रूम में बैठकर इंतजार करने को कहा गया। वहाँ लगभग आधे घंटे तक इंतज़ार के बाद दो युवक और उपस्थित हुए। चारों आसपास ही बैठे बातें करने लगे। परिचय होने पर मालूम हुआ कि वे दोनों भी बिहारी हैं, किंतु उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। फिर कॅरिअर पर बातें हुईं तो पाया कि हम दोनों के मुकाबले वे दोनों बहुत ही कमजोर हैं। मेरे मन में लड्डू फूट रहे थे कि यह नौकरी तो अब हमें मिल ही जाएगी, क्योंकि अबतक कोई पाँचवाँ अभ्यर्थी आया नहीं था। हमारी आशाओं पर तब पानी फिरता प्रतीत हुआ जब उनमें से एक ने हमसे पूछा, “बन्धु, आप दोनों भी पार्टी कैडर हैं क्या?”
मैंने जैसे तन्द्रा से जागकर प्रतिप्रश्न किया, “क्यों, क्या ऐसा होना जरूरी है?”
“हाँ, बुरा मत मानिए, किन्तु जान लीजिए कि आज के दौर में बंगाल में जॉब पाने की यह अनिवार्य योग्यता है कि आप कम्युनिस्ट पार्टी के कैडर हों और इस बात का पक्का प्रमाण आपके पास हो।”
“तो क्या आप दोनों कैडर हैं?”
“हाँ हैं। यह नौकरी हमें ही मिलेगी। पर आप दोनों से विनती है कि इंटरव्यू छोड़कर मत जाइए। एक रिक्त पद पर कम-से-कम दो अभ्यर्थी आवश्यक है अन्यथा यह प्रक्रिया निरस्त हो जाएगी। फिर से आग्रह है कि इंटरव्यू देकर जाएँ।”
इस वार्तालाप के बाद मेरे ऊपर निराशा हावी होने लगी थी, फिर भी अपने बेहतर रिजल्ट के कारण मन के किसी कोने में आशा की लौ टिमटिमा रही थी। अपने-अपने नाम-पते के आदान-प्रदान के बाद हम इंटरव्यू की प्रतीक्षा करने लगे।
इंटरव्यू बोर्ड के रवैये से तो मुझे तवे से सीधे चूल्हे में गिर जाने का अहसास हुआ था। बोर्ड में अध्यक्ष सहित पाँच लोग थे। स्थान ग्रहण करने को अंग्रेजी में कहा गया और फिर बंगला का बोलबाला शुरू हो गया। वह तो गुरुजी राधा बाबू के आशीर्वाद से मैं बंगला शत- प्रतिशत समझने लगा था, सो उनके प्रश्नों का उत्तर हिंदी में दिये जा रहा था। मैंने कहा भी कि मैं बंगला भाषा पढ़ना-लिखना जानता हूँ। मैंने एमए में एक पत्र के रूप में इसकी पढ़ाई भी की है। केवल अभ्यास की कमी के कारण धाराप्रवाह बोल नहीं सकता। मुझे बताया गया कि इस पदपर नियुक्ति के लिए बांग्लाभाषी होना जरूरी है। मैंने विनम्रता से प्रतिवाद किया कि यदि ऐसा था तो विज्ञापन में उसका उल्लेख होना चाहिए था। खैर जो भी हो, हिंदी भाषा और साहित्य से संबंधित बंगला में पूछे गये सवालों के हिंदी माध्यम में दिये गये संतोषप्रद जवाबों के बावजूद बोर्ड द्वारा मुझे विश्वास दिला दिया गया कि वह नौकरी हमें नहीं मिलने जा रही थी। राधा भैया के साथ भी यही सब हुआ था। सो बड़े बेआबरू होकर बंगाल के उस कैडर वाले कूचे से निकलते हुए हम गुस्से से उबल रहे थे। वहाँ से वापस भागलपुर आने तक हम दोनों कम्युनिस्ट बंगालियों को गालियाँ देते नहीं अघाए थे और हमने कसम खायी थी कि अब कभी नौकरी के लिए बंगाल में अप्लाई नहीं करेंगे।
अंदर तक झकझोरकर दिल तोड़ देने वाली इस दुर्घटना के लगभग दो महीने बाद मुझे उन दोनों अभ्यर्थियों में से एक का लिखा पोस्टकार्ड मिला। लिखा था कि उन दोनों की नियुक्ति हो गयी है। एक की जादवपुर यूनिवर्सिटी और दूसरे की वर्द्धमान यूनिवर्सिटी में। इंटरव्यू छोड़कर नहीं भागने के लिए पत्र में सादर आभार प्रकट किया गया था। भविष्य के लिए शुभकामनाओं और आगे भी संपर्क बनाए रखने के आग्रह के साथ पत्र समाप्त किया गया था।
(क्रमशः)

 

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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