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अम्बेडकर के बिना अधूरा है दलित साहित्य

समाज परिवर्तनशील है तो समाज की मान्यताएँ भी परिवर्तनशील होनी चाहिए और परिवर्तनशील समाज का साहित्य भी परिवर्तशील होना चाहिए, क्योंकि साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है और दर्पण में वही दिखना चाहिए जो सामने है। क्या भारतीय साहित्य में या हिन्दी साहित्य में दलित समाज का वास्तविक रूप दिखलाया गया है? मेरे विचार से यदि ऐसा हुआ तो आज दलित साहित्य की आवाज नहीं उठती। दलित साहित्य, लेखन की बात करना यह साबित करता है कि साहित्य में समाज के प्रमुख अंग को उपेक्षित किया गया है।

            इक्कीसवी सदी में दलित समाज को लेकर मन में कई तरह के प्रश्न आते हैं-क्या भारत की जाति¬ व्यवस्था कभी समाप्त हो पायेगी? क्या इस व्यवस्था से पीड़ित और अपमानित लोगों को कभी मुक्ति मिल पायेगी? आज भी भारतीय समाज व्यवस्था में सदियों से विशिष्ट वर्ण-व्यवस्था और जाति-प्रथा का प्रबल वर्चस्व रहा है। जाति-प्रथा की घृणित सामाजिक सच्चाई के कारण ही अनेक भारतीयों को सामाजिक न्याय और सम्मान से वंचित होना पड़ा तथा व्यक्ति जन्म एवं कर्म से ही गुलाम हो गया। भारतीय समाज की इस रूढ़िवादी वर्ण-व्यवस्था के कारण ही दलित असम्मान का पात्र बना रहा, चाहे वह सर्वगुण सम्पन्न हो, कार्य कुशल हो, अपनी मेहनत से ऊँचे पद पर क्यों न हो पर जाति भेद के कारण दलितों को सामाजिक, मानसिक प्रताड़ना और अत्याचारों से जूझना पड़ता है। जातिवाद के कारण ही बुद्ध, सावित्री बाई फुले, ज्यातिबा फुले और बाबा साहब अम्बेडकर की देशभक्ति पर उंगली उठाई गई।

युग के बदलते परिवेश के साथ-साथ अमानवीय विकृत वर्ण-व्यवस्था, धर्म-व्यवस्था, जाति भेद तथा सामंती मानसिकता की सोच के विरुद्ध विद्रोह करने में भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने कड़ा संघर्ष किया है। उन्होंने दलितों को नारा दिया-शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो। वह चाहते थे कि दलित वर्ग शिक्षित होकर अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हो क्योंकि आज भी भारतीय समाज जिन्हें अस्पृश्य या अछूत कहता है उनका घर आज भी गाँव के बाहर दक्षिण दिशा में मिलता है। आज भी बहुत कम वेतन में चैबीस घंटे श्रम करने वाले तथा गंदे काम करने के लिए मजबूर हैं। आज भी दुर्गम पहाड़ों, वनों तथा जंगलों में जीने के लिए मजबूर हैं। वर्तमान में पूंजीवादी

व्यवस्था के कारण आर्थिक दृष्टि से आज भी दुर्बल है क्यों, वह इसलिए कि आज भी अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और गरीब होता जा रहा है।

आज हम जब प्राचीन इतिहास और साहित्य को उठा कर देखते है तो दलितों को लिए दास, दस्यु, शूद्र, चंडाल, अत्यन्ज, अस्पृश्य, अछूत जैसे शब्दों का प्रयोग मिलता था। ऐसे शब्दों के माध्यम से दलितों की पहचान होती थी क्योंकि भारत की चातुर्वण्य व्यवस्था में प्राचीन प्रजातियों को शूद्रों की श्रेणी में रखा जाता था। समाज में बहिष्कृत शूद्रों को स्पर्श करने से व्यक्ति अपवित्र हो जाता था। इस मान्यता के आधार पर शूद्रों को ‘अस्पृश्य’ कह कर पुकारा जाने लगा था जिसे आज भारतीय संविधान में ‘अनुसूचित जाति’ कह कर पुकारा जाता है।

साहित्यिक दृष्टि से देखें तो हिन्दी साहित्य का अध्ययन भारतीच एवं पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तों के आधार पर हुआ है। इस साहित्य परम्परा में दलित दृष्टि को कोई स्थान प्राप्त नहीं हुआ है। यत्र-तत्र हिन्दी साहित्य में शूद्रों की दीन-हीन दशा एवं छुआछूत का वर्णन अवश्य हुआ है। परन्तु आज पारम्परिक साहित्य शास्त्र से अलग हटकर दलित सैद्धान्तिकी का स्वरूप विकसित हो रहा है। भारतीय साहित्य में दलित सैद्धान्तिकी का प्रथम स्वरूप् बौद्ध साहित्य में स्पष्ट होता है। बौद्ध साहित्य में सामाजिक समरसता एवं दलित क्रान्ति का दर्शन दृष्टिगोचर होता है। महात्मा बुद्ध विश्व के प्रथम महापुरुष थे जिन्होंने उद्घोष किया था। ‘अन्त दीपो भव, अन्त नाथो भव’ अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो। ये वाक्य दलित साहित्य का सिद्धान्त बनकर सामने आया। पालि साहित्य में 51 विभुओं, 15 भिक्षुणियों, 18 उपासकों, 6 उपासिकाओं सहित 90 दलितों का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने बौद्ध धर्म में उच्च स्थान प्राप्त किया था. आगे चलकर बौद्ध धर्म की शाखाओं से सिद्वों और नाथों की परम्परा का जन्म हुआ। हिन्दी साहित्य में परम्परा का जन्म हुआ। हिन्दी साहित्य में 84 सिद्धों और 9 नाथ कवियों का उल्लेख मिलता है। इनमें दलित कवियों की संख्या पर्याप्त मात्रा में देखने को मिलती है। इन कवियों ने जन भाषा अपभ्रंश में सामाजिक समरसता के विचारों को अभिव्यक्ति दी। आगे चलकर महाराष्ट्र में नाथ सिद्धों की शाखा से वारकरी सम्प्रदाय उत्पन्न हुआ। इस सम्प्रदाय में संत नामदेव, संत एकनाथ, संत तुकराम ने हिन्दी में रचनाएं की है। इनकी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए तेरहवीं-चैदहवीं सदी में संत काव्य धारा का जन्म हुआ। संत काव्य परम्परा में कबीर, रविदास, गुरु नानक, दादू दयाल, पलटूदास, मलूकदास, सुन्दरलाल, रज्जन आदि संत है। इनमें अधिकांश संत निम्न कही जाने वाली जातियों से हैं। इन संत कवियों ने अपने साहित्य में वर्ण-व्यवस्था, मूर्ति-पूजा, अवतारवाद, आडम्बरों का विरोध किया है। इस धारा ने निराकार ब्रह्म की स्थापना कर सामाजिक समरसता के साहित्य की रचना की।

संत साहित्य परम्परा की लगभग दो शताब्दियों प्श्चात् साहित्य की दलित धारा भारत की लगभग सभी भाषाओं में पुनः उभरती दिखायी देती है। इसका कारण था कि भारत में अंग्रेजी राज के स्थापित हो जाने एवं ईसाई मिशनरियों द्वारा अछूतों में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार हुआ। इस नवजागरण काल में प्रायः सभी भाषाओं में दलित रचनाकार हुए जिन्होंने साहित्य की रचना की। साहित्य की इस दलित धारा में महात्मा ज्योतिबा फुले का नाम अग्रणी है। ज्योतिबा फुले ने निबन्ध, संवाद पत्र, वैचारिक लेखन, काव्य रचना इत्यादि विधाओं में अपने साहित्य को लिखा है। सामाजिक कुरीतियाँ, नारी शिक्षा, समानता उनके साहित्य का मुख्य विषय है। इसी क्रम में केरल में जाति से मछुआरे अछूत कवि के.पी. करुपन हुए जिन्होंने सन 1913 ई0 में शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन का नया विन्यास करते हुए ‘जाति कुम्भी’ नाम से कविता लिखी। केरल के दलित साहित्य की पृष्ठभूमि में नारायण गुरु का आन्दोलन है। नारायण गुरु के शिष्य थे कुमारान आशान जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से जाति-प्रथा पर कुठाराघात किया। इसी प्रकार तमिलनाडु में आत्मसम्मान और काली कमीज आन्दोलन चलाने वाले पेरियार ई.वी. रामस्वामी नायकर, साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय रहे। पेरियार रामास्वामी नायकर के आन्दोलन को उत्तर भारत में चलाने के श्रेय ललई सिंह यादव को हैं। ललई सिंह यादव के बाद आदि हिन्दू आन्दोलन का नारा देने वाले स्वामी अछूतानन्द ने साहित्य सृजन के द्वारा दलित समाज में  क्रान्ति चेतना प्रवाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उन्होंने दलित समाज में जागृति के लिए दलित महापुरुषों को अपने साहित्य का विषय बनाया। दलितों को इस देश का मूल निवासी सिद्ध करते हुए उन्हें आदि-हिन्दू नाम दिया।

अतः बौद्ध धर्म के उदय से लेकर स्वामी अछूतानन्द तक साहित्य में दलित दृष्टि को स्थान अवश्य मिला है परन्तु सीमित अर्थो में। आज का दलित साहित्य जिस समग्रता से विकसित हुआ है उसमें इस साहित्य का योगदान महत्वपूर्ण है। अतः इन साहित्यकारों की रचनाओं में दलित साहित्य की नींव खड़ी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिसे भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर के उदय ने दलित दर्शन के रूप में परिवर्तित कर दिया।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर को अपनी पुस्तकें अपनी संतान से भी बढ़कर प्रिय हैं। वे कहते हैं, “पुस्तकें लिखते हुए समय कैसे बीता जाता है, यह मेरी समझ में नहीं आता। लेखन करते समय मेरी पूरी शक्ति एकत्रित होती है । मैं भोजन की परवाह नहीं करता मैं कभी-कभी तो रात भर पढ़ता लिखता बैठा रहता हूँ मैं उस समय कभी नहीं ऊबता, न ही मैं बहुत निरूत्साही और असंतुष्ट हो जाता हूँ, मेरे चार पुत्र होने पर जितना आनंद होता, उतना मुझे मेरी पुस्तक के प्रसिद्ध होने पर होता है।” बाबा साहब और पुस्तकों का रिश्ता कितना अटूट और प्रियकर है यह उपरोक्त कथन से स्पष्ट हो जाता है। बाबा साहब के पुस्तक प्रेम उनकी साहित्य से मानवतावादी विचारों की अपेक्षा तथा लेखक की आम आदमी के प्रति विचार की धारणा, कितनी यथार्थवादी ओर जीवोन्मुखी है यह दिखाई देती है।”

डॉ. भीमराव अंबेडकर का कहना है कि आम आदमी की महत्ता से प्रेरणा लेकर लेखकों को लेखन करना चाहिए। वे कहते हैं, ‘अपनी साहित्य की रचनाओं में उदात्त जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों को परिष्कृत कीजिए। अपना लक्ष्य सीमित मत रखिए। अपनी कलम की रोशनी को इस तरह से परिवर्तित कीजिए कि गाँव, देहातों का अंधेरा दूर हो। यह मत भूलिए कि अपने देश में दलितों और उपेक्षितों की दूनिया बहुत बड़ी है। उसकी पीड़ा और व्यथा को भली-भाँति जान लीजिए और अपने साहित्य द्वारा उनके जीवन को उन्नत करने का प्रयास कीजिए। उसमें सच्ची मानवता निहित है।’ बाबा साहब का साहित्यिक विचार मानवतावाद पर आधारित है।’

वर्तमान समय में दुनिया का अधिकांश सर्वश्रेष्ठ साहित्य आजादी की चाह के लिए ही लिखा जाता है। अगर हम भारतीय संदर्भ में बात करे तो यहाँ के दलित साहित्य में भी सदियों से प्रताड़ित, शोषित, दमित, पराजित दलितों की आवाज और आकांक्षा व्यक्त होती है। दलित साहित्य में सामाजिक ऐतिहासिक, अनुभवों की गहरी अभिव्यक्ति और मानव जीवन की दशाओं के बारे में अपनी अलग अंतर्दृष्टि है इसमें विरोध एवं आक्रोश का स्वर है इसमें ब्राह्मणवादी व्यवस्था से पीड़ित और प्रताड़ित व्यक्ति की आवाज सुनाई देती है, इसमें व्यवस्था से आजादी या स्वतन्त्रता के साथ समता और बंधुत्व की भावनओं की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है।

अतः वर्तमान में हिन्दी दलित साहित्यकार अपनी धारदार कलम से कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, संस्मरण, इतिहास एवं आलोचना आदि विधाओं के माध्यम से दलित एवं शोषित समाज को प्रकाश और ऊर्जा प्रदान कर रहे है। वर्तमान में हिन्दी दलित साहित्य आन्दोलन हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा बन चुका है। दलितों की प्रतिष्ठा, सम्मान और अस्मिता, शिक्षा, संघर्ष और संगठन, तार्किक सोच आदि सब मुद्दे जो मनुष्यता की जरूरी शर्तें है जिसे दलित साहित्य उठाता है। अतः दलित साहित्यकार जहाँ अपनी कृतियों में समानता, भाईचारा और नस्ल या रंग के आधार पर किसी भी विभेद को नकारता है, वहीं वह धर्म, धन, सत्ता, दर्शन और जन्म के आधार पर किसी श्रेष्ठता और निकृष्टता की अवधारणा को भी अस्वीकार है। इस प्रकार वह केवल दलित के लिए ही नहीं वरन् पूरे समाज के लिए इन विभेदों को मिटाना चाहता है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर का मानना है कि दलितों को स्वयं अपना नेतृत्व विकसित करना चाहिए। दलित साहित्य का नेतृत्व निश्चित रूप से दलितों के हाथ में होना चाहिए अन्यथा वह अपना असली स्वरूप खो बैठेगा। यही बात साहित्यिक संगठनों पर लागू होती है। आज दलित पत्रिकाओं, दलित सम्मेलनों, गोष्ठियों, सभाओं ने भी सामाजिक चेतना के पक्ष में सार्थक कार्य कर परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है।

आज का दलित साहित्यकार आधुनिकता बोध से अपने समाज, इतिहास और परम्परा का मूल्यांगन करके मानतावाद के लिए संघर्ष कर रहा है। आज ओमप्रकाश बाल्मीकि, प्रो0 तुलसीराम, डॉ. जयप्रकाश कर्दम, मोहनदास नैमिशराय, श्री माता प्रसाद, श्री बुद्धराज हंस, डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, कंवल भारती, डॉ. धर्मवीर, प्रो. कालीचरण स्नेही, शरण कुमार लिबांले, श्यौराजसिंह ‘बेचैन’, रजतरानी ‘मीनू’, डॉ. रामचन्द्र, रमणिका गुप्ता, सुनील कुमार ‘सुमन’, दयापतार, मलखान सिंह, विमल थोराट, अनीता भारती, रूपनारायण सोनकर आदि ऐसे अनेक बुद्धजीवि दलित साहित्यकार सामाजिक चेतना को उन लोगों तक पहुँचाने में लगे हैं जो सदियों से असह्य शीत में काँपते रहे हैं. आज जो दलित साहित्यकारों को डॉ. अम्बेडकर ने जगाया, चेताया, शिक्षा का महत्व समझाया और दुनिया को बदलने के लिए उसकी प्रस्थापित विषम व्यवस्था को तोड़ने का आह्वान किया.

आज दलित साहित्य के मूल में बोधिसत्व डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जीवन दर्शन है। आज भिन्न-भिन्न प्रदेशों के लोग अपनी-अपनी प्रादेशिक भाषाओं में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के सभी आन्दोलनों से प्रेरित होकर आत्मकथा, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, गीत आदि लिखने लगे है। बौद्ध धर्म स्वीकार करने से पूर्व ही बोधिसत्व डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने तीन सूत्र – शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो का नारा दिया। आज दलित साहित्य की पृष्ठभूमि में ये तीनों सूत्र विधमान है। अतः मानव मुक्ति की लड़ाई में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भारतीय समाज व्यवस्था पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। उन्होंने भारतीय समाज व्यवस्था को नकारा ही नहीं उसके विरुद्ध संघर्ष भी किया। उनके इन्हीं विचारों में दलित साहित्य के बीज छिपे हैं। डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा सम्पादित एवं प्रकाशित मूकनायक, बहिष्कृत भारत, समता प्रबुद्ध भारत इत्यादि पत्रिकाओं में दलित चेतना के स्वरों को प्रमुखता दी गयी। डॉ. अम्बेडकर के इन्हीं विचारों को दलित साहित्य की आरम्भिक अवस्था कही जा सकती है। इन्हीं पत्रिकाओं द्वारा दलित साहित्य के सम्बन्धित बहुत सा साहित्य प्रकाशन में आया इसलिए डॉ. भीमराव अम्बेडकर को दलित साहित्य का प्रेरणा स्रोत कहा जाता है।

 

आशीष कुमार ‘दीपांकर’

लेखक हिन्दी विभाग, छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर में शोध छात्र हैं

ashishdipankar27@gmail.com

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