देशकाल

वर्तमान चुनौतियाँ और समाजवादी विकल्प – आनन्द कुमार

 

  • आनन्द कुमार

 

आज दुनिया के सामने क्या मुख्य चुनौतियाँ हैं? विश्व के स्तर पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के अनुसार ‘सतत विकास लक्ष्य’ को 2030 तक प्राप्त करने की चुनौती है| इसमें 17 मुख्य चुनौतियाँ और 169 लक्ष्य हैं| यह सितम्बर, 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के शिखर सम्मलेन में अपनाया गया| इसे ‘गरीबी के सभी आयामों को समाप्त करने के लिए एक साहसिक और सार्वभौमिक समझौता’ बनाया गया जो व्यक्तियों के लिए, पृथ्वी के लिए, और समृद्धि के लिए एक समान, न्यायपूर्ण, और सरक्षित विश्व को संभव बनाएगा| निर्धनता उन्मूलन, भुखमरी का खात्मा,  सबको स्वस्थ जीवन, समावेशी न्यायसंगत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता व् महिला सशक्तिकरण, सभी के लिए पानी और स्वछता, सभी के लिए किफायती ऊर्जा, सभीके लिए पूर्ण रोजगार और आर्थिक विकास, राष्ट्रों के अन्दर और उनके बीच गैरबराबरी ख़तम करना,और शांतिपूर्ण और समावेशी सामुदायिक जीवन को सभी को न्याय और जवाबदेह संस्थाओं के जरिये संभव बनाना मुख्य लक्ष्य हैं|

क्या इन चुनौतियों को पूंजीवाद या तानाशाही के जरिये हासिल किया जा सकता है? हमारा दावा यह नहीं है कि इन चुनौतियों का समाजवाद से ही सामना हो पायेगा| लेकिन इतना तो कहने का हक़ बनता है कि इनमें से अधिकांश सपनों को समाजवादी दर्शन, सिद्धांत और आन्दोलनों ने ही जनम दिया है| इसलिए समाजवादी विमर्श को महत्व दिए बिना इन लक्ष्यों को समझना और पाना दोनों कठिन होगा| वैसे बहुचर्चित इतिहासकार युवाल नोआह हरारी की ताजा किताब ‘इक्कीसवीं सदी के लिए 21 सबक’(लन्दन, पेंगुइन, 2018) के अनुसार तो दुनिया के सामने आज टेक्नोलाजी और राजनीति की दुहरी चुनौती है| टेक्नोलाजी के कारण एक तरफ रोजगार और सुरक्षित जीवन को खतरा है और दूसरी तरफ स्वतन्त्रता, न्याय, मानवीयता और समानता का लक्ष्य दूर होता जा रहा है| जबकि राजनीति की नयी करवट से राष्ट्रवाद और धर्म में नया गंठजोड़ हो गया है| आतंकवाद, युद्ध, और असत्य प्रचार इस नयी राजनीतिक संस्कृति के वाहक हैं| आध्यात्मिकता, सहनशीलता और धर्मनिरपेक्षता के प्रति आस्था में कमी आ रही है| लेकिन इस प्रसंग में भी  व्यक्ति और समाज, तथा  राष्ट्र और विश्व की परस्पर निर्भरता के समाजवादी दर्शन से बिना जुड़े आगे बढ़ने की कोई राह नहीं बनायी जा सकती है|

हमें इस बात का गर्व है कि भारत विश्व की सबसे बड़ी प्रजातान्त्रिक व्यवस्था है| 2011 की जनगणना में भारतीयों की औसत जीवन अवधि 68 वर्ष हो चुकी थी|हमारी जनसँख्या में स्त्री-पुरुष अनुपात 960 महिला प्रति हजार पुरुष का है| इसी प्रकार भारत के 31 प्रतिशत स्त्री-पुरुष नगरों में और 69 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं| हम 2025 तक विश्व का सर्वाधिक युवा राष्ट्र होने जा रहे हैं क्योंकि तबतक देश की 64 प्रतिशत जनसंख्या हमारी श्रमशक्ति का हिस्सा हो जाएगी| आज भी भारत में 48 करोड़ कामगार हैं| इनमें 94 प्रतिशत अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं| देश की श्रमशक्ति में महिलाओं का 32 प्रतिशत योगदान है| 21वीं शताब्दी में प्रवेश के बाद से हमारी अर्थव्यवस्था में सकल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से कृषि क्षेत्र का 18 प्रतिशत, उद्योगों का 26 प्रतिशत और सेवाक्षेत्र का 55 प्रतिशत योगदान रहता है|

लेकिन अभी भी भारत की आबादी का पाँचवा भाग असहनीय दरिद्रता के दलदल में फंसा हुआ है| हमारे एक तिहाई बच्चे-बच्चियां खतरनाक हद तक कुपोषण के शिकार हैं| मानवीय विकास के मापदंड के अनुसार संयुक्त राष्ट्रसंघ की गणना में हमारा देश विश्व के 188 देशों में से 131 पायदान पर है जो हमारे पडोसी चीन ही नहीं बल्कि बांग्लादेश और श्रीलंका से भी पीछे है| हमारे देश के शासन-प्रबंध और आर्थिक-राजनीतिक दायरों में काले धन के बढ़ते बल के कारण चौतरफा भ्रष्टाचार का विस्तार जारी है  है जिससे 176  देशों में हम 76 वें स्थान पर फंसे हुए हैं|

1992 से अबतक के तीन दशकों से जारी निर्बाध पूंजीवादी नीतियों के नतीजे अत्यंत चिंताजनक हो चुके हैं| इन नीतियों को ‘उदारीकरण’ से जोड़ा गया था जिसका अभिप्राय 1955 से चल रही ‘मिश्रित अर्थ-व्यवस्था’ और 1969 से चल रहे ‘सरकारीकरण (राष्ट्रीयकरण)’ की नियोजन प्रक्रिया को रोककर वैश्विक पूंजीवाद की संस्थाओं जैसे वर्ल्ड बैंक और इन्तरनेशनल मानेटरी फंड के क़र्ज़ से निजीकरण, व्यवसायीकरण और वैश्वीकरण को बढ़ावा देना था| ‘उदारीकरण’ की वकालत करनेवाली देशी-विदेशी कंपनियों और उनसे जुड़े आर्थिक विशेषज्ञों ने तब देश की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं के लिए नेहरु-इंदिरा शासन के 1947-1994 की अवधि में अपनाये गए तथाकथित ‘समाजवाद’ को दोषी बताया| बाजारवाद और वैश्विक पूंजीवाद को विकल्प के रूप में प्रचारित किया|

लेकिन नतीजा क्या निकला?देश के मात्र एक प्रतिशत लोग राष्ट्रीय संपत्ति के 60 प्रतिशत के स्वामी हैं| सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जी| डी| पी|) में वृद्धि का लाभ जनसाधारण तक पहुँचाने से रोका जा रहा है| हमारी बेरोज़गारी अबतक के 45 बरसों में अधिकतम दर पर है| नागरिकों की आजीविका की व्यवस्था के लिए संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में स्पष्ट निर्देश के बावजूद बेरोजगारी की बढती समस्या के प्रति उपेक्षा भाव स्पष्ट है क्योंकि अधिकांश उद्योगों में रोजगार-निर्माण नगण्य अथवा नकारात्मक हो गया है| दूसरी तरफ सरकारी व सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में नयी नियुक्तियों पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है| तीन प्रतिशत अनिवार्य वार्षिक पद-समर्पण की नीति जारी है| उद्योगों में छटनी, बैठकी और तालाबंदी की जा रही है| सूचना-टेक्नोलाजी से जुड़े रोजगार अवसरों में भारी कमी होने की भविष्यवाणी ने आग में घी का काम किया है|इसके बावजूद नीति आयोग ने सार्वजनिक क्षेत्र की 24 महत्वपूर्ण इकाइयों के निजीकरण की संस्तुति कर रखी है| इसमें रेलवे स्टेशन से लेकर देश की सुरक्षा के लिए हथियार निर्माण शामिल हैं| ऊर्जा, पेट्रोलियम, टेलीकाम, खनिज, खनन, मशीन निर्माण, भवन, सड़क, हवाई व जल यातायात, गोदी व बंदरगाह जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र सरकार के निजीकरण प्रयासों का आघात झेल रहे हैं|

उत्पादक वर्गों की बेहाली :

देश का जन-साधारण, विशेषकर श्रमिक व किसान वर्ग सरकार की जनविरोधी नीतियों का आघात सह रहा है| सरकार की मुट्ठीभर कार्पोरेट घरानों के अंध-समर्थन और 1 प्रतिशत अतिसंपन्न वर्ग को प्रोत्साहन की नीति का सबसे ख़राब असर श्रमजीवी समाज, किसानों और वंचित वर्ग के भारतीयों पर पड़ रहा है| सरकार ने 44 केन्द्रीय श्रम कानूनों को समाप्त करके 4 नयी कामगार एवं जनविरोधी श्रम-संहिता बनाने का निर्णय ले लिया है| कुछ राज्य-सरकारों ने कई मूलभूत श्रम कानूनों जैसे कारखाना कानून, औद्योगिक विवाद अधिनियम, ठेका कामगार कानून आदि को संशोधित कर दिया है|

कृषि की उपज के दामों की लूट और किसानों की कर्जदारी बढ़ी है| विगत दो दशकों में 3|5 लाख कृषकों ने आत्महत्या की है| देश के करोणों खेतिहर मजदूर दयनीय स्थिति में काम कर रहे है| उनको असीमित घंटे काम करना पड़ता है| कोई कार्य सुरक्षा नहीं है और प्राय: न्यूनतम वेतन से कम पारिश्रमिक मिलता है| (‘समाजवादी घोषणापत्र’ (ड्राफ्ट) (नई दिल्ली, सोशलिस्ट मेनिफेस्टो ग्रूप, 2018) से)

मुट्ठीभर कारपोरेट घरानों के अलावा समूचा भारतीय उद्योग-जगत इस आर्थिक व्यवस्था में विवशता का शिकार है| देशी बाज़ार पर चीनी, अमरीकी और यूरोपीय कंपनियों का प्रभुत्व हो गया है| बैंक-व्यवस्था को लंगोटिया पूंजीपतियों ने राजनीतिक संरक्षण के बलपर दिवालिया होने के कगार पर पहुंचा  दिया है| मुद्रा और टैक्स सम्बन्धी नए नियमों ने मंझोले और लघु उद्योगों को बेहद नुक्सान पहुँचाया है| राष्ट्रीय सकल उत्पाद दर और औद्यगिक उत्पादन दर में खतरनाक कमी आई है|

स्वराज की समग्रता की चुनौती :

वस्तुत: जब भारत को ब्रिटिश राज से 1947 में आज़ादी मिली तो महात्मा गांधी ने देश को सचेत किया था कि देश को अभी सिर्फ राजनीतिक आज़ादी मिली है| हमारे सामने आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वराज की रचना की चुनौती बाकी है| लेकिन राजनीतिक स्वराज के 5 महीने के अन्दर ही साम्प्रदायिक ताकतों ने गांधीजी की 30 जनवरी, ’48 को हत्या कर दी और हम कर्मयुग से भोगयुग की ओर फिसल गए| यह चिंता की बात है कि समग्र स्वराज की रचना के बारे में गांधी की चेतावनी उनके जनम के 150वें बरस में भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है|

गांधीजी ने संसदीय प्रणाली के बारे में भी समझाया था कि हमारे देश के लोगों में यह सम्मोहक भ्रम फैला हुआ है कि किसी भी देश-समाज में सत्ता का स्त्रोत विधानमंडल होते हैं| ब्रिटिश इतिहास का सतही अध्ययन भी यह आभास देता है कि जनता की सभी शक्ति संसद के जरिये है| जबकि वास्तव में शक्ति का स्रोत जनता है और जनतन्त्र में जनसाधारण एक सीमित समय के लिए अपनी ताकत चुने हुए जन-प्रतिनिधियों को सौंपा करती है| किसी संसद का जनता से अलग कोई अस्तित्व या ताकत नहीं है| वस्तुत: जन- शक्ति का भंडारघर सिविल-नाफ़रमानी होती है और इसकी अभिव्यक्ति जनता द्वारा सत्याग्रह के जरिये अनेकों कष्ट सहते हुए भी संसद के कानूनों को अस्वीकारने के मौकों पर दीखती है| वस्तुत:जनसाधारण में निहित इस शक्ति से समूचा राज्य-प्रबंध ठप्प हो सकता है| (‘रचनात्मक कार्यक्रम’ (अहमदाबाद, नवजीवन पब्लिकेशंस, 2018) पृष्ठ 9

 

इसी प्रकार हमारे संविधान निर्माताओं ने 26 नवम्बर, 1949 को नवीन संविधान को अंगीकृत और आत्मार्पित करते हुए स्वीकारा था कि हम भारत के लोगों के सामने अपने नव-स्वाधीन राष्ट्र को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने की जिम्मेदारी है जिससे समस्त नागरिकों को, बिना लिंग, भाषा, धर्म, क्षेत्र, जाति, वर्ग और आयु के भेदभाव के :-

क) सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय;

ख) विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता;

ग) प्रतिष्ठा और अवसर की समता; और

घ) व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढसंकल्प के साथ आगे बढ़ें|

भारतीय संविधान सभा की बताई सजगता आज फिर से हमारे लिए नयी प्रासंगिकता के साथ याद रखने लायक है| (‘भारत का संविधान’ ‘उद्देशिका’ (नई दिल्ली, भारत सरकार, 2011)

इस प्रसंग में संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबासाहब डा. भीमराव आम्बेडकर की हिदायत थी कि चूँकि भारतीय समाजव्यवस्था मूलत: जातिव्यवस्था पर आधारित है इसलिए हमारे देश में  जनतांत्रिक मूल्यों और बंधुत्व की बुनियाद मजबूत करने के लिए सिर्फ राजनीतिक जनतन्त्र अपर्याप्त होगा| बिना शीघ्र सामाजिक और आर्थिक जनतन्त्र को स्थापित किये राजनीतिक जनतन्त्र की जड़ें टिकाऊ नहीं होंगी| इसके साथ संविधान सभा के अध्यक्ष और प्रथम राष्ट्रपति डा| राजेंद्र प्रसाद ने संविधान समर्पण के अवसर पर यह चेतावनी थी कि हमारी स्वराज रचना की जिम्मेदारी उठाने के लिए निष्ठावान राष्ट्रसेवकों की जरुरत होगी| अन्यथा अनैतिक लोगों के हाथों में शासन आने पर अच्छे से अच्छे संविधान को दुरुपयोग से नहीं बचाया जा सकेगा|

पूंजीवाद से संघर्ष की जिम्मेदारी:

आचार्य नरेन्द्रदेव के अनुसार, “पूंजीवादी समाज साधनों पर अपने लाभ के लिए प्रभुत्व कायम रखना चाहता है और अपने हितों पर समाज के कल्याण को निछावर करता है| शोषित किसान और मजलूम इस अन्याय को रोकने में अपने को असमर्थ पाते हैं, उनमें शिक्षा और धन की कमी है| उनका संगठन दुर्बल है| वर्ग-संगठन के द्वारा यह वर्ग शिक्षित और संगठित होते हैं| यही इनकी पाठशाला है| यही कारण है कि एक समाजवादी के लिए संघर्ष आन्दोलन का प्राण है| पूंजीवाद का अंत होने पर जब बहुजन हित-सुख की व्यवस्था होगी तब समाज के अन्याय, युद्ध और शोषण का अंत होगा|” (आचार्य नरेन्द्रदेव वांग्मय, खंड 3, नयी दिल्ली, नेहरु स्मृति पुस्तकालय व संग्रहालय, 2004 पृष्ठ 423)

 

भारत में लोकतान्त्रिक नवनिर्माण –

आजादी के शुरू के शासन से पैदा मोहभंग और चुनौतियों के सबसे सशक्त प्रवक्ता समाजवादी चिन्तक और आन्दोलनकारी डा. राममनोहर लोहिया ने स्वाधीनोत्तर भारत की सबसे बड़ी चुनौती को ‘सगुण बनाम निर्गुण’ के रूप में रखा– “निर्गुण है आदर्श या सपना, सगुण है उसके अनुरूप मनुष्य या घटना, दोनों अलग हैं| दोनों को अलग रहना चाहिए| किन्तु दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं और एक-दूसरे के साथ सब कोर जुड़े हुए हैं| दिमाग में दोनों के खाने अलग-अलग रहने चाहिए, लेकिन दोनों में निरंतर आवागमन होना चाहिए| किसी भी सिद्धांत को गेंद की तरह सगुन और निर्गुण दोनों दिमागी खानों में लगातार फेंकते रहने से ही एक सजीव आदर्श गढा जाता है| पूरा अलगाव करने से पाखंड और असचता की सृष्टि होती है| (‘सगुण और निर्गुण’, राममनोहर लोहिया रचनावली से| भाषण, हैदराबाद, 1955)

डा. लोहिया के अनुसार आज़ादी के बाद से हिन्दुस्तान की ज़िन्दगी के सबसे बड़े पाँच मकसद या चुनौतियाँ हैं – बराबरी, जनतन्त्र, विकेन्द्रीकरण, अहिंसा और समाजवाद| इसके लिए लोहिया ने वोट या लोकतान्त्रिक चुनाव, फावड़ा अर्थात रचनात्मक कार्य, और जेल यानी सत्याग्रह और सिविलनाफ़रमानी का तीन आयामी रास्ता बताया|

इसके बाद की परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए समाजवाद के जरिये पूंजीवाद से मुक्ति की चुनौती के बारे में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने ’60 के दशक में लिखा कि “ समाजवाद की तीन परिभाषाएँ की जा सकती हैं:

1. जो समाजवाद हिंसा से, बलपूर्वक स्थापित किया गया हो, वह तामसिक समाजवाद यानी ‘साम्यवाद’ है| 2. जो समाजवाद कानून से राज्य-शक्ति द्वारा स्थापित किया गया हो, वह राजसिक यानी ‘लोकतान्त्रिक समाजवाद’ है| 3. और जो समाजवाद स्वेच्छापूर्वक जनता के विचारों और व्यवहारों में परिवर्तन लाकर स्थापित होता है, वह ‘सात्विक समाजवाद’ यानी ‘सर्वोदय’ है| यद्यपि जैसे मनुष्य में उपर्युक्त तीनों गुणों का सम्मिश्रण होता है, उसी प्रकार इसमें भी होता है| किन्त व्यवहार में जो गुण अधिक दीखता है, उसके आधार पर यह कहा जाता है कि वह अमुक प्रकार का है|”  (‘मेरी विचार-यात्रा’ (वाराणसी, सर्वसेवा संघ प्रकाशन, 2010) पृष्ठ 73)

नक्सलवाद से ‘आमने-सामने’ होने पर जेपी ने आगे 1970 में बताया कि “ यदि लोकशाही अक्षम सिद्ध होती है और हिंसा से भी कोई समाधान नहीं निकलता है तो फिर रास्ता क्या होगा? रास्ता पाने के लिये हमें गांधी की ओर लौटना होगा| तब हमलोग देखेंगे  कि गांधीजी पहले से ही हिंसा की व्यर्थता और लोकतांत्रिक राज्य की स्वभावगत सीमाओं से परिचित थे| वास्तव में वे इस बात के लिए चिंतित थे कि राज्य यथासंभव सर्वोत्तम लोगों के हाथों में रहे और वह उचित नीतियों, कार्यक्रमों और योजनाओं का अनुसरण करे|फिर भी उनको यह स्पष्ट दिखता था कि चाहे कितनी ही अच्छी नीतियां हों और कितने ही अच्छे लोगों के हाथों में शासन सूत्र हो, राज्य स्वत: अभीष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं कर सकता| इसलिए उनकी योजना राज्य-शक्ति के साथ-साथ लोक-शक्ति के निर्माण की थी|”(‘आमने-सामने’ (वाराणसी, सर्वसेवा संघ प्रकाशन, 2013) पृष्ठ 37

आज़ादी के दशकों बाद, विशेषकर स्वतन्त्रता और गणतन्त्र की अर्धशताब्दी पूरी होने पर, 1997 – 2000 के दौरान देश की चुनौतियों की सम्पूर्ण समीक्षाएँ फिर से सामने आयीं| इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय सर्वेक्षण विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन व् ज्यां द्रेज़ का माना जाता है – अन अनसर्टेन ग्लोरी : इण्डिया एँड हर कन्त्राडिक्सन (नई दिल्ली, एलेन लेन, 2013)| इनके अनुसार भारत की राष्ट्रनिर्माण प्रक्रिय में प्रगति और विकास की एकजुटता नहीं हो पाई है| शिक्षा और स्वास्थ्य के पैमाने पर गरीबी और विषमता या गैरबराबरी की निरतरता कम नही की जा सकी है| जवाबदेही का अभाव और भ्रष्टाचार का प्रभाव बढ़ता जा रहा है| दुनिया के मापदंड पर भारत को अपना सम्मानजनक स्थान पाने के लिए अधीरता की जरुरत है| जिससे भारतीय लोकतन्त्र में विषमता को घटाने की जरूरत को प्रबलता से क्रियान्वित किया जाये|

वस्तुत: हमारा देश इस समय सात मुख्य चुनौतियों से जूझ रहा है – विकास का अधूरापन, सुशासन का अभाव, सत्ताव्यवस्था का घटता सम्मान,लोकतांत्रिकता का अवमूल्यन, राष्ट्रनिर्माण का संकट, नागरिकता-निर्माण में अवरोध, और पर्यावरण विनाश|

इनका समाधान पूंजीवाद के दायरे में नहीं हो पा रहा है| पहले डा| मनमोहन सिंह और अब श्री नरेन्द्र मोदी के पास कृषि संकट, उद्योग संकट और रोजगार अभाव के बारे में कोई उत्तर नहीं है| देश की संसद दिशाहीन है| राज्य सरकारों के प्रयोगों से भी दिशाबोध नहीं हो रहा है| इसलिए समाजवादियों को आत्मचिंतन करके देशवासियों के सामने उपयोगी सुझावों को लेकर आने की जिम्मेदारी आ गयी है|

इस सन्दर्भ में तीन प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हैं:  हम समाजवादी किसे मानें? समाजवादियों की एकता की आधारशिला क्या हो?तथा देश की दशा सुधारने के लिए हम तात्कालिक तौर पर राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर किन प्रश्नों को प्राथमिकता दें? इसमें किन सहमना जमातों, संगठनों और अभियानों से संपर्क करें और सहयोग लें?

इन प्रश्नों का सतोषजनक समाधान करने के बाद यह भी सोचना होगा कि हम समाजवादियों की पहल को असरदार बनाने के लिए विचार-प्रवाह, परस्पर समन्वय, कार्यक्रम संचालन, कार्यकर्ता प्रशिक्षण और कोष व्यवस्था के लिए क्या क्या करें?

असल में समाजवाद के अर्थ से ही समाजवादी की परिभाषा और पहचान की जा सकती है| सैद्धान्तिक दृष्टि से संपत्ति का सामाजिक स्वामित्व, गरीबी और गैरबराबरी को समाप्त करना, और  आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से सबसे अधिक वंचित और दलित लोगों के हकों के लिए संघर्ष करना ही कल का समाजवाद था और आज का समाजवाद है| इसलिए समाजवादी होने के लिए समाजवाद के परिवर्तनकारी आदर्शों और क्रान्तिकारी लक्ष्यों में सक्रिय आस्था होनी जरुरी कसौटी है| जो गरीबी और गैरबराबरी के अभियानों और संघर्षों से एकजुटता और प्रतिबद्धता नहीं रखते उनको समाजवादी क्यों मानना चाहिए? सिर्फ अतीत के समाजवादी संगठनों, आन्दोलनों, कार्यक्रमों और नेताओं से संबंधों के आधार पर वर्तमान में दावेदारी समाजवादी आन्दोलन के अगले कदमों में साधक की बजाय बाधक होगी|

समाजवादियों की एकता का आधार मूलत: हमारा ‘सोशलिस्ट घोषणापत्र’ होना चाहिए| इसके साथ भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत, और  भारतीय संविधान के बुनियादी मूल्य भी हमारी एकता के दो मजबूत स्तम्भ हैं|

हरेक समाजवादी के लिए यह सच गर्व की बात है कि भारतीय समाजवादी आन्दोलन का जन्म 1930 के संघर्षपूर्ण दशक के दौरान 1934 में राष्ट्रीय आन्दोलन की कोख से हुआ है| हमने मार्क्स और गांधी दोनों की वैचारिक पूंजी से अपना चिंतन और कर्म समृद्ध किया है| हम राजनीतिक स्वतन्त्रता, सामजिक समानता और आर्थिक प्रगति की त्रिवेणी के असीम स्त्रोत भारतीय संविधान की 1946-’49 में रचना करनेवाले और 1975-’77 में रक्षा करनेवाले राष्ट्रभक्तों के प्रति श्रद्धा रखनेवाले लोग हैं|

आगे का रास्ता :

निम्नलिखित छ: कार्य असरदार तरीके से तत्काल शुरू करने चाहिए:

  1. समाजवादियों को राजनीतिक सुधार और भ्रष्टाचार निर्मूलन के लिए जनमत निर्माण की जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए| यह 1974 से जारी ऐतिहासिक जन-अभियान का तकाजा है| बिना चुनाव सुधार व दल-व्यवस्था में सुधार के हमारा जनतन्त्र धनतन्त्र के रूप में विकृत होने को अभिशप्त है|

2. किसानों और श्रमजीवियों की समस्याओं को समाजवादियों ने सदैव प्राथमिकता दी है| आज भी किसान आन्दोलन और श्रमिक संगठनों के साथ सक्रिय सहयोग हमारी बुनियादीजिम्मेदारी होनी चाहिए|

3. बेरोजगार श्रमशक्ति राष्ट्रनिर्माण की राह में सबसे बड़ी चुनौती है| हर वयस्क स्त्री-पुरुष के रोजगार के अधिकार को समर्थन देना समाजवादियों का सैद्धांतिक दायित्व है|

4. देश की शिक्षा, स्वास्थ्य-व्यवस्था, और आवास-व्यवस्था तीनों को पूंजीवादी व्यवस्था ने तहस नहस कर रखा है| अब बिना देर किये देश के विराट बहुमत अर्थातजनसाधारण के लिए सहज सुलभ शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की मानवीय ज़रूरत पूरी करने के लिए समयबद्ध कार्य-योजनाओं की जरुरत है|

5. सभी वंचित जमातों के साथ एकजुटता के विशेष कार्य हमारी प्राथमिकता में स्थान रखते हैं| बिना हिंसामुक्त और सम्मानयुक्त जीवन अवसर के महिलाओं, आदिवासियों, अनुसूचित जातियों, पिछड़े और निर्बल वर्गों, अल्पसंख्यकों, और अन्य सभी वंचित जमातों के लिए स्वराज निरर्थक है| इसके अभाव में अधिकाँश भारतीयों की नागरिकता अधूरी है और लोकतन्त्र ढोंग है|

6. पर्यावरण सरक्षण व संवर्धन की जरुरत को पूरा करना हमारे समाजवादी भविष्य की आधारशिला है| इसलिए पर्यावरण के सरोकार समाजवादियों के सरोकार होने चाहिए|

अब इन सवालों को देश की जनता के साथ मिलकर उठाने के लिए स्थानीय दशा को प्राथमिकता देनी होगी| इसी आधार परकम-से-कम तीन कदम सामने हैं:

  1. सबसे पहले देशभर में फैले हुए समाजवादियों के बीच (अतीत की समस्याओं को भुलाकर), स्वत:स्फूर्त संवाद और सहयोग का ताना-बाना बनाना होगा– इसे नगर व जिले से शुरू करके प्रदेश और देश के दायरे तक समयबद्ध चरणों में पूरा करना चाहिए| इसीके समान्तर वैचारिक ताज़गी और संगठनात्मक चुस्ती के लिए शोध और प्रशिक्षण का देशव्यापी क्रम आरम्भ किया जाना है| इसमें प्रखंड और जिले के समाजवादियों व समर्थकों के नियमित मित्र-मिलन, विशेषकर विचार गोष्ठियों का प्राथमिक महत्त्व है| देशी भाषाओँ में समाजवादी पत्र-पत्रिका प्रकाशन व साहित्य वितरण वैचारिक ऊर्जा के लिए अनिवार्य है| तभी 26 जनवरी, 17 मई, 9-15 अगस्त, 2-11-12 अक्टूबर, व 26 नवम्बर की ऐतिहासिक तिथियों पर जन-साधारण को जोड़नेवाले वार्षिक कार्यक्रमों का आयोजन भी आसान होगा| परस्पर सहमति और आर्थिक सहयोग से इसमें से कोई न कोई जिम्मेदारी उठाना अगले तीन वर्षों तक हमाराअनिवार्य कर्तव्य है| बिना व्यक्तिगत जीवन में से कुछ समय और साधन का योगदान किये हमारी भूमिका सगुण नहीं हो सकेगी|
  2. फिर सभी प्रासंगिक समूहों और अभियानों को हमें नीति और कार्यक्रमों के बारे में संवाद के दायरे में लाना चाहिए| संवाद के संतोषजनक अनुभव के आधार पर शांतिपूर्ण कार्यक्रमों में सहयोग के प्रयोग किये जाएँ|इसमें शिखर और शाखा दोनों स्तर पर पहल का समय आ गया है|इसके लिए जिला स्तरीय संवाद व सहयोग समिति भी चाहिए|
  3. हमारी यह विशेष कोशिश होनी चाहिये कि राजनीति के हाशिये के समूहों और संगठनों को अपने प्रयासों के दायरे में लाने के लिए ध्यान दिया जाये| उनके मुद्दों से जुड़ना और उनकी रूचि के तरीकों से मेल-जोल बढ़ाना इसमें सहायता करेगा| इससे हमारे राजनीतिक समुदाय का विस्तार होगा| भारतीय लोकतन्त्र का सामाजिक आधार विस्तृत होगा|

और अंत में ….

समाजवादियों ने स्वराज की लड़ाई को अपना सबकुछ दिया था| अब भारतीय स्वराज के अधूरेपन और देश के लोकतन्त्र के महादोषों को दूर करने की लड़ाई चल रही है| इसमें सफलता का रास्ता पूंजीवाद ने अवरुद्ध कर रखा है| इसमें विजय के लिए तन-मन-धन से समाजवादी विकल्प को साकार करने की जिम्मेदारी पूरा करने की चुनौती ही हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक पथ-प्रदर्शक होनी चाहिए| जय हिन्द| जय जगत| जय समाजवाद| इन्कलाब जिंदाबाद!

लेखक प्रख्यात समाजशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं|

सम्पर्क- +919650944604, anandkumar1@hotmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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