झारखंडमुद्दा

जारी हैं भूख से मौतें – आकाश रंजन

 

  • आकाश रंजन

 

सितम्बर 2017 में झारखण्ड के सिमडेगा जिले में भात माँगते हुए हुई 11 वर्षीय संतोषी की मौत सुर्खियों में आने के बाद भी राज्य में भूख से मौत का सिलसिला थमा नहीं है। इसके बाद के 16 महीनों में राज्य में लगभग 20 लोग भूख के कारण मौत के शिकार हुए हैं। यह और बात है कि राज्य सरकार ने बगैर उचित जाँच के ऐसी मौत होते ही, मृतक के परिवार को तुरत बेहद मामूली नकद राशि और कुछ किलो अनाज देकर, आनन-फानन में, हर ऐसे मामले को बीमारी  से हुई मौत करार देकर रफा-दफा करने की कोशिश की है। पर मामले को छिपाने की यह  सरकार की कोशिश मौके पर जाकर की गयी  स्वतन्त्र जाँच में टिकती नहीं। इन सब मामलों में सरकार द्वारा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, जन वितरण प्रणाली व्यवस्था तथा मनरेगा में भारी अनियमितताएँ एवं पात्रता रखने वाले गरीब परिवारों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने में असफलता स्पष्ट दिखाई देती है। झारखण्ड  में जन-वितरण प्रणाली एवं सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के भुगतान को लगभग 2 वर्ष पूर्व आधार से जोड़ने के बाद परेशानी काफी बढ़ गयी है। पहले तो राज्य सरकार ने आधार न होने के नाम पर लाखों ऐसे परिवारों के राशन कार्ड रद्द कर दिए, जो बेहद गरीब थे, राशन कार्ड मिलने की सभी शर्तें पूरी करते थे और जिनका जीवन जन वितरण प्रणाली से मिलने वाले अनाज पर टिका हुआ था। इसके बाद राशन लेने के लिए बायोमेट्रिक सत्यापन व्यवस्था की परेशानियों से राशन कार्ड के बावजूद काफी परिवार राशन लेने से वंचित होने लगे। यह स्थिति राज्य में अब भी जारी है जबकि सुप्रीम कोर्ट एवं केन्द्र सरकार ने स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं कि आधार सम्बन्धी समस्याओं के कारण किसी भी परिवार को राशन से वंचित नहीं किया जा सकता। 

भूख से हुई मौत के शिकार व्यक्तियों के परिवारों पर एक नजर डाली जाए, तो इनमें से ज्यादातर परिवार अत्यन्त गरीब, आदिवासी, दलित या पिछड़ी जातियों के हैं | पात्रता होने के बावजूद इन्हें किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा की सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलता रहा है। बेहद गरीब परिवारों के लिए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान 2003 में शुरु की गयी  ‘अन्त्योदय अन्न योजना’ से झारखण्ड में जरूरतमन्द परिवार लाभान्वित नहीं हो रहे हैं और न ही आदिम जन-जाति परिवारों के लिए राज्य सरकार द्वारा शुरू की गयी ‘डाकिया योजना’ के अन्तर्गत ऐसे परिवारों के घर तक अनाज पहुँच पा रहा है, जिसकी तस्दीक रामगढ़ जिले में भूख से हुई चितामन मल्हार एवं राजेन्द्र बिरहोर की मौतें करती हैं। राज्य सरकार द्वारा ही हर पंचायत में दस हजार रुपए के ‘खाद्यान्न कोष’ की योजना, जिसका उद्देश्य भूख के मामले सामने आने पर वैसे परिवारों को अनाज मुहैया कराना है, भी कहीं धरातल पर दिखाई नहीं देती। झारखण्ड के खाद्य मन्त्री सरयू राय यह घोषणा तो करते हैं कि आधार से लिंक न होने पर या राशन कार्ड के बगैर भी जरूरतमन्द परिवारों को राशन उपलब्ध कराया जाएगा, पर ऐसे मामले सामने आने पर जिसमें राशन नहीं मिलने के कारण मौत हुई, पर चुप रहते हैं एवं सरकार इसकी जिम्मेवारी तय करने के लिए कुछ करती नहीं दिखती।

इसी वजह से प्रशासनिक अमला राशन वितरण की गड़बडि़यों और भूख से मौत के मामलों को रोकने के प्रति गम्भीर होने की बजाय इसकी लीपा-पोती में लगा रहता है। खाद्य मन्त्री द्वारा ऐसी मौतों, जो भूख से हुई मौत मानी जा रही हों, में शव का अन्त्यपरीक्षण कराने की घोषणा करने के बावजूद यह प्रक्रिया अपनायी नहीं जाती और प्रशासनिक अमला मृतक का दाह संस्कार यथाशीघ्र करवा देने में लग जाता है। इसके लिए छोटी-मोटी धनराशि देते समय मृतक के परिजनों से यह लिखवाने में भी तत्परता दिखाई जाती है कि मौत बीमारी या किसी अन्य कारण से हुई है, यद्यपि इसकी मेडिकल जाँच से कभी पुष्टि नहीं होती। स्थिति इतनी खराब और शासन-प्रशासन इतना लापरवाह है कि विशेष रूप से संवेदनशील आदिवासी समूह  के रूप में चिन्हित पहाड़िया आदिम जनजाति को न तो अन्त्योदय अन्न योजना कार्ड मिला है ओर न ही पेंशन के प्रतिमाह मिलने वाले 6 सौ रुपए, सरकारी नीति के अनुसार, जिनके वे अधिकारी हैं। पहाड़िया  समुदाय के बीच लातेहार-पलामू क्षेत्र के सुदूर गाँवों में किए गए एक सर्वेक्षण से ये तथ्य उजागर हुए हैं। बिरहोर भी झारखण्ड में विशेष रूप से संवेदनशील आदिवासी समूह के रूप में चिन्हित किए गए हैं, लेकिन इस समुदाय के कई परिवारों तक भी घोषित सहायता नहीं पहुँच रही है| हाल की इस समुदाय से जुड़ी कई घटनाओं से यह स्पष्ट है। किसी बस्ती में भूख से मौत होने के बाद भी सरकार यह प्रयास करती नहीं दिखती कि मृतक के परिजनों एवं बस्ती में पात्रता के अनुसार राशन व सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं का लाभ पहुँचना सुनिश्चित हो ।

हाल ही में लोकसभा में भूख से मौत पर उठे एक सवाल पर सरकार की तरफ़ से जवाब दिया गया कि पूरे देश में भूख से मौत का कोई मामला सरकार के संज्ञान में नहीं आया है। झारखण्ड सरकार ने राज्य में इस तरह की घटनाएँ होने के बावजूद केन्द्र को सूचित किया कि झारखण्ड  में भूख से कोई मौत नहीं हुई है। इससे सरकार की असंवेदनशीलता जाहिर होती है। सरकार द्वारा भूख से हुई मौतों को भी राजनीतिक  नफे-नुकसान की नज़र से देखना और इसे स्वीकार न करने का दृष्टिकोण हैरान करने वाला है क्योंकि राज्य की हमारी अवधारणा लोक कल्याण आधारित है, जिसमें ऐसे मुद्दों पर सरकार का मानवीय रूख और तदनुरूप कार्यवाही अपेक्षित होती है। राज्य में लाखों गरीब परिवारों को राशन कार्ड न देकर एवं आधार सम्बन्धी गड़बडि़यों के कारण राशन से वंचित रखकर सरकार भूख से और मौतों को न्यौता दे रही है। मृतकों के परिवारों को राशन या पेंशन या अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ क्यों नहीं मिला इस पर सरकार की चुप्पी सरकार की असफलता को बयान कर देने के लिए पर्याप्त है। 

हाल ही में जारी हुए वैश्विक भूख सूचकांक से यह स्पष्ट हो जाता है कि पिछले 4 वर्षों में भारत इस सूची में लगातार नीचे खिसकते हुए 2014 के 55वें स्थान से, 2018 में ज़ारी 119 देशों की सूची में 103 वें स्थान पर पहुंच गया है, जो इस बात को दर्शाता है कि सूची में शामिल देशों से तुलनात्मक रूप में भारत भूख से निपटने के मामले में लगातार पिछड़ता जा रहा है| इससे इस बात की भी पुष्टि होती है कि देश में भूख और इससे होने वाली मौतें एक सच्चाई है, जिसे सरकार द्वारा नकारने से छिपाया नहीं जा सकता।

21 वीं शताब्दी में आजादी के 70 वर्षों बाद भी लोकतान्त्रिक प्रणाली से शासित किसी देश में भूख से किसी व्यक्ति की मौत होना शर्मनाक है। वह भी ऐसी मौतें तब हों जब देश में पर्याप्त मात्र में खाद्यान्न का उत्पादन होता हो और इसमें से लाखों टन अनाज रख-रखाव के अभाव और लापरवाही के कारण हर वर्ष सड़ कर बर्बाद हो जाता हो। यह भी एक विडम्बना  है कि भारत अभी विश्व की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है, जिसके बूते इसके इसी वर्ष विश्व के सबसे बड़ी पाँच अर्थव्यवस्थाओं में से एक हो जाने की प्रबल सम्भावना  है। यही नहीं हम अब एक न्यूक्लियर पावर स्टेट हैं, हमने सफलता पूर्वक चन्द्रमा और मंगल पर यान भेजने का अभियान पूरा किया है और अब अन्तरिक्ष में अगले 2-3 वर्षों में अपने यान में मानव भेजने की हमारी योजना है। इसके बावजूद हम विज्ञान का इस्तेमाल भूख को खत्म करने में, इससे जुड़ी योजनाओं से अनियमितताएँ दूर करने में क्यों नहीं कर पाए, यह  प्रश्न गम्भीर है और विचारणीय भी ।

लेखक भूख एवं शिक्षा के मुद्दों पर कार्यरत स्वतन्त्र सामाजिक कार्यकर्ता हैं|

सम्पर्क- +919931014008, ranjanakash18@gmail.com.

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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