हाँ और ना के बीच

नाम की उलझन – रश्मि रावत

 

  • रश्मि रावत

 

अपनी सहेली से फोन पर बात हो रही थी। हम एक-दूसरे से यह साझा कर रहे थे कि हमारे आस-पास के परिवेश में इन दिनों किस तरह के बदलाव नजर आ रहे हैं। अगर कोई अखबार, किताबें इत्यादि न भी पढ़े, सिर्फ आँख-कान खुले रखे तो तो क्या रोजमर्रा के जीवन में कुछ अलग बनता बिगड़ता महसूस होता है? फोन के दूसरी ओर से भी कुछ प्रसंग सुनने को मिले। फिलहाल हम बात करेंगेअपने आवासीय परिसर के जन-जीवन में जुड़ी कुछ नई आहटों के बारे में, इस ओर से कही गई बातों के बारे में। दो-तीन साल पहले अचानक अपार्टमेंट के फाटक के बगल में एक-एक करके कुछ समय के अंतर पर दो बोर्ड लग गये थे, जिन पर लिखा था ‘पहली रोटी गाय को’ और ‘गो संरक्षण समिति’। यह समिति क्या बला है, कब बनी? कुछ नहीं पता पर भावनाओं के किसी उबाल के दिनों में चंद लोगों ने आनन-फानन में किया होगा क्योंकि कुछ ही दिनों में गो संरक्षण वाला बोर्ड हट गया। चंद परिवारों ने गाय के लिए रोटी निकालने का अभ्यास कुछ समय तक चलाया। मगर फिर कम और अनियमित होते-होते जब बंद हो गया तो वह बोर्ड भी साल-दो साल बाद वहाँ से हट गया। शायद गाय खोजना भारी पड़ा होगा। इस तरफ अमूमन गाय दिखती तो हैं नहीं।

हमारे आवासीय परिसर में जगह सीमित है। पार्किंग की जगह पर ही बच्चे शाम को खेल लेते हैं। चारों ओर पेड़-पौधे लगाए जाने के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं है। अपार्टमेंट से बाहर निकलते ही कई मॉल्स, दुकानें और मंदिर हैं। अपनी-अपनी आस्थाएं और जरूरतें बड़े सहज ढंग अब तक से पूरी होती आ रही हैं। हर चीज आसान पहुँच में है। तो फिर परिसर के भीतर मंदिर बनाने का विचार अचानक कैसे पैदा हो गया, समझ नहीं आया।जिसकी इतने सालों में जरूरत नहीं पड़ी अब क्या जरूरत आन पड़ी? इस बात पर न कोई मीटिंग हुई न कोई सूचना। बस सीधे 5-6 लोग घर-घर जा कर मंदिर के लिए चंदा माँगने आ गए। मुश्किल से 8-10 अहिंदु परिवार होंगे अपार्टमेंट में। उनके दरवाजे छोड़ कर हर किसी से चंदा माँगा गया। अंततः मंदिर की योजना भी विफल हो गई। वह इतनी अव्यवहारिक थी कि चंदा ही बहुत कम हो पाया। अगर बनता तो बच्चे शाम को कहाँ खेलते?पर्यावरण को लेकर हर माध्यम से इतनी जागरुकता फैलाई जा रही है, उसका तो असर दिखता नहीं कि कुछ करना ही है तो पेड़ लगा लिए जाएँ। बस मीडिया में लोगों को वही दिखता है जो उनके भीतर के विभाजनकारी जड़ मूल्यों को पुष्ट कर सके। आजकल बच्चों के भीतर कम उम्र से ही पर्यावरण की चेतना विकसित हो जाती है। इसलिए इस बार दीवाली में अधिकतर बच्चों ने पटाखे चलाने के लिए मना कर दिया था। फिर भी बहुत आवाजें आ रही थीं तो नीचे जा कर देखा तो बच्चे बम-पटाखों से दूर खड़े थे मगर बड़े लोग अपनी आदतों से बाज आने को बिल्कुल राजी नहीं थे। उन्होंने हवा में धुँआ और शोर घोलने में कोई कोताही नहीं की। इस मामले में तो टी-वी की उन्होंने नहीं सुनी।

मेरी ये बातें काम करती हुए घरेलू सहायिका ‘मन्नो’ के कान पर पड़ गईं। मेरी मित्र की तो उसने नहीं सुनी इसलिए मेरी बोली गई बातों पर ही अपने टूटे-बिखरे शब्दों में प्रतिक्रिया दी। और फिर अपने बारे में जो कहा, उसने मुझे बड़ा हैरान और परेशान किया। कहा “दीदी आपको एक बात बताऊँ। पर आप किसी को भी बताना मत। मुझे लगता है आपको बताया जा सकता है। उसने कहा मेरा नाम मुमताज है।” और फिर रुक कर मेरे चेहरे पर अपना असली नाम बताए जाने की प्रतिक्रिया खोजने लगी। “कहती है मैंने यहाँ के लिए ही अपना नाम मन्नो रखा है। मेरे घर पर मुझे इस नाम से कोई नहीं जानता। मैं शाम को उर्दू की क्लास भी लेने जाती हूँ और रोजे भी रखती हूँ। पर किसी को बताया नहीं है। इसलिए उन दिनों भी काम पूरा करना पड़ता है।” इस तरह का कोई भेदभाव अपार्टमेंट में दिखता नहीं सब प्रेम से ही रहते हैं। संयोग ही है कि बिल्डिंग के बच्चों की सबसे प्यारी दीदी का नाम भी मुमताज है। वह बच्चों-बड़ों के बीच बड़ी लोकप्रिय है क्योंकि बच्चों को पेटिंग और अन्य कलाएँ सिखाती है। 15 अगस्त, 26 जनवरी के समारोहों में कला प्रतियोगिता का आयोजन करती है। गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों को घंटों तक चारदीवारी के भीतर रचनात्मक काम में व्यस्त रखती है तो माँओं को तो प्यारी लगेगी ही। मगर मन्नो को लगता है कि सही पहचान बताने पर उसके काम में फर्क पड़ेगा तो उसके इस एहसास को भी नकारा तो नहीं जा सकता और उसका कहना है कि ये विचार उसके अकेले के नहीं हैं। कितनी अजीब बात है जब सब नागरिकों के पहचान पत्र की बात की जा रही है। दावे किए जाते हैं कि सब नागरिक आधार नम्बर से लिंक होंगे। सबके नाम का बैंक में खाता होगा। एक ओर लोकतंत्र के ये दावे दूसरी ओर व्यक्ति अपनी सही पहचान छिपाने के लिए ही खुद को मजबूर पा रहा है। इस सच को छिपाने के लिए कितने असमजंस से गुजरना पड़ता होगा। कितना कुछ सहना पड़ता होगा।

पिछले कुछ समय में जिस तरह की घटनाएँ देश भर में घटी हैं और आदमी को आदमी से अलग करने के लिए तमाम तरह की उठापटकें की जा रही हैं। लम्बे समय से चलते आ रहे सामाजिक ताने-बाने में छेड़छाड़ करने वाली घटनाएँ जगह-जगह फूटी हैं। आम मध्य वर्ग के पास सोचने-समझने का न अवकाश है और न ही दिलचस्पी। वह सरकार और मीडिया की आवाज को ही सत्य मानता है। उसके परे की चीज उसे नहीं दिखती। वैसे तो नागरिक होने के नाते हम सबका यह कर्तव्य है कि अपने भीतर वैज्ञानिक बोध( साइंटिफिक टैम्पर) को विकसित करें और संविधान की बुनियादी जानकारी तो सब को होनी ही चाहिए। मगर देश की बहुसंख्य जनता के साथ यह हो नहीं पाया है। नहीं होने की स्थिति में भी सामाजिक गतिकी स्वाभाविक लय से भी वर्तमान के जिस दौर तक पहुँची है, वहाँ पहुँच कर परम्परा के बहुत से प्रश्न बेमानी हो चुके हैं। यथास्थितिवादी बने रहने पर भी लोगों की जिंदगी से परम्परा के वे पक्ष तो खुद-ब-खुद झड़ ही जाते हैं जिनकी प्रासंगिकता आज बिल्कुल नहीं बची है। भारत जैसे बहुजातीय, बहुसांस्कृतिक राष्ट्र में एक ही समय में विकास के कई स्तर सक्रिय रहते हैं। इसलिए ऐसा भी होता है कि कुछ मुद्दे किसी स्थान विशेष के लिए अब भी महत्व के हों पर किसी और जगह पर न हों। वर्तमान की हवाओं में कहीं कुछ ऐसा है कि महानगर के कंक्रीट के जंगल में एकदम उपभोक्तावादी जीवन जीते हुए भी लोगों के भीतर अस्थायी रूप में सही मगर कुछ ऐसी प्रतिक्रियाएँ सिर उठा रही हैं, जिनकी प्रांसगिकता खत्म हो चुकी थी।  उस पर थोड़ा बहुत कोई एक्शन ले कर अपने मन को संतोष दे लेते हैं और फिर शान्त हो जाते हैं। आज की जीवन-पद्धति में जिन चीजों की संगति नहीं बैठती, वह लम्बा चल नहीं पाती और दिनचर्या अपने सामान्य ढर्रे पर वापस आ जाती है। हम अपने आवास के ही उदाहरण को लें तो तीनों में से एक भी काम सम्पन्न नहीं हुआ। तो फिर क्या जरूरत थी आखिर ये सब करने की। मगर ये थोड़े समय की सक्रियताएँ भी शान्त दिखते माहौल के भीतर ही भीतर सुगबुगाहट तो पैदा कर ही देती हैं। इन सब बदलावों का ही तो नतीजा होगा मन्नो के भीतर इस तरह का असुरक्षा बोध और डर पैदा होना। अगर लोग आपस में एक-दूसरे से डरते रहे तो कभी एक नहीं हो सकते। एक नहीं होने पर जनशक्ति में नहीं बदलेंगे तो सरकारें अपने हितों की ही वृद्धि करती रहेंगी, जनता के सरोकार के लिए उसे कुछ करने की जरूरत ही क्या है। इस चुनाव में भी पार्टियों के एंजेंडे में जनता के मुद्दे तो गायब ही थे। बिना जनता की बेहतरी के लिए कुछ किए सत्ता अपनी शक्ति बढ़ाती जा रही है। चेताने वाले लक्षण हैं ये।  पूरी संवेदनशीलता और सजगता के साथ अपने आस-पास के माहौल पर नजर रहनी चाहिए। सतह पर शान्त दिखते जल के भीतर बारीक से बारीक भी कोई सलवट ऐसी है जो सामाजिक सौहार्द में खलल डाल सकती है, तो उसे पहचान कर वहीं उसे मिटा कर सीधा कर लेना चाहिए। अगर नकारात्मक शक्तियाँ सक्रिय हैं तो शाँत हो कर बैठना काफी कैसे हो सकता है। बल्कि सकारात्मक शक्तियों को भी अपने को सजग और सक्रिय रखना ही होगा वरना हम सामाजिक ताने-बाने का सौंदर्य नहीं बचा पाएंगे।

लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में अध्यापन और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में नियमित लेखन करती हैं|

सम्पर्क- +918383029438, rasatsaagar@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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