मुद्दा

स्‍वच्‍छता अभियान के बली चढ़ते स्‍वच्‍छता के सिपाही

 

  • डॉ अमिता

आज पूरे देश में गांधी जी की 150वीं जयंती बड़े धूमधाम से मनायी जा रही है। सन् 2014 से प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्‍व में पूरे देश में गांधी जयंती को स्‍वच्‍छता अभियान के रूप में मनाया जाने लगा। हमारे आसपास तो कई ऐसे विद्यार्थी और अन्‍य लोग मिल जाते हैं जो 2 अक्‍टूबर को गांधी जयंती नहीं बल्कि स्‍वच्‍छता अभियान अथवा दिवस के रूप में जानने लगे हैं। हद तो तब हो जाती है, जब गांधी जी को स्‍वच्‍छता का दूत बताकर शौचालय के दीवारों पर भी देश के राष्‍ट्रपिता की बड़ी-बड़ी तस्‍वीरें अंकित कर दी जाती है और इस राष्‍ट्र के पिता के अन्‍य तमाम योगदानों को धूमिल करते हुये लोग इन्‍हें सिर्फ और सिर्फ सफाईगि̌री के योगदान के लिए जानने लगते हैं। कुछ लोग तो सच में इस अभियान के माध्‍यम से देश में स्‍वच्‍छता अभियान को चरम पर ले जाना चाहते हैं, किंतु देश के अधिकांश लोग चाहे नेता हों या अभिनेता या कोई अन्‍य अधिकारी जो साल भर कभी झाड़ू को हाथ तक नहीं लगाते, वे आज के दिन झाड़ू हाथ में लिये या सफाई करते हुये फोटो खिंचवा कर उसे सोशल मीडिया पर डालना नहीं भूलतें।
अतीत से लेकर वर्तमान परिदृश्‍य तक नजर दौड़ायें तो एक बात सर्वविदित है कि सालों भर सफाई के नाम पर कुर्बान करने वाले लोगों को कभी इस सभ्‍य समाज में वे पहचान और इज्‍जत नहीं मिली जिसके वे हकदार थें, कभी उनकी फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर नहीं डाला गया, इन असली अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की फोटो को कभी भी सोशल मीडिया पर ट्रोल होते नहीं देखा गया, कभी इनका मीडिया ट्रायल भी नहीं किया गया। जानवरों से भी बद्तर हालात जीने को मजबूर ये लोग बाबा साहब के संविधान के बदौलत अपने हालात में थोड़ा सुधार के हकदार हो पाये हैं।
पिछले एक महीने से मैंने अपने विश्‍वविद्यालय में अध्‍ययनरत बी.ए. अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों को स्‍वच्‍छता से जुड़े लोगों की पड़ताल कर छोटे छोटे वृत्‍तचित्र बनाने के लिए कहा। विद्यार्थियों ने जब इस पर काम करना शुरू किया तो सब के सब सफाईकर्मियों के हालात को देखकर भौंचक्‍के रह गयें। इस कार्य के दौरान विश्विद्यालय के सफाईकर्मियों से लेकर बिलासपुर के विभिन्‍न क्षेत्रों में कार्यरत सफाई‍कर्मियों से बातचीत की गयी। इस पड़ताल में जो महत्‍वपूर्ण बातें निकलकर सामने आयी उनमें उनके वेतन, किसी दुर्घटना के लिए मुआवजा न मिलना, सफाई के उचित साधन मुहैया न कराना, कम सफाईकर्मियों से अधिक लोगों के काम कराना, उन्‍हें छोटी-छोटी बातों पर डराना-धमकाना, शिकायत करने पर नौकरी से निकाल देना आदि शामिल थें।
विश्‍वविद्यालय के विभिन्‍न विभागों तथा छात्रावासों में कार्यरत महिला एवं पुरूष सफाईकर्मियों से जब विद्यार्थी बात करने गयें, तब कई लोगों ने तो नौकरी से निकाल दिये जाने के डर से बात करने से ही मना कर दिया। वहीं कुछ लोगों ने इसलिए बात करने से मना कर दिया क्‍योंकि वे ऊँची जाति के लोग थें और पेट पालने के लिए इस काम को वे समाज से छिपकर कर रहे थें। यदि उनके समाज के लोगों को उनके इस गंदे काम के बारे में पता चल जायेगा तो उन्‍हें उनका समाज बहिष्‍कृत कर देगा। वहीं कुछ सफाईकर्मियों ने बताया कि हम भी यह काम करना नहीं चाहते लेकिन मन मार कर पापी पेट के लिए करना पड़ता है। इतना घृणित काम करने के बावजूद हमें अधिक से अधिक छह हजार वेतन मिलता है, जिसमें घर-परिवार चलाना बेहद मुश्किल होता है। साथ ही समय पर वेतन भी शायद ही मिल पाता है। हम सभी सफाईकर्मीख, ठेकेदार के नियंत्रण में कार्यरत होते हैं, जो अपनी इच्‍छा के अनुसार जैसे चाहे वैसे हमारा लगातार शोषण करता है और हममे से कोई भी शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करते हैं तो उन्‍हें काम से निकाल दिया जाता है। इस काम को करते-करते गंदगी के बीच हम अक्‍सर बीमार भी पड़ जाते हैं, जिसके लिए हमे किसी प्रकार की कोई सुविधा उपलब्‍ध नहीं करायी जाती है। हमे अपने वेतन से ही पूरा ईलाज कराना पड़ता है। छुट्टी लेने पर वेतन भी काट लिया जाता है तथा किसी प्रकार के अन्‍य छुट्टी के भी हम पात्र नहीं हैं। हमे समाज में घृणा की नजरों से भी देखा जाता है। सरकार भी हमारे लिए कुछ नहीं करना चाहती।


बिलासपुर के अन्‍य क्षेत्रों में उनके लेबर इंस्‍पेक्‍टर से जब बात की गयी तो उनका कहना था कि हम क्‍या कर सकते हैं? प्रशासन से हमे पर्याप्‍त साधन उपलब्‍ध नहीं कराया जाता। तीन सफाईकर्मियों से दस सफाईकर्मियों का काम कराने के लिये कहा जाता है। हम भी अपने अधिकारियों के आदेश को मानने के लिए बाध्‍य हैं। वहीं सफाईकर्मियों से बात करने पर यह बात सामने आयी कि इस अभियान से हमारे जीवन में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं आया है। हमारे जीवन में कोई सुधार नहीं करना चाहता, शायद इसलिए क्‍योंकि कोई फिर इस गंदा काम को नहीं करेगा। हम आज भी एक अमानवीय जीवन जीने के लिए बाध्‍य हैं। ऊँचे वर्ग के लोग आज भी इस काम से घृणा करते हैं, इसलिए एक खास वर्ग ही आज भी इस काम को कर रहा है।
देश में चारों ओर स्‍वच्‍छता अभियान की बात की जाती है लेकिन इस स्‍वच्‍छता और स्‍वच्‍छता अभियान के नाम पर बलिदान हो रहे स्‍वच्‍छता के सिपाहियों का क्‍या? देश के विभिन्‍न क्षेत्रों में कुछ सफाईकर्मी तो इस गंदगी के कारण दिन भर गुटखे का भी सेवन करते पाये जाते हैं, जिसके कारण इस गंदगी से होने वाले बिमारियों के साथ-साथ वे कैंसर जैसे जानलेवा बिमारियों की भी चपेट में आ जाते हैं। देश में सीवरेज में लगातार हो रही मौत और उन मौतों पर रोते-बिलखते सफाईकर्मियों के परिजनों के हालात शायद ही किसी सी छिपी है। किंतु सरकार का इस मुद्दे पर जिस तरीके का रूख रहा है, वह बेहद निराशाजनक है।

देश में स्‍वच्‍छता अभियान चलाना जितना जरूरी है, उतना ही इन सफाईकर्मियों के जीवन को भी स्‍वच्‍छ रखना जरूरी है, साथ ही लोगों की मानसिकता को भी स्‍वच्‍छ करना जरूरी है। साथ ही आरक्षण का विरोध करने वाले लोगों को इस काम में भी आरक्षण की मांग करनी चाहिए और इस गंदे काम का हिस्‍सा बनकर, जीवंत अनुभव लेना चाहिए। सरकार को भी इस काम के लिए समाज के सभी वर्गों को आरक्षण देने की पहल करनी चाहिए।
इस तथाकथित सभ्‍य समाज को उस परिस्थिति से भलीभांति अवगत कराना होगा कि जब देश में सफाई करने वाला यह वर्ग नहीं होगा और चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ गंदगी होगी, जैसी स्थिति बरसों पहले कश्‍मीर की हुयी थी, तब परिदृश्‍य क्‍या होगा? हर तरफ लोग महामारी से मौत के शिकार होंगे, उस दिन इन सफाई के सिपाहियों की असली परख होगी। देश के लोग चांद पर तो पहुंच गया लेकिन इसी देश के सीवरेज में मरने वालों को नहीं बचा पाया।

लेखिका गुरू घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छ.ग.) में सहायक प्राध्यापक हैं |

सम्पर्क-   +919406009605

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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