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सभी के लिये स्वच्छ जल और स्वच्छ भारत का सपना

पानी के अभूतपूर्व संकट से जूझ रहे टीकमगढ़ जिले के पलेरा ब्लॉक स्थित पारा गावं के करीब 600 परिवार स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनवाये गये शौचालयों के सेप्टिक टैंक( मॉल कुंड ) का उपयोग पीने के पानी को स्टोर करने के लिए मजबूर हैं. यह तस्वीर पानी के गंभीर संकट और स्वच्छ भारत के जमीनी हकीकत को एक साथ पेश करती है.

दुनिया भर में सभ्यतायें नदियों और समुद्र तटों पर ही परवान चढ़ी हैं लेकिन तमाम तरक्की के बावजूद आज हम पानी और इसके स्रोतों के महत्व को समझने में नाकाम साबित हो रहे हैं. हमने अपनी पृथ्वी को “नीले ग्रह” का नाम दिया हुआ हैं क्योंकि इसके दो तिहाई भाग में केवल पानी ही है. इसके बावजूद आज मानव सभ्यता ने खुद को जल संकट के गंभीर दुष्चक्र में फंसा लिया है. आज ‘अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा’ का मुहावरा पुराना पड़ चूका है अब संकट अस्तित्व का बन चूका है. पिछले कुछ दशकों के दौरान पूरी दुनिया में अविवेकपूर्ण भूजल दोहन से भूजलस्तर में बहुत तेजी से कमी आई है, भारत की भी एक बड़ी आबादी पेय जल के गम्भीर संकट से गुज़र रही है. आज देश का करीब 60 से 70 फीसदी हिस्सा पानी की भारी कमी से जूझ रहा है, विश्व बैंक की मुताबिक करीब 16 करोड़ भारतीय स्वच्छ पेयजल से वंचित हैं. अगर अब हम भी नहीं चेते तो जल्द ही स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जायेगी,सेंटर फॉर साइंस ऐंड इन्वाइरनमेंट (सीएसई) ने चेतावनी दी है कि 2030 तक हमारे करीब 21 शहर केप टाउन की ‘डे जीरो’ की स्थिति में पहुच जायेंगे.

यह संकट हमारा खुद का पैदा किया हुआ हैं तभी तो समुद्र से घिरे और नदियों से पटे होने के बावजूद पानी को लेकर एक तरह आपात स्थिति बनती जा रही है. दरअसल संरक्षण के अभाव में जल संरचनायें लगातार कम हो रही है और इनका पानी नीचे जा रहा है. ऊपर से हमारे पास इससे निपटने के लिए कोई ठोस और टिकाऊ योजना भी नहीं है. हमेशा की तरह इस आपात स्थिति के सबसे गंभीर शिकार गरीब और पिछड़े इलाकों के लोग ही हैं, देश के ग्रामीण हिस्सों में हमारी 18.2 फीसदी आबादी पोखरों, तालाबों और झीलों पर निर्भर हैं जो बड़ी तेजी से सूख और दूषित हो रहे हैं,इसी तरह से शहरी क्षेत्रों में झुग्गी बस्ती और छोटी कालोनियों में रहने वाली बड़ी आबादी साफ़ पानी से महरूम हैं. शायद यही कारण है कि देश में 59 फीसदी स्वास्थ्य समस्याओं का मूल कारण दूषित जल का सेवन है, भारत उन चंद देशों में शामिल है जहाँ डायरिया जैसी जल जनित बीमारियों से सबसे ज्यादा बच्चों की मौत होती है.

दरअसल हमारे देश में पानी की तिहरी समस्या है, एक तरफ भूजलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है और जल संरक्षण की व्यवस्था बहुत कमजोर है, वहीँ बाजारवाद ने पानी को एक कमोडटी यानी खरीदने-बेचने की एक वस्तु बना दिया है जिसके साथ मुनाफे का गणित नत्थी है. इससे स्थिति और बिगड़ी है आज पानी पानी का धंधा अरबों रुपए का खेल बन चुका है और इस खेल में देश-दुनिया के बड़े ताकतवर लोग शामिल है. इसका कोई कारण नजर नहीं आता है कि आने वाले समय में यह धंधा और ना फूले-फले. दुनिया भर की कंपनियां पानी को नीला सोना बना रही हैं, अब वे पानी को बोतल में भर कर मात्र भर से संतुष्ट नहीं है बल्कि वे  चाहती हैं कि सरकारें सेवाएँ मुहैया कराने की अपनी भूमिका को सीमित करें और जल प्रबंधन और वितरण पर उनका नियंत्रित हो जाए. भारत जैसे देशीं में एक तीसरा पक्ष सामाजिक है जहाँ एक बड़ी आबादी को परंपरागत रूप से पानी से अलग रखा गया है.

हम हर साल 22 मार्च को जल दिवस मानते हैं और गर्मियों में पानी को लेकर चिंतित हो जाते हैं, लेकिन अब इन सब टोटकों से काम नहीं चलने वाला है. इस संकट से उबरने का उपाय पानी के निजीकरण में भी नहीं है, जल संकट बहुआयामी है जिसके लिये समाज और सरकार को मिलकर कई स्तरों पर प्रयास करने होंगें जैसे वाटर हार्वेस्टिंग पद्धिति के द्वारा बारिश के पानी को जमीन के अंदर पहुचाना, युद्ध स्तर पर नदियों, झीलों और कुँओं व बावड़ियों को पुर्नजीवित करने का काम और सबसे जरूरी है समाज और व्यवस्था के तौर पर प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाते हुये जीने की सोच को विकसित करना.

स्वच्छता की बात करें तो तमाम प्रचार दिखावे और शोर-शराबे के बावजूद आज भी हमारे देश साफ़-सफ़ाई की कमी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. वर्तमान सरकार द्वारा अक्टूबर 2014 में गांधी जयंती के मौके पर स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की गयी थी जिसके तहत 2019 तक स्वच्छ भारत निर्मित करने का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन दुर्भाग्य से यह नेताओं और स्लेब्रेटीज के लिए महज मीडिया इवेंट और फोटो खीचने –खिचवाने का कवायद बन कर रह गया है.

इससे पहले भारत सरकार द्वारा वर्ष 1999 में “सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान कार्यक्रम” शुरू किया गया था, जिसका मूल उद्देश्य ग्रामीण भारत में सम्पूर्ण स्वच्छता लाना और 2012 तक खुले में शौच को सिरे से खत्म करना था. इसके तहत स्थानीय स्तर पर यह पंचायतों की जिम्मेदारी दी गयी कि वे गांव के स्कूल,आंगनबाड़ी, सामुदायिक भवन, स्वास्थ्य केंद्र एवं घरों में समग्र रूप से पेयजल, साफ-सफाई एवं स्वच्छता के साधन उपलब्ध कराएं लेकिन यह कार्यक्रम अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रहा. इस कार्यक्रम के असफल होने का मुख्य कारण यह था कि इस कार्यक्रम को बनाने से पहले ये सोचा गया था कि अगर लोगों को सुविधाऐं पंहुचा दी जाये तो लोग उसका उपयोग करेगें और समस्या समाप्त हो जायेगी, इसमें स्वच्छता व्यवहार में सुधार को नजरअंदाज किया गया था. इन्ही अनुभव को ध्यान में रखते हुये हुए वर्ष 1999 में भारत सरकार द्वारा “समग्र स्वच्छता अभियान” की शुरुआत की गयी इसमें सहभागिता और मांग आधारित दृष्टिकोण को अपनाया गया. समग्र स्वच्छता अभियान में ग्राम पंचायत एवं स्थानीय लोगों की सहभागिता एवं व्यवहार परिर्वतन पर जोर दिया गया. लेकिन इसमें भी हमें आंशिक सफलता ही मिली. आज भी भारत में अस्वच्छता एक गंभीर चुनौती बनी हुई है. वर्तमान अनुभव यह निकल कर आ रहे हैं कि समस्या का समाधान केवल यही नहीं है कि टॉयलेट्स बना दिए जाएं, बल्कि इसके लिए पानी और मल-उत्सर्जन की एक प्रणाली विकसित किए जाने की भी जरूरत है.

दरअसल साफ़ सफाई के साथ कचरा निस्तारण का मसला भी जुड़ा हुआ है आज बढ़ते शहरीकरण की वजह से भारत जैसे विकासशील देशों में कचरा प्रबंधन एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है. हमने अपने शहरों के पास कचरों के पहाड़ खड़े कर दिए हैं, इन खतरनाक पहाड़ों की ऊंचाई और चौड़ाई में दिनों दिन इजाफा ही हो रहा है यह कचरा जन स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए एक खतरनाक है.

इसी तरह से कचरे को ठिकाना लगाने की हमारी तकनीक बहुत पुरानी है हम अभी तक यह समझ ही विकसित नहीं कर पाए हैं कि कचरा एक संसाधन है जिसके तहत 90 प्रतिशत कचरे को कीमती खाद में तब्दील किया जा सकता है. विकसित देशों में कचरा निस्तारण बड़े मुनाफे के व्यवसाय का रूप में स्थापित हो चूका है, वहां पर शहर के कचरे गंदगी का ढेर बनकर दुर्गन्ध और बीमारियाँ नहीं फैलाते हैं बल्कि इसका उपयोग रिसाइकल करके नयी वस्तुएं बनाने और बायोगैस, बिजली आदि उत्पादित करने में किया जाता है लेकिन हमारे यहाँ हालत यह है कि कचरा बीनने का जो काम प्रशासन को करना चाहिए वह बच्चे कर रहे है, और इसकी वजह से वे कैंसर,दमा,टीबी और चर्म रोग जैसी जानलेवा बिमारियों के शिकार हो रहे है.

लेकिन इन सबसे ज्यादा एक समाज के तौर पर हमें साफ–सफाई और इस काम में लगे लोगों के प्रति अपने नज़रिए में बदलाव की जरूरत है. गांधी जी अपने आश्रम में शौचालय भी स्वयं ही साफ करते थे. उनका यह वाक्य बहुत मशहूर हुआ था कि ‘अगर उन्हें भारत का लाट साहब बना दिया जाए तो वे सबसे पहले वाल्मीकि समुदाय की गंदी बस्तियों को साफ करना पसंद करेंगे’.सफाई से उनका यह मतलब बिल्कुल नहीं था कि कचरा एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया जाए बल्कि उनके लिए सफाई का अर्थ कचरे का निपटान था और उसका सही उपयोग था. लेकिन इसके बरअक्स हमारा व्यवहार जुदा है, हमारे समाज में सफाई के काम को कमतर समझा जाता है और हम सफाई करने वालों को नीची नजरों से देखते हैं. हमारे यहाँ मैला ही नहीं मल भी दूसरे हाथों से उठवाने की प्रथा अभी भी चल रही है. हम में से ज्यादातर अभी भी इसे जातिगत पेशा मानते हैं, एक ऐसा पेशा जो सिर्फ तथाकथित निचली जातियां ही कर सकती हैं. समाज के स्तर पर भी हमें सफाई का काम जाति नहीं बल्कि पेशा के आधार पर स्थापित करने पर जोर देना होगा. तभी गाँधी जी के स्वच्छ भारत का सपना साकार हो सकेगा ।

 

जावेद अनीस

लेखक पत्रकार हैं.

Mob. 9424401459

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