मैं कहता आँखन देखी

मुसलमानों के बाद आरएसएस के निशाने पर ईसाई, अगली बारी किसकी?

  •  नवल किशोर कुमार
आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ। 27 सितंबर 1925 को हेडगेवार द्वारा स्थापित एक संगठन जिसकी बुनियाद में धार्मिक कट्टरता है। यह संगठन इंसानों को इंसान नहीं मानता। वह इस देश जिसे भारत कहते हैं, की विविधताओं को खारिज करता है और यहां रहने वाले सभी लोगों को हिन्दू कहता है। लेकिन वह वर्ण व्यवस्था को जायज ठहराता है। उसके मौजूदा सुप्रीमो मोहन भागवत ने हाल ही में अपने एक बयान में कुछ ऐसा कह डाला है जिसे लेकर जितनी चर्चा होनी चाहिए, नहीं हो रही है। भारतीय अकादमिक जगत मौन है। कोई आगे नहीं आ रहा है जो यह कह सके कि मोहन भागवत जी, आप जो कह रहे हैं, वह सरासर मिथ्या है।दरअसल, मुसलमान आरएसएस के निशाने पर रहे हैं। शुरू से ही आरएसएस ने मुसलमानों को इस देश का नागरिक नहीं माना है। सच्चाई तो यही है कि आरएसएस का गठन ही मुसलमानों का विरोध करने के लिए हुआ और यही वजह रही कि भारत में मुस्लिम लीग की स्थापना हेडगेवार जैसे ही धार्मिक और विभाजनकारी सोच रखने वाले मुसलमानों ने की। नतीजा क्या हुआ, इससे हम सभी वाकिफ हैं। 1947 में देश में सत्ता हस्तांतरण तो हुआ लेकिन दो भागों में बंट भी गया।

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कहना गलत नहीं कि आरएसएस तभी से खार खाए बैठा है। हुआ यह कि पाकिस्तान में तो मुस्लिम लीग के सुप्रीमो जिन्ना को पाकिस्तान में हुकूमत बनाने का मौका मिला और भारत में आरएसएस कहीं नहीं था। यहां सत्ता कांग्रेस को मिली।खैर, भागवत ने कल के अपने बयान में मुसलमानों के बदले ईसाईयों पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा है कि यदि ईसाई इस देश में नहीं आते तब भी वेद-पुराणों के आधार पर हम इस देश में वर्ण रहित समाज बना सकते थे। भागवत ने यह भी कहा है कि यहूदी जब पूरी दुनिया में मारे-मारे फिरते थे। भारत ने उनको आश्रय दिया। उनका यह भी कहना है कि पारसी समुदायों को पूजा और अपने पंथ मानने की जितनी खुली छूट भारत में है उतना पूरे विश्व में कहीं नहीं है। भागवत यही नहीं रूके। उन्होंने कहा कि पूरे विश्व में सबसे अधिक खुश मुसलमान भारत में हैं। इन सबकी वजह बताते हुए भागवत ने हिन्दू होना बताया है।

एक साथ इतने सारे झूठ बोलने का साहस भागवत के पास ही हो सकता है। इसकी वजह भी है। यह वजह है उनका संगठन आरएसएस जो व्यक्ति को आजीवन मूर्ख बनाए रखने, पाखंड करने और लोगों को बांटने में विश्वास रखता है। वैसे भागवत को इस बात की जानकारी नहीं है कि हिन्दू कौन थे। वे नहीं जानते कि आर्यों के आने के पूर्व सिंधु या हिन्दू जनों की जो दुनिया थी, वह जटिल थी। यह जटिलता उनकी सभ्यता में उत्पादन और व्यापार से विकसित हुआ था। हड़प्पा जीवन की नगरीय व्यवस्था में अतिरिक्त उत्पादन पर कब्जे की लड़ाई शुरू हो गयी थी और वहां व्यापारियों और पुरोहितों का एक वर्ग भी विकसित हो गया था।
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अभी जिन वेदों और पुराणों के आधार पर भागवत क्लासलेस सोसायटी बना लेने की बात कह रहे हैं, उन्हें यह समझ ही नहीं है कि आर्य पूर्व हिन्दुओं में तीन तबके तो बन ही चुके थे। एक सामान्य जन जिनमें किसान, मजदूर और कारीगर थे। दूसरे पणि – यानि वणिक – व्यापारी और तीसरे पुरोहित। ऐसा प्रतीत होता है सिंधु समाज में ही इन पुरोहितों को ब्राह्मण कहा जाने लगा था। रावण और शुक्राचार्य असुर है, लेकिन ब्राह्मण भी हैं। आर्यों के यहां जम जाने के बाद हिन्दुओं और आर्यों के पुरोहितों में संभवतः एका हुआ और दोनों ने एक दूसरे से ज्ञान संबंधी लेन-देन की। देवताओं अथवा आर्यों के गुरु वृहस्पति के बेटे कच के असुर-गुरु शुक्राचार्य के यहां ज्ञान हासिल करने हेतु जाने की कथा ऐसी ही संभावनाओं को रेखांकित करता है।1

ये बातें भागवत के कहे अनुसार हिन्दुओं के ग्रंथों में ही उल्लेखित हैं। कुछ भी अलग से नहीं है। दरअसल हिन्दू का मतलब वे जो भारत के मूल निवासी थे और आर्य बाहरी। भूखे, आदमखोर आर्य। हिन्दुओं की देखा-देखी जब आर्यों ने अपने समाज को श्रेणी विभाजित किया तो वह वर्ण-व्यवस्था बन गया। यह इसलिए हुआ कि रंग और नस्ल के आधार पर वर्चस्व दिखाने की एक प्रवृति विकसित हुई, जो नयी चीज थी। इसलिए वर्ण-व्यवस्था में धन और ज्ञान की जगह नस्ल और रंग को प्रधानता दी गयी। ऋग्वेद के दशम मंडल में अचानक 90वां पुरुष सूक्त आ जाता है। इसी सूक्त के पुरुष को समर्पित 12वीं ऋचा में चार वर्णों की बिना किसी भूमिका के चर्चा की गयी है। इसे अनेक विद्वानों ने प्रक्षिप्त यानी बाद में जोड़ा हुआ बताया है, जिसके लक्षण स्पष्टतया दीखते हैं। इसका रहस्य कुछ तो है। यह साफ़ दीखता है कि आर्य जनों के यहां वृहद-स्तरीय उत्पादन की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं थी। आर्थिक तौर पर वह एक पिछड़ा हुआ फटेहाल समाज था, जो तब भी अपने मूल रूप में पशुचारक था। ऐसे समाज में श्रेणी विभाजन केवल रंग, नस्ल, भाषा और आचार-व्यवहार के आधार पर ही संभव था। यह विभाजन स्वाभाविक रूप से नहीं, हिन्दुओं की देखा-देखी की गयी थी, जैसे मध्य-काल में हिन्दुओं की देखा-देखी मुस्लिम-समाज में अशरफ, अरजाल और अजलाफ की श्रेणियां बन गयीं।2
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असल में भागवत साजिश और भय के कारण हिन्दू शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसा करना उनकी मजबूरी है। मुट्ठी भर आदमखोर आर्यों के वंशज लोकतांत्रिक भारत पर राज नहीं कर सकते। उन्हें हिन्दुओं का साथ चाहिए जो दलित, पिछड़े और आदिवासी हैं। भारत में ये बहुसंख्यक हैं। भागवत का भय यह है कि यदि इस देश के सभी हिन्दू जो ब्राह्मण वर्ग नहीं  है, यदि यह जान ले कि आरएसएस की साजिश क्या है तो आरएसएस भारत को आर्यावर्त यानी आर्यों की भूमि बनाने में असफल हो जाएगा।

भारत में मुसलमान कितने खुश हैं, इसके आंकड़े तो सच्चर आयोग की रिपोर्ट में पहले ही आ चुकी है। कौन सा तथ्य छिपा है। भागवत शब्दों का खेल खेल रहे हैं। जिसे वह मुसलमानों का खुश रहना कह रहे हैं, वह असल में भारत को अपना मुल्क मानना है। वे आरएसएस और उसके समर्थकों के जैसे संविधान विरोधी नहीं हैं। फिलहाल तो यही स्थिति है। हालांकि उनमें भी कई गुट ऐसे हैं जो भागवत सरीखे हैं और भारत में मजहबी दीवार को और ऊंची करना चाहते हैं।

भागवत मोदी के गोयबेल्स साबित हो रहे हैं। वैसे इतिहास को पलटकर देखें तो ब्राह्मणवर्ग हमेशा से गोयबेल्स ही रहा है। सत्ता के लिए झूठ और पाखंड का उपयोग इस वर्ग ने तब भी किया जब इस देश में मुसलमान नहीं आए थे। मुसलमानों के शासनकाल में भी ब्राह्मण वर्ग झूठ फैलाता रहा और सत्ता के करीब रहा। अंग्रेजों के समय में तो आरएसएस के एक बड़े नेता ने अंग्रेजों की मुखबिरी की।

बहरहाल, भारत का बौद्धिक वर्ग और अकादमिक जगत अपनी जिम्मेवारियों के प्रति ईमानदार नहीं है। उसे मौन नहीं रहना चाहिए। मौन रहकर वे भागवत जैसे कूढ़ मगज का साहस बढ़ा रहे हैं। इसके परिणाम भारत के लिए अच्छे नहीं होंगे। अभी तो भागवत ने मुसलमानों के बाद ईसाईयों पर निशाना साधा है। बौद्ध और जैन धर्मावलम्बी भी जल्द ही भागवत के निशाना बनेंगे। भागवत के चरित्र को देखते हुए ऐसा कहना अतिश्योक्ति नहीं।

1 वेद और दुनिया, प्रेमकुमार मणि, फारवर्ड प्रेस
2 वही

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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