पर्यावरणमुद्दा

भौंतिक शरीर पर रसायनिक कब्जा

 

  • प्रकाश चन्द्र

 

पंचतत्व से बने भौतिक शरीर पर जहरीले रसायनों की अत्यधिक मौजूदगी और उन जहरीले रसायनों का  हमारे शरीर पर क्या असर हो रहा है? इस बाबत एम्स ने अपने हालिया रिपोर्ट में जो देखा वो बहुत ही चौंका  देने वाला था। एम्स ने हाल ही में अपने एक सिसर्च (Environmental Toxins test)  में पाया कि जो मरीज पहले से गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं उनके शरीर में जहरीले धातुओं (टाक्सिक मैटल) की अधिकता पायी गयी। इसके लिये उन्होंने लगभग 216 मरीजों के रक्त और मूत्र के नमूने लिये, जाँच में पाया गया कि इनमें टाक्सिक मैटल जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, शीशा फ्लोराइड, कैडमियम का स्तर काफी अधिक था। ये वो टाक्सिक मैटल हैं जो हमारे शरीर में विभिन्न माध्यमों से प्रवेश कर हमारे शरीर में गंभीर व्याधियों को जन्म दे रहें हैं।

ये जहरीले धातु आखिर क्या हैं? कैसे ये हमारे शरीर में प्रवेश कर हमें नुकसान पहुँचा रहें हैं? और इन सबके लिये कौन जिम्मेदार हैं इन्हीं पर थोड़ी चर्चा करें-

जहरीले धातुओं के नाम से कुख्यात ये धातु दरअसल मुक्त या संयुक्त रूप से हमारे प्रकृति में ही पाये जाते हैं। जिनका खासतौर पर हमें नुकसान पहुँचाने का कोई इरादा नहीं होता। पर ये आधुनिक होमोसेपियंस की आँखें बंद कर तेजी से आगे बढ़ने की लत ने इन तत्वों को उकसा कर इन्हें हमारा दुश्मन बना दिया है।

विकासशील से विकसित होने की दौड़ में भारत दरअसल जाने अनजाने में प्रकृति और प्रकृति के धरोहरों को नष्ट कर रहा हैं। प्रर्यावरण सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर तेजी से आगे बढने की जिद में हमनें जल जमीन और वायु को इस कदर दूषित कर दिया हैं कि आज हम हर साँस हर घूँट और हर निवाले में जहर ले रहें हैं। आम भाषा में जहर या टाक्सिक वो पदार्थ हैं जो इंडस्ट्रियल क्षेत्रों से वज्र्य पदार्थो के रूप में निकलते हैं जिन्हें रसायनिक भाषा में आर्सेनिक क्रोमियम शीशा फ्लोराइड कैडमियम कहा जाता है। यही रसायन औद्यौगिक क्षेत्रों से निकल कर जल, वायु और जमीन में घुलकर उन्हें दूषित करते हैं। चूँकि मनुष्य का जीवन ही जल, वायु और जमीन पर निर्भर है इसलिये हमारा संपूर्ण जीवनचक्र इन्हीं कारणों से पूरी तरह से प्रभावित हो रहा है।

दरअसल जब ये जहरीले तत्व सुरक्षित तय मानकों से अधिक हमारे जल वायु और जमीन में घुलते हैं तो ये उनमें विषाक्तता के स्तर को बढा देते हैं। इसके उपरान्त पीने के पानी, हवा दूषित मिट्टी में उगे फल और सब्जियों के माध्यम से सीधे हमारे शरीर में पहुँच जाते हैं। परिणामस्वरूप ये जहरीले धातु हमारे शरीर के प्रत्येक अंगों और उनके कार्यो को बुरी तरह से प्रभावित करते हैं। इसके अलावा खाने की चीजों में खतरनाक रसायनों का बिना जानकारी से गलत इस्तेमाल भी हमारे शरीर में विष घोलने का प्रमुख कारण है।

लंबे समय से विशेषज्ञों की जाँचों से पता चला है कि कल-कारखानों के करीब बसे लोंगों में कई तरह की गंभीर व्याधियां जैसे गले फेफड़े पेट का कैसर अधिक देखा गया है। दूषित जल वायु और मिलावटी खा़द्य पदार्थो के उपयोग से देश में गंभीर व्याधियों का प्रभाव अधिक हो गया है। इन व्याधियों में कई तरह के कैंसर, प्रजनन और तंत्रिका संबधी व्याधियां दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। इसके अलावा नवजातों में कई प्रकार के मानसिक और शारीरिक असामान्यता के आकड़े भी बढ़ रहे हैं। लांसेट कमीशन ओन पौल्युशन एण्ड हैल्थ के अनुसार दूषित जल वायु और मिट्टी से हर साल भारत में लगभग 90 लाख लोग असामयिक मौत के शिकार हो रहे हैं जो विश्व के कुल असामयिक मौंतों का 16 प्रतिशत है।

प्रदूषण और स्वास्थ पर रिसर्च करने वाले अलग अलग राष्ट्रीय और अन्र्तराष्ट्रीय संस्थान इन टाक्सिक मैटल के हमारे जीवनशैली में बढ़ती अधिकता पर चिन्ता जता चुकी है। पर सरकारें इन पर गंभीर होकर काम नहीं करती।

स्वास्थ सस्थायें और डाक्टर हमारे शरीर में बढ़ती मैटल टाक्सिीसिटी की जाँच कर सकते हैं उनसे होने वाली गंभीर व्याधियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं जहाँ तक संभव हो ईलाज कर सकते हैं। पर हमारे प्रर्यावरण और जीवनशैली में बढ़ती मैटल टाक्सिीसिटी से तो सरकार संस्थान संसाधन विशेषज्ञ और हम सबकी भागीदारी से ही निबटा जा सकता है।

लेखक व्यंग्यकार, आलोचक एवं शायर हैं|

सम्पर्क- +918860200507, writerprakash.c@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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