• विजय कुमार

तीन राज्य। तीन देव। ब्रह्मा, विष्णु, महेश। कम से कम तीन सुलगते सवाल। खेती, किसानी, भूमि का सवाल। गंगा, हिमालय और पानी का सवाल। रोजी, रोटी और इज्जत का सवाल। जनता ने चुनावी फैसला दे दिया। जनता करवट बदल रही है? करवट एक: जाति का जोर और संप्रदाय का तोड़। करवट दो: सत्ता और संपत्ति की होड़। करवट तीन: विकास और पलायन का शोर। चुनाव हुए। परिणाम भी आये। जो जीता वही सिकंदर। यह निष्कर्ष अपनी जगह सही है। दोनों के वोट का अंतर बहुत ही कम है। जिस इलाके में गोली चली किसानों पर वहाँ भाजपा जीत गई।फिर किसानों के गुस्से का क्या हुआ? इसका मतलब है कि कारक ग्रह कहीं और था।विगत पंद्रह सालों में विकास तो हुआ है। ऐसा लोग भी बोल रहे हैं। केवल वादाखिलाफी होता मुद्दा तो लड़ाई इतनी कश्मकश नहीं होती। चलिए! जरा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और जातीय वर्चस्व की बात पर गौर किया जाय।

कांग्रेस की लगातार यह कोशिश है कि सवर्ण गोलबंदी को कैसे तोड़ा जाय? फिर मुसलमानों को साथ कैसे रखा जाय? भाजपा के कारण मुसलमान स्वतः साथ आये। एस टी/एस सी एक्ट को लेकर सवर्ण सेना का उभार, जनेऊ, गोत्र और ब्राह्मण की राहुल की दावेदारी को जोड़ कर देखना चाहिए।

नई आर्थिक नीति को देश पर लादने का सेहरा कांग्रेस के सर है। भाजपा से आशा थी कि वह स्वदेशी, स्वाबलंबन, स्वराज को हाथ में ले। पर हुआ उल्टा। सच तो यह है कि भाजपा के कदम तेजी से कांग्रेसी पिच पर ही दौड़ने लगे। सामाजिक तौर पर ऐसा लगता है कि कांग्रेस देश की दबंग जातियों और मुसलमानों को मिलाकर सत्ता केंद्र बनाना चाहते हैं। मसलन मराठा, जाट, गुर्जर, पटेल, कोरी, कुर्मी और सवर्ण। खासकर ब्राह्मण। विगत 75 वर्षों को देखा जाय तो कांग्रेस का सोशल इंजीनयरिंग के संकेत और प्रमाण दीखते हैं। इस बात का खतरा है कि दबंग जातीय समीकरण बनेगा तो सामाजिक न्याय और न्याय के साथ विकास का क्या होगा? खासकर दलित और अति पिछड़े, औरत, आदिवासी का क्या होगा? अभी जब सत्ता के लिए मारामारी में इनकी आवाज ही नहीं बन पा रही है।

इस कवायद में यादव लोग भी राहुल के साथ खड़े होकर अपने आप को लेकर आत्म मुग्ध होंगे। यहाँ यह जानना जरूरी होगा की संसाधनों के, सत्ता के वितरण और उत्पादन में कमजोर तबकों की भागीदारी तथा हिस्सेदारी को लेकर इन दोनों की गंभीरता कभी नहीं दिखी। इन राज्यों में उपजाऊ जमीन का मालिक कौन? आज खेती कौन करता है? गांव से पलायन सबसे ज्यादा किनका ? पानी पर कब्ज़ा और नियंत्रण किसका? इतने सालों बाद भी पानी प्रबंधन क्यों नहीं? गांव को उजाड़ कर हम सबको रोजगार कहाँ देंगे? मेरी समझ में आने वाले समय में भी भाजपा और कांग्रेस सामाजिक और सांप्रदायिक विवादों को जन्म देती रहेगी। बाजार और सरकार आपसी ताल मेल से पहले से भी अधिक क्रूर होकर काम करती रहेगी। सरकार इनकी हो या उनकी। सरकार दिल्ली की हो या पटना की। कांग्रेस की हो या भाजपा की। कथित सामाजिक न्याय वालों की। उनकी समझ और सहूलियत सामाजिक विभाजन तथा संतुलन की नीतियों पर ही काम करेगी। ऐसी सूरत में कमजोरों के लिए बहुत कुछ नहीं बचता है। चुनाव की दृष्टि से रास्ता दो ही है। एक वे भी दबंगों की गोलबंदी में अपने लिए जगह तलाशें या सवर्ण गोलबंदी से अलग अवर्ण गोलबंदी करें। यह गोलबंदी जातीय के बजाय अन्य स्तर का ही होगा। देखिए। नजर दौड़ाइए।

विजय कुमार

लेखक गाँधीवादी विचारक हैं।

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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