आवरण कथा

भारत को लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने की चुनौतियाँ

 

  • घनश्याम

 

संसदीय राजनीति में अमूमन लोग दलों को ही विकल्प मानते हैं। लेकिन भारत के संविधान ने ‘भारत के लोगों’ के प्रति ’आस्था’ प्रकट की है। भारत के लोग भी एक संघीय गणराज्य ‘लोकतन्त्रात्मक गणराज्य’ के रूप में भारत को आगे बढ़ाने का संकल्प दुहराया है। संघीय गणराज्य की परिकल्पना करते हुए गाँधी ने स्पष्ट शब्दों में 29 जनवरी, 1948 को कहा था कि आजादी के बाद अब कांग्रेस जैसे दल का कोई औचित्य नहीं रह गया है। इसे भंग कर लोक सेवक संघ नामक एक ऐसी जमात खड़ी करनी चाहिए जिसका एक प्रतिनिधि प्रत्येक गाँव में होंगे और वे सब मिलकर गाँव को संगठित करेंगे तथा भारत को गाँधी का एक संघीय राष्ट्र बनाएँगे। यानी भारत पाँच लाख गाँवों का एक संघीय राष्ट्र बनकर उभरेगा। ठीक इसके एक दिन बाद गाँधी की हत्या हो गई। और गाँधी का वह वसियतनामा धरा का धरा रह गया। तत्कालीन प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, गृहमन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने इस वसियतनामा की तरफ झांकने की जुर्रत तक नहीं समझा और भारत को दलों की बुनियाद पर अधारित एक संसदीय गणतन्त्र करने में अपनी ताकत झोंक दी।

वैसे अब कई दस्तावेज उपलब्ध हो गये हैं जिसके आधर पर यह कहा जा सकता है कि ज्यों-ज्यों भारत आजादी की तरफ बढ़ रहा था त्यों-त्यों गाँधी और कांग्रेस के नेताओें के बीच, खासकर पंडित नेहरू के बीच मतभेद गहरा रहे थे। एक बार तो गाँधीजी ने पंडित नेहरू को गंभीर सलाह देते हुए यह पत्र लिखा था कि हमारे और तुम्हारे बीच मतभेद इतने गहरा गए हैं कि इस मतभेद को अब जनता के सामने लाना जरूरी हो गया है। यह मतभेद खासकर स्वतन्त्रता के बाद के भारत के निर्माण का है। लेकिन तब पंडित नेहरू ने बड़ी ही चालाकी से गाँधी के इस बात को दबा दिया था। या यूं कहें कि गाँधी ने ग्राम स्वराज पर आधरित भारत के नवनिर्माण की तस्वीर देश के सामने पेश की थी लेकिन पश्चिमी चकाचौंध से ग्रस्त नेहरू को यह विचार पसन्द नहीं था और वे चाहते थे कि अमेरिका और रूस की तरह भारत का निर्माण किया जाए। औद्योगिक संस्कृति को विशेष महत्व दिया जाए और दलों पर आधरित संसदीय लोकतन्त्र को बढ़ावा दिया जाय। गाँधी के शहादत के बाद नेहरू को टोकने वाला और पश्चिम की नकल करने से रोकने वाला कोई कद्दावार नेता नहीं था इसलिए नेहरू की मनमानी चलती चली गयी और भारत स्वावलम्बी, स्वाभिमान रास्ते को त्याग कर परावलम्बी और अभिमानी रास्ते पर चल पड़ा। आज इसका हश्र सबके सामने है। संसदीय लोकतन्त्र के नाम पर दलों की तानाशाही बढ़ती जा रही है। फासीवादी ताकतों का वर्चस्व बढ़ा है। और अब दलों के प्रमुख अब सुप्रिमो बनते जा रहे हैं। संसद के बाहर और भीतर दल अपने छूद्र राजनीतिक स्वार्थ में इतने मशगूल हो गए हैं अगर ऐसा कहें कि आज के राजनीतिक दलों का‘’कॉरपोरेटाइजेशन’ हो गया है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया शुरू होते ही देश में नेशनल और इंटरनेशनल कॉरपोरेट का दबदबा इतना बढ़ गया कि संसद में भी इनका वर्चस्व दिखने लगा है। सैकड़ों सांसद करोड़पति और अरबपति परिवार से बनने लगे हैं। यहाँ तक कि संसद में सौ से ऊपर ऐसे संसद चुन कर आने लगे जिनके खानदान के लोग कभी संसद में प्रतिनिधित्व किया करते थे। यानी हमारी संसद भी परिवारवाद की शिकार बना दी गयी।

वास्तव में दल के लोग- जनता की चेतना से डरते हैं। जनता की जाग्रत चेतना दलों पर अंकुश लगाएगी। उनकी मनमानी उनका भ्रष्टाचार नहीं चलने देगी। सच्चे अर्थों में लोकतन्त्र स्थापित करने की पहल होगी। व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में देश आगे बढ़ेगा। लोकतन्त्र और सामन्ती मानसिकता साथ-साथ नहीं चल सकती। लोकतन्त्र महज संसद नहीं है। महज पाँच वर्षों में एक बार वोट देकर अपने नागरिक अधिकार का विसर्जन नहीं है। आज के नेताओं को यह भी समझना होगा कि लोकतन्त्र में संसद सर्वोच्च नहीं होती। संसद तो एक तन्त्र है। एक व्यवस्था है। सर्वोच्च और सार्वभौम तो जनता है, लोक है। लोकतन्त्र लोगों की चेतना और समझदारी से आगे बढ़ता है। संसद जैसे चाहेगी वैसा करेगी- उन्हें कोई टोकेगा नहीं, कोई रोकेगा नहीं-ऐसा अब नहीं चलेगा। कानून अगर जनता के लिए बनाए जाते हैं तो कानून बनाने में जनता की जीवन्त और सक्रिय भागीदारी होनी ही चाहिए, नहीं तो कानून महज एक दस्तावेज बनकर रह जाएगा। महज एक औपचारिकता होगी। इसलिए आजादी के बाद जितने भी कानून बने लगभग सभी धरे के धरे रह गए। क्योंकि उसको कुछ अफसरों और राजनेताओं ने मिलकर बनाया। जनता जान भी नहीं पायी। कुछ ऐसे कानून बने-जिसमें जनता की भागीदारी रही तो कानूनों का उपयोग आज कुछ ही जगहों पर हो रहा है। उदाहरण के रूप में-सूचना का अधिकार या फिर आदिवासी इलाकों के बने ‘पेसा कानून’। उक्त दोनों कानून बड़े अभियानों के बाद बने। परिणामतः आज इसका कई जगहों पर इस्तेमाल हो रहा है। कई आदिवासी इलाकों में लोगों ने ‘पेसा कानून’ का सदुपयोग करते हुए अपनी जमीन बचायी है, अपने जंगल बचाए हैं। अपने इलाकों के स्वशासन की रक्षा की है। लेकिन उन इलाकों में सरकार अपने कानून को खुद तोड़ रही है। ठीक इसी प्रकार सूचना के अधिकार के कानून से आज कई तरह के भ्रष्टाचार उजागर हुए हैं। जनता इस कानून का कुछ हद तक इस्तेमाल कर रही है। क्योंकि उक्त कानून जनता के अभिक्रम से जनता की भागीदारी से बने। कुछ हद तक जनता इसके बारे में जानती है।

अधिकांश जनाभिमुखी कानून के अभाव में सत्ता और संपत्ति, के लिए संसद के बाहर और भीतर खेल चलते रहे। परिणामतः जहाँ एक तरफ भ्रष्टाचार दिन-दूनी रात-चैगुनी बढ़ने लगा, वहीं दूसरी तरफ मंहगाई और बेजरोजगारी के शिकार गरीब-गुरूबे और नौजवान त्राहिमाम करने लगे। स्वाभाविक था ऐसी स्थिति में जनांदोलन का उभरना। देश को एक नेतृत्व चाहिए था और देश के युवाओं के गुस्से को एक मंच। तब अण्णा ने ऐसी स्थिति में देश को नेतृत्व दिया और इंडिया एगेंस्ट करप्शन ने युवाओं को गुस्सा प्रकट करने का एक मंच। अण्णा के नेतृत्व में शुरू हुआ आन्दोलन ने इस बहस को पूरी देश में तेजी से उछाला कि संसद बड़ी है या जनता? ज्यों-ज्यों जनलोकपाल का आन्दोलन आकार ग्रहण करता गया त्यों-त्यों संसद से लेकर सड़क तक यह बहस फैलती चली गयी कि क्या लोकतन्त्र महज एक व्यवस्था है या फिर एक सांस्कृतिक अवधरणा? पश्चिम के लोकतन्त्र और देशज लोकतन्त्र में कोई अंतर है या नहीं?

74 आन्दोलन के दौरान ‘जनता सरकार’ के गठन का प्रयोग समय उस समय के नेतृत्व-जमात ने की थी। बूथ कमिटियाँ और ग्राम सभाओं को सशक्त करने के दौरान उन बातों पर भी विशेष ध्यान देना पड़ेगा जो बातें गाँव के नवनिर्माण के लिए जरूरी है- जैसे गाँव-गाँव में सामाजिक विषमता और लैंगिक असमानता को दूर करने एवं अन्धविश्वास को हटाने के लिए युवाओं और किशोरों की नवनिर्माण वाहिनी जैसा संगठन बनाने की जरूरत पड़ सकती है। यह संगठन अपने सामाजिक कर्मो के साथ-साथ गाँव की मिट्टी, पानी और जंगल को बचाने की प्रक्रिया तेज कर सकता है। इससे गाँव के युवाओं के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ेगा और युवाओं का रुझान सामाजिक चेतना और नवनिर्माण के प्रति तेज होगा।

यह प्रक्रिया गाँव में देशज लोकतन्त्र को मजबूत करेगा और उसकी सांस्कृतिक अवधरणा, नौजवानों के प्रयास से जमीन पर उतारी जा सकेंगी। इसके बल पर चुना गया संसद प्रतिनिधि न सिर्फ संसद के प्रति वफादार होगा बल्कि वह लोगों तथा गाँव के प्रति अभिप्रेरित होकर ‘ग्राम संसद’ को मजबूत करने की भी ठोस पहल करेगा। तब चुने हुए प्रतिनिधि और ग्राम सभा के चयनित प्रतिनिधि मिलकर एक सशक्त लोकतन्त्र का निर्माण कर सकेंगे और इस प्रकार गाँव गणराज्य की प्रक्रिया पर एक नई राजनीति और जीवन्त लोकतन्त्र विकसित हो सकेगा- जो महज अभिजात लोगों का लोकतन्त्र नहीं बल्कि‘’आम और अंतिम जन’ का भी लोकतन्त्र होगा।

जनता की ‘’जाग्रत चेतना’ और ‘’संगठित ताकत’ भ्रष्टाचार के जड़-मूल पर प्रहार करेगा। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था में छिपे भ्रष्टाचार की जड़ को उखाड़ने का अवसर मिलेगा। जनता खुद संस्कारवान होती चली जाएगी, यानी स्वशासन, स्वावलम्बन और स्वाभिमान का मार्ग खुलेगा। सही अर्थ में लोकतन्त्र-लोकशाही की तरफ मुखातिब होती चला जाएगा।

संविधान के प्रिएम्बल में यह घोषणा- ‘वी द पीपुल ऑफ़ इंडिया’ यानी हम भारत के लोग इस बात की साक्षी है कि लोकतन्त्र में लोक सर्वोच्च सत्ता है, सार्वभौम सत्ता है न कि संसद। जनता की सर्वोच्च सत्ता है- यह बात तमाम दलों को स्वीकारने का वक्त आ गया है। इससे ही संसद और सांसदों की गरिमा बढ़ेगी। सभी दल अपनी हठधर्मिता छोड़ें और संसद की सर्वोच्चता की मानसिकता से उबरें। खोखली मानसिकता और सामन्ती मनोवृत्ति अब नहीं चलने वाली। इसी प्रिएम्बल में भारत एक ‘’डेमोक्रेटिक रिपब्लिक’ (यानी लोकतन्त्रात्मक गणराज्य) की परिकल्पना भी सामने रखी गयी है। इसलिए हमें भारत को मिल-जुलकर लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाना है।

 

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और ‘जुड़ाव’ के प्रमुख हैं|

सम्पर्क- +919431101974, judav_jharkhand@yahoo.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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