Category: हाँ और ना के बीच

हाँ और ना के बीच

आजादी: कितना सपना, कितना यथार्थ

 

  • रश्मि रावत

 

स्वतंत्रता दिवस के जश्न का माहौल है हर ओर। टीवी, रेडियो और आवासीय परिसर के समारोह में बजता हुआ लाउडस्पीकर भी खुशी से यही घोषणा कर रहा है कि आजादी के इन 72 सालों में हमने क्या-क्या पा लिया है। इन शब्दों की अनुगूँजें कान को बहुत भली लग रही हैं। ‘आजादी’ शब्द ही ऐसामनोहारी है कि कान में पड़ते ही मन में लुभावनी छवियाँ तिरने लगती हैं। खुले आकाश में पंख पसारे चहचहाते परिंदों की खुशनुमा उड़ानें, हँसते-गाते-मचलते-खेलते-दौड़ते बच्चे(बच्चियाँ अलग से बोलना पड़े तो कैसी आजादी),….हर ओर जीवन की उमंग, अपने होने का, जीने का उत्सव। खुले जीवन-जगत में जिंदगी का होना भर उत्सव बन जाता है, जिसे एक-दूसरे की परस्परता में मनुष्य मनाता है।

जीवन जब बाधा दौड़ हो तो मनोजगत की येछवियाँ देर तक नहीं चलतीं।मनुष्य होने के नाते जो मानवाधिकार हर किसी को मिले ही होने चाहिए, उन्हें हासिल करने के लिए भी अनवरत संघर्षों की दरकार हो तो मुक्ति की कल्पना भी अबाध क्योंकर हो। हाँ आँखें मुक्ति का यह सपना देख पाती हैं-इसका मतलब पहले से बेहतर स्थिति तक तो हम पहुँचे ही हैं।सपना देख पाना छोटी बात तो है नहीं। राजनीतिक स्वतंत्रता के आने से सामाजिक, आर्थिक आयामों में फर्क न पड़ा हो, ऐसा तो नहीं है, मगर उसकी गति काफी धीमी रही है। हाशिये के समूहों की जीवन-स्थितियों की बेहतरी समतामूलक स्वस्थ भविष्य की उम्मीद जगाने लगी थी। मगर पिछले कुछ समय में स्वस्थ, सुंदर जिंदगी जीने की राह कीअड़चनें बढ़ती जा रही हैं। समानता, स्वतंत्रता, न्याय, बंधुत्व संविधान के जरिए लोगों के जीवन में परिणत होते देखने के लिए अनुकूल जीवन स्थितियाँ कब बन पाएंगी, पता नहीं। संवैधानिक मूल्यों को जड़ परम्पराओं और उग्र उपभोक्तावाद की ताकतों के सामने लचर पड़ते देखने के अनुभवों में इजाफा ही हो रहा है। सामाजिक भेदभाव के खत्म हुए बिना आजादी की कल्पना की भी कैसे जा सकती है। तीन-चौथाई भारत शेष एक चौथाई इंडिया का उपनिवेश ही लगता है। विडम्बना यह है कि नागरिकों को इस गुलामी का एहसास नहीं है इसलिए आजादी के लिए संघर्ष-चेतना भी कैसे पैदा होगी? कुशलता पूर्वक तरह-तरह के आख्यान गढ़ने का समय है। ये गढ़े गए आख्यान आँखों में छल का ऐसा प्रपंच रचते हैं कि यथार्थ आँखों से ओझल हो जाता है और रची गई कथा वास्तविकता लगने लगती है। आज के समय की सबसे बड़ी विडम्बना है कि यथार्थ की विषमता का बोध ही लोगों को नहीं है। बोध नहीं है तो विषमता को दूर करने के उपक्रम भी भला कैसे होंगे। साहित्य और अच्छे लेखन की, लघु पत्र-पत्रिकाओं की वर्तमान में बहुत अधिक जरूरत है, मगर लोगों को अपनी इस जरूरत का पता ही नहीं है। इस चुनौती से निपटने के क्रम में अपनी भूमिका तलाशने की कोशिश की तो और भी तीखे ढंग से पता चला कि यह खाई कितनी बड़ी है।

यथार्थ बोध सम्पन्न चिंतन-मनन-लेखन करने वाले लोगों की संख्या इतनी बड़ी नहीं है कि समय की माँग को पूरा कर सके। लिखने-पढ़ने के अपने अनुभवों से एहसास हुआ कि इन चंद लोगों में भी बहुलांश की मानसिकता भी विभाजित है। देखने की दृष्टि खंडित है। समानता मूलकता अभी उनके लिए भी सुदूर भविष्य की कोई चीज है, जो सिर्फ यूटोपिया में हो सकती है। या तो वह इतनी असम्भव सी कोई चीज लगती है कि उसके लिए कोशिश करने का हौंसला ही नहीं पैदा हो पाता इसलिए मानसिकता का साँचा बदलता नहीं। सदियों से मन-मस्तिष्क में जड़ें जमाए हुए ढाँचों को दरकाने के लिए सजग और निरंतर कोशिशों की दरकार होती है। हमारी कोशिशें ढीली पड़ती हैं तो वे मजबूत होते हैं। दूसरी स्थिति यह है कि वर्चस्वशाली वर्ग के विशेषाधिकारों से चिपटे रहने की ललक ( मैं इस ललक को ‘वासना’ मानती हूँ) इतनी तीव्र है कि बस्तुतः सामाजिक बराबरी वह चाहता ही नहीं है, सामाजिक मुक्ति का शब्दाडंबर रचना बस उसने सीख लिया है। भीतर परम्परा के ढाँचे कमोबेश अक्षुण्ण रहते हैं और अभिव्यक्ति में समानता के भाव का छद्म भी बना रहता है। समानता और स्वतंत्रता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरे को नहीं पाया जा सकता। आजादी की बात गैर बराबरी वाले समाज में करना बेमानी है।

समाज के बुनियादी सवालों को रगों में स्पंदित होते अनुभवों के रूप में पेश करना इस स्तम्भ का दावा था। तो फिर एक स्त्री होने के नाते अकादमिक-बौद्धिक जगत में मिले अपने अनुभवों की ही बात करूँ। स्त्री-विमर्श, स्त्री-दृष्टि की अवधारणा कुछ समय पहले तक मेरी वैचारिकी का अलग से हिस्सा नहीं थी। अब भी साफ समझ बन गई हो, कह नहीं सकती। स्पष्ट तौर पर तो बस यही जानती और मानती आई हूँ कि संविधान में स्त्री-पुरुष सब बराबर हैं और उन्हें समान अधिकार मिले हुए हैं। स्वतंत्र भारत के मध्यवर्गीय परिवार में जब जन्म लिया तब तक पढ़ने की, हँसने-बोलने, खाने-पीने, नौकरी करने की सुविधा जैसे बुनियादी अधिकार स्त्रियों को प्राप्त हो चुके थे। मतलब ऐसा दिखने लायक परिवर्तन सामाजिक गतिकी में हो चुका था। इन जीवन-गतिविधियों में जाहिरा तौर पर बराबरी सी दिखे, आचरण और अभिव्यक्ति का इतना कौशल तो तब तक समाज ने अर्जित कर ही लिया था। तो उम्र का लगभग पूरा हिस्सा अपने आप को स्वतंत्र भारत का आजाद नागरिक मानते हुए गुजारा। जिसमें स्त्रियों के कर्त्तव्य और अधिकार एकदम वही हैं जो कि पुरुष के। हर सार्वजनिक, सामाजिक परियोजनाओं में हमेशा खुद को एक व्यक्ति समझा, नागरिक समझा। व्यक्ति होने में जब-जब, जिस-जिस आयाम में हारती रही तब-तब अपने को कमतर समझने का बोध पुष्ट होता गया। उम्र बढ़ने के साथ व्यक्तित्व के कई आयाम जमा होते गए जिनमें मैं खुद को बहुत हीन समझती गई। मगर ऐसे ही जैसे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कमतर या बेहतर होता ही है किसी काम में। उन क्षेत्रों में जिनमें वस्तुनिष्ठताअपेक्षाकृत अधिक पाई जाती है जैसे गणित, विज्ञान इत्यादि में खुद को हमेशा बराबर समर्थ पाया। साहित्य-लेखन जैसे क्षेत्र में जिनमें विषयनिष्ठता तुलनात्मक ढंग से काफी अधिक पाई जाती है,इसीलिए अकादमिक दायरे में पूरी उम्र गुजारने के बाद कहीं कोई स्पेस कभी किसी चीज का बना नहीं पाई। स्पेस से मेरा मलतब है अपनी बात कहने का अवसर। तनिक प्रोत्साहन, या कभी भी कोई भी प्रतिक्रिया, जिससे अपनी कमी या ताकत का पता चले। कम से कम इतना भर कि लिखा हुआ सम्प्रेषित होता भी है या नहीं।‘स्पेस’ का अर्थ किसी मुकाम तक पहुँचना मेरे लिए कदाचित नहीं है। संवाद की स्थिति बनना ही स्पेस है हमारे लिए। कह-सुन भर पाने की स्थितियाँ होना काफी लगता है।

अकादमिक कार्यक्रमों, पत्र-पत्रिकाओं, सोशल मीडिया सब जगह स्त्रियों की संख्या निरंतर बढ़ती दिखाई दे रही है इसलिए इन सब बाधाओं का स्त्री होने से कोई सम्बंध है, लम्बे समय तक कोई ध्यान नहीं गया। लगा कि जिसमें काबलियत होगी वह साहित्यादि लिख-पढ़ रहे होंगे। हमें दुनिया के कुछ और काम खोज लेने चाहिए। इसलिए बीच के तमाम वर्षों में क्षेत्र बदल-बदल कर पढ़ाई और काम करती रही। दर्शन शास्त्र तो पहले पढ़ लिया था। मनोविज्ञान पढ़ा।  मानवाधिकार, पर्यावरण और पारिस्थितिकी, जेंडर अध्ययन, शिक्षा शास्त्र में औपचारिक अध्ययन किया। लैंगिक सौहार्द और सॉफ्ट स्किल की कई कार्यशालाओं में प्रशिक्षित करने का अवसर मिला। जब इन क्षेत्रों से जुड़ी जहाँ लैंगिक विभेद बाहरी आचरण में या एकदम ऊपरी सतह पर साफ दिखाई देता है। मानसिक मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए की जाने वाली इस गुड़ाई में मोटे-मोटे ढेले मिले। जिनके अस्तित्व से इंकार करना असंभव था। लैंगिक विभेद की सख्त चट्टानों, मोटे-मोटे ढेलों से टकराने के बारम्बार के अनुभवों के कारण समानता की छद्म चेतना को बनाए रखना असम्भव हो गया। उन ढेलों को निकालकर बाहर फेंकने में जब सफलता मिलती है तो क्रमशः महीन होती जाने वाली जकड़नें दिखाई देने लगती हैं। पुलिस कर्मचारी, छात्रों के लैंगिक संवेदीकरण के लिए अपने साहित्य के अध्ययन का न केवल प्रयोग करती थी। अपितु नई-नई रचनाएँ खोज-खोज कर पढ़ती थी जिससे सही बात सही ढंग से कह सकूँ। इस प्रक्रिया में प्रबुद्ध जन के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व में गूँथा हुआ विभेद साफ नजर आने लगा। बौद्धिक, अकादमिक जगत में यह विषमतामूलकता महीन स्तर पर काम करती है इसलिए महीन बुद्धि या गहरी खुदाई से ही नजर आ सकती थी। कम से कम उस व्यक्ति की आँखों से तो कदाचित नहीं दिख सकती थी जो स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के जश्न की समारोही घोषणाओं पर भरोसा करके और संविधान को अपना धर्मग्रंथ मानते हुए बढ़ी हुई हो। अपने भीतर और बाहर के उस नशे की चेतना ही अगर न हो जिससे हम जाने-अनजाने संचालित होते हैं तो कैसे आधुनिक हो सकते हैं। सचेतन, सुचिंतित अनवरत सक्रियता के बिना भला कैसे कोई किताब (संविधान) आचरण और सोच को निर्धारित कर सकती है। विविध अनुभवों की इस मुठभेड़ ने मुझे महीन स्तर पर कार्यरत विषमता के विषफलों को पहचानने की दृष्टि दी तो रील की तरह वह अनुभव आँखों के सामने घूमने लगे जो पहले बोध न होने से समझ नहीं आए थे। उन पर अगली कड़ी पर बात करेंगे। फिलहाल कहना चाहती हूँ कि एक स्त्री की आजादी के बारे में सोचती हूँ तो उन कानों को जन्म देना जो एक स्त्री को सुनना सीख पाएँ, मुझे अपना दायित्व लगता है, जो मेरे समय ने मुझे सौंपा है, जो किया जाना अगली पीढ़ी की स्त्रियों की आजादी के लिए नितांत जरूरी है। (जारी)

 

लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में अध्यापन और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में नियमित लेखन करती हैं|

सम्पर्क- +918383029438, rasatsaagar@gmail.com

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