Category: शहर-शहर से

शहर-शहर से

विचारधाराएँ भी सत्ता के चरित्र को परिभाषित करती हैं

15 अप्रैल, 2018 को मऊभंडार (घाटशिला) में आई.सी.सी. मजदूर यूनियन के हाल में प्रलेसं और भारतीय महिला फेडरेशन की घाटशिला इकाईयों ने संयुक्त रूप से बैठक सह गोष्ठी का आयोजन किया. गोष्टी का विषय था “धर्म और जातीय अंधवाद के दौर में लोकतंत्र की चुनौतियां (सन्दर्भ : संविधान, स्त्री और राष्ट्र)”. बेहद अनौपचारिक तरीके से विषय पर मुक्त रूप से बोलने और बातचीत के अंदाज गोष्ठी चलेगी, ऐसा फॉर्म अनायास ही बन गया था.

शेखर मल्लिक ने सूत्रधार का दायित्व ले लिया और भूमिका देते हुए कहा कि आज हम डॉ. आंबेडकर को याद कर रहे हैं. कठुआ और उन्नाव की जघन्य घटनाएँ हमारे समय में घटित हो रही हैं. ये समय किस तरह मानवीयता के प्रतिकूल का है ! दलितों और हाशिये के समाज और वर्गों की बात नहीं, हिन्दू और अन्य जातियों की बात नहीं… धीरे धीरे ये उन्माद सबको खा जायेगा. रविश कुमार ठीक कहते हैं कि हमारे बच्चे हत्यारे बन रहे हैं या हत्या(रों) के समर्थक ! स्त्रियों की कोई जगह ही नहीं है, वे वस्तुएं हैं. वे अपनी राजनीति के लिए इस्तमाल किये जाने वाली डिस्पोजल वस्तुएं हैं !   लयुग जिसमें उत्तरोत्तर आदमी और पतित हो जायेगा. दूसरा है वैज्ञानिक दृष्टि कि ज्ञान विज्ञान से प्रगति होगी और समाज को बेहतर बनाया जा सकता है. उनके अनुसार हिंदू धर्म निरंतर गिरते जाने का दर्शन है, जो विभिन्न युगों के माध्यम से यह बताता है कि मनुष्य का निरंतर पतन हो रहा है, जबकि ठीक इसके विपरीत वैज्ञानिक दर्शन है, जो यह बताता है कि मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञान के बल पर प्रगति की है, जो यह यह विश्वास जगाता है कि समाज जिस रूप है उसे उससे बेहतर बनाया जा सकता है। अगर हमारे यहाँ राजतन्त्र भी रहा हो तो उसका एक कायदा कानून होना चाहिए. लेकिन हमने देखा है कि सांस्कृतिक रूप से स्त्रियों के साथ हमेशा भेदभाव वाला रवैया ही हमारे यहाँ रहा है. सांस्कृतिक मानसिकता से ही ऊँच नीच का पता चलता है जैसे हमारे यहाँ जो गलियां हैं, वे या तो जाति के नाम से या फिर स्त्री के अंगों से जोड़कर. जब शूद्रों को (दलितों को) वेद पढ़ना निषिद्ध कर दिया गया तो जैसे, सुन लिया तो कानों में पिघला शीशा डाल दो, कंठस्थ कर लिया तो उसे चीर दो आदि सज़ा का प्रावधान. जब आपने उसे (शूद्रों को) अपना मान ही नहीं, तो फिर उस पर अधिकार क्यों जताते हैं ? शशि जी के मत में, ब्राह्मणों से नहीं ब्राह्मणवाद से लड़ना है.

सब बातों का एक अर्थशास्त्रीय पहलू है, वह विवेचना भी होना लाज़मी है. सचमुच आज विस्फोटक स्थिति है. बाबरी मस्ज़िद गिरी और उधर चुपके से उदारीकरण लागू हो गया. पोखरण में विस्फोट कर सीना चौड़ा करते रहे, उधर मल्टीनेशनल कम्पनियाँ पिछले दरवाजे से घुसा दी गयीं.  सांप्रदायिक, जातिवादी और लैंगिक उत्पीड़न के पीछे मौजूद आर्थिक कारकों की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि 1991 के बाद देश को सांप्रदायिक आग में झोंककर नई आर्थिक नीति लाई गई, देश की पूरी संपदा पर कब्जा करने की होड़ लग गई। अब तो पूरी राज्यसत्ता भेड़ियों की संस्कृति में तब्दील हो गई है। वह तर्क और विवेक के बजाय अंधआस्था, उन्माद, नृशंसता और भेदभाव को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में अलग-अलग उससे लड़ने के बजाए एकजुट होकर लड़ना होगा। दलितों-स्त्रियों-आदिवासियों सबको मनुवादी-ब्राह्मणवादी ताकतों और खुद अपने भीतर मौजूद उसके प्रभावों से लड़ना होगा। टुकड़ों में लड़ाई लड़ने के बजाए संपूर्णता में मानवमुक्ति की लड़ाई लड़नी होगी। जिस तरह के समाज का सपना संविधान निर्माता अंबेडकर ने देखा था, भाजपा तो उसकी विरोधी है ही, दूसरी पूंजीवादी पार्टियां और मायावती या रामविलास पासवान का भी उससे सरोकार नहीं है।

समकालीन जनमत के संपादक सुधीर सुमन ने कहा कि  अगर धर्म का मकसद समाज को बेहतर बनाना है तो वह अलग बात है लेकिन अगर घर्म की आड़ में मनुष्यता छीनी जा रही है, और लोकतंत्र में वह बाधक है तो जरुर उससे लड़ाई है. आज प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि अम्बेडकर न होते तो वे भी न होते. वे ऐसा भी कह सकते थे कि मैं आंबेडकर बनना चाहता था !! लेकिन विडम्बना देखिये कि अम्बेडकर यूँ ही मनुस्मृति के खिलाफ नहीं थे, संविधान बनने के बाद आर एस एस का जो मुखपत्र है ऑर्गेनाज़र, उसने ने लिखा, “स्पार्टा के लायकरगस और पर्शिया के सोलोन से भी पहले, मनु की विधि लिखी जा चुकी थी. आज भी मनुस्मृति में दिए गए उनके कानून पूरी दुनिया की प्रसंशा पाते हैं और लोग उनका पालन करने के लिए तत्पर रहते हैं.” ये दुःख संविधान बनने के समय है ! आज मनुस्मृति को पढने की बात नहीं है. अपने संस्कारों की जांच करें और मनुस्मृति से मिलाएं. अगर वह मिलता है तो वह खतरनाक है.

आज कोई कहता है (कठुआ के सन्दर्भ में) कि हादसे को राजनितिक रंग मत दीजिये. अगर राजनितिक रंग ‘है‘ तो उस रंग को न दिखाना खतरनाक है. सुधीर सुमन ने कहा कि स्त्री मुक्ति को अंबेडकर जाति उन्मूलन के लिए अत्यंत जरूरी समझते हैं और जाति उन्मूलन को राष्ट्रवाद की बुनियादी शर्त मानते हैं। आजादी के आंदोलन के दौरान डॉ. अंबेडकर, भगतसिंह और प्रेमचंद ने जोर देकर यह सवाल उठाया कि जो नया राष्ट्र होगा, वह किसका राष्ट्र होगा, वह कैसा राष्ट्र होगा? आज जो लोग तिरंगा लेकर नृशंस बलात्कारियों के पक्ष में जुलूस निकाल रहे हैं, जो नफरत, भेदभाव और शोषण-उत्पीड़न पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के निर्लज्ज पक्षधर बने हुए हैं, जो धर्म की आड़ लेकर इंसानियत पर कहर ढा रहे हैं और राष्ट्रीयता के नाम पर विभिन्न समुदायों और मेहनतकशों और आदिवासियों के लोकतांत्रिक आधिकारों को रौंद रहे हैं, दमनकारी कानूनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे भगत सिंह और अंबेडकर के सपनों की हत्या कर रहे हैं। अंबेडकर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को लोकतंत्र की बुनियाद मानते थे, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि अगर हिन्दू राज स्थापित होता है तो वह इस देश के लिए एक बहुत बड़ा संकट होगा। हिन्दू चाहे जो भी कहें परंतु यह एक तथ्य है कि हिन्दू धर्म, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए खतरा है। वह प्रजातंत्र का दुश्मन है। हमें हिन्दू राज को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए।

सुधीर सुमन ने उदय प्रकाश की बहुचर्चित कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ के एक संदर्भ के हवाले से कहा कि विचारधाराएं भी सत्ता के चरित्र पर असर डालती हैं।  विचारधाराएँ भी सत्ता के चरित्र को परिभाषित करती हैं. आज भाजपा-आरएसएस के सत्ता पर काबिज होने के बाद अकारण ही दलितों-स्त्रियों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों पर हमले नहीं बढ़ गए हैं. अकारण अवैज्ञानिकता, अंधआस्था और उन्माद को बढ़ावा नहीं मिल रहा है। यह सबकुछ योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है। देश की बच्चियां और स्त्रियां इतनी असुरक्षित कभी न थीं, आज किसान ही नहीं नौजवान भी बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. श्रमिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा हैं। इसके खिलाफ किसान, छात्र-नौजवान, दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक मजदूर सब संघर्ष कर रहे हैं। मौजूदा फासिस्ट निजाम चाहे जितना षड्यंत्र करे, जितना दमन ढाए, उसे एक रोज खत्म होना होगा। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अंधराष्ट्रवाद की राजनीति के बल पर तानाशाही लंबे समय तक नहीं चलेगी। दुनिया में हिटलर और मुसोलिनी का क्या अंजाम हुआ था, उसे नहीं भूलना चाहिए।

भगत सिंह, अंबेडकर, राहुल सांकृत्यायन सरीखे चिंतकों-विचारकों ने राजनैतिक-आर्थिक बदलाव के साथ-साथ भेदभाव पर आधारित सामाजिक ढांचे को बुनियादी रूप से बदलने की बात की थी। इंसान विरोधी धर्म और जाति के क्षय का आह्वान किया था। लेकिन आरएसएस है जो मनुस्मृति के प्रावधानों और वर्णव्यवस्था को कट्टरता से लागू करने की पक्षधर रही है। संविधान बनते ही उसके मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइज़र’ में उसका इसलिए विरोध किया गया था कि उसमें मनुस्मृति के कानूनों को जगह नहीं दी गई थी। उसने स्त्रियों के लोकतांत्रिक अधिकारों से संबंधित हिंदू कोड बिल का तीव्र विरोध किया था।

ये कौन लोग हैं, एक पुराने समाज को बचाए रखना चाहते हैं ? अम्बेडकर ने 1948 में कानून मंत्री रहते हुए हिन्दू कोड बिल में कई संशोधन प्रस्तावित किये थे मगर उन 55 में से सिर्फ 3 धाराओं पर सहमती बनी जिससे दुखी होकर आंबेडकर ने इस्तीफ़ा दे दिया. इस्तीफ़ा देते हुए उन्होंने कहा था, “वर्गों के बीच, लिंगों के बीच असमानता, जो हिन्दू समाज की आत्मा है, को ज्यों का त्यों अनछुआ छोड़ दिया जाय और आर्थिक समस्याओं से सम्बन्धित कानून दर कानून पास किये जांय, तो इसका मतलब होगा हमारे संविधान का प्रहसन बना देना और गोबर के ढेर पर महल बनाना.

सुधीर जी ने आगे बातचीत में कहा कि कोई भी समाज और कोई भी देश हमेशा एक स्थिति में तो नहीं रहता. लेकिन बेहतर है कि बहुत ज्यादा गंवाने से पहले उसे होश आ जाय. उसकी तैयारी हमलोगों को करनी है, यही बड़ी चुनौती है. प्राकृतिक संसाधनों की लडाई देखें. नौजवान और किसान क्यों आत्महत्याएं कर रहे हैं ? क्यों कोई ईश्वर उन्हें नहीं बचा रहा है ? ये समस्याएं, अगर आप मानते हों ईश्वर तो ईश्वर ने नहीं पैदा किया, आपने पैदा किया है और आप ही इसे हल कर सकते हैं. उन्होंने युवा कवि विहाग वैभव की कविता को उधृत किया कि ये जो अलोकतांत्रिक चीजें हैं उनको कैसे हल किया जाय,

यह सही समय है,

जगत की पुनर्रचना की

मुनादी पिटवा कर इसी दम

सृष्टि की सभी कार्यवाहियां स्थगित की जांय…

यह सही समय है मनुष्यता की पुनर्रचना की.

मतलब पुनर्रचना बहुत जरूरी है. भीषण यथास्थिति में रुका हुआ, दर्शक बना हुआ समाज है. जैसा कि कुबेर दत्त ने कहा था, टेलीविजन के भेड़िये ने हमें भेड़ियों में तब्दील कर दिया है. आग लगाने के चंद तीलियाँ भी काफी होती हैं, तो उस आग की जरूरत है इस समाज को. अगर इस समाज को बचना है तो, या तो बर्बरता या फिर समाजवाद. ये चुनाव है सामने और बर्बरता तो फिर ठीक नहीं. इसी दिशा को मोड़ना है.

कवियत्री डॉ. सुनीता देवदूत सोरेन ने कहा कि स्त्री को अपनी ताकत पहचाननी होगी. ये सबसे पहली और जरूरी बात है. समाज में औरत को अपनी सोच को आज़ाद करना होगा. संकीर्णताओं से उबरना होगा. आज सत्ता का काम अम्बेडकर को हथियाना है, लेकिन उनकी विचारधारा से इन्हें कोई लेना देना नहीं है. हमारा संविधान एक सम्प्रभुतावादी, पंथ निरपेक्ष संविधान है और आज इसी पर चोट की जा रही है. संविधान की हम बात करें तो इसमें सबके लिए न्याय है, विचार आदि की आज़ादी है. मगर आज वास्तविकता ठीक इसके उलट है. आज हमें (आज की पीढ़ी को) संविधान को जानने की जरूरत है. जो इसे सच्चे अर्थों में जानेगा वह समानता और न्याय की बात करेगा. संकट इस बात का है कि वैधानिक प्रावधानों का महत्त्व और उसकी इफेक्टिव्नेस को समाप्त कर दिया गया है. डॉ. सुनीता ने कहा कि वर्तमान माहौल में संविधान की मूल आत्मा के साथ ही छेड़छाड़ किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में भी ऐसे लोग बैठे हैं, जो दलितों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों का दर्द नहीं समझते – जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। संविधान ने हमें भले ही बराबरी का अधिकार दिया हो, पर वह अधिकार हमें हासिल कितना होता रहा है और अब तो स्थिति अधिक खराब होती जा रही थी। हाल के दिनों में दलित-स्त्री-आदिवासी का उत्पीड़न बढ़ा है। इनके लिए बनाए गए तमाम प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाया जा रहा है। जहां तक स्त्रियों की बात है, तो अभी भी बराबरी और आजादी उनके लिए दूर की कौड़ी है। उन्हें आगे बढ़कर सोचना होगा कि उन्हें किस तरह के समाज की जरूरत है। वे सही प्रतिनिधि चुनकर भी लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरों से एक हद तक लड़ सकती हैं।

आज स्त्रियों की बात करें तो वहां जो मर्दों की हिप्पोक्रेसी है, वह घातक है. चुनाव जो लोकतंत्र की आधार तंतु है, उसमें देख लें कि किस प्रकार का लैंगिक भेदभाव और दोहरापन है. असल में पुरुष डोमिनेंस है. वहां अगर महिला चुनाव लड़ रही है, जीत भी गयी है, तब भी निर्णयों पर उसका अधिकार नहीं. वे उसके घर के मर्द द्वारा तय किये जायेंगे ! मर्दों से ही उसका काम संचालित होगा, जैसा कि उसका जीवन. ये एक ‘टर्म’ इधर बहुत प्रचलित है – पी.एम्. यानि मुखिया पति‘. वास्तविक और अंतिम फैसले यही मुखिया पद पर चुनी गयी स्त्री का पति लेगा, चूँकि स्त्री को तो वह क्षमता ही नहीं है ! स्त्री किसी भी स्तर पर स्वतंत्र नहीं है. यह भयानक बात है. जबकि स्त्रियों को अपनी ‘इज्जत’ से जोड़कर हिंसा पर उतारू समाज जो करता है, वह गलत है. दलितों और आदिवासियों के शोषण में भी इनकी स्त्रियों का उत्पीड़न बड़ा है और इस ओर देखना होगा.  हम यानि समाज भूल जाता है कि यह स्त्री और पुरुष दोनों से मिलकर बनता है.

डॉ. सुनीता ने आव्हान स्वरूप दुष्यंत की पंक्तियाँ ‘… इसी हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए. मेरे दिल में न सही, तुम्हारे दिल में सही. हो कहीं भी आग मगर जलनी चाहिए.‘ सुनाईं.

अंत में श्रोताओं के सवाल लिए गए. युवा छात्र शुभम के मन में कई प्रश्न घुमड़ रहे थे. उसने पूछा कि आज का युवा किधर जाये ? कौन सी विचारधारा और झंडे के नीचे रहे ? आज तो युवाओं के समक्ष निराशा में आत्महत्या जैसी स्थितियां हैं. शुभम को जबाव देते हुए सुधीर सुमन ने कहा कि पहले तो आप टीवी के कंज्यूमर न बनें ! टीवी बस आपको उपभोक्ता बना रहा है. वो देता है आप लेते हैं. अगर जेएनयू का सच जानना है तो जेएनयू में जाकर रहिये. वो सारा सच सामने आ जाता है. उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से बताया कि एक दफे इलाहबाद में वाम दलों ने मजदूर दिवस पर संयुक्त कार्यक्रम रखा था और जैसा कि आज हम देख रहे हैं कि वकीलों में भी साम्प्रदायिकता घर कर गयी है. उस सभा में किसी ने बस ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ कहा. बस हमें देशद्रोही का खिताब मिल गया. सच तो ये है कि हम ऐसा नारा लगाने की सोच भी नहीं सकते ! फासिस्ट व्यवस्था से आपको लड़ना पड़ेगा. आप गांधीवादी तरीके से लड़ेंगे तो मारे जायेंगे. आपको दोस्त, खुद खोजना होगा. जैसा कि कबीर, बुद्ध, राहुल सांकृतायन ने भी कहा कि जो मैं कह रहा हूँ उसे मत मानों. स्वयं परखो फिर तय करो.

कॉमरेड शशि ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आज नौजवानों को विचार से तय करना होगा. आज जो व्यवस्था है उसमें जो कारण हैं, कारणों में जायेंगे तो सही जगह पहुंचेंगे. समाज कैसा होना चाहिए ? क्या जैसा है वैसा ठीक है? तो फिर खाईये, पीजिये, मौज से रहिये और अगर लगता है कि इसे बेहतर होना चाहिए तो सोचिये कैसे, किस रस्ते से ? वर्तमान समाज को युवा समझें. नब्बे के दशक में हमारे पड़ोसी जो मुस्लिम थे. हमने हिन्दुओं से पुछा कि दुनिया की छोड़ो, क्या तुम्हारे पड़ोसी मुसलमान ने  तुम्हारा कोई अहित किया है. तो बोला नहीं. फिर ? युवा रेशनल बनें. तर्क करें. उजाले और उजाले का छल पहचानिए. हम अपने अनुभवों से, संघर्षों से यहाँ पहुंचे हैं. हम आपको कोई बना बनाया रास्ता नहीं देंगे. आपको चुनना है.  प्रेमचंद को, भगत सिंह को पढ़िए. “राग दरबारी'” पढ़िए तो आज की स्थिति समझ जायेंगे. शशि जी ने पकिस्तान की लेखिका फौजिया सईद के संस्मरण के हवाले से कहा कि उन्होंने लिखा है कि वे लाहौर के वेश्यालयों में गयी तो छेड़ी नहीं गयीं, बदतमीजी का शिकार नहीं हुईं, जबकि वे बेहद खूबसूरत थीं. लेकिन सभ्य शहर में उन्हें पुरुषों के घटियापन का सामना करना पड़ा. तो ये स्थिति है, जिसे समझना है.

 

(रिपोर्ट: ज्योति मल्लिक / विशेष इनपुट: सुधीर सुमन)