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फूलन देवी : सड़क से संसद तक

“अबला है कमजोर नहीं है, शक्ति का नाम ही नारी है, जैसे वाक्य को चरितार्थ करता फूलन देवी का व्यक्तित्व निश्चित ही नारी शक्ति के प्रतीक के रूप में हमारे समाज और देश के बीच में उभरा। इस समाज में औरत को हमेशा उन्हीं अपराधों की सजा दी गई है जिनकी जिम्मेदार वह खुद नहीं है। फूलन देवी हमेशा असहाय, अकेली अपने किस्मत के साथ लड़ती रहीं जिसने एक ऐसे प्रतिरोध को जन्म दिया, जिसके सामने ताकतवर से ताकतवर लोगों को भी नतमस्तक होना पड़ा। उनके इस प्रतिरोध ने समस्त महिला समाज में एक नवीन शक्ति का संचार किया। किंतु इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि जब भी हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं तो मेधा पाटेकर, अरूंधती राय, तस्लीमा नसरीन आदि महिलाओं को तो बखूबी याद करते हैं लेकिन फूलन देवी को हम इस श्रेणी में नहीं याद करते।

आमतौर पर फूलनदेवी को डकैत के रूप में (रॉबिनहुड) की तरह गरीबों का पैरोकार समझा जाता था। वे पहली बार 1981 में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में तब आयीं जब उन्होंने ऊँची जातियों के बाइस लोगों का एक साथ तथाकथित नरसंहार किया जो ठाकुर जाति के (ज़मींदार) लोग थे। सुर्खियों में आने के बाद से वे ऐसे उभरी कि प्रतिशोध का प्रतीक ही बन गयीं।
राजेन्द्र यादव ने तस्लीमा नसरीन और फूलन देवी का जिक्र करते हुए कहा था कि “दोनों का क्षेत्र सबसे अधिक विस्फोटक है और दोनों पुरूष वर्चस्व की सबसे खूँखार सत्ताओं के खिलाफ खड़ी हुई हैं।” ऐसी सत्ता के खिलाफ खड़े होना ही पुरूष सत्ता को हिलाकर रख देने वाला साबित हुआ। “आदमी हमेशा से औरत की स्वतंत्र सत्ता से डरता रहा है और उसे ही उसने बाकायदा अपने आक्रमण मोन बोउवा कहती हैं कि औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। यही कारण है कि हमारा पुरूष समाज हमेशा औरत को चार दीवारी के अंदर बंद करके रखने की वकालत करता रहा है ताकि औरत बाहर की दुनिया को देख न सके और पुरूषों का वर्चस्वका केन्द्र बनाया है। आदमी ने लगातार और हर तरह की कोशिश की है कि उसे परतन्त्र और निष्क्रिय बनाया जा सके। तभी सी बना रहे। जिस किसी ने पुरूष की इस सोच से ऊपर उठने की कोशिश की उसे पितृसत्तात्मक समाज ने कुचल डाला।

“आदमी ने यह मान लिया है कि औरत शरीर है, सेक्स है, वहीं से उसकी स्वतंत्रता की चेतना और स्वच्छन्द व्यवहार पैदा होते हैं। इसलिए वह हर तरफ से उसके सेक्स को नियन्त्रित करना चाहता है। सामाजिक आचार-संहिताओं, यानी मनु और याज्ञवल्क्य स्मृतियों से लेकर व्यक्तिगत कामसूत्र तक औरत को बांधने और जीतने की कलाएं हैं।” फूलन देवी को भी समाज ने बस इसी नजरिये से देखा और इसी के जरिये उनकी शक्ति को नियंत्रित करने की कोशिश की।लेकिन उन्होंने इससे हार नहीं मानी।
प्रारंभिक दिनों में बिना मर्जी की शादी और कई बार यौन उत्पीड़न की शिकार हुई फूलन देवी ने उत्तरी और मध्य भारत में उच्च जातियों को निशाना बनाते हुए हिंसा की और डकैतियां डालीं। भारतीय नारियों को जहां कोमलता का पर्याय समझा जाता है वहीं उन्होंने इस परिभाषा को बदलकर रख दिया और यह साबित कर दिया कि अगर औरत अपने रौद्र रुप में आ जाएं तो कुछ भी कर सकती है। 1963 में जालौन जिले के कालपी क्षेत्र के शेखपुर गुढ़ा गांव में जन्मी फूलन देवी पर बचपन से ही अत्याचार होते रहे लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

11 साल की उम्र में उनका विवाह कर दिया गया, उसके बाद कुछ दबंगों ने बेहमई गांव में उन्हें निर्वस्त्र कर सबके सामने घुमाया और उनके साथ सामूहिक बलात्कार भी किया। संघर्ष की दास्तान यहीं ख़त्म नहीं हुई। जब मजदूरी करने गई फूलन देवी के साथ गाँव के मुखिया के लड़के द्वारा छेड़छाड़ का विरोध किया तो गाँव के पंचायत में उन्हें ही कुलटा साबित कर दिया गया। उसके बाद गाँव के दबंगों के द्वारा फिर से उनके साथ बलात्कार किया गया और अपहरण करवा लिया। पुरूषों की यह मानसिकता सोचने पर विवश करता है कि “इस समाज में स्त्री की न अपनी कोई जाति है, न नाम और न अपनी इच्छा। हर जाति या नस्ल ने एक-दूसरे की स्त्रियों को लूटा, छीना या अपनाया है।” औरतों पर होने वाले अत्याचार के बारे में नीत्शे कहते हैं-“औरत की हर चीज एक गुत्थी और पहेली है। औरत के सौ मर्जों का सिर्फ एक ही इलाज है और वह है उसे गर्भवती कर डालना।”
लेकिन औरत इस अत्याचार का जवाब देना सीख चुकी है और इसका प्रतिरूप हैं फूलन देवी।

“मान सिंह से लेकर फूलन देवी तक, डकैतों ने अत्याचारियों और शोषकों के खिलाफ बंदूक उठाई है।” फूलन देवी ने लगातार यातनाएं झेली लेकिन समाज की न्याय व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था कहीं से उन्हें सहायता नहीं मिली, सबने उनका तमाशा बनाया। अंततः उन्होंने अपनी लड़ाई खुद लड़ना तय किया। अपने साथ होने वाले अत्याचार और घिनौने कृत्य के बाद उन्होंने चंबल का रास्ता पकड़ लिया और बदले की आग में झुलसते हुए 1981 में अपने साथी डकैतों की मदद से ऊंची जातियों के गांव में 22 लोगों की हत्या कर दी। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकार फूलन देवी को पकड़ने में जब कामयाब नहीं रही तब 1983 में इंदिरा गाँधी की सरकार ने आत्मसमर्पण के लिए बातचीत शुरू की और उन्हें मृत्यु दंड ना देने और गिरोह के अन्य सदस्यों के लिए आठ वर्ष से अधिक सजा न देने का भरोसा दिलाया जिसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह तथा 10,000 लोगों और 300 पुलिसकर्मियों की भीड़ के सामने फूलन देवी ने अपने गिरोह के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। फूलन देवी अपने गिरोह में एक मात्र महिला थी।

“फूलन देवी 11 साल तक जेल में रहीं। 1994 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उनका मुकदमा वापस लेकर उन्हें रिहा कर दिया। ऐसा उस समय हुआ जब दलित लोग फूलन के समर्थन में गोलबंद हो रहे थे क्योंकि वे इस समुदाय की बुलंद आवाज बन चुकी थी। बाद में फूलन देवी अत्याचार, प्रतिशोध और विद्रोह के प्रतीक के रूप में राजनीति में शामिल हुयी और समाजवादी पार्टी से सांसद चुनी गई।

1996 में सांसद बनने के बाद महिलाओं के प्रति जिस प्रकार का भेदभाव फल-फूल रहा था और धर्म, जाति, अमीर, गरीब, शहरी-ग्रामीण विभाजक मौजूद थे उसका उन्होंने हमेशा विरोध किया।

किंतु प्रतिरोध के इस स्वर को 25 जुलाई सन 2001 को दिल्ली में उनके आवास पर हमेशा के लिए दबा दिया गया। फिर भी वह दमदार आवाज सच्चाई और न्याय के लिए आज भी चारों ओर गूंजती सी प्रतीत होती है।

 

डॉ. अमिता

सहायक प्राध्यापक
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
गुरू घासीदास विश्वविद्यालय (केंद्रीय)
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मो. 9406009605

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