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मुद्दा

फॉलो,  फारवर्ड और फेक बनती सच्चाई

 

  • सुनीता गुप्ता

सत्य के संधान के लिए जिन सूचनाओं को एकत्र करना कभी एक प्रयत्नसाध्य कार्य हुआ करता था, सूचना क्रांति के युग में उनका अतिरेक ज्ञान के लिए बड़ा संकट बनता जा रहा है। ज्ञान सर्जनात्मक होता है और सूचनाएं उसके लिए कच्चे माल की तरह होती हैं। सूचना क्रांति ने ज्ञान को सूचना से अपदस्थ कर दिया है। आज चारों तरफ सूचनाओं का अम्बार है और सूचना और ज्ञान के बीच का विभेद समाप्त हो गया है। इससे भी आगे का सच यह है कि अब सूचना मनोरंजन की सामग्री में बदलती जा रही है। चैबीस घंटे चलने वाले न्यूज चैनल्स, चैनल्स के बीच की प्रतिस्पद्र्धा और टी.आर.पी. के दबाव में सूचनाओं को मनोरंजक और चटपटा बनाना आज के समय की विवशता भी है और चालाकी भी। सूचना का ज्ञान से परे मनोरंजन में विघटित हो जाना भी आज के समय की एक बड़ी विडम्बना है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि आज के समय में सोशल मीडिया सूचना और ज्ञान के बड़े माध्यम के रूप में उभरे हैं। इस उपलब्धता के फायदे भी हैं और नुकसान भी। यह सच है कि इन माध्यमों ने आम लोगों को अभिव्यक्ति के लिए एक लोकतांत्रिक स्पेस उपलब्ध करवाया है। पर इसका एक परिणाम यह भी हुआ है कि वहां ढेर सारे प्रामाणिक और अप्रामाणिक पोस्ट की बाढ़ सी आ गयी है जिनके बीच वास्तविक और महत्वपूर्ण तथ्यों को ढ़ूंढ़ना एक मुश्किल सा काम हो गया है। किसी एक नियंत्रण प्रणाली अथवा जवाबदेही के अभाव ने यहां कोलाहल भी फैलाया  है। लिखे हुए शब्दों की एक जवाबदेही होती है। इसलिए वहां गलत तथ्य को रखना मुश्किल होता है। यदि किसी पत्रिका में कुछ गलत छपा है तो उसकी जवाबदेही उसके संपादक पर भी जाती है। पर सोशल मीडिया के साथ ऐसा नहीं है। यही कारण है कि यहां एक तरह की अराजकता फैली हुई है। विचार विमर्श से होते हुए जब पोस्ट बनते हैं तो विवाद और उससे भी आगे बढ़ते हुए गाली गलौज तक में तब्दील हो जाते हैं – यह सोशल मीडिया की आम प्रवृत्ति बनती जा रही है।

तकनीक पर सवार तेज भागते इस समय में भोजन को फास्ट फुड में बदलने के साथ ज्ञान को भी हमने फास्ट फुड की शैली में बदल दिया है। पर जैसे फास्ट फुड आंतों के लिए खराब है, फास्ट फुड शैली का ज्ञान दिमाग के लिए भी उतना ही नुकसान दायक है। इसने हमारी चिंतन क्षमता को गड़बड़ा दिया है। दही को मथकर मक्खन निकालने की तरह ज्ञान की प्रक्रिया लम्बी होती है। इसके लिए पहले तथ्य इकठ्ठे करने होते हैं, फिर चिंतन और मनन की लम्बी प्रक्रिया के बाद तथ्य ज्ञान में बदलते हैं। सच को भी इसी तरह खोजना पड़ता है। कहने को तो सूचना प्रणाली ने सबकुछ सहज सुलभ कर दिया है। पर पैराडॉक्स यह है कि हम पहले से भी अधिक व्यस्त हो गए हैं। हमारे पास तथ्यों को छांटने-खंगालने की फुरसत नहीं बची। इसलिए आज ज्ञान आत्म मंथन की परिणति नहीं हैं,  इन्हें फॉलो और उसके बाद फारवर्ड किया जाता है। पहले भी समाज में कुछ ही लोग होते थे जो ज्ञान और अनुसंधान के लिए प्रतिबद्ध होते थे और दूसरे उनका अनुसरण करते थे। पर तब यह काम ऐसे लोगों पर छोड़ दिया जाता था जो इसके अधिकारी होते थे। समाज एक जटिल संरचना है जिसमें हर किसी की अपनी अलग भूमिका होती है। जो श्रमिक हैं अथवा जो रक्षा,  प्रशासनिक,  व्यवसाय अथवा इस तरह के कार्यों में संलग्न होते हैं उनके पास इतना अवकाश नहीं होता कि वे ज्ञान-अर्जन की प्रक्रिया में संलग्न हो सकें। इसलिए जो अपने विषय के विशेषज्ञ हैं उनपर भरोसा किया जाना चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ज्ञान की स्थिति बंदर के हाथ में आदी की तरह हो गयी है।

फॉलो में अंधानुकरण की पूरी संभावना रहती है। फॉलो और फारवर्ड के अंधानुकरण की यह प्रवृत्ति ही फेक न्यूज की जनक है। अफवाहें पहले भी फैला करती थीं पर कभी कदार ही। सोशल मीडिया के जहाज पर सवार होकर फेक खबरें बड़ी तेजी से फैलती हैं। फेक खबरें बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। वर्तमान में तेजी से फैल रही कट्टरता,  असहिष्णुता और सामाजिक हिंसा की जड़ें भी इनसे जुड़ती हैं। आम लोग ही नहीं,  पत्रकारों के पास भी फुरसत नहीं है और वे भी बिना तथ्यों की छानबीन के खबरें निकाल देते हैं। फेक खबरों के पीछे एक समूची प्रणाली काम कर रही है। किसी का व्यावसायिक हित है तो किसी का राजनीतिक और अपने अपने हितों के लिए ये सच का कारोबार कर रहे हैं।

फेक खबर झूठ का कारोबार है। समाज को यदि सुंदर,  सभ्य और सुसंस्कृत बनाना है तो ज्ञान और अनुसंधान के प्रति प्रयत्नशील होना होगा। सच को विश्वसनीय स्थलों से उठाना होगा अन्यथा झूठ का यह व्यवसाय सच का लील जाएगा। सच आज संकट में है और यह संकट कितना बड़ा है, यह कहने की आवश्यकता नहीं है।

बिहार विश्वविद्यालय के एक महाविद्यालय में सह प्राध्यापक एवं आलोचना और कथा लेखन में सक्रीय

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